Saturday, March 16, 2013

आओ एक बात मैं कहूं तुमसे

आद्या और आदित,

आज आपने मम्मा को कई बार हैरान किया है। मैंने गाड़ी रोकी तब नो स्टॉपिंग, नो पार्किंग के बोर्ड को पढ़कर... सामने गुज़रते ऑटो की पीठ पर छपी शायरी को पढ़ने की कोशिश करके... बिना रुके जैक एंड द बीनस्टॉक की कहानी पढ़कर... और मेरे फेसबुक पर आते ही "आप काम नहीं, फेसबुक कर रही हैं मम्मा" कहकर! मुझे आज एक लंबे सफ़र के सबसे मुश्किल माईलस्टोन्स में से एक तक पहुंच जाने का गुमां हो रहा है। ये भी मुमकिन है कि आप दोनों जल्द ही ममा की डायरी और उनकी लिखी हुई असंख्य चिट्ठियां भी पढ़ने लगो। तब, ए और ए, मेरा लिखना - मेरा ये सारा आत्मालाप सार्थक हो जाएगा।

आदू और आदि, इससे पहले कि तुम बाकी की चिट्ठियां पढ़ो, मैं तुम दोनों के लिए इस पन्ने पर कुछ बुलेट प्वाइंट्स छोड़ देना चाहती हूं। ये मेरे अपने गिरने-संभलने-चोट खाकर सीखने का निचोड़ कहा जा सकता है। इसे मेरी सीमित समझ का आईना भी मान सकते हो। फिर भी जो जानती हूं, तुम्हारे लिए यहां समेट रही हूं।

  • ज़िन्दगी की प्रयोगशाला में किए हुए सभी प्रयोगों का नतीजा सार्थक और कारगर ही हो, ज़रूरी नहीं। तुम्हारे किए हुए किसी प्रयोग से, तुम्हारी किसी गलती से प्रयोगशाला में आग भी लग जाए तो भी सच और फ़रेब, गायब और हाज़िर, दृश्य और अदृश्य, पाप और पुण्य, स्याह और सफ़ेद के साथ प्रयोग करना मत बंद करना।
  • प्यार कई बार होगा और हर बार जिससे भी प्यार करो, उतना ही टूटकर, उतनी ही ईमानदारी से प्यार करना। बाबा से प्यार करना। एक-दूसरे से प्यार करना। अपने दोस्तों से प्यार करना और उससे भी ज़रूरी, ख़ुद से प्यार करना। मोहब्बत लेकिन सिर्फ एक बार करना।
  • जो अगर मोहब्बत हो जाए, तो निभाने के लिए ख़ुद की भी सीमाएं तोड़ जाना। मोहब्बत होगी तो सुबह का अख़बार महबूब को पहले पढ़ने देने और आधी नींद में डूबे महबूब के सिरहाने चाय की प्याली रखने में कोई कोफ़्त नहीं होगी। मोहब्बत होगी तो शुद्ध शाकाहार में यकीन करते हुए भी चिकन बनाना आ जाएगा। गंदी ज़ुराबों की आदत होते हुए भी अलमारियां साफ़ रखना आ जाएगा। कम-से-कम कोशिश करना तो आ ही जाएगा।
  • महबूब तुम्हारे नाम की कद्र करेगा और तुम उसके नाम की। जिस दिन वो कद्रदानी मरने लगे, उस दिन किसी काउंसिलर से मिल लेना।
  • बेवजह मदद करना। हर बात के पीछे कोई वजह हो, ज़रूरी नहीं। हर रिश्ता स्वार्थ का होता हो, ये भी नहीं होता।
  • ज़रूरत पड़ने पर मदद मांगने से घबराना मत। रिश्तों की नींव गिव एंड टेक की होती है, और इसके साथ हमेशा नकारात्मक अर्थ ही जुड़ा हो, ये ज़रूरी नहीं।
     
  • हर मोड़ पर ऐसे लोग मिलेंगे जो तुम्हारा फ़ायदा उठाएंगे (और उठाएंगे ही। अच्छे लोगों का सब फ़ायदा उठाते हैं।) लोग तुम्हें धोखे भी देंगे। तुम्हारे साथ फ़रेब भी करेंगे। उनकी फ़ितरत तुम नहीं बदल सकते, लेकिन अपनी फ़ितरत भी मत बदलना। उन्हें ये सोचकर माफ़ कर देना कि तुमसे बड़ा फ़रेब वे खुद के साथ करते हैं। उन्हें अपनी दुआओं में ढेर सारी जगह देना और इस बात पर यकीन रखने की कोशिश करना कि दुनिया में इंसान ज़्यादा हैं और लोग कम।
     
  • किसी बात का अफ़सोस मत करना। फिर भी अफ़सोस हो तो वो काम दुबारा मत करना। ये तुम्हारी मुक्ति का इकलौता रास्ता है। 
  • प्यार बचाए रखना, हर क़ीमत पर। प्यार बचा रहेगा तो भरोसे और उम्मीद को भी जगह मिलती रहेगी।
  • किसी से नफ़रत मत करना। उदासीनता और बेरूख़ी ज़्यादा कारगर हथियार हैं।
     
  • ईश्वर पर यकीन रखना और अपने ईश्वर का स्वरूप ख़ुद तय करना।
  • मेरी किसी भी बात को याद मत रखना। किसी बात को भी नहीं। ज़िन्दगी की प्रयोगशाला में किसी और के प्रयोगों के आधार पर बनाए गए नोट्स थ्योरी में पास करा सकते हैं, प्रैक्टिल में नहीं। उसके लिए अपने रसायन, समीकरण और उत्प्रेरक खुद ही चुनने होंगे। उसके लिए प्रयोग भी खुद ही करने होंगे।  हां, हमारे प्रयोगों के नतीजों से शायद तुम्हें तत्वों के रासायनिक गुण समझने में मदद मिले।
बाकी अगली चिट्ठी के लिए।

बहुत बहुत सारे प्यार के साथ
तुम्हारी ममा

8 comments:

Arvind Mishra said...

माँ के पत्र बेटे बेटी के नाम:-) अनंत उत्तरजीविता का उपक्रम!

Ramakant Singh said...

आपकी चिट्ठी हमने पढ़ी अच्छी लगी हम जीवन भर याद रखेंगे ही नहीं अमल भी करेंगे ..

Sushil Girdher said...

Excellent Selection of Words,......I read it 4-5 times and still reading again in last half an hour....congrats for such a write up

ब्लॉग बुलेटिन said...

आज की ब्लॉग बुलेटिन ताकि आपको याद रहे - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

प्रवीण पाण्डेय said...

बड़ी प्यारी और सीखभरी चिठ्ठी..अनुभव से इन वाक्यों की मधुरता धीरे धीरे बढ़ती ही जायेगी।

PD said...

आप तो वही बातें कह रही हैं जो पापा से सुनता रहा हूँ. एक शब्द भी इधर से उधर नहीं.

देवांशु निगम said...

Excellent Anu Ji, Once again I am speechless !!!!

संजय मिश्र के एक इंटरव्यू में पढ़ा था कि मैं चाहता हूँ कि जब मरूं तो लगे कि एक बेहतर समाज बना के जा रहा हूँ | जो बातें आपने लिखी हैं वो उसी बेहतर समाज बनाने की दिशा में उठा कदम है क्यूंकि हर समाज की शुरुआत हमसे और हमारे परिवार से होती है |

वन्दना अवस्थी दुबे said...

अच्छा किया ये पॉइंट्स यहां छोड़ के...