Sunday, June 23, 2013

गर्मी छुट्टी डायरिज़ – पर्वत के इस पार, पर्वत के उस पार


मेरी डायरी में ऐसी दो अधूरी ख़्वाहिशें पड़ी हैं जिनके अधूरे पड़े रहने का आभार मैं शब्दों में बयां नहीं कर सकती। अपनी डायरी निकाल कर मैंने पिछले एक हफ़्ते में कई बार इन दोनों अधूरी ख़्वाहिशों को पढ़ा है और सोचती रही हूं कि अगर इन दोनों ख़्वाहिशों में से एक भी पूरी हो जाती तो? इनमें से एक तो एकदम सामान्य-सी लगती है - विशलिस्ट में लिखी हुई कई नामुमकिन-सी लगने वाली बाग़ी ख्वाहिशों के बीच एक आम मध्यवर्गीय परिवार की बेटी-बहू होने की ज़िम्मेदारी से लबरेज एक मिडल क्लास ख़्वाहिश – मम्मी-पापा और सास-ससुर को चार धाम की यात्रा कराने पाने की एक आम-सी ख़्वाहिश।

इस साल मैं इस इच्छा को पूरी करने पर आमादा थी। एक किस्म की ज़िद पर उतारू। साल के शुरू में ही सबको कह दिया था – अपना वक्त और शक्ति दोनों बचाकर रखना शुरू कर दें, हमें चार धाम की यात्रा पर जाना है। डायरी में पूरी तैयारी शुरू हो गई। टूअर ऑपरेटर्स के नंबर और पते, तारीख़ें, यात्रा का ब्यौरा, बच्चों की छुट्टियों के हिसाब से टिकटों की प्लानिंग... हम आठ लोग थे, जिनमें दो बच्चे और दो सेट ऑफ़ मम्मी-पापा। इसलिए तैयारी में कोताही नहीं बरती जा सकती थी। लेकिन पापा (ससुर जी) की एक दिन की गुमशुदगी ने हमारे हौसले पस्त कर दिए। पापा इतनी लंबी यात्रा पर जाने की हालत में नहीं हैं अब और सासू मां उनके बिना जाती, ये हो नहीं सकता था। फिर मेरे पापा का इरादा बदल गया और मम्मी वैसे भी आज कल अपने मन की तीर्थयात्रा हर रोज़ करती हैं, जहां होती हैं चार धाम बसाए चलती हैं। एक मैं घुमन्तू, जिसकी चार धाम की कम, चार धाम के बहाने पहाड़ों की सैर करने के इरादे को वीटो कर दिया गया। फिर मैंने तय किया कि केदारनाथ न सही, वैली ऑफ़ फ्लावर्स की ट्रेकिंग के लिए तो जाऊंगी ही, जिसके लिए मैंने पैसे भी जमा कर लिए थे और तय कर लिया था कि बारह ट्रेकर्स की टोली के साथ इस साल लंबी ट्रेक कर ही आऊंगी। मेरी किस्मत अच्छी थी कि एक दोपहर हुई एक छोटी-सी बातचीत ने मेरे ज़िद्दी इरादे पर पानी फेर दिया और इतने लंबे ट्रेक पर जाने के लिए ख़ुद को मेडिकली अनफ़िट समझते हुए मैंने वो इरादा भी अनिश्चितकाल के लिए टाल दिया। ये सोचकर वक़्त बर्बाद करना भी फ़िज़ूल है कि दोनों में से कोई भी एक मनोकामना पूरी हो गई होती तो क्या हुआ होता।


हिमालय के दूसरी तरफ़ पहाड़ों पर बसे एक शहर के एक होटल के कमरे में बैठे हुए हम पहाड़ों के दूसरी ओर हुई तबाही की ख़बरें टीवी पर देख रहे हैं। बच्चों की ज़िद और छुट्टी का थोड़ा-सा सदुपयोग करने की इच्छा हमें पूर्णियां से दार्जिलिंग ले आई है लेकिन सच कहूं तो मुझे इससे पहले पहाड़ों से इतना डर कभी नहीं लगा। दिन के उजाले में जो धुंध और ठंड पहाड़ों को रोमांचक और अभीष्ट बनाती है, रात के अंधेरे में वही धुंध और ठंड पहाड़ों को डरावना बना देती है। होटल की बालकनी में थोड़ी देर भी खड़ा होना मुश्किल हो जाता है। बाहर घुप्प अंधेरा है और सन्नाटे को झींगुरों की आवाज़ तोड़ती है। अभी थोड़ी देर पहले तक जिस घाटी पर उतरते हुए बादलों को देखकर सुकून मिल रहा था, उसी घाटी की ओर अब देखा नहीं जा रहा। अंधेरे में अंधेरे के भी पर निकल आते हैं। अंधेरे में अंधेरा और डराता है। अंधेरे में पहाड़ और दुरूह हो जाता है। ऐसी ही किन्हीं पहाड़ की अंधेरी घाटियों और जंगलों में आई आपदा और उसकी चपटे में आई सड़ रही लाशों और भटकने वाल घायलों का सोचकर डर और बढ़ जाता है।


हम सैलानी हो गए हैं, पहाड़ हमारी दिल्लगी का, हमारे मन बहलाने का, हमारे आराम का ज़रिया। अपने स्वार्थ के लिए हमने ईश्वर को जहां चाहे बैठा दिया, फिर जैसे चाहा ईश्वर के दर्शन के लिए रास्ते खोल दिए। अपनी तमाम शक्तियां लगाकर पहाड़ों के सीनों को चीरकर अपने लिए रास्ते बना दिए। पहाड़ों की धमनियों में बहने वाली नदियों को जैसे चाहा बांधा, जहां चाहा रोक दिया। वो पहाड़ फिर कैसे बदला न लेता? जिस गंगा पर कई राज्यों की अर्थव्यवस्था निर्भर है, करोड़ों लोगों की रोज़ी जिस गंगा पर आश्रित है, शिव की चोटी तक जाकर उस बहती गंगा में हाथ धोने से भी बाज़ न आए। उस गंगा और उन पहाड़ों का दोहन करने वाले कितने? हम सब। उस गंगा और उन पहाड़ों को समझने वाले कितने? स्वामी निगमानंद जैसे गिने-चुने लोग जो गंगा के लिए लड़ते हुए अपनी जान भी गंवा देते हैं फिर भी अपने संघर्ष में अकेले रह जाते हैं।


हम जिस पहाड़परस्ती का दावा करते हैं वो दरअसल एक फ़ैशन स्टेटमेंट है। लोनली प्लानेट और फ़िफ्टी टू वीकेंड गेटअवेज़ फ्रॉम डेल्ही के पन्नों से निकालकर जमा की गई वो इच्छाएं जो जितनी ही तीव्र होती हैं, हम अपने पीयर ग्रुप में उतने ही कूल और सक्सेसफ़ुल मान लिए जाते हैं। हमने किन-किन पहाड़ों पर बैठकर उगते हुए सूरज को सलामी दी है, किन-किन नदियों की धाराओं से जूझ चुके हैं – हमारी पहचान उससे बनती है। पहाड़ के इस बाज़ारीकरण ने पहाड़ों को, पहाड़ों के बाशिंदों को बर्बाद कर दिया। जितनी तेज़ी से इंसानी ख़्वाहिशों की सूचियां बढ़ती चली गईं, पहाड़, जंगल और नदियां उतनी ही तेज़ी से कम होते गए। लेकिन जिस प्रकृति को संतुलन की आदत है, वो बर्बादी के स्तर तक उतर कर संतुलन बना ही डालती है और अपना बदला पूरा करती है। 


मैंने भी दार्जिलिंग में पहाड़ों को बर्बाद करने का अपना काम बख़ूबी निभाया है। मॉल रोड पर लिलिपुट और कैफ़े कॉफ़ी डे के आने का जश्न मनाया है। पहाड़ों पर टंगे घरों में बस गई बस्तियों की छतों पर लगी डीटीएच प्लेटों को वहां की तरक्की का सबब मान लिया है और टैक्सी ड्राईवर को दो सौ रुपए एक्स्ट्रा देकर समझ लिया है कि पहाड़ पर अहसान किया – यूं कि जैसे हम जैसे सैलानी न होते तो पहाड़ के लोगों को भूखे मरने की नौबत आ जाती शायद। आपकी जानकारी के लिए ये बता दूं कि दार्जिलिंग में 1899 में पहाड़ नाराज़ हुए, फिर 1988 में और उसके बाद 2011 में। हर बार की नाराज़गी ने ठीक-ठाक तबाही और बर्बादी मचाई है। बाज़ आना हमारी फ़ितरत नहीं। प्रकृति भी कभी-कभी ही इस तरह नाराज़ होती है।                   

Monday, June 17, 2013

गर्मी छुट्टी डायरिज़: जापानी कहानी और टूटा हुआ चांद

दिन भर हम क्या करते रहते हैं, एक यही सवाल बस न पूछो। दिन फिर भी कैसी-कैसी बेचैनियों में निकल जाता है। जेठ  की दोपहर में एक ज़रूरी काम धूप की चाल के साथ-साथ अपने बैठने-सोने की जगह बदलना भी है। रात जिस कमरे में पुरवैया का इंतज़ार करते बीतती है, वो कमरा पौ फटते ही छूट जाता है। सुबह उमसभरी हैं इन दिनों और हवाएं सुबह-सुबह आती हैं हल्की-हल्की। इतनी ही हल्की, कि पूअर्स मैन दार्जिलिंग पूर्णियां में होने का भ्रम न टूटे। इसलिए बेचैनी में कभी आंगन में, कभी छत पर बाद-ए-सबा की पूंछ पकड़ने की कोशिश में सुबह के कोई एक घंटे को निकल ही जाते हैं।

बाकी के एकाध घंटे खिड़की पर लटके हुए आमों को गिनने में जाते हैं - कल दोपहर चौंतीस थे दाईं डाली पर। आज उनतीस हैं। उसमें भी एक को तोते ने जूठा कर दिया। फिर मां के पीछे-पीछे छत पर। मां कबूतरों को दाने डालती हैं और मैं देर तक देखती रहती हूं कि कौन-सा जोड़ा उड़कर किस ओर जा रहा है। अगली सुबह उनको पहचानने का खेल। सफ़ेद गर्दन वाले मटमैले कबूतर को तो यादव जी के घर की मुंडेर पर जाते देखा था, फिर आज मिथिलेश अंकल के घर की तरफ़? गहरी धारियों वाला सफ़ेद कबूतर रंगभूमि मैदान की तरह, बाएं पैर से उचक कर चलने वाला पीले वाले मकान की तरफ़... सबके अपने पते। सबके अपने घोंसले। सबका अपना काम।

बच्चों के उठने के बाद थोड़ी-सी हलचल नहीं। ब्रश करो, नहाओ, दूध पियो, आम खाओ की धाराप्रवाह हिदायतें। उसके बाद फिर लंबी ख़ामोशी। बच्चों को ख़ुद से ही फ़ुर्सत नहीं। उनके पास मसरूफ़ रहने के इतने तरीके हैं कि उनसे रश्क़ होता है। और नहीं तो रामजी के किसी तोते को पालतू बनाने लगेंगे। किसी बिरनी के पीछे आधे घंटे दौड़ लगाएंगे। कबूतरों को पानी देंगे। उन्हें रोटी के टुकड़े खिलाएंगे। काग़ज़ के हवाई जहाज़ बनाएंगे और उन्हें अपनी फ़ूकों से उड़ाएंगे। आम की टोलियां बनाएंगे और उनके बीच बिठाएंगे आमदेव महाराज। हर लम्हा एक नया फ़साना, हर घंटे एक नई कहानी। उनकी नज़रों से देखती रहती हूं तभी तक सबकुछ ठीक लगता है। उनकी कसौटी पर कसते हुए ख़ुद को सही-ग़लत का पाठ पढ़ाती रहती हूं। मैं उन्हें अनुशासित नहीं करती, वो मुझे करते हैं। मैं उन्हें बड़ा नहीं कर रही, वो मुझे कर रहे हैँ। सारी कोशिशें उन्हीं की ख़ातिर है। ज़िन्दगी के किताब का उनवान भी वही, अंजाम भी वही।

दोपहर होते-होते एक और खेल शुरू हो गया है। पुराने बक्सों से बच्चों के कपड़े निकल आए हैं। दोनों एक-एक करके उन कपड़ों को ला-लाकर डायनिंग टेबल पर रखते जाते हैं, जहां मैं बैठकर एक रिपोर्ट लिखने की नाकाम कोशिश कर रही हूं। मोज़े उंगलियों में आ जाते हैं, टोपियां सिर में बांध ली जाती हैं, पायजामे गले का हार बन गए हैं, एक पुराने दुपट्टे की आद्या ने साड़ी लपेट ली है, आदित ने शॉल की धोती बना ली है। खेल कई घंटे चलता है, और मैं काम छोड़कर उनके एक-एक कपड़े की याद ताज़ा करने में लग गई हूं। ये जंपसूट कोलकाता से लिया था, ये लाल टोपी चाची ने बनाई थी, ये नीली फ्रॉक लिंकिंग रोड से आई थी... फिर संभालती हूं खुद को। बच्चों को देखो - यादों को भी खेलने का सामान बना लिया। कितने मशगूल फिर कैसे उदासीन! और एक हम हैं कि जहां होते हैं, वहां होते नहीं और जहां होना नहीं चाहिए, अक्सर वहीं होते हैं।

खेल समेट लिया गया है और अब पूरी संजीदगी के साथ नया खेल शुरू हो गया है। एक बाबा के सिर की बनफूल से चंपी कर रहा है, दूसरा पीठ पर पाउडर मल रहा है। बाबा बच्चे हो गए हैं, बच्चे बाबा। हम दोनों पार्टियों के लिए चीयर कर रहे हैं। अचानक बच्चों को टीवी की याद आई है। डोरेमॉन, नोबिता, शुज़ुका, जियान और सुनियो के बग़ैर इतने दिन कट गए, यही कम है? फिर ढेर-सारा टीवी है और ममा की ढेरी-सारी कोफ़्त है। इतनी ही कि मैं उन्हें सज़ा सुना देती हूं - जो टीवी पर देखो वो मुझे कहानी लिखकर दिखाओ, पांच लाईन में। दोनों बच्चों ने हामी भर दी है।

अब शाम है, छत है और झूला है। आद्या मुझे आसमान पर टंगे टूटे हुए चांद की कहानी सुना रही है। चांद तारों के साथ आसमान में लुका-छिपी  खेल रहा होता है, इसलिए कभी पूरा दिखता है कभी टूटा हुआ। राकासुर चांद को निगल जाना चाहता है ताकि उसकी दुल्हन को ले जा सके, लेकिन चांद की दुल्हन हर बार कूदकर ज़मीन पर आ जाती है और भाग जाती है। जिस रात राकासुर के आने का डर नहीं होता उस रात चांद अपनी पूरी शक्ल दिखा कर दुल्हन को वापस आसमान आने को कहता है...

कहानी के बीच में मुझे कुछ याद आता है...  

"ममा ने जो काम दिया वो किया?"

"किया ममा। पांच लाईन्स क्या, एक पेज लिख दिया। लेकिन आपको जापानी पढ़नी थोड़े आती है!"

मैं हंस देती हूं और सोचती हूं कि ऐसे दिन बहुत अच्छे होते हैं कि जिस दिन आप अपने बच्चों से टूटे हुए चांद की मनगढंत कहानियां सुनते हैं। उस दिन ख़ुद के किए कई बड़े फ़ैसलों पर यकीन पुख़्ता हो जाता है।   


Sunday, June 16, 2013

गर्मी छुट्टी डायरिज़ में हैप्पी फ़ादर्स डे

ठीक-ठीक याद नहीं कि साल कौन सा था। १९९४ शायद। मैं दसवीं में थी, और तब तक दोस्ती, यारी, वादे-शिकवों, ख़्वाब-ख़्वाहिशों के साथ अज़ीज़ रिश्तों की समझ और उन रिश्तों पर अपनी राय रखना भी आ गया था। ये राय आर्चीज़ और हॉलमार्क के ग्रीटिंग कार्ड्स से लेकर फ़ुटपाथ पर मिलने वाले पोस्टरों के ज़रिए कमरों में चिपकाकर ज़ाहिर होती थी। मुझे लगता नहीं कि उस वक्त मदर्स डे या फादर्स डे का बाज़ार आर्चीज़ या हॉलमार्क इतना बड़ा बना पाया होगा और रांची जैसे शहर में भी इतना बड़ा हो पाया होगा कि ठीक उसी मौके के लिए मैंने वो एक पोस्टर खरीदा हो। लेकिन माया एंजेलो की कविताओं वाले कार्ड्स तब रांची में भी ख़ूब बिका करते थे और मैं उन्हें ख़ूब खरीदा करते थी। उसी क्रम में दो पोस्टर्स खरीदे और अपने कमरे में रखे गोदरेज पर चिपका दिया। एक पोस्टर में था कि एक चिड़िया अपने घोंसले में बैठे तीन बच्चों को दाना देनी बैठी है, और तीनों  बच्चे उसकी ओर मुंह खोले ताक रहे हैं। उस पोस्टर पर लिखा था - मदर्स आर दे ग्रेटेस्ट इन द वर्ल्ड - मांएं दुनिया में सबसे महान होती हैं। एक और तस्वीर थी जिसमें तीन रंगीन भालू एक दूसरे को गले लगाए आंखें मींचे प्यार जताए खड़े थे। उन तीनों पर (शायद मैंने ही) हम तीनों भाई-बहनों का नाम रख दिया था। अब याद आता है कि हमारी इस छोटी-सी दुनिया में एक-दूसरे के लिए प्यार का इज़हार करने, एक हज़ार झगड़ों के बाद भी  साथ जीने-मरने की कसमें खाने के बीच जो पांचवां शख्स गायब था, वो थे पापा।

इसलिए क्योंकि पापा अक्सर ग़ायब ही हुआ करते, और हाज़िर होते भी तो इस तरह दूर कि उनसे और ज़्यादा दूरी बनाए रखने में हम भलाई समझते। मम्मी के इर्द-गिर्द हमारी दुनिया घूमती थी। हमें सुलाना-उठाना-खिलाना-पढ़ाना-सज़ा देना-समझाना, सब मम्मी की ज़िम्मेदारी थी। पापा को नतीजों से मतलब था। हर रोज़ हमारे छोटे-छोटे काम किया करती मम्मी और हमारे बढ़े हुए नाख़ून और बिखरे हुए बाल नज़र आते पापा को। हर रोज़ हमें नहलाती मम्मी, और सर्दियों में खुश्क पड़े हमारे हाथ-पांव नज़र आते पापा को। हर रोज़ हमारा होमवर्क कराती मम्मी, और टीचर की आंखों में धूल झोंककर रिपोर्ट कार्ड्स पर किए गए फ़र्ज़ी दस्तख़त नज़र आ जाते पापा को। हर रोज़ हमें प्यार-दुलार करती मम्मी और रोल मॉडल बना दिया जाता पापा को। इसलिए क्योंकि मम्मी हर वक्त अवेलेबल (मुझे इस एक शब्द के लिए हिंदी में कोई बेहतर शब्द नहीं सूझा) होती, इसलिए हम उनको ग्रान्टेड ले सकते थे। पापा दूर थे, कम वक्त के लिए साथ होते इसलिए उन्हें ख़ुश करना, ख़ुश रखना हमारा कर्तव्य होता। उनका कहा पत्थर की लकीर था, उनके तौर-तरीके हमारे लिए आदर्श।

अब समझ में आता है कि तब के पापा लोग ऐसे ही हुआ करते थे। तब अपने बच्चों को गोद में उठाना एक संयुक्त परिवार में शर्म की बात मानी जाती थी। आप अपने भतीजे-भतीजियों, चचेरे-ममेरे-फूफेरे छोटे भाई बहनों को गोद में लेकर उनसे प्यार जता सकते थे, आपके अपने बच्चों पर उस दुलार का अधिकार नहीं था। ये ग़ज़ब की परंपरा थी जो आज तक मुझे समझ में नहीं आई। मेरे परिवार में सबको पापा जैसा प्यार मिला - लेकिन किसी को अपने पापा से नहीं - किसी को बाबा से, किसी को बड़े पापा से तो किसी को चाचा से। सब पापा लोग प्यार करते थे, लेकिन अपने बच्चों को नहीं।

पापा को हमारे पास नज़दीक आते-आते, हमसे खुलते-खुलते कई साल लगे। मुझे अब लगता है कि बिचारे पापा ने इसके लिए ख़ूब मेहनत भी की होगी। आख़िर एक पुश्तैनी परंपरा को तोड़ना आसान तो है नहीं। हमारे लिए पापा सिर्फ चुनौतियां सामने डालने का काम करते, हमें करियर में और अच्छा करने के लिए कभी तल्ख़ी से कभी प्यार से पीछे से धक्के लगाते। पापा इस क़दर अनप्रेडिक्टेबल थे कि ठीक-ठीक अंदाज़ा लगाना मुश्किल था कि कौन-सी छोटी बात गुनाह क़रार दी जाएगी और कौन-सा बड़ा अपराध नज़रअंदाज़ कर दिया जाएगा।

एक वाकया याद है मुझे। पापा हमें अक्सर पन्नों की बर्बादी न करने को कहते और अपने कॉलेज के उन बड़े गणितज्ञों, वैज्ञानिकों की मिसालें देते जो पहले पेंसिल से गणित के समीकरण हल किया करते, और फिर उसी पन्ने पर पाइथागोरस थ्योरम की धज्जियां उड़ाते। (सच कहूं तो ये फ़ितूर मेरी समझ में कभी नहीं आया, वैसे ही जैसे मैथ्स नहीं आया)। ख़ैर, पापा को ख़ुश करने के लिए मैंने बड़ी मेहनत से पुराने पन्नों को इकट्ठा कर एक रफ़ कॉपी बनाई और उनके सामने एक दिन मैथ्स पढ़ने बैठी - अ ला ट्रू मैथेमटिशियन स्टाईल। पापा ने पूछा, ये क्या है? रफ़ कॉपी, मैंने फ़ख्र से कहा, पेंसिल से पहले दो चैप्टर्स कर लिए। अब अगले दो पेन से करेंगे। यूं कि इतना भर कर देने से अगले वशिष्ठ नारायण सिंह हमीं निकलेंगे। पापा ने वो बुरी तरह झिड़का, वो बुरी तरह झिड़का, वो बुरी तरह झिड़का कि हम उसी दिन तीन नई कॉपियां रघुनाथ चाचा की दुकान से लेकर आ गए थे। कहा कि हम पैसे नहीं कमाते कि तुम्हारी कॉपी खरीदने के लिए कोई पैसे नहीं देता जो ये तमाशा कर रही हो? सवाल ही नहीं था कि मैं पापा से बहस भी करती, या ज़ुबान से ये भी फूटता कि आप ही ने तो...

पापा के दिए हुए झिड़कियों के ज़ख़्मों पर बाबा मरहम लगाया करते थे, इसलिए मैं धीरे-धीरे ढीठ हो गई। लेकिन पापा ने सबसे मुश्किल लम्हों में मेरा हाथ थामा है, मेरा साथ दिया है। बारहवीं में मेरे नतीजे अच्छे नहीं आए थे। मैं जैसे स्टूडेंट रही बचपन से, उस लिहाज़ से तो बिल्कुल नहीं। जिस पापा ने कभी सिर पर हाथ तक नहीं रखा था प्यार से उस पापा ने पहली बार मुझे गले से लगाया था। मैं उनके सीने से लगकर सिसकियां लेती रही और पापा ने कहा, ये एक ख़राब रिज़ल्ट तुम्हारी ज़िन्दगी का रूख़ बदल देगा। वही हुआ। आज सोचती हूं कि पापा ने उस दिन गले से लगाकर सिर पर हाथ नहीं फेरा होता तो छोटी ईया की नींद की गोलियों के तीन पत्ते तो मेरे हाथ में आ ही गए थे। बाकी, जॉर्जेट का एक दुपट्टा भी सिरहाने रख लिया था। उस पापा ने मुझे ऐन मौके पर डूबने से बचा लिया, जिन्होंने मुझे कभी तैरना सिखाया ही नहीं।

पापा दूसरी बार पापा जैसे कब लगे, वो वाकया सुनाती हूं। मेरी विदाई के दिन मैं दहाड़ें मार-मारकर रोई थी (जी, विदाई में मेरा रोना एक किंवदंती बन चुका है)। ये ज़िन्दगी में दूसरी बार मैं पापा के गले लगकर रोई थी। बहुत रोई थी। जाने कौन सा गुबार था कि यूं निकला था। इतना ही रोई थी कि पापा और मुझे अलग करने में चार लोगों को लगना पड़ा था। गाड़ी घर के आंगन से निकल गई। भाई ने विदा होती बहन को पानी का आख़िरी घूंट पिला दिया, आख़िरी बार पैर पखार दिए। गाड़ी गली से निकलकर स्टेशन पहुंच गई और मैं ससुराल आने के लिए ट्रेन में बैठ गई। पापा स्टेशन छोड़ने नहीं आए थे। दोनों भाई साथ पूर्णियां आ रहे थे, इसलिए ट्रेन के निकलते-निकलते तक मैं सहज हो गई थी और शाम तक पूरी तरह सामान्य। अगली सुबह पापा का फोन आया था। हम अभी ट्रेन में ही थे, भागलपुर पहुंचे नहीं थे। नेटवर्क ठीक था नहीं इसलिए दो-एक बार की कोशिश में मुझे पापा की आवाज़ सुनाई पड़ी। पापा - मेरे पापा - मेरे स्ट्रॉन्ग और एक हद तक दुनिया से विरक्त होने का दावा करने वाले पापा बड़ी मुश्किल से इतना पूछ पाए थे कि तुम ठीक तो हो। उसके बाद फोन के दूसरी तरफ़ पापा की न थमने वाली सिसकियां थीं, और इधर मैं फ़ोन पकड़े  ट्रेन की सीट पर बैठी हैरान-परेशान। बाद में मम्मी ने फ़ोन करके बताया कि पापा मेरी विदाई के बाद लगातार रोते रहे - पूरा दिन, पूरी शाम, पूरी रात। खाना तक नहीं खाया।

तब से मेरी और पापा की दोस्ती हो गई है लेकिन पापा के साथ एक सार्थक बातचीत, एक सार्थक डायलॉग अभी भी कम ही होता है। हमारी बातचीत अक्सर एकालाप होती है - या तो मैं बोल रही होती हूं या पापा अपने मन की भड़ास निकाल रहे होते हैं। लेकिन मेरे बाल में तेल लगाना, सिरदर्द होने पर मेरी हथेली की नसों को दबाकर मेरा इलाज करना, मेरे कमरे में आकर एक कोना पकड़कर ख़ामोशी से अख़बार पढ़ना और मम्मी से हुई लड़ाई के बावजूद मुझे फ़ोन करके हमारी परवरिश में मम्मी के सारे त्याग-पुण्य गिनाना - हमने बाप-बेटी के अपने रिश्ते में ये मुक़ाम तो हासिल कर ही लिया है। अपने पति में मुझे पापा की पचहत्तर कमियां, उनासी गुण नज़र आने लगे हैं। मेरे हिसाब से पापा के लिए मेरे प्यार की ये इंतहा है। बाकी हैप्पी फ़ादर्स डे तो आता-जाता रहेगा कि अब तो आर्चीज़ और हॉलमार्क के कार्ड्स की तरह माया एंजेलो की कविताओं से भी मन उचटने लगा है।
मेरे पापा के साथ मेरी बेटी, और एक वो लम्हा जिससे रश्क होता है :)



     

Saturday, June 15, 2013

गर्मी छुट्टी डायरिज़ - हमसे दीवाने भी दुनिया की ख़बर रखते हैं

मेरी एक दोस्त ने सुबह-सुबह मुझे व्हॉट्सएप्प पर एक लिंक भेजा। यहां पूर्णियां में अंग्रेज़ी का अख़बार नहीं आता। इसलिए क्योंकि कोई पढ़नेवाला नहीं, और दूसरे दिन अख़बार पढ़ने का कोई मतलब नहीं है। मैं यूं भी अख़बार ख़बर के लिए कम, बीच के पन्नों और कॉलमों के लिए अधिक पढ़ती हूं। अख़बार है नहीं, तो आज सुबह इंडियन एक्सप्रेस में छपा एक दिलचस्प कॉलम पढ़ने से रह गई। आप भी पढ़िए इसे - लहर काला ने ओवरशेयरिंग द स्टोरी ऑफ़ मी के नाम से लिखा है इसे।

हां, हम सब आजकल अपने बारे में लिख रहे हैं, पोस्ट कर रहे हैं, बात कर रहे हैं। हां, ये भी सच है कि हममें से कुछ लोग इसलिए यहां हैं क्योंकि हम लगातार अपने बच्चों के बारे में, उनकी परवरिश के बारे में लिख रहे हैं। हां, ये भी सच है कि हमारे फ़ेसबुक अपडेट्स, हमारे ब्लॉग्स तक इसी एक पेरेन्टिंग के इर्द-गिर्द घूमा करते हैं। और अगर प्रिंट मीडिया हमारे विचारों को छाप रहा है तो इसलिए नहीं क्योंकि पेरेन्टिंग अचानक 'द इन थिंग' हो गया, बल्कि इसलिए क्योंकि 'मदरहुड' या 'पेरेन्टिंग' को कभी तवज्जो दी नहीं गई, कभी इस बारे में बात भी नहीं की गई।

मैं आमतौर पर किसी पोस्ट या किसी कॉलम पर तीखी प्रतिक्रिया ज़ाहिर नहीं करती। मैं हर लिहाज़ से सबकी आवाज़ों के होने और सबकी अभिव्यक्ति के तरीकों की इज्ज़त करने में यकीन करती हूं। हम सबको अपनी-अपनी बात पब्लिक स्पेस में आकर रखने का हक़ है, और एक पाठक को उस विचार से इत्तिफ़ाक़ रखने या उसे सिरे से ख़ारिज़ कर देने का हक़ है।

मैं इस कॉलम को पढ़कर इसलिए परेशान हुई क्योंकि लेखिका ने उन सभी लिखने वालों की धज्जियां उड़ाई हैं जो मां हैं, या मदरहुड पर, ज़िन्दगी के, समाज के छोटे-बड़े मसलों पर अपनी राय लिख रही हैं, अपने विचार पेश कर रही हैं। मेरा सवाल इतना-सा है कि जर्नलिज़्म सिर्फ़ फ्रंटलाईन वॉर अनुभव के बारे में लिखना, सिर्फ़ राजनैतिक उठापटक की बेमानी ख़बरें परोसना और सिर्फ़ विदेश मामलों और स्पॉट फिक्सिंग पर अपनी 'ओरिजनल' राय रखना होता है?

चलिए समाज की बेसिक संरचना पर एक नज़र डालते हैं जिसे समझने के लिए न आपको समाजशास्त्री होने की ज़रूरत है न  'जर्नलिस्ट' या लेखक ही। दुनिया कैसे बनती है? कई देशों से। देश कैसे बने? कई तरह के समाजों से। समाज की धुरी क्या? परिवार। और परिवार की नींव कहां पर? हममें-आपमें। इसी मूलभूत संरचना के तहत अगर हम-आप अपने परिवार को बनाने-बचाए रखने, ख़ुश रखने, उनकी परवरिश करने और देखभाल करने में कोताही करेंगे तो फिर किस तरह के समाज का निर्माण करेंगे हम? हमने अपने बच्चों को एक ख़ुशमिज़ाज, आत्मविश्वासी, ईमानदार इंसान नहीं बनाया तो देश को क्या दिया? और अपना काम करते हुए हमने उस प्रक्रिया के बारे में पब्लिक स्पेस में आकर अपने अनुभव बांटे, अपनी चुनौतियों पर चर्चा की, पेरेन्टिंग के तरीकों की बात की, बच्चों के बारे में बताया तो इसे आत्म-श्लाघा का नाम दे दिया गया?

पब्लिक स्पेस में आकर अपनी ज़िन्दगियों के बारे में बात करने का मकसद सहानुभूति जुटाना कतई नहीं होता। यहां आकर अपने बारे में बात करने का मकसद उन गलत-सही सीखों को बांटना होता है जो ज़िन्दगी जीते हुए हमारे रास्ते में पड़ते हैं। ये छोटे-छोटे लम्हे विदेशी नीतियां तय नहीं करेंगे, लेकिन ये छोटे-छोटे लम्हे उस समाज के प्रतिरूप को रिकॉर्ड करने का, उन्हें डॉक्युमेंट करने का काम उतनी ही ईमानदारी से करेंगे जितनी ईमानदारी से एक मशहूर पत्रकार की किताब करती है।

हम लम्हों में जीने वाले लोग हैं। हम हर दिन कुछ नया देखने का जज्बा देखने वाले लोग हैं। हम बुद्धिजीवी या ज़हीन होने का दावा नहीं करते। हम तो वो औरतें, वो मांएं हैं जिनमें साधारण को, ऑर्डिनरी को ख़ास बना देने का हुनर है। हमने जो अपने नज़रिए से देखा, वो बांटा। हमारी रसोई, हमारा घर, हमारे बच्चे, हमारी दुनिया बेशक बेहद निजी हैं - लेकिन इस निजता में जो सार्वभौमिक हो सकता है, हम वो बांटने आते हैं। और यदि किसी को ये लगता है कि खलबली ही ग्रेट राइटिंग हो सकती है, ठहराव नहीं, तो फिर... आई रेस्ट माई केस योर ऑनर।

मगर जाते-जाते जांनिसार अख़्तर का ये शेर पढ़ते जाएं...

हम से इस दरजा तग़ाफुल भी न बरतो साहब
हम भी कुछ अपनी दुआओं में असर रखते हैं



Friday, June 14, 2013

गर्मी छुट्टी डायरिज़ - ऐनक लगाकर पढ़ना ये चिट्ठियां (१)

कैसे कहूं कि इन दिनों कुछ लिखने को जी नहीं चाहता। कुछ है ही नहीं बताने को। ऐसी स्थिति आमतौर पर तब आती है जबकि अंदर कुछ गुबार भरा हो और निकलने का रास्ता न जानता हो। या फिर तब कि जब बहुत सुकून हो - इतना कि सुख-दुख, पाप-पुण्य, अच्छा-बुरा, सही-ग़लत, कुछ भी मायने न रखता हो। कोई भी बात तकलीफ़ न पहुंचाती हो, कोई भी ख़ुशी उतावली न करती हो। मन कमल का चिकना पत्ता हो गया है। कुछ ठहरता ही नहीं यहां...

क्या बांटूं फिर? क्या लिखूं चिट्ठी में? बस ये समझ लो कि सब कुशल-मंगल है और तुम्हारे लिए भी मंगलकामना है। मन के व्याकुल होने का इंतज़ार करती हूं, कि फिर लिखने को कोई बात होगी तब शायद...

फिलहाल बसंत पर लिखी गुरुदेव की कविता का एक अनुवाद पढ़ो जो अपनी खिड़की पर बैठकर जेठ की बिदाई और आषाढ़ की आमद के इंतज़ार में लटके पके हुए आमों को गिनते हुए एक दोपहर किया था मैंने। दो धृष्टता एक साथ - पहले तो कविता के अनुवाद की धृष्टता और दूसरी, मूल कविता से लेते हुए भी बसंत का लिंग बदल देने की। (बसंत प्रियतम ही तो है, जिसका इंतज़ार कभी शेष नहीं होता)

कविता का नाम याद नहीं, इंटरनेट से निकाला था कभी। इच्छा हो तो तुम भी कभी नाम निकाल लेना।   

इठलाता हुआ आया बसंत
अपनी शोभा-यात्रा के कोलाहल के साथ 
और, 
भर गया मेरा आंगन फूलों और कहकहों से 
वन में निकल आए नए पत्ते
चूमकर आसमान को उसने कर दिया था गहरा लाल। 


चुपचाप मिलने आया मुझसे 
कोई दूसरा वसंत 
बैठ गया मेरे कमरे के एक कोने में 
विचारमग्न। 

अनंत आकाश का किया मुआयना, बसंत ने 
उसकी निगाहें पहुंचीं ठीक वहीं जहां 
हरितिमा धुंधली होकर गुम हो जाती है नील रंग में 
और वसंत की गहरी, हैरान एकटक नज़र के आगे
हो जाती है एकरंग। 

Spring came in happy ruckus
With her clamorous cortege
Whereby,
Filling my yard with laughter and flowers
The forest with new leaves,
Painting deep scarlet kisses across the sky.

Quietly paid me a visit today
A very different spring.
Sat in the corner of my room
Pondering.

Surveyed the endless sky, spring did
Her gaze fixed to that spot, where
All the green faints and fades into blue
Becoming one under her deep, curious stare.

Sunday, June 9, 2013

गर्मी छुट्टी डायरिज़ - अब तेरे बिन जी लेंगे हम

२६ मई को ही तो आख़िरी पोस्ट लिखी थी - कुल तेरह दिन पहले। तेरह दिन बहुत नहीं होते। फिर ऐसा क्यों लग रहा है कि कई दिनों से कुछ लिखा नहीं, कुछ कहा नहीं, कुछ सुना नहीं। तेरह दिन बहुत नहीं होते लेकिन तेरह दिन बहुत होते हैं, तब कि जब वो तेरह दिन किसी मातमपुर्सी की मानिंद इंटरनेट से दूर बिताए हों। मैं ख़ुद को कम्पलसिव शेयरर मानती हूं। कई बातें बांटना चाहती हूं कि लगता है, एक दिन और निकल जाएगा। लगता है कि जिए हुए लम्हों को कहीं समेटकर रखा नहीं, कहीं रिकॉर्ड नहीं किया तो फिर ये लम्हे दिमाग के किसी ऐसे अंधेरे खोह में जा घुसेंगे जहां ये निकालकर इन्हों यादों की शक्ल देना मुश्किल हो जाएगा।

शायद इसलिए हम पहले डायरियां, चिट्टियां लिखा करते थे। शायद इसलिए हम अब पोस्ट्स, चिट्ठे लिखा करते हैं।

मैं तीस मई की रात बच्चों को साथ पटना पहुंची हूं। बच्चों के साथ अकेले सफ़र करते देखकर मेरे आस-पास के कई लोग अक्सर हैरान होते हैं। उन्हें नहीं मालूम की चार साल की कम उम्र से भी पहले से मैं उन्हें लेकर अकेले सफ़र करती रही हूं। इस तरह मेरे हिस्से में ख़ूब सारी सहानूभूति आती है। इस तरह मुझे ख़ुद को बांधने का, अपने सब्र की इंतहा देखते रहने का मौका मिलता रहता है। हर सफ़र मुझे और शांत और धैर्यशील बना देता है। उनके साथ हर सफ़र के बाद लगता है, मैंने ये कर लिया तो कुछ भी कर लूंगी। दो बेचैन बच्चों की उछल-कूद, नीचे की बर्थ से ऊपर और ऊपर से नीचे कूदते रहने से परेशान सहयात्रियों के चेहरे की शिकन, हर आइसक्रीम, हर चिप्स के पैकेट की ज़िद और फिर इस बीच टॉयलेट के कई चक्कर - सुनने में आसान लगता है, लेकिन सेल्फ-ट्रेनिंग की किसी मुश्किल एक्टिविटी से कम नहीं, क्योंकि इस बीच आपको अपनी धीर-गंभीर छवि बनाए रखने है। आप मां है इसलिए चीख नहीं सकतीं, कान उमेठकर सबके सामने शरारत की सभी सीमाएं तोड़ते बच्चों को दो थप्पड़ नहीं लगा सकतीं। आपको प्यार से काम लेना है और भरी ट्रेन में आपके प्यार की भी ये इंतहा है।

पापा आए हैं लेने, पटना। ट्रेन रात के दो बजे की बजाए डेढ़ बजे ही पहुंच जाती है। अच्छा है कि पापा को स्टेशन वक्त से कम-से-कम एक घंटा पहले आकर बैठे रहने की बुरी आदत है। रिकॉर्ड है कि पापा कहीं कभी वक्त पर नहीं पहुंचते। शाम पांच बजे आऊंगा का मतलब कल शाम पांच बजे भी हो सकता है। मैं देर करता नहीं, देर हो जाती है - हम छोटे थे तो हिना का ये नया-नया रिलीज़ हुआ गीत पापा का फ़ेवरिट हुआ करता था। कभी किसी दुर्लभ दिन अपने ओढ़े हुए संजीदा रूप से निकलकर अपनी असल छवि में आते थे तो पापा यही गाते थे - मेरे जागने से पहले हाय रे मेरी किस्मत सो जाती है....

हमारे साथ होने के लिए पूरा चांद ट्रेन की खिड़की से उचककर गाड़ी की खिड़की पर लटक गया है। पापा ने रात के दो बजे ही सिवान के लिए निकल जाने का फ़ैसला किया है। मुझे भी कोई आपत्ति नहीं। मैं गाड़ी से किसी भी वक्त कहीं भी कितने भी लंबे सफ़र पर जाने के लिए तैयार हो जाती हूं। बच्चे पीछे की सीट पर यूं भी लंबे होकर सो जाएंगे।

शर्मा जी पापा के ड्राईवर हैं। धोती-कुर्ता में चलाते हैं गाड़ी, जबसे उन्हें देख रही हूं तबसे। शर्मा जी की यही पहचान है - उनका लिबास और उनकी सफ़ेद मूंछें। उनकी एक और पहचान भी है। आप आंख मूंदकर भी गाड़ी में बैठें तो बता सकते हैं कि गाड़ी वही चला रहे हैं। स्पीड चालीस से ऊपर जाती नहीं, चाहे हाईवे हो या बाईलेन। तीसरे गियर से चौथे-पांचवे में गाड़ी डालना शर्मा जी अपनी शान के ख़िलाफ़ समझते हैं, चाहे आप एसयूवी में हों या पिकअप वैन में। लेकिन एक शर्मा जी ही हैं जो पापा की रेयरसीट ड्राईविंग के साथ गाड़ी चला सकते हैं।

मुझे किसी भी लंबे सफ़र पर जाते हुए बाबा की बेतरह याद आती है। बाबा हमें अपने किस्म का संगीत बजाने-सुनने की इजाज़त देते थे। उनकी गाड़ी हवा से बातें करती थी। उनके साथ मेरी मर्ज़ी चलती थी। पापा के साथ कभी नहीं चली। मैंने ज़िन्दगी भर बाबा को ख़ुश करने की कोई कोशिश नहीं की। मैं ज़िन्दगी भर पापा का समर्थन जीतने की, उन्हें ख़ुश रखने की जद्दोज़ेहद में लगी रही हूं। फिर भी हमारे बीच ख़ामोशी की दोस्ती ही अच्छी होती है। या फिर महाराजगंज सीट के उपचुनाव की बात करते हुए हम सहज हो सकते हैं। किसी शाही जी, किसी प्रभुनाथ सिंह से मेरा कोई वास्ता नहीं। पापा की ख़ुशी के लिए मैं बड़ी देर तक गोरया कोठी, एकमा, मांझी, बनियापुर, तरैया के जातीय समीकरण और प्री-वोटिंग रूझान के बारे में सुनती रहती हूं। पापा शाही जी के लिए प्रचार कर रहे हैं। ये समझना कोई रॉकेट साइंस नहीं कि शाही जी के जीतने की उम्मीद न के बराबर है - नीतिश और प्रशासन चाहे जितना ज़ोर लगा ले तब भी, सिवान-महाराजगंज के हिस्से चुनाव प्रचार के दिनों में चाहे जितनी बिजली आ जाए तब भी। ये प्रभुनाथ सिंह की मांद है। प्रभुनाथ सिंह यहां के चप्पे-चप्पे से वाक़िफ़ हैं। शाही जी इस क्षेत्र में हेलीकॉप्टर से उतारे गए हैं। ज़मीन पर आकर बहुत दोस्त, हितैषी और समर्थक बनाए हों, ऐसा लगता नहीं। मैं तो पापा को भी ज़मीन का आदमी नहीं मानती। पापा को मैं वॉनाबी ईलीट मानती हूं, लेकिन उनसे कहती नहीं। कहा न, हमारे बीच शब्दों का रिश्ता बने तो हम दोनों हार जाएंगे। इसलिए हमपर हमारी ख़ामोशी का रिश्ता हमेशा तारी रहता है।

मैं पापा को म्यूज़िक सिस्टम चलाने के लिए कहना चाहती हूं। कहती नहीं। बाबा होते तो कहना भी नहीं पड़ता, मेरे दिमाग में ये पहला ख़्याल आता है। सच है कि मैं पापा को हमेशा बाबा की, उन्हीं के पापा की कसौटी पर कसती रहती हूं। पापा और बाबा के बीच उम्र का फ़ासला बहुत कम था। पापा बाबा से महज़ अठारह साल छोटे थे। मैं पापा की बड़ी बेटी - अपने आप बाबा की सबसे छोटी और सबसे दुलारी संतान बन गई। मैं बाबा की पोती नहीं, वो बेटी थी जो उन्हें नसीब नहीं हुई। मुझपर बाबा ने वो प्यार बरसाया जिसका भागीदार वो अपने तीन बेटों को कभी नहीं बना सके थे। मैं आजतक समझ नहीं पाई कि सिबलिंग राईवलरी बाबा या पापा में ज़्यादा थी या मुझमें और पापा मेँ। बहरहाल, हमें पूरी तरह बाप-बेटी बन जाने में कई साल लगे - तब जब मैं बड़ी हो गई। तब जब पापा भी कुछ बड़े हो गए।

पापा का हाथ अपने-आप म्युज़िक सिस्टम के नॉब पर चला गया है। इतनी रात गए पटना का रेडियोसिटी दरौली तक का हाईवे गुलज़ार कर रहा है। बाहर चांद ढलने से पहले पूरे शबाब पर है। चांद रूठा हुआ है, आसमान ने मनाने की कोशिश नहीं की। नई सुबह के आगमन के इंतज़ार में मसरूफ़ रूई-से बादलों को अपने श्रृंगार की फ़िक्र है। जाती हुई रात को विदा कहने का वक़्त किसी के पास नहीं। शर्मा जी अपनी स्पीड से चले जा रहे हैं।

शर्मा जी नहीं बदले। पापा नहीं बदले। ये सड़क नहीं बदली। गांव नहीं बदले। टोटल सैनिटेशन कैंपेन के नाम पर हज़ारों करोड़ रुपए फूंक देने के बाद भी पौ फटने से पहले सीधे आंचल में लिपटी खेत की ओर जाती हुई औरतों की किस्मत नहीं बदली। प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क निर्माण योजना के तहत बनी सड़क के ठीक बीचोबीच लापरवाही से पेडल मारते साइकिल सवार नहीं बदले। ट्रैक्टर खरीदने के लिए इंटरेस्ट फ्री लोन मिलने के बावजूद दो बैलों का जोड़ा हांकते धान का बीया (बीज) डालने से पहले की जुताई के लिए लड़खड़ाते हुए भोर होने से पहले खेत की ओर निकले किसान का जज्बां नहीं बदला। कई यात्राओं के बीच सब्र की प्रैक्टिस करते-करते भी मैं नहीं बदली। फिर एफ़एम पर गाते कुमार शानू की आवाज़ को सुनते हुए भात खाते हुए दांतों के बीच कंकड़ के चले आने का अहसास कैसे बदल जाता?

हम वही पुराने लोग अपने कई वजूदों के बीच के एक उसी पुराने सफ़र, एक उसी पुराने शहर की ओर चले जा रहे हैं और कुमार शानू रोए जा रहे हैं - अब तेरे बिन जी लेंगे हम, ज़हर ज़िन्दगी का पी लेंगे हम...