Friday, January 18, 2013

बाबा के बहाने ज़िन्दगी के मानी-बेमानी फ़लसफ़े

वो भी १८ जनवरी का ही दिन था। २००२ जनवरी का।

मगर वो दिन ऐसा उदास, हाड़ कंपाने और रुलाने वाला नहीं था। सुबह-सुबह धूप छत पर मेहरबान होकर ऐसे बरस रही थी कि जैसे रातभर के ठंडे और बेरहम बिछोह के बदले सारा प्यार बस अभी के अभी उंडेल देगी। हम दो ही लोग थे छत पर - बाबा और मैं। आराम कुर्सी पर बैठे हुए बाबा दूर कांके डैम और उनकी नज़रों के बीच कांटे की तरह उग आए शहर को देख कर मायूस हो रहे थे, मैं अभी नई-नई मिली नौकरी की डींगें हांक रही थी।

"हम इंटरनेट पर गाने सुनते हुए काम करते हैं। दफ़्तर में कहीं कोई औपचारिकता नहीं है।" मैं डॉटकॉम के ज़माने में जवान होती बेपरवाह लड़की, बाबा ब्लू-कॉलर से व्हाईट-कॉलर हो जाने की मशक्कत में ज़िन्दगी के पैंतालीस साल निकाल देनेवाले मेहनतकश इंजीनियर। बाबा में फिर भी मेरी बातें सुनने का सब्र रहा, मेरी पैदाईश से। सब कहते थे कि बाबा का गुस्सा दो ही चीज़ों से पिघलता है - सलीके से परसी हुई थाली से और अनु रानी के थोबड़े से। मुझे लेकर उनमें बेइंतहा धैर्य था, मेरी तमाम ज़्यादतियों और ज़िद के बावजूद।

"आपका फेवरिट गाना कौन-सा है?" बाबा से ऐसे सवाल पूछने की ज़ुर्रत एक मैं ही कर सकती थी।

बाबा सोचते रहे।

"चलिए रैपिड फ़ायर खेलते हैं। हम सवाल पूछेंगे, आप जवाब दीजिए।"

बाबा के साथ ऐसे बेतुके खेल खेलने की ज़ुर्रत भी एक मैं ही कर सकती थी।

"फेवरिट एक्टर?"

"राज कपूर।"

"और फेवरिट हीरोईन?"

"वहीदा रहमान।"

"फेवरिट खाना?"

"खीर। चावल-चिकन। मीठा पान।"

 "फेवरिट सिंगर?"

"मुकेश और लता मंगेशकर।"

"फेवरिट गाड़ी?"

"ओपेल एस्ट्रा।"

"फेवरिट गाना?"

"एक दिन बिक जाएगा माटी के मोल... और अब हमको शांति से अख़बार पढ़ने दो।" बाबा ने बात बंद कर दी, और मैं बात करने को कुलबुलाती रही।

"हम अगले तीन घंटे में चले जाएंगे।"

"हां, तो? रहने के लिए तो आई नहीं थी?"

"रह जाते हैं। यहीं रांची में। हम कहीं भी, किसी भी जगह किसी भी हाल में रह सकते हैं।"

"रांची में रहकर क्या करोगी?"

"कुछ भी। शादी की तैयारी करेंगे। किसी स्कूल में पढ़ा लेंगे। घर में आराम करेंगे।"

बाबा ने अख़बार नीचे ज़मीन पर रख दिया, बल्कि फेंक दिया और अपनी कुर्सी मेरी ओर खींच ली।

"शादी के बाद क्या करोगी अनु?" बाबा का ये सवाल बेहद गंभीर था।

अपनी कमअक्ली और बीस के ऊपर आ जाने वाले जुवेनाईल आत्मविश्वास का बेबाक परिचय देते हुए मैंने सास-ससुर की सेवा और ससुराल में रिश्तों को बनाए रखने के लिए किए जाने वाले बलिदान पर कुछ तो छोटा-सा भाषण दे दिया।

बाबा के चेहरे पर पसर गई हैरानी मुझे आज भी नहीं भूली।

"मुझे तुमसे ये उम्मीद नहीं थी," बाबा ने कहा।

क्या सोचा था अनु सिंह? सरदार खुश होगा? शाबाशी देगा? 

"हम नहीं जानते हैं कि मेरी बात तुमको कितनी समझ आएगी। हो सकता है तुम कई बातों से डिसएग्री भी करो। लेकिन फिर भी सुनो अनु। ये ज़िन्दगी एक बार मिलती है - सिर्फ एक बार। इसको अपनी शर्तों पर जीना सीखो और याद रखो कि आसानियां नहीं चुननी हैं। दिल... यहां देखो यहां... एक दिल होता है, जो रास्ता दिखाता है। उसकी सुनो। दूसरों के लिए जीने से पहले अपने लिए जीना सिखोगी तो खुश रहोगी - खुद भी खुश रहोगी और दूसरों को भी खुश रखोगी। याद रखना अनु, यहां तक पहुंचने के लिए तुमने बहुत-बहुत मेहनत की है। अपनी उम्र के बच्चों से कहीं बहुत ज़्यादा। इसलिए इतनी आसानी से किसी के लिए भी सबकुछ छोड़ देने की बात मत करो।"

बाबा नाराज़ थे और मैं हैरान थी क्योंकि मुझे पूरी उम्मीद थी कि कुर्बानियों की बात सुनकर बाबा को मुझे दिए गए संस्कारों पर फ़ख्र होगा। आख़िर हमको समझौतों के पाठ ही तो पढ़ाए जाते हैं पूरी ज़िन्दगी। घर के लिए समझौता। परिवार के लिए समझौता। बच्चों की ख़ातिर समझौता।

बाबा ने कहा था कि एक आना बचाए रखना खुद को। उस वक्‍त इस बात का ठीक-ठीक मतलब समझ आया नहीं था। इतने सालों बाद कुछ-कुछ समझने लगी हूं कि एक आना ख़ुद को बचाने का मतलब पंद्रह आनों की कुर्बानियों के खर्च के बीच थोड़ा-सा स्वार्थी बन जाना होता है। बाबा ने कहा था कि दिल की सुनूं। बाबा होते तो उनसे पूछती कि अपने दिल की सुनने में किसी और के दिल को ठेस पहुंचने के बीच के हेयरलाईन डिफरेंस की सफ़ाई कैसे दी जाती है। बाबा ने कहा था कि आसानियां मत चुनना। होते आप तो पूछती आपसे, ज़िन्दगी आसानियां चुनने के मौके देती ही कहां है। शायद झगड़ती भी आपसे कि ये क्या सिखाया आपने कि हर बार, जिस मोड़ पर भी होती हूं कोई रास्ता सीधा जाता हुआ नहीं दिखता। क्या सिखाया कि जूझना फ़ितरत बन गई और संघर्ष करना शख्सियत।
(बाबा की ये तस्वीर १९७४ की है)

बाबा से वो मेरी आख़िरी बातचीत थी। कुछ घंटे बाद बाबा मुझे एयरपोर्ट छोड़ने आए थे, और हम गाड़ी में उनका फेवरिट गाना - एक दिन बिक जाएगा माटी के मोल - सुनते रहे थे। डिपार्चर गेट पर खड़े-खड़े उन्होंने  मुझे ख़ूब-ख़ूब मेहनत करने और किसी क़ीमत पर हार ना मानने की सीख दी थी। ये भी कहा था कि सिर उठाकर जीने के लिए आत्मनिर्भर होना ज़रूरी है। ये भी कहा था कि उन्हें अपने पोतों से ज़्यादा मेरे स्वावलंबी होने की फिक्र है क्योंकि इस पेट्रियार्कल सोसाइटी में लड़के तो किसी ना किसी तरह अपना मुकाम हासिल कर ही लेंगे, लड़कियों को पीछे खींचनेवालों में से परिवार और समाज का हर वो शख्स होगा जिससे उसके स्वार्थ की सिद्धि होती है। बाबा ने ये भी कहा था कि तुम्हारे आगे बढ़ने से सबसे ज़्यादा तकलीफ़ तुम्हारे अपनों को होगी, क्योंकि कोई परिवार अपनी औरत को घर के भीतर और चौखट के बाहर की दुनिया में बंटते देखकर खुश नहीं रहता। परिवार उसी औरत को सिर-आंखों पर लेता है जो सवाल नहीं उठाती, सिस्टम को चुनौती नहीं देती, जो सेवा में तल्लीन रहती है और जो उस पानी की तरह होती है जिसे किसी भी बर्तन में डाल दिया जाए, वो उसी बर्तन का रूप ले लेती है। तुम्हें बहती हुई धारा बनने का हुनर सीखना होगा और ये अपने आप में एक बहुत मुश्किल काम है, बाबा ने चेताया था। 

बाबा की कही हुई सारी बातें मेरे सिर के ऊपर से गुज़र गई थीं। तब मुझे शादी कर लेना और परिवार बसा लेना ज़िन्दगी का इकलौता और सबसे ज़रूरी काम लगता था। बाकी सब स्टॉप-गैप अरेंजमेंट था - आज है तो ठीक, कल नहीं तो भी बहुत अच्छा।

मैं मूर्ख थी कि बाबा मुझको अजर-अमर लगते थे। उस आख़िरी बातचीत के ठीक सवा महीने बाद बाबा गुज़र गए। मुझे सिर्फ़ इस बात का सुकून है कि किस्मत ने उनकी ज़िन्दगी के आख़िरी पंद्रह दिनों में मुझे उनके सिरहाने होने का मौका दिया। बाबा ने आख़िरी निवाला, पानी का आख़िरी घूंट मेरे हाथ से लिया और जाते-जाते आख़िरी बार मेरी हथेली को यूं कसकर थामे रखा कि जैसे अपनी सारी शक्ति, अपना सारा भरोसा उसी एक लम्हे में हथेलियों के उसी एक स्पर्श में सौंपकर जाएंगे। बाबा के जाने के बाद समझ में आया कि किसी बेहद क़रीबी, किसी बेहद अज़ीज़ को खोने की तकलीफ़ वो तकलीफ़ होती है जिसकी भरपाई वक़्त जैसी कमाल की ताक़तवर शय भी नहीं कर पाती। जिस आख़िरी बार जाने से पहले बाबा ने हाथ पकड़ा था और कातर आंखों से मेरे चेहरे की ओर देखा था उसे याद करती हूं तो समझ में आता है कि मरना कोई नहीं चाहता, तब भी नहीं जब ज़िन्दगी हज़ार धोखे देती है, मुंह के बल बार-बार पटकती है। इतनी बेमुरव्वत ज़िन्दगी के लिए मोह कभी ख़त्म नहीं होता क्योंकि ज़िन्दगी है तभी सुख-दुख, समझ-नासमझियां, हार-जीत, लड़ाई-झगड़े, प्यार-वफ़ा, रिश्ते-नाते, खुशनसीबी-बदनसीबी सब है।

बाबा ने जो समझ बांटी वो अभी तक पूरी तरह कारगर हुई नहीं है। अव्वल तो इतनी सारी समझ बांटने के ठीक एक महीने भीतर ही बाबा ने ज़िन्दगी का सबसे बड़ा फ़लसफ़ा सीखा दिया कि सांसें हैं तभी तक ये उलझनें हैं। इसलिए, जितना हासिल है उसके लिए शुक्रगुज़ार रहो और हर रोज़ ऐसे जियो कि जैसे कल की सुबह देखने का सुख मयस्सर ना होगा। दूसरा, दिल की बातें सुनकर उनपर अमल करने की हिम्मत कहां आ पाती है हममें? ये जानते हुए भी कि अपने लिए जीना ज़रूरी होता है, हम फिर भी दूसरों की ख़ुशी की ख़ातिर खुद को हज़ार बार ठुकराते चलते हैं। बाकी, ये ज़िन्दगी भी हर रोज़ इम्तिहान लेती है। हर रोज़ हम ख़ुद को नए दिलासे दे दिया करते हैं। फिर भी, आसानियां नहीं चुनने की सलाह पर क़ायम हूं, और ये भी याद रखूंगी कि दूसरों को खुश रख सकूं, इसके लिए ख़ुद खुश रहना बेहद ज़रूरी है। याद  रखूंगी कि जब तक बहती हुई सांसें हैं, रगों में बहती हिम्मत और सेहत है तबतक बहती हुई धारा बनना है, बर्तन में डाला जा सकने वाला ठहरा हुआ पानी नहीं। 

आई लव यू, बाबा।



 

16 comments:

Nidhi Tandon said...
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Nidhi Tandon said...

अनु..आज kuchh ऐसा सा ही मन हो रहा था ..अपनी खुशी...दूसरों की खुशियाँ.....क्या करूँ..क्या न करूं...के बीच मन डो
ल रहा था.अच्छा लगा पढ़ कर....एक आना खुद को बचाए रखने की जद्दोजहद जारी है..:)

Tulika Sharma said...

यदि हम खुद के लिए रत्ती भर भी जी पाए तो ज़िन्दगी से हमें इतनी शिकायत न रहे .....खुशनसीब हो ...जो वक्त रहते तुम्हें जीवन की इस कठिनतम सच्चाई को बताने-समझाने वाला मिला .....

प्रतिभा सक्सेना said...

पढ़ कर बहुत अच्छा लगा.लड़कियों के लिये तो अधिकतर उपदेश ही रिज़र्व रहते हैं ,भाग्यशाली हैं आप जो ऐसे बाबा मिले.लेकिन अपनी ही शर्तों पर घर-परिवार के साथ कर दुनिया चलाना संभव नहीं हो पाता.समझौता किये बिना काम नहीं चलता- आगे-आगे देखिए होता है क्या!

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

ये ज़िन्दगी एक बार मिलती है - सिर्फ एक बार। इसको अपनी शर्तों पर जीना सीखो और याद रखो कि आसानियां नहीं चुननी हैं। दिल... यहां देखो यहां... एक दिल होता है, जो रास्ता दिखाता है। उसकी सुनो। दूसरों के लिए जीने से पहले अपने लिए जीना सिखोगी तो खुश रहोगी - खुद भी खुश रहोगी और दूसरों को भी खुश रखोगी।

आपके बाबा ने कितनी सटीक बात कही थी ....नहीं तो लड़कियों को हमेशा कुर्बानी देने की ही शिक्षा मिलती है .... बाबा को नमन

Arvind Mishra said...

अपनी सुनाने में इतनी मशगूल हो जाती हैं कि अपने आडियेंस तक के लिए बेरहम और बेमुरउत होती जाती हैं आप :-)
आपके लेखन की सबसे बड़ी खासियत यह है कि आप व्यक्तिगत अनुभवों में भी समूची समष्टि को समाहित कर जाती हैं -ये भाव विचार
आपके आडियेंस के खुद अपने से लगने लगते हैं -अपने बाबा जी के साथ के अनुभव सुनाऊँ क्या? महज पुनरावृत्ति होगी ..छोड़ता हूँ।।।।
मगर कुछ टूट सा गया है आज :-(

Sonal Rastogi said...

मैं मूर्ख थी कि बाबा मुझको अजर-अमर लगते थे।
kaash

प्रवीण पाण्डेय said...

अपने ही यदि निश्चय कर लें तो वही अवरोध सबसे बड़े सहारे में बदल जाता है।

rashmi ravija said...

ये एक आना बचाए रखना, कितना जरूरी है और कितना मुश्किल भी .
ज़िन्दगी जीने का हुनर सीखा गए ,बाबा
नमन

देवांशु निगम said...
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देवांशु निगम said...

शायद गुलज़ार ने लिखा है ..
हमसफ़र बनो मेरे, या मेरा साथ छोड़ दो ,
दीवारों के रोके , दरिया कहाँ रुका है !!!!

पर ज़िन्दगी का फलसफा मुझे भी यही लगता है

:) :) :)

प्रवीण शाह said...

.
.
.
अनु जी,

सीधे दिल से लिखा है आपने... फिर इस लिखे ने दिल को तो छूना ही था...

बाबा को नमन !


...

Pallavi saxena said...

शायद यही है ज़िंदगी जीने का सही और एकमात्र फलसफा बाबा को नमन ...

Piyu said...

आपके बाबा ने कितनी बढ़िया सीख दी थी - एक आना खुद को बचा कर रखने की।

अनूप शुक्ल said...

मैं आपकी पोस्टें देखता रहता हूं। मौका मिलते ही बांचता हूं। अपने बाबा के बारे में लिखी यह पोस्ट मन को छू गयी। बाबा आपकी यादों में हमेशा जिन्दा रहेंगे। जैसा वे चाहते थे उस जैसा बनने में समय आपकी मदद करे।

Pooja Sharma Rao said...

heart-warming to say the least.Sorry for your loss and thanks for sharing the gains with us here !