Sunday, August 24, 2014

Then as it was, then again it will be...

(It is uncanny how I was dreaming of my grandfather yet again. 


Two years later... the same date... the same dream. 


Here is a note I wrote on FB on August 23rd, 2012. Yet another proof of what writing a diary could do to us, and how writing helps us understand our lives, actions and ourselves better through months and years, and through our lifetime. Yet another proof of why we should often communicate with ourselves. Yet another proof of how our expressions help us in the moments of despair.)  


I woke up really early today, having cried freely even in my dreams. It is really uncanny how I dream of my grandfather every time there is something I need to take a decision about.

I dreamt of him again last night. He was restless, and he was making me look for something I had lost. He was stading right behind me holding me by my shoulders, forcing me to duck down right under the bed.

"It's filthy out there. I am allergic to dust," I resisted.

"Get a broom and clean it", he said.

That couldn't be my grandfather, I thought to myself. This has to be someone else. Baba would have never asked me to pick up a broom, and do something THAT menial. I was too precious for him. 

I couldn't find what I was looking for, but I have got your message Baba. 

I need to clean up. I need to duck down in order to see where all this filth is lying, and I need to look for what I have lost, making my way through that clutter.

I need to find myself. I need to find patience. And I need to find time to indulge in meaningful conversations with myself in order to express better.

Now, THAT is what is bothering me. I am in such a hurry most of the time that I just need outlets to express - short conversations, a flash of thought, an idea, a sentence, a phrase, a line which is self-explanatory... All the mediums through which I am communicating are giving me such outlets. 

But what happened to the more meaningful conversations? The result is here - endless day-to-day shallowness and a monotony that is making me wonder where all my time is going! 

My dear Facebook, if it were not for you, I wouldn't have found even this bit of myself which wants to take a plunge into something deeper, something more challenging. I owe my courage to express uninhibitedly in public to you, and this is precisely why I need to step aside and look at what has become of me from a distance now. 

Is this what I wanted my expressions to be? 

I don't deny that what starts here with a monologue sometimes results into very meaningful and quick dialogues, with ideas flowing in from all sides - sometimes inspirational, sometimes creative, intuitive, imaginative, but quick nevertheless. And if you come to think of it, these quick conversations are like quick lovemaking, which fulfills the desire but can never be passionate and meaningful.

I am feeling the need of more meaningful conversations with myself now, more in-depth, more evocative. And hence I need to take some strong actions against small and quick communication, for some ideas will need to be left untouched and dissatisfied in order to grow into something bigger and more powerful.   

An action doesn't necessarily proceed by laws or by reasons. An action proceeds by feelings, intuition and conscience. An action, I would like to believe, is a representation of thoughts and behaviour. Consider this action of mine a way of disciplinging myself. I need to stay quiet. I need to cry without feeling miserable. I need to laugh without having this obsessive compulsive disorder of sharing that joke with the world. I need to be with myself. I am hoping that it surely will bring some order to the chaos of mind and will help me make the unknown known. If not that, it will at least help me acknowledge the unknown, and sometimes help me accept it.

For now, I would like to measure "a meaningful talk" by the control it has managed to achieve over outbursts of emotions. 

I will come back when I have something more meaningful and important to share that the mundane status updates and note-to-selfs. I will come back when I have found myself. 

क्या कहूं कहां ग़ुम हूं मुद्दतों से, 
मुझको तो ढूंढने निकला है अब घर मेरा। 

And here is the famous Led Zeppelin song which has been on a loop since early morning. Melancholy has its own charm, I tell you!

"But the eagle leaves the nest, it's got so far to go

Changes fill my time, baby, that's alright with me
In the midst I think of you, and how it used to be"  

Wednesday, August 20, 2014

ख़ानाबदोशियों पे ही जाने क्यों, इलाही मेरा जी आए!

टूटा हुआ एक घोंसला, बिस्तर पर फुदकते दो चूजे, फ़र्श पर घूमती बेपरवाह निर्भीक मोटी छिपकली, बिखरा हुआ घर और बाथरूम का एक नल जो बंद ही नहीं हो रहा... रात कुछ ऐसे बिंबों से होकर गुज़री है।

शुक्र है, सुबहों का वजूद रातों से आज़ाद होता है।

साढ़े छह बज गए हैं, लेकिन मैं उठना नहीं चाहती। छह चालीस हो गए हैं, लेकिन मैं फिर भी उठना नहीं चाहती। अगले पैंतीस मिनट में बच्चों की बस आ जाएगी, लेकिन मैं फिर भी उठना नहीं चाहती।

जाने वजह क्या है। रात जल्दी सो गई थी। लेकिन फिर भी मैं उठना नहीं चाहती। मैं बच्चों के बहाने अपनी छुट्टी चाहती हूँ।

बच्चों का इंटर-हाउस कविता पाठ है आज, और दोनों ने बहुत तैयारी की है। आदित तो साढ़े नौ बजे तक होमवर्क करता रहा था, और अपने क्लास के नोटिस बोर्ड पर लगाने के लिए पुलिसवाले का एक स्केच बनाता रहा था। नींद में भी दोनों अपनी-अपनी रटी हुई कविताएं दोहराते रहे थे।

मुझे उठना ही होगा। मुझे दोनों को स्कूल भेजना ही होगा, वरना दिल टूट जाएगा दोनों का।

साढ़े सात से थोड़ा पहले ही घर एकदम खाली हो जाता है। यूं कि जैसे तूफ़ान गुज़र गया हो, और आपाधापियों की निशानियां चुनते हुए एक ही ख़्याल तारी रहता है - बिस्तर पर जाऊं और सो जाऊं बस। गहरी नींद। बहुत गहरी। मर जाने के माफ़िक। और जब उठूं तो किसी अनजान शहर में उठूं, जहां से बिस्तर से बाथरूम तक जाने तक का दरवाज़ा ढूंढना पड़े, रसोई खोजनी पड़े, घर से बाहर निकलने का दरवाज़ा ख़ुद ही बनाना पड़े।

हम सबसे ज़्यादा जो छुपाते हैं, अपनी थकान को छुपाते हैं। जिस्म से ज़्यादा मन की थकान को।

मन को थकान दूर करने का कोई तरीका चाहिए।

ऐसे थके हुए मन को रिजुवेनेट करने के लिए जुलिया कैमेरॉन आपको आर्टिस्ट डेट पर जाने की सलाह देती हैं। कहती हैं कि अपने 'इनर चाइल्ड', अपनी भीतर के 'आर्टिस्ट चाइल्ड' को घर से बाहर निकालिए। शहर में बेवजह घूमिए। सूखी हुई पत्तियाँ अपनी जेबों में भरिए। टूटे-फूटे पत्थर गली-मोहल्लों से लाकर अपनी मेज़ों पर सजाईए। हफ़्ते में एक घंटे का वक़्त अपने लिए, सिर्फ़ अपने लिए निकालिए। ये वक़्त आपके भीतर के 'आर्टिस्ट चाइल्ड' की ज़िद पूरी करने का है।

मैं सोचती हूं, जूलिया कैमरॉन हिंदुस्तान में - ख़ासकर - उत्तर भारत में नहीं रही होंगी। सितंबर की चिलचिलाती धूप और गंदी-सी उमस में भला कोई पत्ते-पत्थर चुनने घर से बाहर जाए? मेरे भीतर का आर्टिस्ट चाइल्ड कभी सोता, कभी रोता हुआ ही ठीक है। हमारे देश में बच्चे ऐसे ही पाल लिए जाते हैं। हमारा समाज बच्चों को नर्चर करने में यकीन नहीं करता, इस बात पर यकीन करता है कि बच्चे बड़े हो ही जाते हैं। रोज़़-रोज़ का संघर्ष जो है, वो बच्चों और बच्चों की तरह भीतर के आर्टिस्ट बच्चे की बात सुनने का वक़्त नहीं देता।

फिर क्या है कि मन ज़िद पर अड़ा है? फिर क्यों मैं बेवजह इंटरनेट पर दुनिया के सबसे तन्हां और अलहदा शहरों के नाम ढूंढ रही हूं? क्यों गूगल पर अचानक टाईप कर बैठी - the 25 most remote places in the world? वो कौन-सी हैरतें हैं जो मैं जीना चाहती हूं, महसूस करना चाहती हूं? रोज़मर्रा की ज़िन्दगी कम हैरतअंगेज़ है? आस-पास कम हैरानियां, कम सदमे हैं कि कहीं दूर जाकर डूबते हुए देखना है सूरज को?

वो कौन-सा शहर होता होगा जहाँ रात उगती नहीं होगी कभी?

वो कौन-सा पहाड़ होगी जिसके चिकने पत्थरों पर से फिसलकर सीधे प्लूटो पर लैंड किया जा सके?

वो कौन-सी नदी होगी जिससे निकलकर मछलियां रेत पर आराम फ़रमाती हों?

दुनिया का सबसे ऊंचा, और सबसे नीचा शहर कैसा होता होगा?

मछुआरों की बस्तियों में क्या वाकई समंदर से निकलकर नाचने के लिए आती होंगी रूहें?

जंगल की बीचोंबीच सड़क जब बल खाना भूल जाती होगी तो कहाँ ठहरती होगी?

एक ज़िन्दगी में ये सब देख लें और जान लें, क्या मुमकिन है ये भी?

दो किताबें और एक आर्टिकल दूसरी ज़ुबान की शक्ल में ढलने का इंतज़ार कर रहे हैं। टूृ-लिस्ट है कि ख़त्म नहीं होती। क्लायंट मीटिंग्स और कॉनकॉल्स आज की ज़िन्दगी का इकलौता सच है। ड्राफ्ट्स में अधूरी कहानियां पुकार पुकार कर थक चुकी हैं। बाज़ार के सौ काम हैं, और बाज़ार जाने के नाम पर आनेवाली उबकाई कम नहीं हुई। मेरा बस चले तो दूध और सब्जी भी ऑनलाइन खरीद लूं। दोस्तों को आवाज़ देना चाहती हूं, लेकिन शुक्र है कि मेरे पास किसी का फोन नंबर नहीं। एक ही रोना क्या रोना हर रोज़? काम के अलावा ख़ुद को बचाए रखने का कोई दूसरा रास्ता नहीं। डेडलाइन जिए जाने की इकलौती वजह है।

सब जानती हूं, लेकिन फिर भी...

ख़ानाबदोशियों पे ही जाने क्यों,
इलाही मेरा जी आए, आए।
इलाही मेरा जी आए...

बूंदों पे नहीं, गहरे समंदर पे
इलाही मेरा जी आए, आए
इलाही मेरा जी आए!!!

 





Tuesday, August 19, 2014

एक चिट्ठी 'गुलज़ार' के नाम!

गुलज़ार साब,

उड़ीसा में एक इत्तू-सा स्टेशन है - इतना ही इत्तू-सा कि गूगल पर भी बड़ी मुश्किल से मिलता है। इंटरसिटी में बैठने के बाद मुझे कई बार स्टेशन का नाम मन ही मन कई बार रटना पड़ा था - राईराखोल... राईराखोल... राईराखोल... राईरोखोल। कुल दो मिनट ट्रेन रुकती थी वहाँ, और ग़लती से स्टेशन छूट जाता तो अगला स्टेशन कौन-सा होगा, ये भी नहीं मालूम था। उड़िया बोल पाती तो सूरमा बन जाती, लेकिन ज़ुबानों पर मेरी अपनी निर्भरता ने मेरे भीतर की भीरू लड़की के सारे पोल खोल दिए थे।

और ऊपर से ग़ज़ब बात ये कि जिस ड्राईवर को मुझे लेने आना था, वो पहुंचा नहीं वक़्त पर। एक अजनबी प्लैटफॉर्म पर गुम हो जाना फैंटैसी रही है मेरी, लेकिन वो प्लैटफॉर्म राईराखोल नहीं हो सकता था। What a disgrace it would have been!

स्टेशन पर उग आए पलाश के पेड़ों को गिनने में मुझे जितना वक़्त लगा, उतने ही लंबे थे ड्राईवर साब का 'दो मिनट'। गाड़ी में बैठते ही उस ड्राईवर के सात ख़ून माफ़ कर देने का फ़ैसला कर लिया था मैंने। एक तो अप्रैल में जलते उड़ीसा से झूठी राहत मिल गई थी, और दूसरा - गाड़ी में आपकी आवाज़ गूंज रही थी - याद है/मेरी मेज़ पर बैठे-बैठे/सिगरेट की डिबिया पर/छोटे-से एक पौधे का स्केच बनाया था...

मुझे मालूम नहीं था कि मैं किस शहर, किस क़स्बे में हूँ।

मुझे ये भी मालूम नहीं था कि मुझे जाना कहाँ है।

मैं ये भी नहीं जानती थी कि मुझे मंज़िल पर पहुँचाने का बीड़ा उठाने वाले इस ड्राईवर पर यकीन करना भी चाहिए या नहीं।

मुझे रास्ते का पता न था, जिन लोगों से मिलने जाना था उन लोगों के फोन नंबर के अलावा मेरे पास कोई और जानकारी न थी।

(मैं एक फ़ील्ड विज़िट पर थी, और गांवों में जाकर एक रिपोर्ट के लिए डेटा इकट्ठा कर रही थी। उड़ीसा के पांच ज़िलों के सफ़र पर थी, अकेली।)

लेकिन गाड़ी में आपकी आवाज़ सुनते ही सिक्स्थ सेंस ने कहा, इस अजनबी आदमी पर यकीन किया जा सकता है। जिस डाईवर की गाड़ी में गुलज़ार और जगजीत सिंह की आवाज़ मुसलसल बहती हो, वो ड्राईवर मेहमानों की सलामती अपनी ज़िम्मेदारी समझता होगा।

राईराखोल के जंगल-गांवों से निकलते हुए, महानदी के विशालकाय पुल से होकर, किसी नेशनल हाईवे के रास्ते हम सफ़र करते रहे, और गाड़ी में आपकी आवाज़ के पीछे-पीछे चलकर आपकी लिखी ग़ज़लें आती रहीं, गूंजती रहीं।

सारी वादी उदास बैठी है
मौसम-ए-ग़ुल ने ख़ुदकशी कर ली 

किसने बारूद बोया बाग़ों में?


मैं नियमगिरि से कुछ ही दूर थी। मै कालाहांडी के रास्ते में थी। मैं उन जंगलों, पहाड़ों से होकर गुज़र रही थी जिनकी आवाज़ें तभी सुनाई देती हैं जब तरक्कीपरस्त लोग उनपर हमले बोलते हैं। हैरान थी कि हर जगह का अलग-अलग सच एक नज़्म में कैसे बयां हो सकता है? लेकिन ये नज़्मआपकी लिखी थी। जिसने ज़िन्दगी को भरपूर, और भरपूर ईमानदारी से जिया-बोया-काटा-धोया-खंगाला हो, उसका बयां किया हुआ सच यूनिर्वसल सच के बहुत करीब होता है।

आओ हम सब पहन लें आईने 
सारे देखेंगे अपना ही चेहरा 

सबको सारे हसीं लगेंगे यहां 

हम सब ज़रूरतमंद लोग हैं। पेट और जिस्म की भूख से ज़्यादा बड़ी भूख दिल और ज़ेहन की होती है। किसी की छुअन, प्यार से थाम ली गई उंगलियां, दाएं गाल पर बेख़्याली में उतार दिया गया कोई बोसा, तारीफ़ में कहे गए चार सच्चे-झूठे अल्फ़ाज़, और किसी का दिलाया हुआ ये यकीन कि तुम्हारी ज़रूरत है - ये हर बार एक बड़ा फ़रेब होता है। लेकिन हर बार इस बड़े फ़रेब को सच मानने की बदगुमानी हर रोज़ जीना का हौसला देती है। हर शख़्स टूटा-फूटा है यहां।

और ये पहली बार नहीं था कि आपके अल्फ़ाज़ों में किसी कच्चे भरोसे को जोड़ने की पक्की कोशिश सुनाई दी थी फिर एक बार। मैं उन दिनों उलझनों में थी। कई सवाल के जवाब हम ज़िन्दगी भर ढूंढते रहते हैं। वैसे ही कुछ सवालों को बालों के क्लच में उलझाए हुए सिर पर बोझ-सा डाले घूम रही थी गांव-गांव, शहर-शहर।

अपना ही चेहरा देखना चाहते हैं हम गुलज़ार साब - हर रिश्ते में, हर दोस्ती में। हम सब थोड़े कम थोड़े ज़्यादा हैं तो नारसिस ही। हम सबको अपने-अपने एको... अपनी-अपनी ही परछाईयों से मोहब्बत है।

है नहीं जो दिखाई देता है
आईने पर छपा हुआ चेहरा 


तर्जुमा आईने का ठीक नहीं!

और जो दिखता नहीं, वो ऐसा सच है जिसे रेत में सिर घुसाए शुतुमुर्ग की तरह हम देखना ही नहीं चाहते। दोष आईने के किए हुए तर्जुमे का है ही नहीं। दोष हमारी नज़रों का है, जो आईने में सिर्फ़ अपनी झूठी शक्लें देखना चाहती है। नज़रें सच को झुठलाती हैं। नज़रें अपने दोष छुपाती हैं। नज़रें अपने ही गुनाहों, ग़लतियों, बेवकूफ़ियों से आंखें चुराती हैं। नज़रें को नज़र में नज़र डालकर बात करने वाली परछाईयां अच्छी ही नहीं लगतीं।

इसलिए हम बदलते नहीं। इसलिए हम सुधरते नहीं। 

ऐसे बिखरे हैं रात-दिन जैसे 
मोतियों वाला हार टूट गया 

तुमने मुझको पिरो के रखा था! 

कई बार हुआ है कि भीतर के गर्द-ओ-गुबार को साफ़ करने की ज़रूरत होती है हमको। कई बार होता है कि रोने के लिए कोई अनजान रास्ता मंसूब होता है। जब कोई न देख रहा हो तो खुलकर रोना आसान होता है। जब कोई न सुन रहा हो तो अपनी रूह के कन्फेशन बॉक्स में बैठे-बैठे अपने भीतर के किसी पादरी के सामने अपने गुनाहों को क़ुबूल करना आसान हो जाता है।

जिस दिन रूह किसी अनजान रास्ते पर खुलकर ज़ेहन से बात करती है उस दिन गुलज़ार साब, उस सदी में पैदा होने के लिए यूनिवर्स को हज़ारों शुक्रिया भेजता है दिल कि पैदा हुए तो उसी ज़माने में जिस ज़माने ने आप जैसा कोई शायर देखा। चले उन्हीं सड़कों पर, जिए वही सरोकार, हासिल की वही तकलीफ़ें जो आपकी कलम से बरसती रहती है लगातार।

आपकी सालगिरह पर और क्या कहूं, सिवाए इसके कि

हमको ग़ालिब ने ये दुआ दी थी
तुम सलामत रहो हज़ार बरस 


हमको ग़ालिब ने ये दुआ दी थी
तुम सलामत रहो हज़ार बरस 

ये बरस तो फ़क़त दिनों में गया!

और ये जो दिन हों न, उनकी उम्र हज़ार बरसों की हो। है तो क्लिशे ही, फिर आपसे मुआफ़ी के साथ। आपके आगे आप ही की बात करने की ज़ुर्रत की मुआफ़ी भी दे दी जाए!

आप गुलज़ार रहें, सदियों तक।

 अनु


   

Sunday, August 17, 2014

चले हैं दूर हम दीवाने... और मैं घुमन्तू!

सुबह-सुबह उठकर मुझे योगा करना चाहिए। टहलना चाहिए। अपने मोटापे को कम करने के तरीके ढूंढने चाहिए।

लेकिन सुबह-सुबह उठकर मैं कर क्या रही हूँ? गूगल पर पहाड़ों और पहाड़ी शहरों के नाम-पते ढूंढ रही हूं, कि जहाँ जाकर फ़ितूरी मन का चैन ढूंढा जा सके। आईआरसीटीसी पर टिकटें हैं, और छोटे-छोटे होमस्टे की कीमतें इतनी ही हैं कि अपने और अपने बच्चों के लिए ज़िन्दगी की थोड़ी-सी कामचलाऊ सहूलियतें और बहुत-सारी तस्वीरें, अल्फ़ाज़ी तस्वीरें, बिंब, प्रतीक, उपमाएं और ज़िन्दगी के ख़ूबसूरत होने का यकीन खरीद सकूं।


ये मेरी सबसे बड़ी फैंटेसी थी कि किसी दिन गाड़ी में बैठकर पूरा देश धांग मारूंगी। ये मेरा सबसे बड़ा ख़्वाब था - अब भी है - कि डायरी में नई जगहों, नए लोगों के नाम-पते होंगे। मैं हर सुबह किसी नए गांव, किसी नए शहर में उठूंगी और हर शाम शफ़क़ पर गिरते रंगों पर लिखी जानेवाली कविताओं और अफ़सानों की चिंदियाँ उसी गांव, उसी शहर में उड़ा आऊंगी।

मुझे घुमंतू पहाड़ों ने बनाया। दरअसल ईमानदारी से कहूं तो मैं घुमन्तू तो हूँ भी नहीं। गुमां पाल रखा है बस, घुमंतू होने का। याद नहीं कि सड़कों से, और रास्तों से कब प्यार हो गया था। जब से मुझे याद है, मुझे बेमतलब घूमना अच्छा लगता था। हम छोटे थे तो हमारे रास्ते भी बहुत छोटे हुए करते थे। बहुत हुआ तो रांची से ओरमांझी, गुमला, खूंटी, तोरपा, चांडिल, घाटशिला। थोड़े और खुश हुए तो रांची से पटना, सिवान। थोड़े और खुश हो गए तो जमशेदपुर, कोलकाता, पुरी, भुवनेश्वर। 


खुशियों का दायरा इतना सा ही था, लेकिन हर बार खाली सड़क पर, खुले आसमान के नीचे, दरख़्तों की छांव के बीच से, उगती-कटती फ़सलों से होकर अजान गांवों, कस्बों, शहरों की जो तस्वीरें चलती हुई गाड़ी से फास्ट-फॉरवर्ड मोशन में गुज़रतीं, उन्हीं से ज़ेहन में कल्पनाओं के रंग भरे जाते। सड़कों पर होना, रास्तों पर होना मेरे लिए अपने निज के सबसे करीब होने की तरह होता था, एक किस्म के मेडिटेशन की तरह। बचपन से।

फौज में रहे मेरे नानाजी अक्सर कहा करते थे, “यात्रा का मतलब ही है कष्टों की शुरुआत।“ मुझे उन कष्टों से मोहब्बत थी। सहूलियतें और आसानियां, ठहराव और स्टेटस को मुझे बहुत दुखी और परेशान करती हैं। मेरा फ़लसफ़ा ही है कि जीवन चलने का नाम, चलते रहो सुबह-ओ-शाम...

नानी जी की बात समझ में आती है क्योंकि वे जिस पीढ़ी के थे, उस पीढ़ी के लिए गांव की सरहदें पार करना दुश्वार हुआ करता था। शहर के लिए सुबह चार बजे की इकलौती ट्रेन दस-बारह किलोमीटर दूर दरौंदा स्टेशन से जाया करती, जिसको पकड़ लेना वर्जिश से कम नहीं था। फुटबोर्ड पर अख़बार बिछाकर बैठने में कोई शर्म नहीं थी। दूसरे दर्जे में रिज़र्वेशन लेकर चढ़ना संपन्नता का प्रतीक माना जाता था।

फिर उनके बाद की पीढ़ी नौकरी और बेहतर ज़िन्दगी की तलाश में शहर आकर बसने लगी। यात्रा का मतलब हर साल शहर से गांव लौटना होता था। गर्मी छुट्टियों में घूमना 'घर जाना' होता था। हम भी कई सालों तक 'घर' गए - रांची से सिवान होते हुए अपने गांव मोरवन, और अपनी ननिहाल मुबारकपुर।

दुनिया इतनी-सी ही थी। घूमना इतना-सा ही था। बाबा थोड़े घुमक्कड़ थे, इसलिए पिकनिक के नाम पर पुरी तक जा आए थे हमलोग। पापा बहुत बड़े घुमक्कड़ थे, लेकिन पूरी ज़िन्दगी जंगलों और गांवों में अकेले घूमते रहे। कुछ पेशे की मजबूरी थी, और कुछ फ़ितरत की। और कुछ ये भी डर रहा होगा कि सुकुमार बच्चे मलेरिया के मच्छर झेल पाएंगे या नहीं।

मैं जिस पीढ़ी की हूं, उसका अपना कोई गांव, कोई शहर नहीं है। गांव और शहर - घर - के नाम पर जो भी बचा-खुचा रह गया है, वो नोस्टालजिया में जाकर बस गया है। मैं जिस पीढ़ी की हूं, वो जड़ों से उखड़ी हुई पीढ़ी है। उसे किसी गांव, किसी शहर से कोई ख़ास लगाव नहीं। हमारे लिए घर वहां बसता जहां मां-बाप की पोस्टिंग होती। घर और पते, शहर और गांव अक्सर बदलते रहे।

इसलिए पूरी दुनिया हमारा घर थी, और कहीं किसी मोड़ पर चार कदम से थोड़ी सी ही और दूर साथ चल लेने वाला हमराही हमारे लिए हमारे परिवार का सदस्य बन जाता था। हमने घर महानगरों में बनाया, कटवारिया सराय की किसी बरसाती में, मुंबई के चार बंगला में किसी वन-रूम फ्लैट की पीजी में। हमारे लिए दुख-सुख में साथ रहनेवाले हमारे रूममेट्स, हमारे दोस्त थे। हमारे लिए परिवार का मतलब भी वही थी, और उन्हीं दोस्तों से हमारे बच्चे अब मामा-मौसी-बुआ-चाचा का रिश्ता निभा रहे हैं।

मुझे ठीक-ठीक याद है कि मैंने अकेले घूमना कब शुरु कर दिया था। वो ज़िन्दगी की उदासियों और नाकामियों से बचने के लिए ढूंढे जानेवाले रास्तों के दिन थे। घुमक्कड़ी के मेरे शौक (और मेरी मजबूरी) को कम उम्र में हाथ आ जाने वाली ढेर सारी सैलरी ने हवा दे दी। पांच दिन हम जम कर मेहनत किया करते और बाकी के दो दिन आस-पास के पहाड़ों की खाक छानने में गुज़ारते।

मैं कभी अकेले घूमती, कभी अपने जैसी पागल दोस्तों के साथ घूमती। उस अजनबी ग्रुप के साथ घूमती जिसे ट्रेकिंग का शौक था, और जिससे दोस्ती हो जाने की कई वजहें हुआ करती थी। पता नहीं कब ऐसा हो गया कि अपने वजूद में मौजूद घर से लगाव को नई-नई जगहों को देखने के रोमांच ने रिप्लेस कर दिया।
वो घुमक्कड़ी अलग किस्म की थी। ट्रेन के स्लीपर क्लास में बैठकर नए शहरों की तलाश, शहर में कैंपनुमा ठिकानों की खोज और पैदल या रिक्शे या तांगे पर बैठकर नई गलियों की खोज। सफ़र करने का मतलब दस-बारह किलोमीटर ट्रेक करके किसी दुरूह पहाड़ी की बर्फीली चोटी देख आना होता था, सफ़र करने का मतलब अंधेरे जंगलों में ट्रेकिंग और रियल ट्रेज़र-हंट, रॉक-क्लाइम्बिंग, रैपलिंग, कयाकिंग, बोटिंग जैसी फिज़िकल और बेहद थका देनेवाली एक्टिविटिज़ होतीं। 


सफ़र करने का मतलब कम बजट में मिलनेवाला ढेर सारा थ्रिल होता। सफ़र करने का मतलब अजमेर शरीफ़ की दरगाह पर अकेले बैठकर कव्वाली सुनना होता, श्रीनगर के लाल चौक पर खड़े होकर जली हुई इमारतों से झांकती खिड़कियों के पीछे की ज़िन्दगियों की कल्पना करना होता। 

ऐसे खूब घुमक्कड़ी की मैंने। खूब दोस्त बनाए। वेलेंक्कनी चर्च के बाहर मिल गई स्टीफेन आंटी को सालों तक ख़त लिखे, मुक्तेश्वर के पास के एक गांव में प्रकाश के घर खाए राजमा-चावल का स्वाद महीनों तक याद रखा। बुरूस के सूखे फूलों और गोआ की रेत को छोट-छोटे बक्सों में बचाए रखा। 


ऐसा नहीं कि सिर्फ मधुर स्मृतियों ही मिलीं, लेकिन रास्ते में मिलनेवाली चुनौतियों और लोगों की हैरानी भरी नज़रों को अनदेखा करना कम उम्र में ही सीख लिया। मेरी घुमक्कड़ी ने मुझे आज़ाद बनाया और वो हिम्मत दी जो एक मध्यवर्गीय परिवार की छोटे शहर की लड़की को आमतौर पर संस्कारों में नहीं दिया जाता।

फिर शादी और जीवन साथी ने घुमक्कड़ी थोड़ी सोफिस्टिकेटेड कर दी। बिना किसी प्लानिंग के दो कदम न चलने वाले पति घूमने भी जाते तो पूरी तैयारी के साथ। अच्छे रिसॉर्ट में रहना, अच्छा खाना और ढंग की गाड़ी। मेरी किसी आउटडोर एक्टिविटी और नई-नई जगहों को देख लेने के शौक में उनकी दिलचस्पी नहीं थी। हममें एक ही चीज़ कॉमन थी, हम खूब पैदल चलते थे, हालांकि हमारी चाल, रास्ते और मंज़िल तीनों अलग-अलग होते।धीरे-धीरे हमने एक-दूसरे की घुमक्कड़ी के तरीकों के साथ समझौता करना सीख लिया, और अलग-अलग घूमने की वजहें और मौके तलाशने लगे - बिना किसी दुविधा या शिकायत के, बहुत सारी आपसी समझ और हामियों के साथ।

बच्चों ने मेरी घुमक्कड़ी को एक नया आयाम दिया है। छोटे बच्चों को लेकर भी मैं ख़ूब घूमी हूं। साथ में बारह-चौदह बोतलें, एक छोटा स्टेरेलाइज़र, सेरेलैक और दूध का डिब्बा, गर्म पानी की थर्मस, डायपर्स, बेबी वाइप्स और पुराने अख़बार होते। और साथ में कोई एक सहयात्री, जो पति से लेकर बच्चों के नाना-नानी, दादी-दादी और उनकी आया तक में से कोई भी हो सकता था।

बच्चे बड़े हो गए हैं और घुमक्कड़ी और बढ़ गई है। पहले थ्रिल मकसद था, अब बच्चों को देश-दुनिया दिखाना है। लोग दो बच्चों के साथ सफ़र पर निकली एक मां को देखकर अभी भी हैरान होते हैं। लेकिन उनकी इस हैरानी को मैं अपनी उपलब्धि ही मानती हूं। मैं और बच्चे सफ़र पर अपने मनमुताबिक साथी भी खोज लेते हैं – कोई हमउम्र दोस्त, कोई हमउम्र मां, कोई भलमानस ऑटोवाला, कोई अच्छा रिसॉर्ट मैनेजर...


मुझे इस बात का पक्का यकीन है कि हम सफ़र पर ही अपने असली रूप में होते हैं, बिना किसी दिखावे और मिलावट के। हमारा सब्र, हमारा असली स्वभाव और हमारी अनुकूलनशीलता का पता दरअसल सफ़र पर ही चलता है। जब हम घूम रहे होते हैं तो हम आंखें खुली रखते हैं और सफ़र ज़िन्दगी को लेकर हमारे कई मुगालते दूर करता है, हमें बेहतर इंसान बनाता है।
 

सफ़र करना हमें अपने इन्सटिन्क्ट पर, हमारे सिक्स्थ सेंस पर हमें भरोसा करना सिखाता है। सफ़र हमें दूसरों पर, यूनिवर्स की अदृश्य ताकतों पर भी यकीन करना सिखाता है। मैं नहीं जानती कि बड़े होने पर बच्चों के लिए घर लौटने का मतलब क्या होगा। मैं ये ज़रूर जानती हूं कि उनके लिए घुमक्ड़ी और सफ़र का मतलब ढेर सारी हैरत, हिम्मत, धैर्य और बाहर की दुनिया को खुद में आत्मसात करने की ताक़त होगा।

कुछ भी कर सकने का मेरा ये जज्बा मेरी घुमक्कड़ी की देन है, और अगर कोई दो चीज़ें हों जो मैं अपने बच्चों को दे सकूं तो वो घुमक्कड़ी का शौक और ये जज्बा है। 


In other news, घुमंतू मां की प्लानिंग पूरी हो गई है। हम अगस्त का एक वीकेंड हिमाचल के एक छोटे से पहाड़ पर, सितंबर का एक वीकेंड उत्तरांचल के एक छोटे से पहाड़ पर, अक्टूबर का एक वीकेंड पूर्णिया और दूसरा वीकेंड सिवान में, नवंबर का एक वीकेंड रामेश्वरम और पॉन्डिचेरी में और दिसंबर की छुट्टियां बंगाल और उड़ीसा में काटने की ख़्वाहिश रखते हैं।

डियर यूनिवर्स, हमारी इन ख़्वाहिशों को आपकी डायरी में दर्ज किया जाए!

वैसे एक और फैंटेसी भी है - ज़मीर फ़िल्म में अमिताभ बच्चन के स्टाईल में गिटार लेकर घूमते हुए गाना - 


चले हैं दूर हम दीवाने 
कोई रसीला सा, बांका सजीला सा यार मिले तो रुक जाएं 

ध्यान से सुनिए तो साहिर लुधियानवी के बोलों के मानी घुमक्कड़ी के सबसे दिलचस्प फ़लसफ़े के कम नहीं। 

Thursday, August 14, 2014

बराबरी के जश्न का त्यौहार बने रक्षा-बंधन

रक्षा बंधन से जुड़ी कई यादें हैं। उनमें से सबसे ख़ास है माँ के हाथ की दाल भरकर बनाई हुई पूड़ियाँ और खीर जो राखी बांधने के कार्यक्रम के बाद खाने को मिलती थी। इसके अलावा हथेली पर धर दिए जाने वाले वे पैसे भी ख़ास होते थे जो राखी के नाम पर हम बहनों को मिला करते थे। पूड़ियों और खीर पर कभी झगड़ा नहीं होता था, पैसों पर ज़रूर होता था। मेरे दोनों छोटे भाई कई सालों तक इस बात पर मुँह फुलाते रहे कि एक धागा बाँधने के नाम पर पैसे सिर्फ़ दीदी को मिलते हैं। अगर ऐसा ही है तो हम भी दीदी को राखी क्यों नहीं बाँध देते? बचपन की वो नासमझी अब बड़े होने पर तार्किक लगती है। बात पैसों की नहीं थी, बात उस बंधन की - उस वायदे की थी जो रक्षा बंधन के हवाले से भाई-बहन एक-दूसरे को करते हैं। बहन अगर भाई को दुआओं में याद रखने की कसम खाती है तो भाई बहन की हर हाल में रक्षा करने का वायदा करता है। राखी अगर रक्षा का वो बंधन, वो वायदा है जो एक भाई की कलाई पर बाँधते हुए बहन उससे लेती है, तो यही काम तो अब बहनें भी करने लगी हैं भाईयों की ख़ातिर। इसलिए पिछले दो सालों से हमारे घर में राखी बाँधने की परंपरा बदल गई, और इसकी शुरुआत की मेरे भाई ने। अब सिर्फ़ बहनें ही भाईयों को राखी नहीं बाँधतीं, बल्कि भाई भी बहनों की कलाई पर राखी बाँधते हैं, और बहनें भी एक-दूसरे को राखी-सूत्र बाँधती हैं। सुनकर अजीब लगता है, लेकिन इस बदली हुई परंपरा के पीछे कई वजहें, ज़िन्दगी के दिए हुए कई तजुर्बे हैं।   

रक्षा बंधन का त्यौहार दुनिया भर की बहनों की तरह मेरे लिए भी बहुत ख़ास है। इसलिए भी क्योंकि इस एक दिन हम उस एक रिश्ते का जश्न मनाते हैं जो परिवार की धुरी होता है। भाई और बहन (या बहन और बहन) का रिश्ता सिर्फ़ एक नहीं, कई परिवारों को जोड़ता है। सबसे पहले तो उस परिवार को, जिसमें दोनों पैदा हुए हैं। फिर उन परिवारों को, जो वे बसाते हैं। भाई और बहन के रिश्ते की नींव मज़बूत हो तो धीरे-धीरे उनके इर्द-गिर्द बनते और रिश्तों की दीवारें अपने-आप मज़बूत होने लगती हैं और रिश्तों को मज़बूत करने का काम सिर्फ़ रक्षा बंधन के बहाने नहीं होता। रिश्तों को मज़बूत करने की ज़िम्मेदारी जितनी बहन की होती है, उतनी ही भाई की भी होती है। 

दरअसल अब भाई और बहन के रिश्ते में - बल्कि परिवार में भी - ज़िम्मेदारियों की परिभाषाएँ बदलने लगी हैं। आज से कुछ साल पहले तक बेटे से उम्मीद की जाती थी कि वो परिवार की तमाम ज़िम्मेदारियाँ संभाले। बेटियों को पराया धन मानते हुए उन्हें ब्याह दिया जाना परिवार का इकलौता मकसद होता था। ससुराल से मायके आई बेटी को अतिथि समझा जाता था और बेटी के पति पाहुन होते थे - मेहमान। लेकिन पिछले कुछ सालों में हिंदुस्तानी समाज की ये धारणा कुछ ज़रूरत, और कुछ बदलते हुए सामाजिक परिवेश की वजह से बहुत बदली है। बेटियाँ न सिर्फ़ अपने पैरों पर खड़ी हो रही हैं बल्कि परिवार चलाने में, अपने बुज़ुर्ग माँ-बाप की सेवा करने में, अपने छोटे भाई-बहनों की पढ़ाई-लिखाई और परिवार की तमाम ज़रूरतों को पूरी करने में वैसे ही मशगूल हैं जैसे उनके भाई होते हैं। जब परिवार में बेटियों की जगह और ज़िम्मेदारी बदली है तो रक्षा बंधन जैसे त्यौहार के मौके पर उस बदली हुई जगह और ज़िम्मेदारी को पूरा सम्मान क्यों न दिया जाए?

मेरी निजी राय ये भी है कि रक्षा बंधन को मनाने का तरीका बदलेगा तो बेटियों को इज्ज़त देने का तरीका भी बदलेगा। बहन की बेचारगी से जुड़ी जो दंतकथाएं सुनते हुए हम बड़े हुए, उन्हें बदलकर नई कहानियाँ लिखे जाने की अब सख़्त ज़रूरत है। इन कहानियों की नायिकाएं नरेन्द्र कोहली की जिज्जी जैसे किरदार हों तो कितना अच्छा हो! इन कहानियों में अपने भाई के हक़ के लिए लड़ती बहनों के किरदार हों तो कितना अच्छा हो! इन कहानियों में वैसी बेटियाँ हों तो कितना अच्छा हो कि जिन्हें पिता के प्यार के साथ-साथ उनकी संपत्ति में भी बराबर की हिस्सेदारी मिली। इन कहानियों में अपनी बहनों को स्कूल या कॉलेज भेजने के लिए लड़ते भाई और बहन हों तो कितना अच्छा हो! मेरी नज़र में रक्षा बंधन को नए तरीके से मनाए जाने की ज़रूरत इसलिए भी है क्योंकि समाज में बेटियों को बराबरी का अधिकार तबतक नहीं मिल सकता जबतक हमारी परंपराओं और संस्कारों में उन्हें वो अधिकार न दिया जाए। रक्षा बंधन के मौके पर भाई के हाथ पर राखी बाँधती आज की बहन कमज़ोर और निरीह बिल्कुल नहीं है। उस बहन को रक्षा के झूठे दिखावे की नहीं, बराबर के प्यार और अधिकार की सच्चे वायदे की ज़रूरत है। 

राखी हम अभी भी मनाते हैं और उतने ही प्यार से। लेकिन मुझे ये कहने में बिल्कुल हिचक नहीं कि मेरे भाई मुझसे बेहतर पूड़ियाँ और खीर बनाते हैं और मैं उनसे हथेली पर महंगे तोहफ़े रखने की उम्मीद बिल्कुल नहीं करती। परिवार और रिश्ते वो साझा ज़िम्मेदारी है जो हम सब आपसी समझ से आपस से बड़े प्यार से बाँटते और निभाते हैं। फिर हम सबने एक-दूसरे के हाथों पर राखी के धागे बाँधकर उस रिश्ते और ज़िम्मेदारी को और पुख़्ता बनाने की ओर एक क़दम ही तो बढ़ा लिया है। इसके अलावा, अगर मैं ये कोशिश करती हूँ कि मेरे बेटे और बेटी की परवरिश में मैं कोई अंतर नहीं करूँगी तो उनके दिए गए संस्कारों में, उनके साथ मनाए जा रहे त्यौहारों में ये बात परिलक्षित होनी चाहिए। अबकी साल राखी में जितना संजीदा और ईमानदारी वायदा मैं अपने भाई, अपने बेटे से अपने और अपनी बेटी के लिए लूँगी उतना ही ईमानदार वायदा उनकी ज़रूरतों में, उनके मुश्किल दिनों में, उनकी ज़िम्मेदारियों में उनके साथ खड़े होने का मैं भी करूँगी। अगर अधिकार बराबरी का होगा तो ज़िम्मेदारियाँ भी बराबरी की होंगी। आपकी क्या राय है इस बारे में?  

(१० अगस्त २०१४ को 'प्रभात ख़बर' की पत्रिका 'फ़ैमिली' में प्रकाशित। http://epaper.prabhatkhabar.com/318383/Faimly/Family#dual/2/1)

Wednesday, August 13, 2014

स्मार्ट फ़ोन के बग़ैर ज़िन्दगी के जलवे

ये दिल तुम बिन कहीं लगता नहीं... 

मेरी हथेलियों पर मेरा नोकिया लुमिया सूरजमुखी-सा खिला हुआ था उस दिन। इतवार की सुबह थी, रक्षा बंधन की, और मैं व्हॉट्सऐप्प पर कहीं दूर से आई अपनी तारीफ़ पढ़कर मुस्कुरा रही थी।

फिर पता नहीं क्या हो गया!

तारीफ़ें शायद इस क़दर फ़रेबी और झूठी थीं कि फ़ोन उस गुनाह को झेल न पाया और बेहोश हो बैठा। मैं अक्सर मज़ाक में कहती थी कि मेरा स्मार्टफ़ोन मेरे हाथ में आकर सिर्फ़ सेन्सिटिव रह गया है, स्मार्टनेस का तो अता-पता नहीं है।

कौन जानता था कि मेरा अपना मज़ाक मुझी पर भारी पड़ेगा!

फिर पूरा अट्टा छान मारा। राखियाँ बाँधने-बँधवाने के लिए जाना था फ़रीदाबाद, और वक़्त हाथ से निकलता जा रहा था। लेकिन संडे की उस बेरहम सुबह किसी भलमानस ने मेरे फ़ोन को रिवाईव करने का बीड़ा न उठाया। ज़ाहिर है, कोमा में पड़े मेरे बिचारे फ़ोन ने उस सुबह उम्र से पहले दम तोड़ दिया।    

ये वो सदमा था जिसे बर्दाश्त करना मेरे बस के बाहर की बात हो सकती थी।

अपने फ़ोन को लेकर ओसीडी है मुझे। मैं रास्ते पर चलते-चलते, सब्ज़ियाँ खरीदते-खरीदते, गाड़ी चलाते-चलाते, आधी नींद में सोते-जागते, अस्पताल के बाहर इंतज़ार करते, मेट्रो में शहर के दूसरे छोर जाते, बर्तन और कपड़े धोते-धोते भी फ़ोन चेक करती रहती हूँ। मैं बातचीत का कोई सिरा ज़ाया नहीं होने देती। हर मुमकिन कोशिश करती हूँ कि जवाब दूँ। चाहे उसमें मेरी ऊर्जा का क्षय ही क्यों न हो रहा हो।

जो फ़ोन लाइफ़लाइन था, उस फ़ोन के बिना जी लगता कैसे? फ़ोन का गुज़र जाना किसी प्यार के हमेशा के लिए छूट जाने से कम तकलीफ़देह नहीं था। उस दिन तो बहकी-बहकी परेशान से घूमती रही मैं। लगा कि जैसे कुछ लुट गया है, कुछ छिन गया है।

राखी की तस्वीरें नहीं खींची गईं।

यहाँ से फ़रीदाबाद जाते हुए सड़क के ट्रैफ़िक के हाल पर कोई फ़ेसबुक पोस्ट नहीं लिखा गया।

कोई आड़ी-तिरछी कविता नोट्स में सेव नहीं हुई।

किसी दोस्त से झूठ कहा नहीं व्हॉट्सऐप्प पर कि ये दिल तुम बिन कहीं लगता नहीं...

याद ही नहीं कि उस एक इतवार जाने कैसे शब ढली, जाने कैसे दिन ढला... मुद्दतों बाद ऐसा हुआ था कि मैं जहाँ थी, वहीं थी - कहीं और नहीं। मुद्दतों बाद ऐसा हुआ था कि मेरी फ़ितरती गुमख़्याली को कहीं कोई वर्चुअल दुनिया नहीं मिली थी।

भीतर से कोई और आवाज़ देता रहा, झूठ था... सरासर झूठ था वो सब जो दुनिया से जुड़े रहने के ख़्याल से जोड़ रखा था तुमने।

फ़ोन सबकुछ नहीं ज़िन्दगी के लिए!

मुझे लगता था कि दुनिया में कुछ चीज़ें (और कुछ लोग) ऐसी हैं जिनके बिना मेरा वजूद बेमानी है, और जीना नामुमकिन। इंटरनेट और स्मार्टफ़ोन उन्हीं दो हासिल चीज़ों में से था। फ़ोन मेरे लिए चलता-फ़िरता दफ़्तर था - आप सबकी तरह। अपनी तमाम तन्हाईयों और सुख-दुख के बीच फ़ोन मेरे लिए रियल और वर्चुअल दुनिया से जुड़े रहने का इकलौता ज़रिया था। जो जी में आए, तब के तब बोल देना... उसे पोस्ट कर देना... किसी दोस्त को व्हॉटसऐप्प कर देना... रात-दिन, सुबह-शाम बातचीत के उन सिरों को थामे रहने की कोशिश करना जो कभी अंजाम तक नहीं पहुँचतीं... मेरी ज़िन्दगी ऐसी ही होने लगी थी पिछले दो-ढाई सालों से। ज़िन्दगी जिस रस्ते को अख़्तियार कर चुकी थी वहाँ बेमतलब की वर्चुअल स्माइली, दिल, टूटा हुआ दिल, फूल के गुच्छे, तोहफ़ों के बक्से और बिना सोचे-समझे किसी की ओर भी उछाल दिए जानेवाले बोसे थे।

और अचानक एक फ़ोन के न होने से वो सब ख़त्म हो गया!

वो सारे वर्चुअल रिश्ते ख़त्म हो गए!

वो सारे संपर्क और नंबर (कुल सत्रह सौ) ख़त्म हो गए जो मैंने इन दो-चार सालों में अर्जित किए होंगे!

हाथ में आया एक बेसिक फ़ोन, और ठहर जाने का गुमां।

कुल साढ़े चौदह फ़ोन नंबर मुझे मुँहज़ुबानी याद थे। मम्मी-पापा, पतिदेव, सासू माँ, ससुराल का लैंड-लाईन नंबर, भाई-भौजाई के, और कुल मिलाकर साढ़े पाँच दोस्तों के, जो पिछले सालों की सबसे बड़ी कमाई हैं... जिन्हें बचाए रखने में दस साल से ज़्यादा लंबी उम्र लगी है।

स्मार्टफ़ोन के न होने ने मेरी ज़िन्दगी में सबकी अहमियत और जगह भी मुक़र्रर हो गई थी। ये तय हो गया था कि ये वही साढ़े चौदह लोग हैं जो आपको आपकी तमाम ख़ामियों और ख़ूबियों के साथ स्वीकार करेंगे। जो एक आवाज़ पर आपके साथ होंगे, और जिन्हें आपने अच्छे-बुरे दिनों में मुलससल आवाज़ें दी हैं इसलिए इनके नंबर आपको मुँहज़ुबानी याद हैं।

(एक और एपिफ़ैनी - आत्मबोध - ये भी है कि किसी और की ओर से आनेवाला भरोसा हमारे भीतर के भरोसे का रिफ्लेक्शन, उसी का अक्स होता है। हम वही हासिल करते हैं जो हम बाँट रहे होते हैं।)

दिल जज़्बाती है, मजबूर नहीं है

अपने आस-पास क्या होना चाहिए, और किस रिश्ते पर कितना भरोसा किया जाना चाहिए - ये आत्मबोध अपने आप में मोक्ष का दरवाज़ा है। हम कई भ्रांतियों और ग़लतफ़हमियों के साथ जीते हैं। सबसे बड़ी ग़लतफ़हमी  इस भंगुर दुनिया में अपनी जगह को लेकर पालते हैं हम। हमें कितने लोग जानते हैं... कितने लोगों को हम पहचानते हैं... हमारा वजूद इससे मुक़र्रर होता है, यही बताया जाता है हमें। बड़े होकर ख़ूब नाम और पैसे कमाओ - यही आशीर्वाद मिलता है न हमें बचपन से? अपने बच्चों को 'बडे होना' सिखाते हुए सही मायने में बड़े होने की परिभाषा क्या होती है, ये बताना भूल जाते हैं हम।

जिसे नापा जा सकता है, जो टैंजिबल है - परिणाम के तौर पर देखा जा सकता है, उसे ही हासिल समझ लिया जाता है। इन्टैंजिबल माइलस्टोन्स - अपने स्वभाव और शख़्सियत में जीते गए बदलावों की क़ीमत नहीं समझी जाती।

अभी हाल ही में एक फ़िल्म आई थी - फॉल्ट इन आवर स्टार्स। दो टीनएजर्स की कहानी है - कैंसर के आगे इनकी उम्र की रेखाओं ने हार मार लिया है, लेकिन इनकी जिजीविषा ने नहीं। मौत का इंतज़ार करते हुए जीने की उत्कट इच्छा रखने वाली सत्रह साल की हेज़ल ग्रेस अठारह साल के अपने कैंसरपीड़ित बॉयफ्रेंड से कहती है - ऑब्लिवियन इज़ इनएविटेबल - गुमनामी लाज़िमी है।

जब गुमनामी लाज़िमी है तो फिर इतनी हाय-हाय क्यों?

गुमनामियों के इन ख़तरों के बीच हेज़ल ग्रेस को एक और टीनेजर एन्न फ्रैंक की याद में बने म्यूज़ियम में गुमनामी के बीच की शोहरत सेलीब्रेट करने से ज़्यादा ज़रूरी मौत के मुहाने पर खड़े अपने बॉयफ्रेंड को पहली बार किस करना लगा।

हेज़ल के लिए वो लम्हा गुमनामियों के अंधेरों में इकलौती रौशनी रहा होगा। वो लम्हा उसके भीतर के किसी डर पर हासिल की गई जीत का लम्हा था।

मुझे फिल्म देखते हुए वो बात इतनी स्पष्टता से समझ में नहीं आई थी जितनी अब आई है - अपरिहार्य गुमनामी के बीच जो शोहरत का इकलौता शाश्वत कारण होता है, वो किसी इंसान का जज्बा होता है। वही जज्बा डर पर जीत हासिल करने की हिम्मत देता है।

एन्न फ्रैंक का जज्बा था कि चौदह साल की उम्र में गुज़र गई लड़की को पचासी साल बाद भी दुनिया भूल नहीं पाई है।

हेज़ल ग्रेस का जज्बा था कि मरते-मरते भी उसने किसी एक ज़िन्दगी को इस बेरहम, बेवफ़ा, मतलबी दुनिया में वापस आने की वजह दे दी... अपनी बची हुई ज़िन्दगी की सारी तकलीफ़ों और छूटती हुई साँसों के बीच तारों से भरी एक रौशन रात के शामियाने तले गीली आँखों से मुस्कुराना सीख लिया।        

ये जज्बा भीड़ पैदा नहीं करती। ये जज्बा हम अकेले अंधेरे कमरे में ख़ुद से जूझते हुए, अपनी हार और नाकामियों के बीच अपने हालातों को अपने हिसाब से ढालते हुए पैदा करते हैं। इस जज्बे का इससे कोई वास्ता नहीं होता कि हम दुनिया से कितने जुड़े हुए हैं और हमारी बातों पर कितनी वाहवाहियाँ मिल रही हैं। इस जज्बे को फोन-बुक में मौजूद हज़ारों नंबरों से भी कोई वास्ता नहीं होता।

हम हर रिश्ते को अपनी वजह से ढोते हैं, झेलते हैं या उन्हें पालते-पोसते हैं। उनकी ज़रूरत हमें होती है क्योंकि हमारे जज्बात उन रिश्तों पर फ़ीड कर रहे होते हैं। उन रिश्तों से हासिल हमदर्दी (और कई बार तरसते हुए बोलों के जवाब भी, जो हम सुनना चाहते हैं), उन रिश्तों से हासिल भरोसा (कभी झूठा, कभी सच्चा) और उन रिश्तों से हासिल ऊर्जा हमें ज़िन्दगी की नीरस और अरुचिकर जद्दोजेहद को झेलने का माद्दा देती है।

हम उस ग़लतगुमानी में ख़ुश रहते हैं कि हमारी ज़रूरत है - हमारे घर-परिवार में, हमारे वर्क प्लेस पर, हमारे सहकर्मियों को, हमारे बॉस को, हमारे जान-पहचान वालों को, हमारे क्लायंट्स को... हम इस बदगुमानी में होते हैं कि जो जब भी, जिस भी तरह आवाज़ लगाए, हमें उसका जवाब देना ही चाहिए क्योंकि अपनी ज़रूरत बचाए रखने का ये इकलौता रास्ता है।

बेताबियों में खुशी ढूंढने वाले बेताबियां भी ढूंढ-ढूंढकर लाते हैं। ये बेताबियां रिश्तों की शक्लों में होती हैं जो हर रोज़ किसी न किसी से बना रहे होते हैं हम। अक्सर क्षणभंगुर। अक्सर छोटी मियाद वाले। अक्सर ज़रूरतपरस्ती।

कितना बड़ा फ़रेब है ये!

फ़ोन नहीं है तो समझ में आया कि इस फ़रेब को जीना मजबूरी नहीं है। हमारे जज़्बातों का सबब भी हम ही, मरहम भी हम ही। हमारी ज़रूरत अगर किसी को सबसे ज़्यादा है, तो वो हम हैं।

मेरे फ़साने पे न जा... 

डिस्क्लेमर ये भी है कि ये मेरे अपने तजुर्बे हैं। ये मेरी अपनी राय है। तजुर्बों के आधार पर राय भी बनती-बिगड़ती-बदलती रहती है। मेरा मकसद फ़ोन के बहाने बाहर की दुनिया से जुड़ाव को लेकर अपने हालात और अनुभवों का लेखा-जोखा करना है। मेरा मकसद अपने लिए कुछ फ़ैसले लेना है। ख़ुद को याद दिलाना है कि वेलॉसिटी यदि डिस्प्लेसमेंट और टाईम टेकेन का अनुपात है कि डिस्प्लेसमेंट की वैल्यू को कम करके वेलॉसिटी यानी गति पर काबू पाया जा सकता है।

सारे फ़ैसले अपने हैं - दिल-ओ-दिमाग पर हर लम्हा लगती खरोंचों की तरह। वजह भी मैं ही, मरहम भी मैं ही।

नोकिया लूमिया उर्फ़ डियर सूरजमुखी, तेरा प्यार अनोखा है!

Wednesday, August 6, 2014

मत लिखो। मत लिखो। मत लिखो!!!

यूँ लगा कि जैसे अगर ठीक इसी वक़्त इस पन्ने पर अनाप-शनाप लिखा नहीं तो सुबह से आगे बढ़ने की गुज़ारिश करना नामुमकिन हो जाएगा। कई बार गिरहों को खोलकर बंदिशों के बग़ैर अपने भीतर का गर्द-ओ-गुबार निकलने देने की ज़रूरत ज़िन्दगी की तमाम ज़रूरतों से बड़ी बन जाती है।

मैं उसी मुकाम पर आ पहुँची हूँ जहाँ खुलकर बेमकसद लिख पाना किसी और ज़रूरत से ज़्यादा बड़ी ज़रूरत बन गया है।

मैं लिखने का काम करती हूँ। महीने (या तीन महीने) के आख़िर में आने वाले पैसे उसी लिखाई (या लिखने से जुड़े और कामों) से आते हैं। दिन के आठ-दस घंटे अलग-अलग फॉर्मैट्स में लिखना, अनुवाद करना या  एडिट करना ही मेरा काम है, और मैंने ऐसी ही किसी ज़िन्दगी की ख़्वाहिश की होगी क्योंकि मेरी ख़्वाहिशें पूरी करने के मामले में ख़ुदा उस्ताद है। मेरी कोई दुआ अनसुनी नहीं छोड़ता। इसलिए ये दुआ कि दिन भर लिखती रहूँ, बड़े प्यार से क़ुबूल हो गई।

ये और बात है कि मैं अब उकताने लगी हूँ। फ़ितरत ही कहिए कि उकता जाना सबसे आसान लगता है।

लिखती तो हूँ, लेकिन क्या... ये मालूम नहीं। इस लिखे हुए का हासिल भी क्या, ये मालूम नहीं।

लोग कहते थे कि पोर्टफोलियो बड़ा करने के लिए लिखो। तो किया।

फिर लगा कि लिखना ही काम है, और काम मन लगाकर करना चाहिए। इसलिए भी किया।

फिर लगा कि काम करने से ही गुज़ारा चलता है, इसलिए लिखती रही।

लेकिन अब ऊब होने लगी है।

इसी ब्लॉग पर बेख़्याली में भरे गए पन्ने - अपना ही लिखा हुआ - देखती हूँ तो यकीन नहीं होता। उन दिनों मैं क्या खा-पी रही थी? उन दिनों के कैसे दुख थे कि इतना लिखा, और बिना किसी हासिल की उम्मीद के लिखा? मुझे तब किसी असाइनमेंट की उम्मीद नहीं थी। मैं मशहूर होने के लिए भी नहीं लिख रही थी। तब लिखने का मक़सद किसी को इम्प्रेस करना भी नहीं था। मेरे लिखे हुए के बारे में दुनिया क्या सोचती है, लोग मुझे किस निगाह से देखते हैं, लिखकर मैं कितने दोस्त बनाऊँगी और कितने दुश्मन - ये भी नहीं सोच रही थी तब। लिखने का मकसद अपना गुज़ारा चलाना भी नहीं था। लिखने का मकसद कहीं छपना, किसी दिन किताब या फिल्म लिख देना - कुछ भी नहीं था।

जब कोई मकसद ही नहीं था तो मैं क्यों लिख रही थी तब?

चार्ल्स बुकोस्की की कविता का वरुण ग्रोवर का किया अनुवाद याद आ रहा है -

अगर फूट के ना निकले
बिना किसी वजह के
मत लिखो।
अगर बिना पूछे-बताये ना बरस पड़े,
तुम्हारे दिल और दिमाग़
और जुबां और पेट से
मत लिखो।

वो दिन कुछ ऐसे ही थे कि लिखना ही ख़ुद को बचाए रखने का इकलौता रास्ता था। इसलिए लिखना ज़रूरी था, और जब लिखना शुरु किया तो अंदर का सोता ऐसे खुला था कि जैसे सबकुछ बहा ले जाने पर आमादा हो।

अब ऐसा लगने लगा है कि बहुत बह चुकी हूँ, और बहते-बहते ठहर गई हूँ। कहाँ गई वो भीतर की पहाड़ी नदी जो पत्थरों को चूमती हुई निकलती थी तो भी ज़ोर-ज़ोर से गीत गाती थी? कहाँ गया वो भीतर का रेगिस्तान जिसके धोरों पर अपनी ही बारिशें गिरा करती थीं मुसलसल? कहाँ गए वो लोग जो एक बाएं हाथ की उंगलियों पर गिने जा सकते थे, लेकिन जिनकी चिट्ठियों से अपने ही बेचैन शब्दों की ख़ुशबूएँ आया करती थीं?

सुनो कि कोई बात है नहीं कहने को, इसलिए मत लिखो।

अपनी ही ग़ुमख़्याली की वजहें मालूम नहीं, न उनके इलाज का सबब है कोई। इसलिए, मत लिखो।

यहाँ से उठते ही तुम्हारा ध्यान टू-डू लिस्ट की लिखाई और उसकी ज़रूरतों पर जाएगा, इसलिए जाने दो। मत लिखो।

तुम्हारे ब्लॉग पर आने वालों की ट्रैफ़िक तुम्हारे बारे में अब एक मुक़म्मल राय बना चुकी है, इसलिए मत लिखो।

तुम्हारी एक किताब आ चुकी है, इसलिए अब आगे बिल्कुल मत लिखो।

तुम एक सेल्फ-प्रोक्लेम्ड राईटर हो चुकी है, इसलिए अब तो बिल्कुल बिल्कुल बिल्कुल मत लिखो।

मत लिखो अनु सिंह। अब बिल्कुल मत लिखो।

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इस सुबह के मुहाने से निकलकर दिन के समंदर में मिलने के लिए बना जो रास्ता मुझे दिखाई दे रहा है वो यहाँ से बहुत ठहरा हुआ दिखता है। 

अच्छा है कि सफ़ीनों की मंज़िलें दरिया हुआ करती है, एक ठहरी हुई उदास नदी नहीं।