Tuesday, March 8, 2011

हिम्मत, जो कमज़ोर नहीं पड़ती

स्वीडन की एक महिला पत्रकार के साथ महाराष्ट्र के वाशिम ज़िले के एक गांव में हूं। हम विदर्भ में महिलाओं के स्वयं सहायता समूहों पर एक फीचर के लिए महिलाओं से बातचीत कर रहे हैं। ये वो इलाका है जहां के 95 फीसदी किसान कर्ज़ के बोझ तले दबे हैं और हर गांव में कम-से-कम एक परिवार ऐसा है जहां परिवार के मुखिया ने आत्महत्या की है। "कई समस्याएं हैं," एक महिला कहती है, "पानी नहीं है, बिजली नहीं है, खेती के लिए पैसे नहीं है, अस्पताल दूर है।" "लेकिन दीदी, हमें ये बताइए कि हम अपने पैरों पर कैसे खड़े हो सकते हैं," कमरे में पीछे से किसी महिला की धीमी-सी, लेकिन आत्मविश्वास से लबरेज आवाज़ सुनाई देती है। "हम पापड़, अचार, अगरबत्ती बनाना सीखना चाहती हैं, कुछ पैसे कमाना चाहती हैं", बातचीत का सिलसिला जारी रहता है। बेशक गांव की महिलाओं के आत्मविश्वास और स्वावलंबी होने की इस आकांक्षा को किसी स्वयं सहायता समूह से जुड़ जाने पर और ताकत मिली है। लेकिन आख़िर हर महिला में भी अपने हालात बदलने की पुरज़ोर ख़्वाहिश होती होगी जो उन्हें एक समूह से जुड़कर और मज़बूत बनने के लिए प्रेरित करती है।

 मेरे सामने महिला शक्ति की ऐसी कई मिसालें हैं - हर उदाहरण अपने आप में एक पदक पाने के काबिल। पुरुष वर्चस्व और पितृसत्ता पर लंबी बहस की यहां आवश्यकता नहीं। इस बैठक में मौजूद हर महिला अपनी हैसियत जानती है। बिना किसी चुनौतीपूर्ण व्यक्त्व्य के अपने परिवार और अपने आस-पास के लिए हालात बदलने का इनका जज़्बा महिला दिवस के नाम स्त्री-विमर्श और सशक्तिकरण पर हर साल लंबी-लंबी बहस छेड़ने वाली हम जैसी महिलाओं के लिए एक प्रेरणा है।

मेरे घर काम करनेवाली देवी सुबह से शाम तक जिस चक्की में पिसती है, उसकी लकीरें बाहर से नज़र नहीं आती। महिला सशक्तिकरण उसके लिए कोई मायने नहीं रखता। शारीरिक रूप से श्रमसाध्य और मानसिक रूप से निर्भीक होकर उसके लिए अपना काम करते जाना, महीने के आखिर में घर चलाने और बच्चों को स्कूल भेजने के लिए चंद रुपए कमा लेना ही ज़िन्दगी का एकमात्र मकसद है। पड़ोस में एक स्टेशनरी दुकान चलानेवाली महिला ने कभी अपना दुखड़ा किसी के सामने नहीं रोया, उनकी कहानी हमने टुकड़ों-टुकड़ों में सुनी भर है।

मुझे हर उस महिला की हिम्मत हैरान करती है जो हर रोज़ अपने घर-परिवार-बच्चों की ज़िम्मेदारी संभालते हुए अहले-सुबह काम के लिए निकल जाया करती है। हर वो लड़की ब्रेवरी अवॉर्ड की हकदार लगती है जो बसों, ट्रेनों, रिक्शों, सड़कों पर चलते हुए छेड़छाड़ और शोषण का शिकार होती है, लेकिन फिर भी घर से निकलने की हिम्मत रखती है। हर उस महिला के लिए मेरे मन में असीम श्रद्धा है जिसने अपनी महत्वकांक्षाओं और प्रतिभाओं को ताक पर रखकर परिवार के लिए खुद को समर्पित कर दिया।

बैठक से निकलने के बाद मेरी स्वीडिश महिला पत्रकार सोफी से बातचीत जारी रहती है। सोफी मुझे माया एंजलो की कविता "फिनोमिनल वूमैन" की पंक्तियां सुनाती है। इन असाधारण महिलाओं, फिनोमिनल वूमैन, की तस्वीरें किसी अखबार, किसी पत्रिका के मुखपृष्ठ पर छपें ना छपें, अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की सही तारीख की इन्हें जानकारी हो या ना हो, असाधारण तो ये तब भी रहेंगी। तमाम चु्नौतियों के बीच इनकी जीवटता हर रोज़ के संघर्ष से निखरती है।

6 comments:

नीरज बसलियाल said...

Inspirational ... phenomenal post.

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बहुत सार्थक लेख ...प्रेरणादायक .

कौशलेन्द्र said...

एक कहावत थी 'बातें कम और काम ज्यादा" ....आपके लेख के बाद कहना पडेगा -"बातें नहीं काम ही काम "
वाकई रोज के संघर्षों के लिए घर से तैयार होकर निकलने वाली हर लड़की ...हर महिला मेडल की हक़दार है. अगर हम उनके संघर्षों को किंचित भी कम कर सकें तो महिला सशक्तीकरण दिवस मनाने की आवश्यकता ही नहीं रहेगी

Manoj K said...

महिला दिवस पर एक सार्थक पोस्ट. आज के दिन आपके अनुभव सोचने पर मजबूर करते हैं..

आपके फीचर और उससे जुडी बातों का इन्तेज़ार रहेगा.

मनोज

प्रतिभा सक्सेना said...

'महिला-दिवस'के नारे एक दिन लग कर चुप हो जायेंगे ,जिन को सचमुच दिशा निर्देश की जरूरत है कि उनके हाड़-तोड़ श्रम का सही प्रतिफल उन्हें मिल सके उन्हें पता भी नहीं चलेगा.बिना एक भी दिन की छुट्टी लिये हमारे घरों में काम करनेवाली स्त्रियों को कौन सचेत करेगा ?

Udan Tashtari said...

प्रेरक...