Tuesday, July 8, 2014

कई फ़ितूर और 'नीला स्कार्फ'

मैं भुवनेश्वर से पुरी के रास्ते में थी जब नताशा का मेसेज आया था – व्हॉट्सऐप्प पर। कुछ तस्वीरें थीं – उस अनारकली की, जो मैं बनवाना चाहती थी। एक के बाद एक कई मेसेज आए – उसके आईफोन से ली हुई तस्वीरों के। एक तस्वीर मेरे ज़ेहन में अटक ही गई बस, उस तस्वीर में मैनेक्वीन की गर्दन में बेतरतीबी से पड़े दोरंगी नीले दुपट्टे की तरह।

मैंने नताशा को वापस जवाब भेजा, "ये अनारकली चाहिए और ये तस्वीर भी। अपनी पहली किताब की कवर पेज के लिए।"

बात मार्च की है, और मेरे दिमाग में कहानी-संग्रह को पूरा करने का ख़्याल खलबली मचाए थे। मैं जहाँ-जहाँ जाती थी, वो ख़्याल साथ जाया करता था। एक किस्म के फ़ितूर की तरह। बेशक काम नहीं किया करती थी इस ख़्याल पर, लेकिन फ़ितूर तो था।

उम्र के पैंतीस गर्मी-जाड़ा, सूखा-बाढ़ और सूनामी देख लेने के बाद मैं एक बात पूरे यकीन के साथ कह सकती हूँ – एक फ़ितूर न होता तो दुनिया में क्रांतियां न आया करतीं। वक़्त फ़िसलता रहता किसी चिकने से रास्ते पर घूमते पहिए की तरह, और हमारे पास जानने-सुनने को किसी किस्म का इतिहास न होता।

ये कमबख़्त फ़ितूर कई चीज़ें करा लेता है इंसानों से।

मुझसे कहानियाँ लिखवा लीं इसी फ़ितूर ने। इसी फ़ितूर ने मेरी अच्छी-खासी आर्टिस्ट-राईटर दोस्त को ऑन्ट्रप्रॉन्योर और बिज़नेसवूमैन बना दिया। इसी फ़ितूर ने व्हॉट्सऐप्प पर आई उस तस्वीर को किताब के कवर पेज तक पहुंचा दिया जो दरअसल मेरे ही एक कुर्ते, मेरे ही एक दुपट्टे की तस्वीर है। 'नीला स्कार्फ' भी तो उस तस्वीर, उन कपड़ों की तरह आख़िर मेरे ही वजूद के जिए हुए अनुभवों का कई टुकड़ा है। 

'नीला स्कार्फ' कई मायने में ख़ास है। ख़ास इसलिए कि इसे बनाते हुए हमने अनजाने में कई अनकन्वेंशनल रास्ते अख़्तियार किए। 'नीला स्कार्फ' का इस मुकाम तक पहुंचना एक लिहाज़ से आउट ऑफ द बॉक्स सोचकर ख़तरे उठाने वाले चार अजूबा फ़ितूरियों की सच्ची कहानियां भी है।

मिलिए अजूबा नंबर एक से। अनु सिंह। लिखने का शऊर नहीं था, गलतफ़हमियां थी कईं। लिखना ज़रूरत से ज़्यादा मजबूरी बनता गया एक वक़्त के बाद, और फिर जेबखर्च का ज़रिया भी। लिखने के फ़ितूर ने ब्लॉग दिया, ब्लॉग ने दोस्त दिए, दोस्तों ने काम के ज़रिए दिए, काम के ज़रिए मिले तो ठीक-ठीक समझ में आया कि कैसे, कब और कहां, किन लोगों के साथ काम करना चाहती हूं। लोग मिले तो भरोसा आया। भरोसा आया तो रास्ते पता नहीं किस-किस मोड़ से होते हुए निकलते चले गए। अनु सिंह इस लिहाज़ से अनकन्वेंशनल है क्योंकि वो कहीं भी किसी एक रूप में मुकम्मल नहीं। अनु सिंह का लिखना भी मुकम्मल नहीं। टुकड़ों-टुकड़ों में कई वजूदों के बीच कई कामों के साथ बिखरी-बिखरी ज़िन्दगी समेटना, और उस बीच लिखते रहना, हर रोज़ का रोज़गार है। रोज़गार भी यही है, और ज़िन्दगी से भिड़ने का हथियार भी यही।

मिलिए अजूबा नंबर टू से। शैलेश भारतवासी। अव्वल दर्ज़े के फ़ितूरी। एक फ्लिपकार्ट, एक इंफीबीम के सहारे एक टाइटल की पाँच सौ प्रतियाँ छापकर हिंदी के बेस्टसेलर लेखक तैयार करने चले हैं। ढूंढ-ढूंढकर लेखक निकालते हैं। रेगिस्तान-नखलिस्तान, समंदर-मैदान, पहाड़-पठार, महागनर-देहात – कुछ भी नहीं बख़्शा इन्होंने। जहाँ किसी के लेखक होने का एक आना भरोसा भी हुआ नहीं कि जी-जान लगा बैठे। महाराज, ऐसे पब्लिशर का बेड़ा गर्क होगा, ये चित्रगुप्त महाराज ने अपनी कलम को अपने ही ख़ून में डुबो-डुबोकर बड़े-बड़े अक्षरों में लिख दिया है। सातवें आसमां पर जब इनके कर्मों का लेखा-जोखा प्रस्तुत होगा तो नर्क की सज़ा सुनाई जाएगी इनको। हिंदी पठन-पाठन की अलौकिक शांति में व्यवधान डालने का अक्षम्य अपराध जो किया है इन्होंने।

मिलिए अजूबा नंबर थ्री से। नताशा बधवार। इस औरत से बड़ा फ़ितूरी मैंने अपनी पूरी लाईफ़ में नहीं देखा, बाई गॉड। मैं टीवी चैनल में जब एक टुच्ची-सी रिपोर्टर/प्रोड्युसर थी तो मैडम कुछ तो टॉप टाईप पोस्ट पर थीं। इक्कीस साल की थी तब मैं, और नताशा बधवार के बारे में सुनते-सुनते उसके टाईप बन जाने का वो जुनून था कि जो आज तक कमबख़्त ख़त्म नहीं हुआ है। वैसे इतने सालों में ये भी नताशा से ही सीखा है कि कोई किसी की तरह होता नहीं है, और फिर भी हम सब अपने आस-पास के अजीज़ लोगों के आईने हुआ करते हैं। बहरहाल, फ़ितूरी नंबर थ्री ने ज़िन्दगी में कई फ़ितूर पाले और उन्हें अंजाम तक पहुंचाया। (हाथ कंगन को आरसी क्या, मुझपर यकीन हो न हो गूगल पर तो है)। नताशा का सबसे बड़ा और ख़तरनाक फ़ितूर आजकल 'ऑकर स्काई' नाम के ब्रांड के रूप में फेसबुक पर दिखाई दे रहा है। कसम से कह रही हूं, इस फ़ितूर की पहली ख़बर मिली थी तो मैंने अपना सिर पीट लिया था। अब मैं ही इस फ़ितूर की सबसे बड़ी कायल (और ख़रीददार) हूं। नताशा के फ़ितूर ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि हर फ़ितूर के साथ हम ख़ुद को बेहतर पहचान रहे होते हैं, और ये अपने किस्म की अलग साधना है – एक अलग किस्म का मे़डिेटेशन। ये अपने-अपने आसमान के टुकड़ों को ढूंढ लाने की कोशिश है, जो ताउम्र चलती रहे तो अच्छा।

और आख़िर में, मिलिए अजूबा नंबर फ़ोर से। रोहित भाटिया। मैं डिज़ाईनर-विज़ाईनर, आर्टी टाईप लोगों से ज़रा दूर ही रहती हूं और नताशा के घर रोहित से दो-चार बार मिली तो उसे भी दूर से सलाम किया था। मतलब वो कितना पागल शख़्स होगा जो बच्चों के साथ कमरे की दीवारें पेंट करते हुए पूरा वीकेंड गुज़ार सकता है? जिसे चांदनी चौक टाईप की जगहों पर सुकून मिलता है? जो चाय बनाकर पिलाता है तो दूसरों की जूठी चाय की प्यालियां धोने से भी नहीं हिचकता? जिसका कारोबार वेडिंग ट्रूज़ो पर चलता है? जिसका बस चले तो कुशन कवर्स और पर्दों पर भी ब्रॉकेड की पट्टियां और सलमा-सितारा लगा दे। आई मीन, वियर्ड, रियली। और इसी रियली वियर्ड टाईप के डिज़ाईनर के भीतर के कई रंगों से वाकिफ़ हुई तो चार बार कान खींचे ख़ुद के। हम कितनी आसानी से लोगों को जज कर लेते हैं। स्टीरोटाईपिंग दुनिया का सबसे आसान और ख़तरनाक काम है। इस फ़ितूरी के डिजाईन किए हुए कपड़े मेरा नया फ़ितूर है आजकल - एक किस्म के ऑबसेसिव कम्पलसिव डिसॉर्डर की तरह। जिस डिज़ाईनर की बनाई सलमा-सितारा, कढ़ाई वाली साड़ियों को देखकर दिल घबराता था, उसी का तैयार किया हुआ डिज़ाईन मेरी सबसे अहम कहानी की सबसे अहम किरदार का आईना बन गया! उसकी पहचान बन गयाअपनी पहली किताब के कवर पर उसे जगह देकर ज़िन्दगी भर के लिए उस डिज़ाईन को न भूलने लायक बना दूंगी, ये मैंने अपने वियर्डेस्ट ख़्याल में भी नहीं सोचा था।

चार फ़ितूरियों के इस साझा नतीजे – 'नीला स्कार्फ' ने कई चीज़ें साबित की हैं। पहला, दिल अपनी शक्ल के दिल खोज लेता है। 

दूसरा, दिल अपने फ़ितूर को पूरा करने के रास्ते भी खोज लेता है। 

तीसरा, ज़िन्दगी में कभी भी ‘I will never do it (or I will never be able to do it)’ नहीं बोलना चाहिए। कुछ भी हो सकता है। कुछ भी!!!
         
और चौथा, एक फ़ितूर ही है जो आपको भी आपके अंजाम तक पहुंचाएगा। इसलिए अपने भीतर के फ़ितूर शिद्दत से पालिए दोस्तों।

(पोस्टस्क्रिप्ट - मेरे बाबा चीन से मेरे लिए सिल्क का स्कार्फ लेकर आए थे - नीले रंग का स्कार्फ, मेरी सोलहवीं सालगिरह पर। वो स्कार्फ इतना ख़ूबसूरत था कि उसे गले में लटकना दुश्वार हो जाया करता। एकदम अजनबी लोग मुझे रोक कर उस स्कार्फ के बारे में पूछा करते। वो स्कार्फ गुम हो गया कहीं। मैं इस सदमे से कई महीनों तक उबर नहीं पाई। आज भी उस स्कार्फ की बड़ी शिद्दत से याद आती है। गुम हो गए उस नीले स्कार्फ का ग़म मेरे लिए किसी बेहद अजीज़ दोस्त के गुम हो जाने जैसा है। वैसे सच तो ये है कि हम नीले स्कार्फ की तरह कई रिश्ते भी अपनी गर्दन में टांगे फिरते हैं, जिनकी कोई अहमियत नहीं होती - जो एक महंगी एक्सेसरी से ज़्यादा कुछ भी नहीं। जो न शरीर ढंकने का काम करता है, न गर्मी-सर्दी से बचाने का। लेकिन फिर भी गर्दन में शो-पीस की तरह लटकता रहता है, सिर्फ एक मकसद से - हमारे सौंदर्य और दिखावे में इज़ाफ़े के लिए। नीला स्कार्फ कहानी ऐसे ही एक रिश्ते की पड़ताल करती है। 

एक और बात - ऑकर मटमैला भूरा रंग होता है। नीले आसमान पर चढ़े गहरे मटमैले बादलों के नीचे गर्दन में नीला स्कार्फ लटकाए बेवजह भटकती किसी लड़की को देखिएगा तो हम फ़ितूरियों के बारे में सोचिएगा ज़रूर।)    

नीला स्कार्फ ऑर्डर करने के लिंक ये रहे - 

http://bit.ly/nsflipkart

http://bit.ly/nshomeshop18

http://bit.ly/nsinfibeam

8 comments:

काजल कुमार Kajal Kumar said...

:)

राकेश said...

बहुत खूब!

Mukesh Kumar Sinha said...

लिस्ट आगे भी बढ़ेगी क्या :)

Anju (Anu) Chaudhary said...

बहुत बढ़िया

देवेन्द्र पाण्डेय said...

आनंद दायक।

garima srivastav said...

ऐसा ही फितूर मेरे अंदर भी है, पर ये निराशा रस क्यों

monali said...

Story behind the stories.. i love evrything u write or u dnt write :)

Digamber Naswa said...

इन फितूरों को हवा मिलनी जरूरी है ... कुछ पागल रहें ऐसा जरूरी है नहीं तो इंसान अपने को इंसान कैसे समझगे ... बधाई ...