Wednesday, July 15, 2015

अटकी हुई स्क्रिप्ट - डे थ्री

भीतर से भरने लगो तो बाहर से कटने लगते हैं। ये मेरी रचना-प्रक्रिया का हिस्सा है।

सारा वक़्त ख़ुद में उलझी-उलझी चलती हूँ। बात किसी से कर रही होती हूँ, सोच कहीं रही होती हूँ। किसी से मिलने-जुलने या बात करने का मन नहीं करता। नींद या तो बहुत आती है या बिल्कुल नहीं आती। सोचती हूँ कि बीमार पड़ जाऊँ - टायफॉय या मलेरिया या जॉन्डिस जैसा कुछ हो जाए तो ऑफ़िस न जाने की वजह मिल जाए, डेडलाइन से पिंड छूटे। झूठ बोल नहीं सकती, क्योंकि जानती हूँ बीमार पड़ने का बहाना किया तो चार कॉलीग या दोस्त और धमक आएंगे घर पर बीमार की मिज़ाजपुर्सी करने।

लेकिन अब तैयार होने लगी हूँ लिखने के लिए। इतने दिनों से जैसे भीतर का घड़ा भर रही थी। छोटे-छोटे काम रास्ते से हटाने ज़रूरी हैं। वो कॉलम जिन्हें लिख देने का वायदा किया था, और जिसके लिए एडिटर कई मेल कर चुकी है... वो अनुवाद जो बस आज के आज ही जाना है... वो किताब जो हर हाल में अब एडिट हो ही जानी चाहिए... तीन मिनट की फ़िल्म की स्क्रिप्ट भी लिखकर आज ही देनी है... सब ख़त्म करके अब अपनी स्क्रिप्ट, अपनी कहानी की ओर मुड़ने का वक़्त हो चला है।

किसी ने बताया था कि १५ जुलाई को सितारों की गति और उनकी जगहों में बहुत बदलाव होने वाला है। आनेवाला वक़्त हम सबके लिए, यहाँ तक कि देश के लिए भी अच्छा है। आज है १५ जुलाई। पता नहीं सितारों की गति बदली या नहीं। लेकिन एक ही वक़्त पूरी दुनिया के लिए अच्छा या बुरा कैसे हो सकता है? सबकी किस्मत एक-सी होती तो ये दुनिया एकरूप न होती? कहते हैं कि किस्मतें जुड़ी होती हैं सबकी। हम जहां कहीं भी होते हैं, जिस भी लम्हे, जिन भी हालातों में... वहाँ किसी न किसी वजह से होते हैं... इसलिए होते हैं क्योंकि यूनिवर्स एक बहुत ही महीन, बहुत ही सोफिस्टिकेटेड मैथेमैटिकल कैलकुलेशन पर चलता है। उस कैलकुलेशन में हम सब एनवेरिएबल फैक्टर्स हैं, और हमारे कर्म वेरिएबल फैक्टर्स। हर माइक्रो-लम्हे का गणित इन्हीं दो फैक्टर्स पर निर्भर है। मेरा बीजगणित बचपन से बहुत कमज़ोर है, इसलिए मुझे शायद ये कैलकुलेशन समझ न आए। जिसे समझ में आता है, उसकी बात पर यकीन कर लेने में भलाई है। यूँ भी क्या बुरा है ये सोचना कि आनेवाले दिनों में सब अच्छा-अच्छा होगा?

घड़ी तीन चालीस का वक़्त दिखा रही है और आँखों से अधूरी नींद बहे जा रही है निरंतर। पता नहीं क्या सूझा है कि पहले मन की भड़ास, अलाय-बलाय बाहर निकाल देने का इरादा बना लिया है मैंने। उसके बाद शायद काम पर लौटना आसान हो जाए। पूरे दिन के चक्कर हैं। इन चक्करों में कई लोगों से मिलना भी शामिल है। मैं एक ही दिन में इतने सारे कमिटमेंट करती ही क्यों हूँ? अपने ही चैन की दुश्मन आपे-आप हूँ!

बग़ल में रश्मि बंसल की किताब औंधे मुँह पड़ी हुई कह रही है - अराइज़, अवेक। स्वामी विवेकानंद को काहिलों से जाने कैसा बैर था कि एक जुमला छोड़ गए। सदी गुज़र गई लेकिन वो जुमला हज़ारों की मेज़ों के ऊपर चिपका पूरे देश को जगाने का ढोंग भरता रहता है। पता नहीं वो गोल क्या है, और वो रास्ते क्या जिन पर चलते चलनेवाले अंतहीन सफ़र पर रहते हैं। अराइज़! अवेक! एंड स्टॉप नॉ ट टिल द गोल इज़ रिच्ड। सोने मत दीजिए स्वामी जी। बिल्कुल सोने मत दीजिए। इसी किताब का अनुवाद करना है मुझे? हो गई छुट्टी। रात की जूठन में थोड़ा-सा चैन भी बचा होगा तो उसे डस्टबिन में फेंक देने का पूरा इंतज़ाम मैंने अपने ही हाथों कर लिया।

हआ बहुत अनु सिंह। लौटो काम पर। इंतज़ार है कि तुम्हारी एडिटर ने रात में तुम्हें इतना ही कोसा होगा कि सपने में भी जगाने आ गई वो नैन्सी!

शुक्र है कि शुक्रवार को बजरंगी भाई जान रिलीज़ होने को है। इस पागलपन में सैनिटी का थोड़ी-सी उम्मीद!    

Tuesday, July 14, 2015

अटकी हुई फ़िल्म स्क्रिप्ट - डे टू

हमें इन्सटेंट ग्रै टिफिकेशन की आदत पड़ी हुई है। डेडलाइन माथे पर नाचने लगे तो किसी न किसी तरह कुछ लिख दिया। किसी तरह ख़्यालों को एक स्ट्रक्चर दिया, और हो गई कहानियाँ, कविताएँ, लेख, विचार, कॉलम, ब्लॉग, वगैरह वगैरह तैयार। जितनी तेज़ी से लिख लिया, उतनी ही तेज़ी से उस लिखे हुए पर प्रतिक्रियाएँ भी हासिल हो गईं। लिखना फेसबुक स्टेटस मेसेज पर लाइक की कामना से आगे जाता ही नहीं कमबख़्त। लिखना बस इसलिए, क्योंकि जल्दी से जल्दी कोई बात कह देनी है किसी तरह।

जब हम लॉन्ग फॉर्मै ट में लिखने बैठते हैं तो यही सबसे बड़ी समस्या होती है। काम जब तक पूरा नहीं हो जाता, तब तक किसी को दिखाना संभव नहीं होता। हमारी तरफ से पूरा हो भी गया तो भी उसमें स्ट्रक्चर के बिखरे हुए होने का डर सताता रहता है। फेसबुक के स्टेटस मेसेज की तरह उसको हाथ के हाथ लाइक नहीं मिलते।

लॉन्ग फॉर्मैट भीतर ही भीतर हमें तन्हां करता रहता है, दुनिया से काटता रहता है, ख़ामोश रहने पर मजबूर करता रहता है। लॉन्ग फॉर्मैट सीखाता है कि हर छोटी-छोटी बात कहकर और उस पर प्रतिक्रियाओं का इंतज़ार कर अपनी ऊर्जा मत ज़ाया करो। ये ऊर्जा बचाए रखो, क्योंकि अभी कई और ड्राफ्ट्स लिखे जाने हैं। अभी बहुत सारा काम और होना है।

कल मैंने भाई को मॉर्निंग पेज या डायरी लिखने की सलाह दी तो उसने बहुत अच्छी एक बात कही। ज़रूरी नहीं कि जो लॉन्गहैंड लिखता हो, या शब्दों का खेल समझता हो, उसका थॉट प्रॉसेस बहुत साफ-सुथरा ही होगा। हम कई बार अच्छा लिखने की बदगुमानी में verbose होते चले जाते हैं। सटीक, साफ-सुथरे ख्यालों का पता नहीं होता, बस शब्दों को सजाने-सँवारने के चक्कर में लगे रहते हैं। कई बार शॉर्टहैंड लिखना टू-द-प्वाइंट सोचने के लिए ज़रूरी होता है। और अपनी बात अच्छी तरह कम्युनिकेट करने के लिए भी। मुझे अचानक उसकी बात में बहुत दम नज़र आया। वाकई ज़्यादा लिखने के चक्कर में हम ज़्यादा शब्द ज़ाया भी करते हैं, और जो कहना होता है वो कह नहीं बाते। बीटिंग द बुश मुहावरा किसी राईटर के कॉन्टेक्स्ट में ही पैदा किया गया होगा।

ख़ैर, लॉन्गहैंड फॉर्मैट लिखने की एक समस्या ये भी है कि ज़्यादा-ज़्यादा लिखा जाता है लेकिन काम का बहुत कम निकल पाता है। स्क्रिप्ट लिखते हुए भी ठीक यही हो रहा है। एक सीन इतना लंबा और बोरिंग हो जाता है कि ख़ुद ही कोफ़्त होने लगती है। वही बात इशारों में, या किसी एक छोटे से एक्शन के ज़रिए भी तो कही जा सकती है। कहानीकार होने और स्क्रिप्टराईटर होने में यही अंतर है।

मैं जिस चीज़ से परेशान हूं उसे अपने लर्निंग प्रोसेस की सीढ़ियां क्यों नहीं मान लेती? ऐसे कितने राईटर होंगे जिन्हें एक साथ कई किस्म की चीज़ें कई तरह के फॉर्मैट में लिखने का मौका मिल रहा होगा? मैं ख़ुशनसीब हूं कि मैं एक ही दिन में किसी बड़े उपन्यासकार की रचना एडिट कर रही होती हूँ, वेब के लिए कॉन्टेन्ट लिख रही होती हूँ, किसी किताब का अनुवाद कर रही होती हूं, किसी टीवी चैनल के प्रोमो के लिए स्क्रिप्ट लिख रही होती हूं, किसी अंग्रेज़ी वेबसाइट के लिए अगले कॉलम के आईडिया सोच रही होती हूँ और उसके साथ-साथ अपने लॉन्ग फॉर्मैट के साथ संघर्ष भी कर रही होती हूँ। हर बार लिखना - ख़राब या अच्छा, शॉर्ट या लॉन्ग, संभला हुआ या बिखरा हुआ, अपने लेखन को मांजने का ज़रिया क्यों नहीं हो सकता? लिखने के साथ इतना सारा रोमांस जोड़ देने की इजाज़त मुझे है क्या?

और अगर है, तो उस रोमांस को बचाए रखना भी मेरा ही काम है। लिखना अब मेरे लिए रोमांस रहा नहीं, वो कई सालों की शादी हो गई है जो बस है - दिन-रात, आजू-बाजू, भीतर-बाहर.... वजूद का एक अकाट्य हिस्सा, जिसके लिए लॉयल्टी में ही चैन है। अपनी तमाम उलझनों और कोफ़्त के बावजूद। उस रिश्ते में कुछ एक्साइटिंग करने की बेमानी और नाजायज़ ख़्वाहिश के बावजूद। इसलिए क्योंकि लॉयल्टी में सुख है। जिन्होंने लेखन को रोमांस बनाकर उसे बचाए रखा, जिलाए रखा और उसमें ज़िंग डालते रहे, वो ऊबते रहे, डूबते रहे। मेरे लिए लेखन शादी ही ठीक। टेढ़ा है, मगर मेरा है। बोरिंग है, लेकिन फिर भी मेरा है। एकरस है, फिर भी मेरा है। रुलाता है, थकाता है, मगर फिर भी मेरा है। इसलिए हर सुबह और शाम इस शादी के लिए ख़ुद को दुरुस्त बनाए रखना है, मेहनत करते रहनी है। जो कई सालों से शादी-शुदा है, वो जानता है कि एक रिश्ते को सुकूनदायक बनाए रखना कोई हँसी-ठठा नहीं। शादी लाइफलॉन्ग है। लिखना कई जन्मों के आर-पार से होते हुए हर जन्म में पाल लिया गया वही लाइफलॉन्ग फितूर है।

इसलिए निजात है नहीं अनु सिंह। किसी भी तरह से नहीं। रोकर-धोकर, तमाम सारी शिकायतें करके भी बस ये समझ लो कि लिखना रोमांस नहीं है। लिखना जीने की ज़रूरत है। इसलिए खाली पन्ने निहारते रहने और लिखने को रोमांटिसाइज़ करते रहने से अच्छा है कि हर रोज़ ख़राब या अच्छा, जैसा भी हो लिखा जाए।

आज की डेडलाइन क्या है, देखो तो ज़रा।

आज की चुनौतियां? ब्रिंग इट ऑन, वर्ल्ड!

Monday, July 13, 2015

अटकी हुई फ़िल्म स्क्रिप्ट - डे वन

दिनभर लिखती रहती हूँ - कभी किसी के लिए, कभी किसी के लिए। काम अब सिर्फ़ शब्दों का खेल हो गया है। इसलिए कहानियाँ गायब हो गई हैं, शब्द बचे रह गए हैं।

एक थकन सी तारी रहती है इन दिनों। टीएसएच लेवल बहुत बढ़ा हुआ है। जी में आता है, रोती रहूँ। लेकिन रोने की भी फ़ुर्सत नहीं। दिन हरसिंगार की डाल है तो डेडलाइन वो अजगर जो उस डाल की जान ही नहीं छोड़ता। माली को फिर भी उम्मीद है कि मौसम बदलेंगे। पेड़ों से पत्ते झर-झरकर गिरेंगे जिस रोज़, उस रोज़ अजगर किसी और डाल का रास्ता अख़्तियार करेगा। या कोई सँपेरा ही कहीं आ जाए कहीं से। काबू में अजगर भी होगा एक दिन, डेडलाइन का डर भी।

तब तक एक बोझिल गर्दन पर जलती आँखें और तपता माथा कायम रहे, यही उम्मीद है।

कोहिनूर की कहानी आंतों में जाकर अटक गई है कहीं। ग़म के क़िस्से लिखना आसान है। हँसी और मज़ाक से कहकहे ढूंढ निकालने के बहानों के लिए लिखना बहुत मुश्किल। वो भी, कहानी अगर बच्चों की ज़ुबां में कहनी हो तो...

इन दिनों यही सोचती रहती हूँ कि बच्चे अपने आस-पास के लोगों को किस तरह देखते हैं, उनके बारे में क्या सोचते हैं, उनके भीतर क्या डिस्ट्रक्टिव और क्या कन्सट्रक्टिव है, रिबेलियन की भावना पहली बार कब और क्यों आती है, वो कौन-सी वाइब होती है जो एक खूंखार दिखनेवाले इंसान की बेतरतीबी उन्हें बहुत आसानी से जोड़ देती है जबकि एक शांत दिखनेवाला, दुनिया की नज़र से सफल और क़ायदे का इंसान उन्हें बिल्कुल रास नहीं आता। बच्चों के लिए मुमकिन क्या है और असंभव की परिभाषा क्या है?

दस सीन के इर्द-गिर्द ही घूम रही हूं पिछले कितने दिनों से। कहानी आगे बढ़ने से इंकार कर रही है। कहती है, पहले जितना बनाया है, उसे अच्छी तरह तैयार तो करो, उससे संतुष्ट तो हो जाओ। भीतर का एडिटर नुक्ताचीं करता रहता है। बाहर का दबाव लिखने से रोके रहता है। अजीब सी हालत है। न हरसिंगार के पत्ते झड़ने का नाम ले रहे हैं, न अजगर किसी और चंदन की तलाश में निकलने को तैयार है।

फिर भी ये उम्मीद है कि कहानी एक न एक दिन ख़ुद को कह ही डालेगी। फ़िल्म की स्क्रिप्ट लिखने का हुनर भी एक न एक दिन आ ही जाएगा।