Wednesday, February 24, 2010

लक्ष्य

राजू तेज़ी से अपनी टोकरी संभालने में लग गया। हटिया-दिल्ली स्वर्ण जयंती एक्सप्रेस के पहुंचने का वक्त हो चला था। मुरी स्टेशन पर लगातार खियाई हुई आवाज़ में उदघोषक ट्रेन के प्लेटफॉर्म नंबर दो पर आने की सूचना दोहराए जा रहा था।

यहां से बोकारो तक झालमुढ़ी बेचकर राजू की अच्छी कमाई हो जाती है। फिर वो गया या पटना की ओर से आनेवाली कोई ट्रेन पकड़कर वापस मुरी पहुंच जाता है। भूख लगी तो प्लेटफॉर्म पर ही कहीं से चाय-पावरोटी खरीदी और खोमचे को माथे से लगाए, दाहिने हाथ से कसकर जकड़े हुए बाएं हाथ का तकिया बनाकर सो रहना - कई रातें तो ऐसे ही स्टेशनों पर कटती हैं। परिवार के नाम पर एक बूढ़ी दादी है जो मुरी स्टेशन के बाहर भीख मांगती है। होश संभाला तब से राजू को दादी को ऐसे ही देखा है, इतनी ही बूढ़ी, ऐसी ही मलिन, इतनी ही झुकी हुई। प्लेटफॉर्म राजू का घर है, और बाहर की जो दुनिया उसने देखी है, ट्रेन के डिब्बों में बैठे रंग-बिरंगे मुसाफिरों के रूप में देखी है। हां, एक नया जानकार बना है राजू का। खुद को असलम भैया बताता है। साफ-सुथरे कपड़े, हाथ में कपड़े का झोला, झोले से बाहर झांकती किताबें और पत्र-पत्रिकाएं - सूरत-सीरत से तो असलम भैया किसी इज़्जतदार घर के होनहार वारिस नज़र आते हैं। लेकिन प्लेटफॉर्म पर लावारिसों के बीच बैठना, बातें करना और एक छोटी-सी बही में लाल स्याही से कुछ लिखते रहना, राजू के हिसाब से असलम भैया को ये शोभा नहीं देता।

आज फिर असलम भैया ने पकड़ लिया था उसे। एक लंबी सूची लिए उससे सवाल पूछने बैठे। नाम, पता, उम्र, पढ़ाई... अब बताओ भला। प्लेटफॉर्म पर घर बनानेवालों के आगे-पीछे भी कोई होता है क्या। अब असलम भैया एक और सवाल बार-बार पूछे जा रहे थे। "लक्ष्य राजू लक्ष्य, मकसद क्या है जीने का। कुछ तो करना चाहते होगे ज़िन्दगी में। आखिर लक्ष्य क्या है तुम्हारा?" ये लक्ष्य कौन से नए परिंदे का नाम है। हमारा लक्ष्य क्या होगा। झालमुढ़ी बेचना, एजेंटों को खोमचे की कमाई से वक्त पर हिस्सा पहुंचाना, दादी का पेट भरना और चैन की नींद सो जाना। इसके परे तो राजू ने दुनिया जानी ही नहीं।

भला हो असलम भैया का। आज उनके चक्कर में स्वर्ण जयंती छूटते-छूटते रह गई। सबसे ज्यादा कमाई इसी ट्रेन से होती है राजू की। लोग खा-पीकर रांची स्टेशन से चढ़ते हैं। मुरी तक पहुंचते-पहुंचते चाय और नाश्ते की तलब सताने लगती है। फिर झालमुढी के साथ चाय पीने का मज़ा ही कुछ और है।

राजू ने एस७ से शुरुआत की। ट्रेन करीब-करीब खाली थी। ऑफ-सीज़न था। लोग छुट्टियों, त्योहारों या दाखिलों के दौरान ज्यादा सफ़र करते हैं। लेकिन अगस्त में तो सफर करने की ऐसी कोई वजह कम ही होती है लोगों के पास। पूरे डिब्बे में किसी ने झालमुढ़ी नहीं खरीदी। राजू अगले डिब्बे की ओर बढ़ा। "मुढ़ी, मुढी, झालमुढ़ी...", हर कूपे पर रूककर राजू बड़ी उम्मीद से आवाज़ लगाता, लेकिन आज जैसे पूरी ट्रेन किसी मातमपुरसी के लिए जा रही थी। ना किसी को चाय पीनी थी ना मूढ़ी खानी थी।

तभी पीछे से एक बच्चे के रोने की आवाज़ आई। "नहीं खाएंगे। चावल भी नहीं, अंडा भी नहीं, पराठा भी नहीं। कुछ नहीं खाएंगे।"

मां बिचारी फिर मनुहार में लगी रही। "बाबू, एक कौर। सोना, एक बार मुंह में डाल लो।"

"नहीं, नहीं, नहीं।" बच्चा अपनी जिद पर कायम था।

"आंटी, बाबू को झालमुढ़ी खिलाईए ना। मुंह का स्वाद बदलेगा। एकदम इस्पेसल बनाएंगे बाबू के लिए। बिना मिर्ची वाला। मुढ़ी से पेट भी भरेगा। एक दोना बनाएं क्या?"

"नहीं रे भाई। ई सब अंट-संट हम बाबू को नहीं खिलाते हैं। पेट खराब होगा इसका। देखते हो, मिनरल वाटर भी खौलाकर देते हैं बाबू को। झालमुढ़ी नहीं। आगे ले जाओ।"

राजू फिर भी बड़ी उम्मीद से बच्चे को देखता रहा। क्या पता बच्चे की ज़िद में ही सही, उसकी बोहनी हो जाए।

तभी उसे करीब-करीब धक्का देते हुए पीछे से एक और खोमचेवाला निकला। टोकरी में सजे हुए रंगीन पैकेट - कुरकुरे, लहर नमकीन, अंकल चिप्स, चॉकलेट, केक, बिस्कुट और ना जाने क्या क्या। उसे देखते ही बच्चे का चेहरा कुछ यूं खिला जैसे सूरज को देखकर सूरजमुखी का खिलता है। बच्चे से झट से कुरकुरे की फरमाईश कर डाली। उबला हुआ मिनरल वॉटर पिलानेवाली मां ने बच्चे की इच्छा पूरी करने में बिल्कुल देर नहीं की।

राजू को भी ज़िन्दगी का लक्ष्य मिल गया था। कल असलम भैया से मिलेगा तो कहेगा कि उसकी ज़िन्दगी को भी मकसद मिल गया है। वो झालमुढ़ी की जगह अब कुरकुरे और चिप्स बेचना चाहता है!

2 comments:

Sanjeet Tripathi said...

ye hamare samay ka kadwa sach hai......sehmat hu is se

अनूप शुक्ल said...

कड़वा और कुरूप सच!