Tuesday, April 19, 2011

श्रीनगर से लौटकर

बेमिसाल हुस्नवाले पहाड़ों ने
परदेसियों की नज़र से बचने की ख़ातिर
काली चादर ओढ़ ली है आज।
जो हवा छूकर गई है मुझको
रंग-रूप में खुशबू-सी लगती है।
चिनार के पत्तों से लटकी हैं
बूंदें मोती जैसीं
और गिरता है टप-टप
लटकते शहतूत से पानी।
मेरी खिड़की पर आई है
नीलपंखी चिड़िया
गीले पंखों का पानी झटककर
फिर तैयार है
बगल में बहते झेलम के पार जाने को।
पीछे अखरोट के पेड़ों पर
छाई है गुलाबी रूमानियत,
और नर्गिस ने दूर से
सिर हिलाकर बुलाया है।
टीन की छत पर
बजता है संतूर-सा पानी,
आज रात की नींद
हमने घाटी में आई बारिश से भिंगोई है।

अल-सुबह जो आई है सामने
सबा नाम है उसका।
दोस्त है मेरी
और दुल्हन बनी है आज।
सिर पर लटकता है झूमर
और जूड़े में सज गए हैं
अखरोट के फूल।


आई हूं मैं जन्नत में आज,
जन्नत इसको ही तो कहते होंगे,
और लाल गरारे में सिमटी दुल्हन
जैसी ही लगती होगी
कोई जन्नत की हूर।

(16-17 अप्रैल को सबा और ओमैर की शादी से लौटकर)

7 comments:

Kishore Choudhary said...

सबा और ओमैर ने भी इस नज़र से न देखा होगा और न ही इस तरह दिल में उतारा होगा... कश्मीर मुस्कुराता सा लगता है.

shubha said...

its like an invitation to the valley, to come and witness the beauty that's bestowed selectively, those who have not been to the Valley have yet to add the dimension of natural beauty to their horizon of imagination....Sabah di must be a super beautiful bride and can imagine her charm in the wedding attire....

Urmila Dasgupta said...

can you translate please??!! Just coz I missed it all....

udaya veer singh said...

specialty probably cant seen by itself,haw can
peep stable mountains .Yes they can ,by your eyes . beautiful poem ,with eternal feelings .Thanks .

Manish Kumar said...

बेहतरीन खाका खींचा हैं आपने। अखरोट के पेड़ों को देखा नहीं अभी तक..सही कहते हैं लोग कश्मीर नहीं देखा तो बहुत कुछ छूटा रह गया है ज़िंदगी में..

Annu said...

wish to evident the beauty eagerly

anupama's sukrity ! said...

बहुत ही खूबसूरती से वर्णन किया है कश्मीर की वादियों का -
नयनाभिराम सौंदर्य का ...
गुलाबी रूमानियत का ...
जन्नत की हूर का ...!!
बधाई .