Tuesday, May 10, 2011

लिखना... मेरा लिखना

क़तरा-क़तरा,
लम्हा-लम्हा,
जो बिखरा है
इधर-उधर
उसे सहेजना,
समेटकर रखना
मेरा ही तो काम है।
लफ़्जों में
जो फिसलते नहीं
ज़ुबां से कई बार
वो उतरे, बिखरे,
बरसे काग़ज़ पर
उस सावन की तरह
जिसका मक़सद
हरा कर देना है
मन को भी,
ख्वाबों की
बंजर ज़मीं को भी।

5 comments:

Manoj K said...

aapke yeh shabd man ko yun hi hara karte rahein..

udaya veer singh said...

A creation by heart with liable feelings .thanks .

anupama's sukrity ! said...

beautiful expression .
carry on ...!!

Kishore Choudhary said...

Bahut sundar !

Manish Kumar said...

वाह !