Friday, November 22, 2013

सिरफिरों की मंडली, ख़्वाबमंदों की टोली



लोदी गार्डन में पिछले इतवार की दुपहर एक बजे का वक़्त मुक़र्रर था मंडली के लिए। सच कहूं तो इतवार की दोपहर कितने लोग आएंगे, इसका ठीक-ठीक अंदाज़ा मुझे भी नहीं था। ख़ासकर तब, जब आने वालों में कईयों को अपने घर के काम समेटने होंगे शायद, अपने बच्चों को सॉकर, म्यूज़िक या बैडमिंटन क्लास के लिए लेकर जाना होगा, या फिर जाड़े की एक नर्म दुपहर अपनी नींद ही पूरी करनी हो शायद... लेकिन मेरी आशंका के ठीक विपरीत लोगों ने एक बजे से पहले ही मुझे फोन करना शुरू कर दिया। डेढ़ बजते-बजते पूरी मंडली इकट्ठा हो चुकी थी, और कुल बारह-पंद्रह लोग एक घेरे में बैठे थे। इनमें से कम-से-कम दस अपनी कहानियां लेकर आए थे सुनाने के लिए, और कई इस उम्मीद में आए थे यहां से लिख सकने की प्रेरणा मिल सके।

शाम के गिरते-गिरते तक, ठंड के बढ़ते रहने तक, अंधेरा और गहरा होते जाने तक हम वैसे ही बैठे रहे थे - एक-दूसरे की कहानियां सुनने और उसपर अपनी प्रतिक्रियाएं देने के लिए। वक़्त तेज़ी से भागने की अपनी लत से मजबूर न होता तो हम कई और घंटे वैसे ही बैठे रहने को तैयार थे।

अब 'मंडली' के बारे में कुछ बताती चलूं। बाकी और लोगों की तरह मैंने भी मंडली के बारे में पहली बार फ़ेसबुक पर ही पढ़ा था और कुछ तस्वीरें देखीं थी वहीं। वो तब का दौर था जब बच्चों को प्ले-स्कूल भेज देने के बाद अपने मन का गुबार निकालने के लिए मैंने इसी ब्लॉग का सहारा ले लिया था। कई और लिखने वालों की तरह मैं भी सात या आठ साल की उम्र से लिखती रही हूं, और दस साल की उम्र से लिखते हुए मैंने अपनी जेबखर्च का इंतज़ाम भी शुरू कर दिया था। तब साठ रुपए बहुत होते थे और एआईआर, रांची या दूरदर्शन रांची में बच्चों के कार्यक्रम में कविताएं पढ़ने वाले बहुत सारे बच्चे थे नहीं। लेकिन लिखना एक शगल भर था - एक फ़ितूर - जिसपर आईआईएमसी जाकर फुल स्टॉप लग गया। उसके बाद का लिखना सिर्फ और सिर्फ रनडाउन भरने और एंकर लिंक्स लिखने तक ही सीमित रह गया। नौकरी छोड़ी तो लिखना शुरु किया - बड़ी बेतरतीबी से।

मैं ये बात इसलिए बता रही हूं क्योंकि मंडली के लिए जमा हुए अमूमन सभी लोगों की कहानी कुछ ऐसी ही थी - कम से कम लड़कियों और महिलाओं की तो थी ही। इनमें से कुछ ने डायरी के पन्ने भरे और उन पन्नों को या तो फाड़कर फेंक दिया या फिर तकियों के नीचे छुपाए रखा। कुछ नौकरी-गृहस्थी में इतने मशगूल हो गए कि लिखना बेमानी लगने लगा और फिर धीरे-धीरे कुछ कहने, बांटने की ज़रूरत भी मरने लगी। कुछ थे जो बेचैन रहे मेरी तरह। इसलिए फ़ेसबुक स्टेटस अपडेट्स में कविताएं लिखते हुए ख़ुद को जिलाए रखने का काम करते रहे। जो भी था, लिखना सब चाहते थे। चाहते हैं, उतनी ही शिद्दत से जितनी शिद्दत से मैं चाहती रही हूं, लेकिन कई सवाल रास्ता रोके रहते हैं।

मसलन, इस लिखने का हासिल क्या हो? ये दीवानगी, लिखने का ये जुनून कौन-सी दुनिया बदल देगा कमबख़्त? कितने लोग कालजयी लिख पाते हैं? कितने लोगों की पहचान बन पाती है लिखकर? लिखकर क्या करेंगे?

मैंने भी ये सवाल कई बार पूछे हैं ख़ुद से, और इसी ब्लॉग को कई बार उन सवालों के आड़े-तिरछे, बेमानी जवाबों से भर भी दिया है।
किसी ने लिखकर दुनिया न बदली है, न बदल पाएगा कोई। लेकिन लिखना ख़ुद को ज़रूर बदल देता है भीतर से। इसे एक क्लेनज़िंग प्रोसेस भी मान लिया जाए तो इस सफाई की ज़रूरत हर रूह को किसी न किसी रूप में होती ही है। वैसे लिखना इतना ही ग़ैर-ज़रूरी काम होता तो वाल्मिकी ने क्यों रची थी रामायण? स्वयं सिद्धिविनायक को क्यों बैठना पड़ा था एक महाकाव्य लिखने के लिए? एक पल को इन एपिक्स के बारे में भूल भी जाएं तो हम क्यों बेचैन होकर लिखते हैं चिट्ठियां? लव लेटर्स ही प्यार के इज़हार का ज़रिया क्यों बनते हैं? बहरहाल, ये विमर्श का एक अलग मुद्दा है और मैं तो कोई एक्सपर्ट भी नहीं।

अपने अनुभव से इतना ज़रूर जानती हूं कि लिखने की ख़्वाहिश रखने वाले हर इंसान को संबल ज़रूर दिया जाना चाहिए, उसे पढ़ा बेशक न जाया जाए, एक बार सुना ज़रूर जाना चाहिए। कोई कितना भी ख़राब क्यों न लिखता हो, हम सबके भीतर बैठे किस्सागो को थोड़ी-सी इज़्जत बख़्शने का मतलब दूसरे इंसान की कद्र करना होता है और हर इंसान उस थोड़ी-सी इज़्जत का हक़दार है - लिखनेवाले के तौर पर न सही, इंसान के तौर पर सही और मेरे लिए लिखना-पढ़ना इंसानियत बचाए रखने का एक्सटेंशन है।

सच कहूं तो शुरू में मुझे लगता था कि क़ाबिल लेखकों की एक मंडली एक स्मार्ट बिज़नेस मूव है (और यहां पब्लिक स्पेस में ये स्वीकार करते हुए मुझे बेहद हिचकिचाहट हो रही है) और कमर्शियल राइटिंग स्पेस में इससे बेहतर कोई बिज़नेस आईडिया शायद ही हो (सॉरी नीलेश! मैं पहले ऐसा सोचती थी। अब नहीं सोचती।)

लेकिन मैं जैसे-जैसे ख़ुद मंडली से गहराई और ईमानदारी से जुड़ती गई, वैसे-वैसे समझ में आने लगा कि ये एक पागलपन है - एक किस्म का सिरफिरापन, जिसका कोई रिटर्न, कम-से-कम वक़्त और ऊर्जा के अनुपात में आने वाला फाइनैन्शियल रिटर्न बहुत कम है। इस तरह का पागलपन उसी किस्म का कोई इंसान कर सकता है जिसने अपने लिखने और सीखने के क्रम में कई सारी गलतियां की हों, और बड़ी गहराई से ये महसूस किया हो कि इन गलतियों से हासिल सबक को इकट्ठा करके उन्हें अपने जैसे कई और सिरफिरे लोगों के साथ बांटा जाना चाहिए।

लिखनेवालों की एक टोली जुटाने की हिम्मत वैसा ही कोई शख़्स कर सकता है जिसने अपना ईगो, अपना दंभ एक हद तक क़ाबू में कर लिया हो। वरना ये आसान नहीं होता कि आप बड़ी ईमानदारी से ये स्वीकार कर सकें कि जो लोग आपसे सीखने आए हैं, वो दरअसल आपसे कहीं बेहतर हैं। ये भी आसान नहीं कि अपना लिखना छोड़कर आप बाकी लोगों को लिखने के लिए प्रेरित करते रहें, उनके लिए अवसर ढूंढते रहें।

लेखक या आर्टिस्ट या किसी किस्म का कलाकार अपने एकाकीपन में ही सबसे बेहतर रच पाता है - अपनी उदासियों में। उसकी उलझनें ही दूसरों को बांधती हैं। ये वो सूक्ष्म तंतु होते हैं जिनसे लेखक जितना कस कर  ख़ुद को घेरे रखता है, उतनी ही ज़ोर से पढ़नेवालों को, सुननेवालों को बांध पाता है। आर्टिस्ट का सिरफिरापन, उसका अवसाद, उसके दुख उसकी सबसे बड़ी ताक़त होते हैं - उसके हथियार होते हैं। वो दुनिया को जितनी शिद्दत से नकारता है, उतना ही अच्छा और नया लिख पाता है।

और हम मंडली में क्या कर रहे हैं? लिखनेवालों (या खुद को लेखक समझनेवालों) की फ़ितरत के ठीक विपरीत हम भीड़ जुटा रहे हैं। हम कह रहे हैं कि लिखो, और कुछ सकारात्मक लिखो। हम कह रहे हैं कि तुम्हारे पास जो ताक़त है न लिखने की, उसमें दुनिया को तो नहीं, लेकिन कुछ लोगों की सोच को बदलने का माद्दा ज़रूर है। इसलिए अच्छा लिखो। बदलो तो कुछ बदलो बेहतरी के लिए। बांटों तो उम्मीदें। लफ़्ज़ गिरें तो हौसलों के हों। अपनी टूटन का फ़साना बयां भी हो तो किसी और के टूटे हुए दिल को जोड़ पाने के लिए।

धत्त तेरे की!!! एक और सिरफ़िरी बात।

लेकिन ये मंडली है ही इसी के लिए। सिरफ़िरों की टोली है, जो अभी और बड़ी होगी। मुंबई और दिल्ली से देश के कई और शहरों में जाएगी। अगले कई सालों तक कई सारे लोगों को लिख पाने का भरोसा देगी।

अपने प्यार का इज़हार कर पाने के लिए जो चिट्ठी किसी ने कभी न लिखी, उसे वो चिट्ठी लिख पाने का हौसला देने के लिए।

अपने बॉस को assertive होकर जो ई-मेल कभी हम लिख न पाए, वो polite assertiveness बाहर लेकर आने के लिए।

अपनी मां की सालगिरह पर एक कविता लिख पाने के लिए। अपने भाई को राखी पर एक गीत सुना पाने के लिए।

अपने दोस्तों के बीच बैठकर कहानियां रच पाने के लिए।

अपने बच्चों को सुलाते हुए नई-नई कहानियां बुन पाने के लिए।

मंडली इसी के लिए तो है। रेडियो, टीवी या फिर किताबों-पत्र-पत्रिकाओं में अपना लिखा हुआ देख पाना तो सेकेंडरी है। कम-से-कम मंडली के लिए। दो क़दम आगे और एक क़दम पीछे चलते हुए हम अपना नया रास्ता तय कर ही लेंगे। मंडली के बारे में और बताऊंगी लौटकर। अभी के लिए इतना बता दूं कि दिल्ली में हुई चार मंडली बैठकों से होकर पांच नए (और बेहतरीन) writers निकले हैं, जिनकी कहानियां आप आनेवाले हफ्तों में बिग एफएम पर सुन सकेंगे। इनके अलावा एक मां (जो नानी भी हैं) ने बीस-पच्चीस साल पहले बंद की गई कविताओं और कहानियों की डायरी एक बार फिर निकाल ली है। अंबुज खरे नाम के साथी ने पंद्रह साल के बाद कलम उठाने का वायदा किया है। कॉरपोरेट नौकरियों और ज़िन्दगी की आपाधापी के बीच चार लेखिकाओं ने (जो मां भी हैं, और कामकाजी भी) अपनी कहानियां बांटी हैं।

अब और क्या कहूं कि ये मंडली  आख़िर है क्या?

Thursday, November 21, 2013

दिलासों को छूके, उम्मीदों से मिलके

एक छोटी सी बच्ची ट्रेन की पटरियों के ठीक बीचों-बीच बेफ़िक्री से चलती है। उसके दाएं हाथ में लाल फूलों का गुच्छा है। लाल नहीं, गहरे गुलाबी-नारंगी फूलों का। बुगेनवेलिया के फूलों का गुच्छा लिए वो लड़की इस तरह अकेली कहां जा रही होगी, मैं घबराकर सोचती हूं। तभी देखती हूं कि लड़की सुबक रही है - गहरी उदासियों वाली सिसकियों के साथ। मैं उस लड़की को गले लगाना चाहती हूं। Big hug - मन में सोचती हूं, सामने बढ़कर दे नहीं पाती।

किसी अनजान शहर में मुसलसल बर्फ गिरती रहती है। कई साल पहले बिछड़ गई एक सहेली को बर्फ़ में ठिठुरते देखती हूं बंद गाड़ी की खिड़की के पीछे से आते-जाते। हर बार सोचती हूं, उतरकर गले लगाऊंगी और हाथ थामकर गाड़ी में बिठा लूंगी। गाड़ी रुकती नहीं, बर्फ थमती नहीं, सहेली का ठिठुरना बंद नहीं होता। Big hug देने का ख़्याल धरा का धरा रह जाता है। मैं फिर एक पत्थर-सा भारी अफ़सोस लिए उठती हूं सुबह-सुबह।

उसके ठंडे बेजान पैरों पर एक बार फिर गहरा आलता लगाए देती हूं। उसकी सूजी हुई उंगलियों में शादी की अंगूठी नहीं है, एक दाग़ रह गया है बस। सफ़ेद कपड़े के पीछे से रंग-बिरंगे पत्थरों वाले ताबीज़ झांकते हैं। उसे इस हाल में देखकर पत्थरों पर से भी यकीन उठ गया है, ईश्वर पर से भी। ग़लती से मेरा हाथ आलते की शीशी पर लग जाता है और पूरा रंग उसके पैरों के पास बिखर जाता है। मैं डर कर रोने लगती हूं। यहां भी कोई नहीं आता, Big hug लिए। भीतर कुछ है जो फिर एक बार डूब जाता है। गले में रुलाई अटकी रहती है नींद में भी।

शुक्र है सुबहों का वजूद रातों से आज़ाद होता है।

आड़े-तिरछे बेतरतीब बेमानी सपनों में ही नहीं... मेट्रो में आते-जाते हुए, मेट्रो कंस्ट्रक्शन की वजह से दिल्ली की और तंग हो गई सड़कों पर गाड़ी चलाते हुए, किसी प्लश से दफ़्तर में किसी का इंतज़ार करते हुए, बिना इंटरनेट के नए फ़ोन में सिर घुसाए मसरूफ़ दिखने का झूठा दिखावा करते हुए, बस स्टॉप पर बच्चों का इंतज़ार करते हुए, मॉर्निंग वॉक से लौटते हुए... एक ही ख़्याल तारी रहता है आजकल - किसी को गले लगाने का बेतुका ख़्याल, और गले लगकर जीभर कर रो लेना का बेतुका ख़्याल।

फिर मम्मी के पास होना चाहती हूं मैं अचानक। पूछना चाहती हूं कि ऐसी बेचैनियां कितनी पीढ़ियों को शाप में मिलती हैं? किस महर्षि का ध्यान भंग किया था किस जन्म में हमने कि पूरी ज़िन्दगी की तपस्या सज़ा के तौर में मिली? तीसरी पीढ़ी तक तो चैन नहीं है। आद्या को क्या सौंपूंगी? उसे शाप से बचाए जाने का कोई तो प्रायश्चित होगा मम्मी...

सुबह फिर रात की पूंछ थामे आई है। मुझे जाड़ों की सुबहें ज़रा भी नहीं भाती। धूप की नरमी न हो तो सुबह का मतलब ही क्या? रात गुज़र जाए और नींद न आए तो उससे बड़ी सज़ा क्या? डरावने सपनों को ख़्वाबों से रिप्लेस न किया तो फिर जिएं कैसे? विरह न हो तो प्रेम की परिभाषा कैसे समझ में आए? टूटन सताए न तो समेटने का ख़्याल कहां से लाएं?

ऐसी ही है तो ऐसा ही हो। मुझे डॉ कुमार से मिलने की सख़्त ज़रूरत है।

मैं जानती हूं डॉ कुमार क्या कहेंगी। उनकी समझदारी और डॉक्टरी पर, उनके हीलिंग पावर पर मेरी सोचने-समझने की शक्ति कई बार भारी पड़ती है। ठीक उसी तरह, जिस तरह उनके दिए हुए संबल पर मेरा परिताप भी भारी पड़ता है कई बार। बहुत सूक्ष्म हैं ये परिताप। बांधते भी नहीं, लेकिन इनसे ख़ुद को आज़ाद करना भी मुश्किल लगता है। इन सूक्ष्म तंतुओं को तोड़ने की ज़िद में कहीं कुछ बड़ा नष्ट न हो जाए, इस डर से मैं डॉ कुमार से भी अपना एक हिस्सा बचाए रखती हूं। कुछ ज़ख़्म हरे रहें तो ही ठीक।

लेकिन ज़िन्दगी में ऐसे विरोधाभास कई बार नितांत आवश्यक होते हैं। डर आता है तो हिम्मत ढूंढने का सबब मिलता है। प्यार होता है तो परिताप भी, क्लेश भी। देवताओं के माथे गुनाहों का कलंक सबसे गहरा होता है।  जो सबसे ज़्यादा प्यार बांटता है, वही सबसे ज़्यादा खाली होता है भीतर से। शब्द अधूरे होते हैं तभी उच्चारण मांगते हैं। चाराग़र अपनी ही जानलेवा बीमारी का इलाज नहीं कर पाता।

कुछ डर, कोई आशंका, कोई तिश्नगी, कोई उद्विगनता, किसी के प्रति अबूझ स्नेह, कहीं अटकी हुई बेजां श्रद्धा और कहीं पीछे रह गया किसी किस्म का एक अफ़सोस - ज़िन्दगी ऐसे ही बनती है शायद। उम्मीदें और दिलासे, प्यार और big hug इसी विरोधाभास को बचाए रखते हैं।

ये सब सोचते हुए उठती हूं एक कठिन रतजगे के बाद बिस्तर आख़िर छोड़ ही देती हूं और बच्चों को आवाज़ लगाती हूं। 6.45 के बाद उठने का मतलब है बस के छूट जाने की पूरी गुंजाईश बन जाना।

बच्चे नींद में भी शायद मां की बेकली पहचानते होंगे। मैंने मांगा नहीं - बिग हग - बड़ी सी झप्पी, और बेटा अपने आप बिस्तर से सरकते-सरकते मेरी गर्दन के आस-पास कहीं जगह बनाते हुए अपना बासी मुंह मेरी गर्दन के भीतर घुसेड़ देता है। बेटी भाई की देखा-देखी पीठ से लटक जाती है।

मेरे इर्द-गिर्द दो सुरक्षा चक्र हैं, और कई तरह के विरोधाभास। बच्चों का प्यार न चाहते हुए भी खलिश भर ही देता है कई बार।

मैं गुलज़ार और पंचम को आवाज़ देती हूं अपने लैपटॉप पर फिर एक बार, और ख़ुद को एक बार और याद दिलाती हूं कि खुशी उस तितली का नाम है जिसे पंखों से पकड़ना होता है और इंसान उस बच्चे का नाम जिसे खुशी नाम की तितली को पंखों से पकड़कर जेब में घुसेड़ लेना का हुनर आ ही जाता है अपने आप - ज़िन्दगी के तमाम विरोधाभासों के बीच भी।

बाकी, दिलासों को छूते हुए, उम्मीदों से मिलते हुए ज़िन्दगी ठीक उसी तरह कट जाती है जैसे आज का दिन कट जाएगा।

***

कभी पास बैठो,
किसी फूल के पास
सुनो जब महकता है
बहुत कुछ ये कहता है

कभी गुनगुना के
कभी मुस्कुरा के
कभी चुपके चुपके
कभी खिलखिला के

जहां पे सवेरा हो, बसेरा वहीं है

कभी छोटे-छोटे
शबनम के कतरे
देखे तो होंगे
सुबह-ओ-सवेरे
ये नन्हीं-सी आंखें
जागी हैं शबभर
बहुत कुछ है दिल में
बस इतना है लब पर

जहां पे सवेरा है, बसेरा वहीं है

न मिट्टी न गारा
न सोना सजाना
जहां प्यार देखो
वहीं घर बनाना
ये दिल की इमारत
बनती है दिल से
दिलासों को छूके,
उम्मीदों से मिलके

जहां पे बसेरा हो, सवेरा वहीं है




Friday, November 15, 2013

बच्चे नहीं, हम बिगड़े हुए हैं


कौटिल्य पंडित को टीवी पर देखकर दिमाग में जो पहली बात आई थी, उसके बारे में सोचकर मझे कई बार अफ़सोस हो चुका है। मैंने सोचा, कौटिल्य नाम का ये जीनियस मेरे बच्चों से तो सिर्फ एक साल छोटा है!” जितनी तेज़ी से ये ख़्याल मेरे मन में आया, उतनी ही संजीदगी से ये बात भी ज़ेहन में आई कि ख़ुद को जागरुक और संवेदनशील बताने वाले हम मां-बाप भी आख़िर किस हद तक ढोंगी हो सकते हैं! हम सब तमगे चाहते हैं, ट्रॉफी किड्स चाहते हैं – उस तरह के बच्चे जिनका घर, बाहर, समाज और यहां तक कि सोशल मीडिया पर दिखावा करने का मौका मिल सके।

बच्चों को लेकर हमारी प्रतिस्पर्धा उनके पैदा होते ही शुरू हो जाती है। बच्चे किस अस्पताल में पैदा हुए, और कितने बड़े पेडियाट्रिशियन के पास से हमने टीके लगवाए - यहां से शुरू हुई ये स्पर्धा उनके बैठने, बोलने, चलने और कब कितना क्या-क्या कहा के हिसाब के तौर पर स्क्रैप-बुक्स, एलबम्स और लाइव स्टेटस अपडेट्स में जमा होने लगी है। मैं मानती हूं कि अपने बच्चों को बड़ा करना एक किस्म का सेलीब्रेशन होना चाहिए - एक किस्म का जश्न-ए-बचपन - क्योंकि बच्चों को बड़ा करने के साथ-साथ हम भी न सिर्फ अपना बचपन जी रहे होते हैं, बल्कि उनके साथ-साथ ख़ुद भी बड़े हो रहे होते हैं। बच्चे हमें सब्र का पाठ पढ़ाते हैं। बच्चे हमें प्यार करना सीखाते हैं। बच्चे हमें जीने का सलीका बताते हैं। लेकिन इसका मतलब बच्चों के साथ हमेशा परफेक्ट होने की ज़्यादती करना कतई नहीं हो सकता।

लेकिन बदकिस्मती से हमने एक ऐसा समाज बना लिया है जो बच्चों की मासूमियत और उनका बचपन छीनने का काम बख़ूबी और सीना ठोक कर करता है। ये वो समाज है जहां हमारे बच्चों की आंखों पर पट्टियां लगाकर उन्हें ज़िन्दगी की रेस में तभी छोड़ दिया जाता है जब उनकी उम्र अपनी सीधे खड़े होने की भी नहीं हुई होती। इसके पीछे बड़ा कारण एक ही है – हमें पेरेन्ट्स या अभिभावक के तौर पर खुद को अव्वल साबित करना है। इसलिए बच्चों की परवरिश हमारे लिए वो प्रोजेक्ट हो जाती है जिसमें ए-प्लस हासिल करना ज़िन्दगी का सबसे बड़ा लक्ष्य बन जाता है। 

हमारे बच्चे किस स्कूल में पढ़ते हैं, स्कूल से आने के बाद कितनी तरह की हॉबी क्लासेस में जाते हैं, क्लासिकल संगीत के साथ-साथ टेनिस क्लासेस के लिए जाते हैं या नहीं, स्कूल में ग्रेड्स कैसे लेकर आते हैं, उनका बर्ताव कैसा है, उनकी शख़्सियत कैसी है – इन सारी बातों पर हमारी लम्हा-लम्हा नज़र होती है। हम अपने काम में चाहे कितने ही फिसड्डी क्यों न हों, जाड़े की सुबह दफ़्तर जाने के लिए रजाई को छोड़ने से पहले बॉस को कितनी ही गालियां क्यों न दे दें, ख़ुद दूसरों से किस तरह पेश आते हैं उसके बारे में भले कभी न सोचा है, लेकिन बच्चे हमें परफेक्ट चाहिए। अपनी अपेक्षाओं का भार अपने बच्चों को कोमल कंधों पर रखते हुए हमें ज़रा भी हिचक नहीं होती। क्यों भला?

मैं एक और वाकया सुनाती हूं। गर्मी की छुट्टियां काटने के लिए दोपहर में अपने पांच साल के जुड़वां बच्चों को मैंने ड्राईंग कॉपी और वॉटर कलर के डिब्बे पकड़ा दिए थे। बच्चों को भी बड़ा ज़ा आ रहा था। जब तक बच्चे मेरे अपेक्षा के मुताबिक ब्रश को कलर में डुबो के आराम से पेंटिंग करते रहे, मैं उनकी तस्वीरें खींचती रही, वीडियो लेती रही। इन सभ्य और कलाकार बच्चों पर नाज़ करती रही। बच्चे तो बच्चे ठहरे। थोड़ी देर में उनका मन ड्राईंग बुक से ऊब गया और उन्हें रंगों के साथ खेलने में इतना मज़ा आने लगा कि उनके शरीर, चेहरे और हथेलियां पर देखते ही देखते मॉडर्न आर्ट के कई डिज़ाईन उतर गए। पूरा रंग कमरे में और फर्श पर बिखर चुका था। खेल-खेल में सूरत ऐसी बिगड़ी कि मुझे तेज़ गुस्सा आ गया। अभी दस मिनट पहले मैं जिन सभ्य और परिष्कृत बच्चों पर फ़ख्र कर रही थी, वही बच्चे अब मेरी नाराज़गी की चपेट में आ चुके थे।

किसने तय किया कि बच्चे कैसे पेंटिंग करेंगे? उनके हमेशा बच्चों के तरीके से काम करने की अपेक्षा क्यों की जाती है? हम इतनी सारी बंदिशों में क्यों रखते हैं उनको? उन्हें उनके तरीके से जीने देने में हमें इतनी तकलीफ़ क्यों होती है? सच तो ये है कि उन्हें उनके तरीके से हम तभी जीने देते हैं जब हमारी सहूलियत की बात आती है। हमारे पास वक़्त नहीं है तो उन्हें टीवी देखने दिया। हम शाम को वक्त पर घर नहीं लौट पाए तो उनके लिए खिलौने ले आए। हमारे पास उनके दोस्तों से मिलने और उन्हें जानने का वक्त नहीं है तो उन्हें मॉल ले गए। हमारे पास उनकी पसंद का खाना बनाने की फ़ुर्सत नहीं है तो उन्हें पिज़्जा और बर्गर खिला दिया। अपनी सहूलियत के हिसाब से सब ठीक, लेकिन जब बच्चों ने इनमें से कुछ भी अपनी मर्ज़ी से मांगा तो हमने बड़ी आसानी से कह दिया, आजकल के बच्चे ही बिगड़े हुए हैं।

बच्चे बिगड़े हुए नहीं हैं। हम बिगड़ चुके हैं। हमारे बच्चे हमारा ही प्रतिबिंब होते हैं। उनकी सोच, उनके रहन-सहन, उनके तौर-तरीकों में हमारी शख़्सियत ही झलकती है और ये बात वैज्ञानिक रूप से साबित भी हो चुकी है। एक बेहतर समाज बन सके, इसके लिए बहुत ज़रूरी है कि हम बच्चों के लिए एक अच्छा माहौल बनाएं। इस गलाकाट और बेरहम दुनिया में बच्चों का तो क्या, हमारा भी गुज़ारा मुश्किल से हो रहा है। बच्चों की ज़रूरतें सुविधाएं, विलासिता, आईपैड और मोबाइल फोन नहीं, हमारा वक्त और हमारा प्यार है। अपने बच्चों का प्यार से पालन-पोषण करना अपने भीतर प्यार और इंसानियत बचाए रखने का सबसे कारगर तरीका है और बच्चों को उनके हिस्से का प्यार और सम्मान मिले, इसके लिए हर बच्चे का कौटिल्य पंडित होना भी कतई ज़रूरी नहीं।          

('खुशबू' में प्रकाशित कवर स्टोरी - लिंक है http://dailynewsnetwork.epapr.in/184374/khushboo/13-11-2013#page/1/1)

Wednesday, November 13, 2013

... कि सब ठीक ही है आज कल

मुझसे मत पूछना कि कहां गुम ही इन दिनों।

जब कहने के लिए कई बातें होती हैं, तो सबसे ज़्यादा सन्नाटा यहीं इसी जगह पर, यहीं मेरे ब्लॉग पर होता है।

बस इतना यकीन दिला सकती हूं आपको कि टुकड़ों-टुकड़ों में बिखरे वजूद को समेटने की कोशिश में लगी हुई हूं ताकि एक भरपूर और मुकम्मल शक्ल में आप सबके सामने आ सकूं।

तब तक दुआएं भेजिए क्योंकि कुछ और काम नहीं आता। सिर्फ़ दुआएं और सकारात्मक ऊर्जा, पॉज़िटिव एनर्जी, ही कुछ बदल पाने का माद्दा रखती हैं।

इन पन्नों पर फिर से लौट आने को बेचैन,

आपकी ही
अनु