Wednesday, May 11, 2011

दर्द और दवा

मैं परेशां हूं
दर्द से जिस्म तार-तार है
पैरों में क्यों लगती नहीं ताक़त
मन है कि सबसे बेज़ार है।

दोपहर चलती है कराहकर
रातों से नींद फ़ाख़्ता है
दिन जख़्मी है,
शाम भी लगती बीमार है।

घूमता है सिर
या सिर के ऊपर घूमता है पंखा
गोल-गोल है दुनिया
घूमती लगती दर-ओ-दीवार है।

जिस्म से चुनती हूं
दर्द के तार जब,
कमरे में घुसे हैं ताज़े झोंके की तरह,
इन दोनों से कायम संसार है।

मेरी पेशानी पर
वो रखते हैं हाथ,
पूछते हैं धीरे-से,
"मां, क्या तू बीमार है?"

क्यों पिघलता है दर्द,
कैसे आती है ताक़त शरीर में,
बोलती हूं - मेरे लिए तो
अचूक दवा, बच्चों, तुम्हारा दीदार है!

3 comments:

Manoj K said...

hope to see u well soon.

Patali-The-Village said...

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति| धन्यवाद|

मीनाक्षी said...

भावभीनी रचना...