Friday, March 4, 2011

कुकिंग बनाम राइटिंग


बारहवीं के इम्तिहान खत्म हुए और मां ने सोचा, लड़की को खाना-वाना बनाना सीखा दिया जाए। घर में तो ये चौके में घुसने से रही सो, मुझे कुकिंग क्लास के लिए भेज दिया गया। कुकिंग क्लास का नाम आ-ला-कार्ट। तंदूरी, दक्षिण भारतीय, मुग़लई, कॉन्टिनेन्टल, इटालियन, लेबनीज़, जापानी, ग्रीक, मेक्सिन.... हर तरह के कुइज़िन में से आपके पास कोई भी, या फिर हर तरह की कुकिंग सीखने का विकल्प।

पापा को मेरा कुकिंग क्लास जाना बिल्कुल नहीं सुहाता था। "खाना बनाना भी कोई सीखने वाली चीज़ है? अच्छा खाना खाने का शौक हो तो आप कुछ अच्छा बना ही लेंगी। पढ़ना-लिखना सीखिए, वो काम देगा आगे।" पापा ने फ़रमान जारी कर दिया। इतना ही नहीं, हर रोज़ एक पन्ना लिखने की आदत भी डाल लो, कह दिया उन्होंने। सो वो गई बोर्ड के बाद की छुट्टियां और मस्ती करने की शाही योजनाएं पानी में। मैं कुकिंग और राइटिंग के बीच का कोई संतुलन ढूंढने में ही रह गई।

कुकिंग और राइटिंग की तुलना क्यों? क्योंकि दस साल पहले तक ये दोनों करियर ऑप्शन के तौर पर नहीं देखे जाते थे, हॉबी के तौर पर देखे जाते थे। लेकिन अब तो "मास्टरशेफ" आपको मशहूर बना देता है, पच्चीस साल की उम्र में मीनाक्षी माधवन और अद्वैता काला बेस्टसेलिंग राइटर बन जाते हैं। वैसे राइटिंग या कुकिंग एक-दूसरे से बहुत अलग तो हैं नहीं। खाना बनाना शुरू करते हुए किचन में आप पहले अपने लिए एक्सपेरिमेंट करते हैं, फिर आत्मविश्वास बढ़ते ही दूसरों को अपना कुक किया हुआ खाना सर्व करते हैं। ठीक वैसे ही जैसे लिखना शुरू तो हम स्वान्तः सुखाय करते हैं, लेकिन धीरे-धीरे अपना लिखा हुआ दूसरों को भी पढ़ाना चाहते हैं। जैसे हर पैलेट को अलग-अलग स्वाद भाता है, वैसे ही हर पाठक की भी पसंद अलग-अलग होती है। कुकिंग का स्टाईल एक जैसा नहीं हो सकता, राइटिंग का भी नहीं। बेशक हम राइटिंग और कुकिंग, दोनों को एक रेसिपी फॉर्मैट में डाल दें। कुकिंग बुफे और आ-ला-कार्ट, दोनों तरीके से सर्व किया जाता है। राइटिंग भी। कुकिंग और राइटिंग, दोनों लिहाज़ से फीडबैक चाहते हैं हम। एक और बात। जैसे कुकिंग को धीमी आंच और धैर्य बेहतर बनाते है वैसे ही राइटिंग के लिए भी खुद को तपाना होता है - धीमी आंच पर। 

जहां तक मेरा सवाल है, कुकिंग और राइटिंग के लिहाज़ से मेरा ध्येय तय था। राइटिंग करूंगी एक हिंदुस्तानी थाली की माफ़िक, जिसमें सूखे पुलाव या चावल को गीला करने के लिए दाल हो, तरी भी। कभी मुंह का स्वाद सूखी भुजिया बदले, कभी अचार-चटनी चटपटापन लाए। कभी पापड़ जैसा करारा लेखन हो, कभी सलाद जैसा हेल्दी और ज़रूरी। कुकिंग तो सेवन कोर्स मील ही करना चाहती थी – एकदम सेफ कुकिंग। खानेवाले को अपेटाइज़र पसंद ना आया, तो शायद सूप अच्छा लग जाए। सलाद के मामले में तो सुरक्षित बच ही जाऊंगी। कोई एक डिश तो ऐसा होगा जो मेरी नाक कटने से बचा लेगा। नहीं तो सोरबे टाईप का पैलेट रिफ्रेशर मुंह में जाते ही पिछले स्वाद की नाकामियां घुल जाएंगी। डेज़र्ट तक आते-आते पब्लिक वाह-वाह कर रही होगी। लेकिन दुर्भाग्य ऐसा कि दोनों फाइनल लक्ष्य गड्ड-मड्ड हो गए। अब होता यूं है कि हिंदुस्तानी थाली बोतलबंद अचार, धनिया-पुदीने की चटनी, अरहर की दाल और आलू की भुजिया के साथ तो मैं बना ही लेती हूं, लेखन ऐसा खांटी नहीं हो पाता। बल्कि सब उलटा हो गया। लगता है, राइटिंग ही सेवन कोर्स मील टाईप करती हूं। ये नहीं तो वो अच्छा लिख ही डालूंगी!

वैसे एक और राज़ की बात साझा करती हूं यहां। मेरी हिंदुस्तानी कुकिंग से मेरे घरवाले इतना ही कतराते हैं कि कहते हैं, "अपनी एक कविता ही सुना दो। खाना हम बना लेंगे।" लेकिन आपके लिए दुआ करती हूं कि काग़ज़ पर आपकी कलम और कढ़ाही में आपका पलटा अनवरत चलते रहें। आख़िर राइटिंग और कुकिंग, दोनों में महारत हासिल करने में क्या बुराई है?

3 comments:

नीरज बसलियाल said...

I do both

AWADHESH KUMAR SINGH said...

What a writing concept.I will call it "Good KHiCHDI" which contains - Indian taste and food culture compared to develop writing skill and off course projecting typical Indian culture - girl child means "Ghar, Grihasti aur Chulha". Just superb..

Manoj K said...

भाई हम अगर आपके घर आयें तो आपकी कविता तो सुनेंगे ही साथ ही आपके हाथ का बना खाना भी खायेंगे, क्योंकि हम खानाबदोश ओगोन को घर के खाने से अच्छा कुछ नहीं लगता :)