Friday, December 19, 2014

आओ गिनें कफ़न, चुनें ताबूत

अमरावती डिविज़न में है बुलढाणा, विदर्भ का सबसे पश्चिमी हिस्सा - नाम-शोहरत-दौलत-ख़्वाब बनाती बिगाड़ती मुंबई से कुछ पांच सौ किलोमीटर दूर। अरुणावा सिन्हा की किसी अनूदित कहानी में पढ़ा था कि बुलढ़ाणा में एक झील है जो दरअसल झील नहीं, दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा क्रेटर है। एक सैलानी बाबा की दरगाह भी है वहाँ। पीर की दर पर मेरे जैसे फ़ितरती घुमंतुओं की दरकार है या नहीं, मैं नहीं जानती। बुलढ़ाणा शहर को सैलानियों की ज़रूरत ज़रूर है। शहर या तो गन्ने की खेती से चलता है या फिर थोड़ी-बहुत कपास की खेती से। 

मैं जिस मौसम में बुलढ़ाणा गई थी वो मौसम कपास के खेतों से कपास चुनने का था। कांटों में उंगलियां और अपने दामन उलझाए खेतों में सिर झुकाए या तो औरतें कपास चुनती रहती थीं, या फिर बच्चे। 

रोज़ी-रोटी की ज़रूरत इल्म से कहीं ज़्यादा बड़ी होती है। पढ़-लिखकर दुनिया को बदल देने के वालों की जो गिनी-चुनी कहानियां बच्चों तक पहुंचती है, उसमें बहुत उम्मीद नहीं होती। आनेवाले कल के बिकाऊ ख़्वाब तो वो खरीदे जिसके आज का पेट भरा है और एक जो शरीर है वो किसी बाहरी-भीतरी ज़ख़्म या तपिश से थका हुआ न हो। वरना ज़िंन्दगी के रोज़-रोज़ के संघर्ष दो वक्त किसी तरह पेट भरने और सिर पर छत जुटाए रखने से आगे नहीं निकल पाते। वजूद का सवाल बेसिक सर्वाइवल के जवाब से जुड़ा हुआ है। 

फिर मैं, और मेरे जैसे लोगों की टीम खामगाँव में क्या कर रही थी? अपनी-अपनी गर्दनों में कैमरे लटकाए हम किस गरीबी की तस्वीर खींचते? किस डोनर को भेजते? किस इंटरनेशनल फंडिंग एजेंसी को पक्का यकीन दिला पाते कि उनके दिए यूरोज़ (या डॉलर) बच्चों के ख़्वाब खरीद लाएंगे? हम फिर भी उस गाँव में अपने लिए तस्वीरें और केस स्टडिज़ ढूंढते रहे थे। 

एक प्राइमरी स्कूल था वो, जहाँ उस रोज़ का सबक मिला था हमें। शाम होने को थी, लेकिन मग़रीब की ओर बढ़ता सूरज धीरे-धीरे चलता है। रोशनी के जो थोड़े-बहुत टुकड़े खिड़कियों से आने चाहिए थे, उन्हें बंद खिड़कियों ने रोक रखा था। 

खिड़कियां बंद क्यों हैं? मैंने पूछा था। 

दूसरी-तीसरी-चौथी क्लास के बच्चे क्या जवाब दे पाते कि मुझे कोई जवाब मिलता। 

बाहर से शोर बहुत आता है न, इसलिए। 

बाहर का शोर भी दो हिस्सों में बंटा हुआ है, ये समझने में मुझे देर न लगी। मैं जिस स्कूल में खड़ी थी वो एक प्राइमरी स्कूल था और वहां की दीवार से कुछ पचास मीटर दूर जो दो कमरों की इमारत थी वहाँ उर्दू प्राइमरी स्कूल चलता था। तालीम बंटी हुई थी। तालीम का मज़हब और तालीम की ज़ुबानें भी बंटी हुई थीं। ज़ाहिर सी बात है, शोर भी बंटा हुआ था।  

हम दोनों स्कूलों में गए थे। एक स्कूल में बच्चों ने हमें सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला का लिखा'वर दे वीणावादिनी वर दे' सुनाया था, तो दूसरे में अल्लामा इक़बाल का लिखा 'लब पे आती है दुआ बनके' सुनाया था। बच्चे कहां बंटे होते हैं कि बंद खिड़कियां उन्हें बांट पातीं? लेकिन दुआएं बंटी हुई थीं, दुआओं की ज़ुबानें भी बंटी हुई थीं। ऊपरवाला जाने ज़ुबानों की सुनता होगा या आवाज़ों की सुनता होगा! या शायद बहरे हो जाने में ही अक्लमंदी नज़र आई होगी उसको। 

दुआ की ज़ुबानें हिंदी और उर्दू में बंटी हुई थीं। लेकिन आवाज़ें एक-सी थी, बातें एक-सी थीं और सरोकार बिल्कुल एक जैसे थे। बच्चों का नाम चाहे जो भी रहा हो, उन्हें अपने स्कूलों में साफ़ पानी चाहिए थी, किताबें और नोटबुक चाहिए थे और खेलने-कूदने के लिए गेंद, बल्ला, फुटबॉल, रस्सियां और वक़्त चाहिए था। उन्हें हिफ़ाज़त चाहिए थी। स्कूल में बच्चे ज़िन्दगी के उन कड़वी सच्चाईयों से महफ़ूज़ थे जिन्हें जीना उनके वजूद की मजबूरी थी। 

बांटने का काम हम कर करते हैं। कितने सारे बंटवारे हैं - नामों के, उपनामों के, गांवों-कस्बों-गली-मोहल्लों के। मज़हब के, ज़ुबानों के। यहां तक कि मज़हब में भी बंटवारे। हम तो अपने बच्चों को भी बांट देते हैं - तू बड़ा, तू छोटा। तू लड़का, तू लड़की। तू गोरा, तू काला। तू बेवकूफ़, तू ज़हीन। स्कूल में बंटवारे और बड़े। तू मिलिट्री वाला, तू सिविल। तू अमीर, तू गरीब। तू कसाई टोला का, तू बाह्मन टोला का। 

अंतहीन बंटवारे। ज़मीन के बंटवारे, आसमान के बंटवारे। गोलियों के बंटवारे, ख़ून के छींटों के बंटवारे। गुनाह के बंटवारे, यकीन के बंटवारे। 

जिस देश में एक ख़ूनी की मूर्ति चौराहों पर लगाकर उसका जश्न मनाने की बात होने लगे, उस देश को अपने पड़ोसी की गिरेबान में झांकने का हक़ मिलना भी चाहिए? चलो बंटवारों को अंतिम सत्य मान लें, और गोलियां गिनें। ख़ून के क़तरे गिरें। कफ़न गिनें, ताबूत चुनें। गिनते-गिनते जब थक जाएं तो अपने-अपने चौराहों पर लगे मूक महापुरुषों की मूर्तियां गिनें। 

फिर चलो ये भी गिन लें कि अपनी-अपनी गलियों, गांवों, शहरों में कितने बच्चों को कितनी बार बांटा हैं हमने। 

आओ, अपनी-अपनी खिड़कियां बंद कर लें। तुम अरबी-फ़ारसी में पढ़ो मर्सिया और मैं संस्कृत में श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोक गुनगुनाती हूं। 

अध्याय दो, श्लोक २७-२८ - 

जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च। 
तस्मादपरिहार्य अर्थे न त्वं शोचितुमर्सि। 

क्योंकि इस मान्यता के अनुसार जन्मे हुए की मृत्यु निश्चित है और मरे हुए का जन्म निश्चित है। इस बिना उपाय वाले विषय में तू शोक करने योग्य नहीं है। 

सुनो कि तुम्हें नसीब होगी जन्नत, और मुझे एक हज़ार चंद्रलोकों का सुख। बच्चों का क्या है? फिर पैदा हो जाएंगे। उन्हें हम फिर से बांट देंगे। 

Thursday, December 4, 2014

एक इंटेलिजेंट फ़िल्म है 'ज़ेड प्लस'

"फिल्म देखी तुमने?" 

हालाँकि मेरे इस फोन पर नाम फ़्लैश नहीं कर रहा था, लेकिन मैं जानती थी कि आवाज़ किसकी थी और ये दो टूक सवाल मुझसे पूछने का अधिकार कौन सा फ़िल्मकार रखता है। 
अपन की इतनी औकात नहीं अभी कि हैप्पी न्यू ईयर की रिलीज़ से पहले फराह खान फ़ोन करके पूछें, "फिल्म देखी तुमने?" ? ये दीगर बात है कि हैप्पी न्यू ईयर को हम नाचीज़ दर्शकों के बिना भी बॉक्स ऑफ़िस में दो-चार सौ करोड़ तो यूँ ही मिल जाएँगे। लेकिन ज़ेड प्लस जैसी फ़िल्म को हम जैसे दर्शकों की सख़्त ज़रूरत है। इसलिए नहीं कि ज़ेड प्लस किसी एब्स्ट्रैक्ट इंटेलेक्चुअल फ़िल्म की श्रेणी में आती है - वैसी फ़िल्में जो सत्तर और अस्सी के दशक की मेनस्ट्रीम ढिशूम-ढिशूम फ़िल्मों के बीच उतनी ही ख़ामोशी से बन रही थीं जितनी ख़ामोशी से फ़िल्म रिलीज़ हो जाती थी और एनएफडीसी के आर्काइव में जमा कर दी जाती थी। ज़ेड प्लस इंटेलेक्चुअल फ़िल्म बिल्कुल नहीं है। लेकिनज़ेड प्लस इंटेलिजेंट ज़रूर है, एक ऐसा पॉलिटिकल सटायर जिसे पढ़ने की आदत तो है हमें, लेकिन पिक्चर हॉल में देखने की बिल्कुल नहीं है। 
इसलिए कीकर और खेजड़ी के झाड़-झंखाडों से होते हुए कोई एक सड़क जिस रेगिस्तानी कस्बे की ओर का रुख लेती है, वो कस्बा अपनी पूरी ऑथेन्टिसिटी के साथ हमारे समक्ष खुलता है - गड्ढा दर गड्ढा, दुकान दर दुकान, किरदार दर किरदार, बात दर बात, गली दर गली। सुखविंदर सिंह (और किसी नई गायिका) की आवाज़ में कव्वाली को रूह ज़ब्त कर लेना चाहती है, लेकिन रेडियो पर या यूट्यूब पर बार-बार सुना होता तब तो मनोज मुंतशिर नाम के गीतकार के बोल ज़ेहन में ठहरे रहते। इसलिए ज़ेड प्लस का संगीत दर्शकों के लिए उतना ही भर रह जाता है - बैकग्राउंड स्कोर - पार्श्व में चलती हुई धुन जिससे कहानी का वास्ता न के बराबर है। 
किरदारों के इंट्रो के बाद जो कहानी खुलती चली जाती है उसमें कहीं कोई बनावटीपन नहीं है, यहाँ तक कि सरकार गिराने की धमकी देती समता मुखर्जी में भी नहीं। व्यंग्य अपने शुद्ध रूप में बचा रहता है - चाहे वो हिंदी न बोल पाने वाले दक्षिण भारतीय प्रधानमंत्री के रूप में हो (कुलभूषण खरबंदा) या चैनलों को ख़त भेजने की ख़्वाहिश रखने वाले 'पड़ोसी देश' के टेररिस्ट ग्रुप के मुखिया (संजय मिश्रा) के रूप में। ग़ौर फ़रमाने वाली बात ये है कि 'पीएम' न पीवी नरसिंह राव का कैरिकेचर है न देवेगौड़ा का। बल्कि लॉन्ग शॉट में तो कुलभूषण खरबंदा का किरदार मुझे कई जगह चंद्रशेखर के आस-पास लगा। (और चूँकि डॉ द्विवेदी ने फ़िल्म की शुरुआत में ही डिस्क्लेमर दे दिया है कि ऐसी घटनाएँ डेमोक्रैसी में नहीं घटतीं, इसलिए फ़िल्म को हम सिर्फ़ और सिर्फ़ 'डेमोक्रैसी' का कैरिकेचर मान लेते हैं।) 
परत दर परत जो कहानी खुलती है वो कुछ यूँ है - एक छोटे से कस्बे के पीपल वाले पीर की दरगाह पर पीएम आते हैं, अपनी सरकार बचाने की दुआ माँगने। पीर की दरगाह पर एक दिन का खादिम असलम पंचरवाला है, जो अपने पड़ोसी की शिकायत पीएम से कर बैठता है। पीएम का आला अफ़सर 'पड़ोसी' से तात्पर्य वही लगाता है जो डेमोक्रैसी के आला अफ़सर को अब तक कूटनीति के पाठ के तहत समझाया गया है - पड़ोसी यानी पाकिस्तान। फिर ज़ुबानों और तर्जुमे का कम, डेमोक्रैसी का कुछ ज़्यादा... घालमेल इस तरह का होता है कि पीएम असलम को ज़ेड प्लस सेक्युरिटी दिलवा देते हैं। उसके बाद असलम महज़ एक किरदार है, बाकी का स्वाँग डेमोक्रैसी रचती चली जाती है।   

फ़िल्म में कुछ कमाल के मेटाफ़र हैं - सईदा यानी कश्मीर के लिए दो पड़ोसियों की लड़ाई; असलम का पंचरवाला होना (जो बाद में चुनाव उम्मीदवार के तौर पर दिल्ली से सीमावर्ती राजस्थान तक पहुँचते-पहुँचते पंचर हो जानेवाली योजनाओं के 'पंचर' ठीक करने का दावा करता है; पीपलवाले पीर की दरगाह से गायब पीपल ठीक वैसे ही जैसे लोकतंत्र से 'लोक' गायब होता है; पीएम का दक्षिण भारतीय होना, जो अब तक के लोकतंत्र के सबसे बड़े स्टीरियोटाईप को तोड़ता है।  
फ़िल्म की दूसरी बड़ी ख़ूबी वे कलाकार हैं जिन्हें हमने अभी तक सह-किरदारों के रूप में देखा है। आदिल हुसैन को देखकर सबसे ज़्यादा हैरानी होती है। जिस आदिल को अभी तक द रिलक्टेंट फंडामेन्टलिस्टलाइफ ऑफ़ पाई याइंग्लिश विंग्लिश में हमने बहुत शहरी और सोफिस्टिकेटेड भूमिकाओं में देखा है, उस आदिल को असलम की भूमिका के रूप में स्वीकार करते हुए ज़रा भी वक़्त नहीं लगता। असलम असलम लगता है, आदिल नहीं और यहीं आदिल के अभिनय को विश्वसनीय बनाता है। हालाँकि, निजी तौर पर मुझे आदिल के पड़ोसी की भूमिका में मुकेश तिवारी ने बहुत प्रभावित किया। छोटे से कस्बे के एक नाकाम शायर (और नाकाम महबूब) के रूप में मुकेश ने कमाल का अभिनय किया है। और कुलभूषण खरबंदा मेरी याद में शान के शाकाल के रूप में कम, 'डीक्षिट' कहने की अपनी अदा और आईपैड से असलम के लिए संदेश पढ़ते पीएम के रूप में ज़्यादा बचे रहेंगे। 
इस फ़िल्म में जिस एक शख़्स को पर्दे पर देखते ही चेहरे पर हँसी आ जाता है, वो है संजय मिश्रा। ओवर-द-टॉप भूमिकाओं में भी कैसे अपने अभिनय की छाप छोड़ी जाती है, संजय मिश्रा को इसमें महारात हासिल है। हालाँकि जाने क्यों मुझे फँस गया रे ओबामा में संजय का किरदार याद आता रहा। उतनी ही प्रभावशाली भूमिका में पीएम के ओएसडी के रूप में हैं के के रैना। स्टारों और सुपरस्टारों के लिए लिखी और बनाए जानेवाली फ़िल्मों के बीच ऐसे कलाकारों के लिए भूमिकाएं क्यों नहीं लिखी जातीं, ये समझ पाना कोई रॉकेट साइंस नहीं है। पर्दे पर का स्पेस हर स्टार को इतना ही प्यारा होता है कि मुझे नहीं लगता कि वो किरदारों के इक्वल या फ़ेयर डिस्ट्रिब्यूशन में यकीन भी करता होगा। इस लिहाज़ से ज़ेड प्लस को इसलिए पूरे नंबर मिलने चाहिए क्योंकि यहाँ कहानी को तवज्जो दी गई है, कलाकारों को नहीं। कलाकार अपने दम पर कहानी पर अपनी-अपनी छाप छोड़ते हैं। 
हालाँकि फ़िल्म की महिला किरदारों को देखकर अफ़सोस होता है। हो सकता है ये मेरा वहम हो, लेकिन चाहे वो हमीदा हो, सईदा हो या फ़ौज़िया, सब अभिनेत्रियाँ ज़्यादा लगती हैं, किरदार कम। जितनी मेहनत पुरुष किरदारों के डायलॉग सँवारने में गई, उसका दसांश भी महिला किरदारों के डायलॉग को दिया जाता तो शायद जो बनावटीपन उनके किरदारों में दिखाई देता है, उससे बचा जा सकता था। मिसाल के तौर पर, मोना सिंह का शहरी लहज़ा उनसे छूटता नहीं और वहाँ स्थानीयपन को कोई पुट नहीं। ये स्थानीयपन और नहीं तो कम-से-कम पुरुषों की गालीनुमा गालियों में तो बचा रहता है। हालांकि, मुझे लगता रहा कि अगर मुख्य किरदारों के संवादों में रेगिस्तान की थोड़ी सी ख़ुशबू मिलाई जा सकती तो क्या मज़ा आता। उनकी उर्दू और हिंदुस्तानी कहीं-कहीं तो एकदम आर्टिफिशियल लगती है। जो और चीज़ें खलती रहीं वो मीडिया का पोट्रेअल था, जिसमें कहीं कोई ताज़गी नहीं थी। हम इन कैरिकेचरों को इतना देख चुके हैं कि स्क्रीन पर उनका आना बेमानी लगा। फ़िल्म की लंबाई भी खलती रही। एक और चीज़ जो खलती रही वो क्लाइमैक्स का बड़ी ख़ामोशी से आकर ख़त्म हो जाना था। आख़िरी के आधे घंटे फ़िल्म बहुत प्रेडिक्टेबल लगी मुझे - ऐसे कि जैसे एक के बाद घटनाएं ठीक वैसी ही बढ़ती रहीं जैसी हम उम्मीद कर रहे थे।  
मैं वीकेंड में जिस हॉल में फ़िल्म देख रही थी, वहाँ कुल मिलाकर २३ दर्शक थे। उड़ने वाली गाड़ियों और अनरिअलिस्टिक कहानियों के बीच अपने स्टार के लिए सीटियाँ और तालियाँ बजाने की आदत रखने वाली ऑडिएंस को ज़ेड प्लस इसलिए अच्छी नहीं लगेगी क्योंकि इस फ़िल्म में कहीं कोई मसाला नहीं है। अगर आपको सिर्फ़ और सिर्फ़ तंदूरी, पिज्ज़ा और चाइनिज़ खाने की आदत है तो ऑथेन्टिक राजस्थानी कुइज़िन की तरह ये फ़िल्म भी आपकी ज़ुबान पर थोड़ा भारी पड़ सकता है। ये फ़िल्म सटायर है, स्लैपस्टिक कॉमेडी नहीं। इसलिए हँसी फव्वारों में नहीं, फुहारों में आएगी। बाकी, जिस लोकतंत्र को लेकर ही हम इतने तटस्थ हो गए हैं, उस लोकतंत्र पर बने सटायर को लेकर हम क्या पता कभी संवेदनशील होंगे भी या नहीं (पहले आती थी हाल-ए-दिल पे हँसी/अब किसी बात पर नहीं आती)। 
बहरहाल, एक मीडियम के रूप में फ़िल्म की सफलता इस बात में निहित होती है कि उस फ़िल्म ने हमारे वक़्त को कैसे रिकॉर्ड किया है। इस लिहाज़ से ज़ेड प्लस एक महत्वपूर्ण फिल्म है क्योंकि हमारा वक़्त और हमारी पीढ़ियों का सच सिर्फ़ कैंडीफ्लॉस अर्बन डिज़ाईनर सिनेमा ही नहीं है। हमारे वक़्त का सच उन कस्बों का सच भी है जिसे मीडिया रिपोर्ट करती नहीं, जिससे वजूद से हमारा कुछ बनता-बिगड़ता नहीं। और चूँकि फिल्म का लेखक (राम कुमार सिंह) ऐसे ही किसी कस्बे में पला-बढ़ा है, कस्बों में बसे उसी लोकतंत्र और वहाँ की दुनिया के बारे में लिखता-पढ़ता रहता है, इसलिए ज़ेड प्लस जैसी फ़िल्म इससे अधिक ईमानदारी से नहीं लिखी या बनाई जा सकती थी। कोअलिशन पॉलिटिक्स का दौर मुमकिन है टल गया हो, लेकिन ख़त्म नहीं हुआ। मेरा मानना है कि अपनी तमाम खामियों-खूबियों के साथ ज़ेड प्लस सिनेमा के तौर पर उतना ही प्रासंगिक है, जितनी लोकतंत्र के लिए गठबंधन की राजनीति। 
बावजूद इसके मेरे जैसे नाकारा दर्शक हैप्पी न्यू ईयर फर्स्ट डे फर्स्ट शो देखने जाएंगे, और जेड़ प्लस जैसी फ़िल्में तब देखेंगे जब वे या तो डीवीडी पर आ जाएंगी या जब कोई उनसे हक से पूछेगा, "फ़िल्म देखी तुमने?"