Sunday, March 17, 2013

लौटकर जाता हुआ बसंत

अभी तो पिछले ही हफ्ते बच्चों को शहीद स्मारक पार्क लेकर गई थी। वहां सिर्फ टहलने की इजाज़त है, या फिर पार्क के किनारे-किनारे लगी हुई लोहे की हरी कुर्सियों पर बैठने कर प्राणायाम करने की। मेरी उम्र के कम ही लोग होते हैं वहां। ज़्यादातर इस डिफेंस कॉलोनी में रहनेवाले रिटायर्ड फौजियों और एक्स-मेमसाहबों की जमात होती है वहां। बच्चे को तो वहां जाने की बिल्कुल अनुमति नहीं है। पार्क चूंकि पार्क नहीं, शहीदों की स्मारक है, इसलिए वहां टहलते हुए भी एक डेकोरम मेन्टेन करना होता है।

शहीद कौन, फौज क्यों, देश क्या, सरहद कैसी और फाइटर प्लेन की ज़रूरत क्या के बच्चों के सवालों के जवाब देने की एक बार की नाकाम कोशिश के बाद मैं कई महीनों बाद उन्हें शहीद स्मारक ले गई थी उस दिन - इस सख़्त ताक़ीद के साथ कि पार्क का एक चक्कर लगाते हुए हम सिर्फ और सिर्फ फूलों को देखेंगे, और किसी तरह की कोई शरारत नहीं करेंगे, दौड़-भाग भी नहीं।

बच्चों को मां की ताक़ीद समझ में तो आ गई लेकिन बसंत को महसूस करते हुए बौरा जाने के बाद क्या किया जाता है, ये उन्हें क्या समझ में आता कि जब पंत सरीखे कवियों तक को समझ में ना आया! बहरहाल, हमने रंग गिने, फूल चुने, खुशबू पी ली और कचनार के पेड़ के नीचे खड़े होकर तबतक तोतों की जोड़ियां बनाते रहे जबतक कि टहलनेवालों ने क़रीब-क़रीब धकेलते हुए पार्क के बाहर नहीं पहुंचा दिया।

मैं यहां शहर के कोलाहल से छुपते-बचते हर रोज़ सुबह आते-जाते मौसमों के घटते-चढ़ते दिन की डूबती-उतराती सांसों की हरकत सुनने आती रही हूं, तबसे जबसे नोएडा में हूं। हर जाता हुआ मौसम बहुत उदास करता है और इस पार्क में मौसमें के जाने की आहटें ज़रा खुलकर सुनाई देती हैं। ओखला बर्ड सैंक्चुअरी से रास्ता भटकर आ पहुंचे साइबेरियन क्रेन्स सर्दियों के आने की ख़बर लाते हैं तो सूखता हुआ डालिया गर्मियों की दस्तक ले आता है।

बच्चों ने और मैंने बसंत को अपने चरम पर देखा था उस दिन। पॉपी के फूल अपने नशे में चूर थे। डालिया ने इस अदा से गमलों के बाहर अपनी गर्दन निकाल रखी थी कि उनमें मोच ना आती तो मुझे हैरानी होती। मोगरे की खुशबू अपने पूरे शबाब पर थी (अगर खुशबू की तस्वीर खींची जा सकती तो मैं वो भी कोशिश करती उस दिन)। हम लाइलैक का रंग देखकर हैरान थे, ऐसे हैरान कि आद्या घर लौटकर अपने क्रेयॉन्स के डिब्बे में बड़ी देर तक वो रंग ढूंढती रही थी। नीम के कुछ सूखे हुए पत्तों को आदित ने अपनी जेब में भर लिया था और हम सड़क के किनारे खड़े होकर अपनी मुट्ठियों में उन्हें मसलते हुए किस्म-किस्म की आवाज़ निकालकर खिलखिलाते रहे थे। वो बसंत का एक हसीन, ख़ुशमिज़ाज दिन था।

आज सब वीरान था, उजड़ने के कगार पर खड़ा। आपके शहर के बाहर पसरे रेगिस्तान से चल निकली धूलभरी आंधियां यहां भी पहुंचती ही होंगी, मैंने उदास होकर अपनी बड़ी ननद को फोन पर कहा था।

बसंत चुपचाप अपना साजो-सामान बांधने में लगा है। फूलों ने उदास होकर खिलना छोड़ दिया है। सेमल ने नाराज़ होकर अपने सैंकड़ों फूल ज़मीन पर फेंक दिए हैं। कचनार ने फूलों का गहना उतार दिया है। अब पत्तों से श्रृंगार की बारी है। कोने में खड़ा एक टेसू है जो गर्द-ओ-गुबार से निडर यूं ही खड़ा रहेगा, कम-से-कम तबतक कि जबतक अमलतास और गुलमोहर मोर्चा ना संभाल लें।

इस जाते हुए बसंत के लिए उदास होते-होते रह गई। इस कमबख़्त की तो फ़ितरत ही ऐसी है। मनमोहना आता ही दो-चार-दस दिनों के लिए है। आता भी इस अदा से है कि जैसे पूरी दुनिया को दीवाना बनाने में ही इसके अहं को तुष्टि मिलती हो। प्यास बढ़ाने आता है, प्यास बुझाने का कोई उपाय नहीं करता। आंखों पर रंगों के परत-दर-परत ऐसे पर्दे डालता है कि सच-फ़रेब, सही-गलत कुछ नज़र नहीं आता। ऋतुओं का राजा कहलाने भर के लिए हर तरह की चालबाज़ियां, हर तरह के छल-कपट करेगा। अगर इसकी बातों में आ गए तो ख़ुद को नाकाम समझ लीजिए। ऐसे दिलफेंक, आशिकमिज़ाज, किसी के ना हो सकनेवाले छलिया बसंत के लिए क्या उदास होना?

हम तो ख़ुद को गर्मी के लिए तैयार करेंगे। यूं भी विरह की आग में जलनेवालों को कुछ भी अब जला नहीं सकता। बिस्तर को रज़ाईयों और कंबलों से आज़ाद कर हल्का करेंगे। अलमारियों में हल्के रंगों के लिए ढेर सारी जगह बनाएंगे। धूप को आम की मिठास से बर्दाश्त करने लायक बनाएंगे। कोयल को गीत गाने के लिए आज़ाद करेंगे और कौऔं को उनपर औचक आन पड़ी कोयल के अंडों को सेने की ज़िम्मेदारी के लिए तैयार करेंगे। बालकनी में दो की बजाए चार रोटियां और पीने का थोड़ा-सा पानी डाल आएंगे। लंबे हो गए दिन का लुत्फ़ उठाएंगे और ख़ूब सारा बाकी काम निपटाएंगे।

जा जा बसंत, अपने घर जा। सुना नहीं कि जो तपता है, कुंदन होकर वही निखरता है?

6 comments:

anjusambhi said...

बसंत अपना चुपचाप सामान बाँधने में लगा है ...कोने में खड़ा एक टेसू है ...बहुत सुंदर विदाई लिखी , हम उदास हैं पर नहीं हैं क्योंकि और भी मौसमों का इंतजार है ...बहुत सुंदर ...Anu

Arvind Mishra said...

Vaah,a passage like the morning breaze....very touching and eloqent! A perfect ' Lalit Nibandh'!

प्रवीण पाण्डेय said...

अपना सौन्दर्य दिखा तो जाता है, शान्ति और ताप, क्रम हैं, एक एक कर आते हैं...सुन्दर प्रवाह...

Ramakant Singh said...

बेहतरीन खुबसूरत ही नहीं नायाब मनकों की तरह लाजवाब

वाणी गीत said...

हर रुत का अपना मजा , अपना नशा ... जीवन चलने का नाम !

Rahul Singh said...

मुश्किल है शहरों में बसंत तलाश पाना. आसानी से न आना पता लग पाता न जाना. कितने कर पाते हैं स्‍वागत और विदा.