Sunday, February 3, 2013

फ़र्ज़ करो ये दोनों बातें झूठे हो, अफ़साने हों

एक बहुत बड़े मैदान में बहुत सारी लड़कियां हैं, सफ़ेद यूनिफॉर्म और सफेद मोज़े-जूतों में। छोटी लड़कियों के बालों में लाल फीते हैं। वो प्राइमरी स्कूल की लड़कियां हैं। हाई स्कूल की लड़कियों ने बालों में काले फीते लगा रखे हैं। इतनी ही भीड़ है कि जैसे अभी-अभी असेम्बली शुरू होने वाली हो जैसे। या शायद ख़त्म हुई होगी। ठीक-ठीक ये मालूम नहीं चल रहा। लड़कियों की भीड़ कतारों में बंटकर अपनी-अपनी कक्षाओं में जाने लगी है। उस भीड़ से कटकर एक टुकड़ा उस ऑडिटोरियम की ओर जाने लगता है जो बाहर से किसी चैपल की तरह दिखता है। ऑडिटोरियम के बाहर बारह-चौदह फ़ुट का बरामदा है। वहां कई लड़कियां घूम-घूमकर अपने पाठ याद कर रही हैं। आज कोई इम्तिहान हो शायद। ऑडिटोरियम के भीतर एक छोटे से झुंड को गरबा की प्रैक्टिस कराई जा रही है - वन टू वन टू वन टू वन टू थ्री फोर फाईव वन टू थ्री फोर फाईव। म्यूज़िक के बीट्स को अंकों में बांट दिया गया है। वन टू थ्री वन टू थ्री वन टू थ्री थ्री फोर फाईव... बीट पर लड़कियों ने थिरकना शुरू कर दिया है।

एक लड़की जिस महिला के साथ चल रही है वो यहां की प्रिंसिपल हैं - सिस्टर क्रिस्टिना। लेकिन सिस्टर क्रिस्टिना ने जाने क्यों रंगीन कपड़े पहन रखे हैं। लड़की और सिस्टर क्रिस्टिना जिस रास्ते मुड़े हैं वो रास्ता स्कूल के छोटे से बगीचे की ओर जाता है। मेहमानों के लिए गुलदस्ता बनाना होगा, सिस्टर क्रिस्टिना कहती हैं। इसी स्कूल में ऊपर लड़कियों का एक हॉस्टल है जिन्हें दिन के खाने में एलमुनियम की प्लेटों में उसना भात, पानी-जैसी दाल और आलू और सेम की सूखी सब्ज़ी मिलती है। हॉस्टल की लड़कियों को मिलनेवाले खाने को देखकर जो भूख मर जाया करती है उसे आमड़े के पेड़ के नीचे काग़ज़ की पुड़िया में मिलने वाले दस पैसे के मसाले चने फांककर ही जगाया जा सकता है। लड़की ने अभी-अभी चने खाए हैं और उसे डर है कि मिर्ची के हाथों लाल गुलाब छू लेने से उस गुलाब की ख़ुशबू जाती रहेगी। उसी हाथ से फिर भी उसने फूल तोड़ लिए हैं।

स्कूल का अहाता बहुत बड़ा है और उसकी चहारदीवारी भी उतनी ही ऊंची है। मोटरसाइकिल और साइकिल पर सवार लड़कों की आंखें फिर भी उन चहारदीवारियों के पार जिसे ढूंढना हो, उसे ढूंढ लेती है और यदा-कदा चिट्ठियां खिड़कियों के शीशों-सी सारी सीमाओं को चूर-चूर करते हुए लड़कियों की गोद में आ गिरती हैं। सिस्टर क्रिस्टिना फिर भी स्कूल को लड़कियों का स्कूल बनाए रखने पर अडिग हैं।

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फूल गुलदस्तों में लगे नहीं और खिड़की के रास्ते आकर रौशनी ने कमरे में जगह बना ली है। संडे की सुबह कोई जल्दी नहीं होती, लेकिन मुझे बेचैन रहने की बीमारी है। ख़्वाब में दिखाई देने वाला मेरा स्कूल मॉर्निंग वॉक तक मेरे साथ-साथ चलता है। मैं ख़्वाब की गुत्थियां सुलझाने की नाकाम कोशिश करती हूं और आख़िर हार मान लेती हूं। जागते हुए तो समझ में आता है, सोते हुए भी मिल जाने वाले लम्हे किसी कारण के आएं, ये यकीन करना मुश्किल है। औऱ फिर वो लड़की तो यूं भी जाने कहां रह गई। चुनी हुई ये ज़िन्दगी आख़िर अपनी ही तो है।

जब सारे फ़ैसले अपने होते हैं तो फिर इतनी बेकली क्यों होती है? क्या वाकई मैन्युफैक्चरिंग डिफेक्ट ही होता है ये कि दिमाग सोचना बंद नहीं करता और सवालों का पिटारा कभी खाली नहीं होता? हम कौन हैं? क्यों हैं? हमारे होने का हासिल क्या? हार क्या और जीत क्या? मिलना क्या और पाना क्या? सही कौन और ग़लती कौन-सी? फ़िराक़ क्या और विसाल क्या? हम किस इंतज़ार में जिए जाते हैं? हौसले का ये समंदर कहां से आता है? क्या है भीतर जो खाली है और क्या है कि जो रीतता नहीं फिर भी?

फोन पर मुझसे एक दोस्त ने पूछा, क्या किया इन दिनों? मेरे पास कोई पुख़्ता जवाब नहीं होता। इन दिनों दिन-रात के पर निकल आए हैं। मेरे हाथ कुछ नहीं आता। दिन पंछी बन उड़ जाता है, हम खोए-खोए रहते हैं। फिर भी तो कितना काम है। बच्चों को स्कूल भेजना है। उनका होमवर्क कराना है। उनके इम्तिहानों की तैयारी करानी है। बच्चों के बाल क टवाने हैं। उन्हें पार्क लेकर जाना है। उन्हें टीवी देखते रहने से रोकना है। कपड़े धोने है। आयरन के कपड़े अलग करने हैं। किचन के सामान की लिस्ट बनानी है। किचन के खानों की सफ़ाई करनी है। बच्चों की अलमारी सरियानी है। नीले कुर्ते की शलवार बनवानी है, काली शलवार के साथ का दुपट्टा लेना है। इस बीच कहानियां लिखनी हैं। अनुवाद करना है। कॉलम लिखने हैं। कविताएं बांचनी हैं। और ये कमबख़्त दिन है कि फिर भी उड़ता फिरता रहता है।

सब कामों से जी चुराकर मैं जाकर पार्लर में बैठ गई हूं। आंखों के आगे एक आधी-अधूरी मैग़जीन है। बाल कितने छोटे कर दूं पूछने पर कहती हूं, इतने ही छोटे कि मैं पहचान में ना आऊं। आंखें बंद हैं और हेयर स्टाईलिस्ट बाल कतर-कतरकर मेरी शख्सियत को नई पहचान देने पर आमादा है। आंखें खुली हैं तो शीशे में से दिखाई देनेवाली लड़की की शक्ल ख़्वाब वाली लड़की से मिलती-जुलती नज़र आई है। मिर्ची वाले हाथों से लाल गुलाब को छू लेने का डर एक बार फिर सता गया है। ख़ैर,बाल तो मैं फिर भी कई महीनों तक नहीं बांध पाऊंगी और एक इसी बात का सुकून है। बाकी,  बेचैनियों ने जन्म-जन्मांतर तक साथ ना छोड़ने की कसम खा ली है।

ये डेजा वू क्या है दोस्तों? मुझे ऐसा क्यों लग रहा है कि ये पहले भी लिखा है कहीं, ये पहले भी कहा है कभी। हम एक ही ज़िन्दगी में एक ही दिन दुबारा-दुबारा भी जीते हैं क्या?

ये आत्मालाप किसी काम का नहीं और जो काम की है, इब्ने इंशा की लिखी हुई ये क़माल की बात है।

फ़र्ज़ करो ये जी की बिपता जी से जोड़ सुनाई हो
फ़र्ज़ करो अभी और हो बाकी, आधी हमने छुपाई हो




 

5 comments:

अनूप शुक्ल said...

इस पोस्ट पर टिप्पणी करने में मिर्ची वाले हाथों से लाल गुलाब को छू लेने का डर हावी हो गया। अब समझ नहीं आ रहा लिखें क्या! :)

Nidhi Tandon said...

फोटू डालो अपनी ..बाल कटे वाली तो पता चले कि लड़की कैसी है?
फैसले अपने तो बेकली क्यूँ?????/
पर है तो है...क्या किया जाए

Arvind Mishra said...

खुदा खैर करे -अभी तो इम्तिहाँ और भी हैं -जमियाज वू ("jamais vu") के भी !

प्रवीण पाण्डेय said...

जिन्दगी अपनी है, फैसले भी अपने हैं, किसको कितना याद करते चले, जोड़ते चले..यही रंगीनी बचती है ले दे के।

पारुल "पुखराज" said...

फ़र्ज़ किया अभी और है बाक़ी ..आधी तुमने सुनायी है :)