Monday, October 29, 2012

मां ना होती तो मैं क्या होती?

मम्मा, भूलना मत कि आज बॉम्बे जाना है आपको।

स्कूल जाने से पहले आदित की इत्ती-सी बात पर चेहरे पर एक बड़ी-सी मुस्कुराहट आ गई है। हम सिर्फ अपने बच्चों से ही उम्मीदें पाले नहीं रखते। हमारे बच्चों को भी हमसे बड़ी-बडी़ उम्मीदें होती हैं। इन्हीं उम्मीदों के वास्ते आदित अपनी मां से दो रातों की जुदाई बर्दाश्त करने को तैयार हो गया है, बावजूद इसके कि उसे मां की उंगलियों को अपनी उंगलियों में फंसाए बग़ैर नींद नहीं आती।

इतनी सारी ज़िन्दगी जी लेने के बावजूद मैं ठीक-ठीक नहीं कह सकती कि मुझे ज़िन्दगी से आख़िर चाहिए क्या? दौलत, शोहरत, ताक़त या सिर्फ हिम्मत? या इनमें से कुछ भी नहीं और बेइंतहा मोहब्बत? या थोड़ा-थोड़ा सबकुछ?

मैं नहीं जानती मुझे क्या चाहिए। आदित और आद्या जानते हैं, उनकी मां को क्या चाहिए।

तेरह या चौदह साल की थी जब इंग्लिश टीचर ने एक लेख लिखने को दिया - व्हाट वुड आई लाईक टू बी वेन आई ग्रो अप। बड़ी होकर मैं क्या बनना चाहूंगी?

मैंने बड़े मन से साढ़े तीन सौ-चार सौ शब्दों में लिखा था - आई वुड वॉन्ट टू बी ए मदर।

मैं जानती थी कि मैं बच्चों को पैदा करने और उनको पालने का सुख तो चाहती ही थी। ऐसा क्यों था, इस बारे में कभी सोचा नहीं। बच्चों से इतना ही प्यार था तो मैं किसी किंडरगार्डन में टीचर भी तो हो सकती थी।

लेकिन अपनी मां को देखकर लगता था कि मुझे भी मां बनना है। अपनी मां जैसी, ये ठीक-ठीक नहीं बता सकती। या बताना नहीं चाहती, क्योंकि एक पीढ़ी के फ़ासले के बीच हम कई मायने में अलग-अलग हैं, कई मायनों में एक जैसे होते हुए भी।

हम एक संयुक्त परिवार में पले-बढे, जहां मेरी मां का दिन सुबह चार बजे शुरू हो जाता था। घर में मर्दों का ऐसा आधिपत्य था कि अब सोचती हूं तो सिहर जाती हूं। आख़िर ये औरतें इतना बर्दाश्त कैसे करती थीं? पुरुषों की इतनी ज़्यादती के बीच मेरी मां हम तीन भाई-बहन में ही अपने सुख तलाशती रहती थी। उसकी सुबह हमारे लिए होती थी, उसकी थकन में आराम के सिलसिले भी हम ही से आते थे। जिस परिवार में प्यार से बात करने, एक-दूसरे को गले लगाने, हाथ थामने, प्यार जताने, इज़्जत देने का चलन नहीं था वहां उस भीड़ में मेरी मां ने गोद में सिर रखना सिखाया, एक-दूसरे के बालों में तेल लगाना, एक-दूसरे के साथ गुनगुनाना, एक-दूसरे की पीठ पर हाथ रखकर मुस्कुराना और बिंदास एक-दूसरे को गले लगाना सिखाया। मां उस परिवार में रहते हुए भी खुलकर अपने प्यार का इज़हार करती थीं, जहां अपने बच्चों को गोद में लेना शान का विरूद्ध समझा जाता था। उसी का नतीजा है कि इतने बड़े हो जाने के बावजूद हम भाई-बहन एक-दूसरे को गले लगाने से बिल्कुल नहीं कतराते। हमारी संस्कृति में इसे उचित नहीं माना जाता, फिर भी।

मां ने अपने बेटों को बिस्तर लगाना, मच्छरदानी खोलना और घर की औरतों के दुख-सुख समझना सिखाया। उन्होंने कुछ कहा हो, ऐसा याद नहीं। हम कई बातें उन्हें देखकर समझ जाते थे। भाई के घर से लौटी हूं अभी-अभी, और इस बात का गुमान है कि उसमें मां की संवेदनशीलता और सहनशक्ति है। मां ने और कुछ सिखाया या नहीं, ज़िन्दगी को लेकर उदार बनना ज़रूर सिखाया।

जो मां ने सिखाया और जो मां ने नहीं सिखाया, वही अपनी बच्चों को सिखाना चाहती थी मैं। मैं अपनी ज़िन्दगी अपने बच्चों से बांटना चाहती थी, ऐसे कि जैसे किसी और का हक़ ना हो। मैं उनके साथ दुनिया को नई नज़र से देखना चाहती थी। इसलिए, मैं मां की तरह ना होते हुए भी मां की तरह की मां बनना चाहती थी।

मैं ये सही-सही जानती थी कि मुझे ज़िम्मेदारियां उठानी हैं और उन ज़िम्मेदारियों को बच्चे मुक़म्मल बनाते हैं। अपनी ज़िन्दगी का एक बड़ा हिस्सा अपने शरीर के हिस्से के नाम यूं कर देना कि उनसे बंधे भी रहें और उनसे जुदा भी, इंसानियत की क़िताब का उपसंहार होता है। हम जब अपने बच्चों के साथ जीना सीख जाते हैं तो  बाहर की दुनिया से जूझ जाने का हुनर अपने-आप आ जाता है।

मैं कभी महत्वाकांक्षी नहीं थी। छोटे-छोटे ख़्वाब थे, और ये यकीन था कि उन्हें पूरा होते देखूंगी एक दिन। इन ख़्वाबों में इतनी ही आज़ादी थी कि किसी सेंकेंड हैंड गाड़ी की स्टीयरिंग व्हील पर बैठकर अपने तरीके से अपनी गाड़ी चला सकूं। इन ख़्वाबों में इतने ही पैसों का शौक़ था कि ट्रेन की टिकटें कराकर एक जगह से दूसरे जगह जा सकने की आज़ादी हो। मुझे कपड़ों, जूतों, गहनों का शौक़ नहीं। मैं अक्सर कहती हूं कि कमाती तो मैं दरअसल अपने लिए टिकटें खरीदने के लिए हूं, और उन टिकटों से किए जा सकने वाले सफ़र में अपनी खरीदी हुई किताबें पढ़ सकने के लिए।

इत्ती-सी ही है ख़्वाहिश। इत्ती-सी ही थी ख़्वाहिश ।

और उन ख़्वाहिशों को अचानक बच्चों ने पर दे दिया। उन्हें घर में रहनेवाली बेसलीका, बेतरतीब, बेढंगी मां रास नहीं आती। तीन साल की थी आद्या जब कहा था उसने, आप भी ऑफिस जाया करो मम्मा। हम नहीं रोएंगे आपके लिए।

मेरे बेसलीका काम का कितना हिस्सा समझ में आता है उन्हें, मैं नहीं जानती। लेकिन मेरे बच्चे अक्सर अजनबियों से बताते हैं, मेरी मम्मा राईटर है। कहानियां लिखती हैं।

राईटर? जाने राईटर होने का मतलब उन्हें क्या समझ में आता होगा? लेकिन मेरे लिए उनकी आवाज़ का फ़ख़्र मेरा सबसे बड़ा ईनाम है।

मेरे बच्चे जानते हैं कि उनकी मां और दूसरी मांओं से अलग है। इसलिए उन्होंने अपनी मां को अपने तरीके से स्पेस दिया है। मैं बच्चों को अपने साथ क्लायंट मीटिंग्स में ले गई हूं। ऐसा भी हुआ है कि एक बच्चे को सोफे पर सुलाकर दूसरे को गोद में लिए मैंने डॉक्युमेंट्री फिल्मों पर चर्चा की है। अपनी मजबूरी में उन्हें अपने काम का हिस्सा बना लेना और अपनी पर्सनल और प्रोफेशनल ज़िन्दगी में मची गड्डमड्ड का जो असर उनपर दिखाई दे रहा है, वो दिल को बहुत सुकून पहुंचाता है।

बच्चों ने सिखाया है मुझे कि नामुमकिन कुछ भी नहीं होता, और अगर आप मां हैं तब तो कुछ भी नहीं। मां बनते ही पांच गेंदों को एक साथ उछालकर उन्हें संतुलित करते हुए ज़िन्दगी के सर्कस में बने रहने की बाज़ीगरी अपने आप आ जाती है।

इसका ये मतलब कतई नहीं कि ये जगलिंग आसान होती होगी। कई-कई बार मुंह के बल गिरने-संभलने-चोट खाने के बाद आता है ये हुनर। मां से मां बनना सीखने के बाद अब अपने बच्चों से मां बनना सीख रही हूं। मेरी मां ने मुझे सोचने-समझने-जूझने-बर्दाश्त करने की शक्ति दी। मेरे बच्चों ने मुझे अभिव्यक्ति की ताक़त दी। मेरी मां ने मुझे दूसरों के लिए जीना सिखाया। मेरे बच्चे उनकी ख़ुशी के लिए ख़ुद को बचाए रखना सीखा रहे हैं। मेरी मां ने मुझे बांटना-देना-उदार होना सिखाया। मेरे बच्चों ने मुझे सहेजना-समेटना सिखाया है। मेरी मां ने मुझे जो पंख दिए उन्हें मेरे बच्चे परवाज़ देने में लगे हैं।

मां ना होती तो मैं क्या होती?

मैं मां ना होती तो क्या होती?











Thursday, October 25, 2012

बेंगलुरू डायरिज़ 3: कहीं अह्ले दिल का ठिकाना भी है?

२००२ में इस शहर में आई तो बस जाने के इरादे से। 

हम जाने किन चीज़ों का पीछा कर रहे होते हैं, पता ही नहीं चलता। किस्मत अच्छी रही तो हाथ में ज़िन्दगी का दामन आ जाता है, और किस्मत ख़राब रही तो हर चीज़ मरीचिका बन जाया करती है। वरना हम कहां बदलते हैं? भरोसा और उम्मीद, इन दो ईंटों पर दिल का ठिकाना खड़ा कर दिया जाता है तो वो हर बार उसी सलीके और शिद्दत से किया जाता है जितनी बार वक्त की आंधी एक पुराने को ठिकाने को गिराकर सब तहस-नहस कर जाती है।

तो बस, उम्मीद की डोर ही थी कि कभी ऑटो में, कभी भाई के साथ मोटरसाइकिल पर, कभी एक दोस्त के साथ घूम-घूमकर नौकरी की लिए अर्ज़ियां डाल दी थीं बैंगलोर में। 

मैं इस शहर में क्यों बसना चाहती थी? 

मैं किसी भी शहर में क्यों बसना चाहती हूं? 

एक अदद-सा घर है यहां अब। जो भाई कॉलेज में दाख़िला लेकर यहां पढ़ने आया, जिसका घर बैचपर पैड हुआ करता था, उसका घर है ये। नौवीं मंज़िल पर ड्राईंग रूम की बालकनी से आउटर रिंग रोड नज़र आता है, और उसके परे दूर-दूर तक पसरा शहर। शहर में शोर और ट्रैफिक इतना है कि इतनी ऊपर तक भी गाडियों का शोर, गुज़रते हुए एंबुलेंस का सायरन और ट्रकों के भोंपू सुनाई देते हैं। ऑटोवाले और चोर हो गए हैं और इंदिरानगर से आने-जाने के लिए कम से कम तीन सौ रुपए खर्च करने होते हैं। कमर्शियल स्ट्रीट जाने में हौसला पस्त हो जाता है। 

ये शहर दस साल पहले भी ऐसा ही था, इतने ही शोर-शराबे से भरा हुआ, इतनी ही तेज़ी से पसरता हुआ, इतने ही ट्रैफिक में फंसा हुआ... फिर मैं यहां क्यों बसना चाहती थी?

इस रेसिडेंशियल कॉम्पलेक्स में हज़ारों ऐसे अपार्टमेंट्स होंगे जहां ज़िन्दगी एक ही पैटर्न पर, एक ही ढर्रे पर चलती होगी। कामवाली सुबह आकर घंटी बजाती होगी तो उनींदी हालत में यंग कपल में से एक दरवाज़ा खोलता होगा, अख़बार के पन्नों के साथ चाय-कॉफी की प्याले बांट लिए जाते होंगे, कुक लंच और ब्रेकफास्ट बना दिया करता होगा, फिर दौडते-भागते हुए ऑफिस पहुंचने की जद्दोज़ेहद होती होगी। दिनभर घर बंद हुआ करते होंगे, या फिर इक्का-दुक्का घरों में बच्चों की देखभाल के लिए कामवालियां हुआ करती होंगी, या फिर किसी की सासू मां या मां बच्चों की परवरिश में हाथ बंटाने के लिए सुदूर किसी दूसरे शहर से आई होंगी। शाम होती होगी तो थके-हारे दंपत्ति घर लौटते होंगे। फिर काम भी बंटा होगा शायद - बिस्तर लगाने का, वॉशिंग मशीन चलाने का, कपड़े पसारने और समेटने का, बर्तन समेटकर सिंक में डालने का, बायोडिग्रेडेल कचरे और नॉन-बायोडिग्रेडेबल कचरे को अलग-अलग रखने का (बेंगलुरू में कचरा सेग्रीगेट करना एक नियम है)... फिर ऐसे ही कुकिंग, बेकिंग, क्लीनिंग, वॉशिंग करते हुए वीकेंड आ जाया करता होगा, फिर थोड़ी और कुकिंग, बेकिंग, क्लीनिंग और वॉशिंग। फिर मेड से थोड़ी और झक्क-झक्क। 

ये तो किसी भी शहर की कहानी होती। फिर मैं यहां क्यों बस जाना चाहती थी?

इस शहर में भी हर शहर की तरह ऐसे पावर-सेन्टर्स बना दिए गए हैं जहां पैसे खर्च करके पावरफुल होने का सुख महसूस किया जा सकता है - बनाना रिपब्लिक में एल्फैंज़ो मैंगो पीपल हो जाने का सुख। हर आधे किलोमीटर पर जगमगाते मॉल्स हैं, सब्ज़ियां और फल सुपरमार्केंट्स में मिलते हैं और पानी तक हर रोज़ खरीद कर पीया जाता है। छोटे-छोटे शहरों से अच्छी नौकरी का ख़्वाब लिए हर रोज़ हज़ारों इंजीनियर, एमबीए और सॉफ्टवेयर प्रोफेशनल यहां आते हैं और यहीं बस जाते हैं। बैंगलोर दक्षिण भारतीय कम, रेस्ट ऑफ द इंडिया अधिक हो गया है। नतीजा ये है कि दक्षिण भारतीय खाना ढूंढने के लिए ख़ासी मशक्कत करनी पड़ती है और तंदूरी रेस्टुरेंट्स की भरमार हो गई है।  

बैंगलोर में ज़िन्दगी दिल्ली, गुड़गांव, नोएडा. मुंबई से कहां अलग है? फिर मैं यहां क्यों बस जाना चाहती थी? 

हम किसी शहर में शहर के लिए नहीं, उससे भी बड़ी किसी वजह के लिए ठिकाना बना लेना चाहते हैं। कभी नौकरी वजह होती है, कभी पढ़ाई। कभी प्यार वजह होता है, कभी शादी। मैं दस साल पहले इस शहर में बस जाना चाहती थी क्योंकि दिल्ली से उकता गई थी। उससे ज़्यादा बड़ी वजह एक ये यकीन था कि मुझे भी ज़िन्दगी एक ढर्ऱे पर ही चाहिए - जहां मियां-बीवी काम पर जाते हों, किसी एयरकंडिशन्ड दफ़्तर पर कंप्यूटर या लैपटॉप के कीपैड से उलझने के बाद घर लौटकर आते हों तो उलझे हुए ज़िन्दगी के मसलों पर ज़्यादा दिमाग नहीं लगाते हों, जहां शादी तेईस-चौबीस साल में हो जाती हो और शादी के तीन साल बाद पहला बच्चा होता हो, फिर उसके तीन साल बाद दूसरा। जहां करियर कंपार्टमेंट्स में डिफाइन्ड हो - पहले तीन साल में इतने लाख का पैकेज, उसके बाद के तीन साल में कम-से-कम इतने का, उसके बाद के तीन साल में मार्केट करेक्शन और एक जंप और फिर पैंतीस की उम्र में कम-से-कम वाइसप्रेसिडेंट की पोस्ट। घर खरीदने और गाड़ियों के आकार बदलने की प्लानिंग भी उसी में कहीं फिट कर दी जाती।

लेकिन एक दिन मैंने यू-टर्न ले लिया और अपने लिए एक मुश्किल ज़िन्दगी चुन ली - ऐसी ज़िन्दगी जहां कोई ग्राफ दिखाई नहीं देता था, जहां अगले मोड़ के बाद किस रास्ते पर पहुंचते, इसका तक गुमान नहीं था। शादी एक ऐसे इंसान से कर ली, जिसके अपने ठिकाने का कोई ठिकाना नहीं, जो एक जगह होते हुए भी कई जगह है, और जो कई जगहों पर होते हुए भी एक जगह का होना चाहता है। पैरों में पहियों के होने का मतलब घूमते रहना नहीं है, पैरों में पहियों के होने का मतलब पूरी तरह किसी एक शहर के ना हो सकने का मलाल है। 

मैं बैंगलोर की नहीं हो सकती थी। मैं रांची, सीवान, पूर्णियां, पटना, कोलकाता, दिल्ली, मुंबई की भी नहीं हुई। मैं सिलीगुड़ी की होना नहीं चाहती। इस अह्ले दिल का ठिकाना नहीं है, इसलिए फ़ितरत, किस्मत, चाहत, सोहबत से ये घुमन्तू है। 

Tuesday, October 23, 2012

बेंगलुरू डायरिज़ 2: इत्तिफ़ाक़ ऐसा और उसका बयां

एक ऐसे ही ट्रेन वाले सफ़र पर मिली थी वो मुझे।

नौकरी अभी-अभी शुरू ही की थी मैंने, और इतने पैसे नहीं होते थे कि एसी की टिकटें कराई जा सकीं। घर जाने का बहाना ढूंढती रहती थी, और याद नहीं कि उस बार कौन-सा बहाना था। कोई त्यौहार नहीं था, कोई छुट्टी भी नहीं थी, कोई शादी-ब्याह नहीं था घर में। फिर भी घर जा रही थी। ऑफ़िस से सीधे पुरानी दिल्ली स्टेशन स्वर्ण जयंती एक्सप्रेस पकड़ने चली गई थी, तब भी जब पेट में ऐसा दर्द था कि सीधे खड़े होना मुश्किल। लेकिन लगता था, घर पहुंचते ही सब तकलीफ़ों के हल निकल आएंगे।

मेरी सीट नीचे की थी, और मेरे सामने वाली सीट पर दो लड़कियां थीं, और उनके साथ एक लड़का। कौन थे, कहां जा रहे थे, सोचने-समझने की ताक़त नहीं थी। मैं बोगी में घुसते ही सीट पर पसर गई थी। ट्रेन चलने के वक़्त सिर्फ़ एक लड़की रह गई थी सामने। बाकी दो लोग ढेर सारी हिदायतों के साथ उतर गए थे।

ट्रेन चल दी। मैं फिर भी अपनी सीट से नहीं उठी। याद भी नहीं कि ट्रेन में भीड़ थी या नहीं, या उस कंपार्टमेंट में हम दो लड़कियों के अलावा कोई और भी था। ये भी याद नहीं कि टीटीई टिकट देखने आया था या नहीं। ये भी याद नहीं कि वैसे पेट के बल लेटे हुए जाने कितना वक्‍त गुज़ारा था मैंने।

ये याद है कि वो लड़की मेरे पास आई थी और मेरी पीठ पर हाथ रखकर कहा था, आर यू ओके?

उसका अपनापन-भरा स्पर्श था या देर से दर्द बर्दाश्त करते रहने की तकलीफ़, मैं सिसकियां लेकर रोने लगी थी। उसने मुझे सीट पर उठाकर बिठाया था, मुझे पानी पिलाया था, मैकडॉनल्ड्स के पैक किए हुए डिनर में से कुछ खिलाया था और कोई दवा निकालकर दी थी मुझे। फिर क्या हुआ, याद नहीं। मैं सो गई थी शायद।

सुबह उठते ही एक मुस्कुराती हुई शक्ल नज़र आई थी। फीलिंग बेटर? उसने पूछा तो ध्यान आया, मैं वाकई बहुत बेहतर महसूस कर रही थी।

थोड़ी देर में दिमाग पर से पिछली रात का धुंधलका छंटा और फिर धीरे-धीरे होश में आने लगी। तब देखा था मैंने कि सामने बैठी सत्रह-अठारह साल की इस लड़की की शक्ल बहुत ख़ूबसूरत थी। उसके सांवले चेहरे पर बहुत बड़ी काली, गहरी आंखें थीं और उसकी पलकें कमाल की घनी थीं। उसके होंठ के नीचे बाईं तरफ ठुड्डी से थोड़ा ऊपर एक तिल था। वो ख़ूब मुस्कुराती थी और अक्सर ऊंची आवाज़ में ही बात करती थी। उसके बाल लंबे थे, सीधे और रेशमी।

"मेरा नाम शुभशंसा है, शुभा। लेकिन घर में सब मुझे ऋतु बुलाते हैं। आप मुझे ऋतु बुला सकती हैं। हम डाल्टनगंज जा रहे हैं। आपको कहां जाना है?"

हमारी बातचीत वहीं से शुरू हो गई। फिर याद नहीं कि ट्रेन कितनी लेट थी। ये भी याद नहीं कि हमने बातें क्या-क्या कीं। लेकिन कुछ घंटों में हम दिल-विल, क्रश-वश की भी बातें कर रहे थे, ये याद है। लड़कियों के लिए एक-दूसरे से खुल जाने के लिए शराब की ज़रूरत नहीं पड़ती, वो हर वक़्त अपने नशे में होती हैं।

डाल्टनगंज उतरने से पहले ऋतु जाते हुए एक क़ागज़ पर अपना पता लिख गई थी। पटना वीमेन्स कॉलेज हॉस्टल का था। मैंने भी कोई पता लिख दिया था अपना, कटवारिया सराय का था या वसुंधरा एन्क्लेव का, ये याद नहीं।

ट्रेन में मिलनेवाले लोग दुबारा मिला करते हैं? सफ़र पूरा होने के साथ दोस्तियां ख़त्म हो जाती हैं।

लेकिन मेरी और ऋतु की दोस्ती ख़त्म नहीं हुई। मुझे याद नहीं कि पहली चिट्ठी किसने लिखी थी। लेकिन हम एक-दूसरे को गाहे-बगाहे चिट्ठियां लिख दिया करते थे। फिर किसी चिट्ठी में ही नई-नई बनाई गई ई-मेल आई़डी भी शेयर कर दिया था। ऋतु तब कॉलेज के तीसरे साल में थी।

फिर हमारा संपर्क नहीं रहा। मैं मुंबई चली गई और वो एक साल किसी फास्ट-फॉरवर्ड मोशन में चलती फिल्म की तरह गुज़रा। फिर मैं मुंबई से रांची आ गई, तेईस साल की उम्र में ही थक-हारकर... कुछ रिश्तों से थकी हुई, कुछ ख़ुद से, और कुछ अपनी पैदा की हुई उलझनों से। जिस दिन मुंबई में अपना सामान पैक कर रही थी, उसी दिन इंटरनेट कैफ़े ई-मेल चेक करने गई थी। एक ई-मेल शुभशंसा बख़्शी का था - ऋतु का। ऋतु नोएडा आ गई थी, यूपीएससी की तैयारी करने। उसने अपना पता और फोन नंबर लिखकर भेजा था। मैंने कोई जवाब नहीं दिया। कोई जवाब सूझा नहीं। कहां से शुरू करती बताना कि एक साल में पुल के नीचे से गुज़रती पहाड़ी नदी की ज़िन्दगी में कैसे-कैसे उफ़ान आ चुके थे।

फिर महीनों संवाद नहीं रहा। फिर एक दिन मैंने उसे ई-मेल किया था। मैं दिल्ली वापस आ रही थी, और नोएडा के पास ही रहनेवाली थी। ऋतु ने तुरंत जवाब भेजा था - कोई ज़रूरत हो तो मुझे बताना। मुझसे तीन साल छोटी लड़की मेरी इतनी फ़िक्र क्यों कर रही थी? मैं तो अब उसकी शक्ल भी भूल गई थी शायद। हम डेढ़ साल पहले मिले थे, और ट्रेन में मिले एक सहयात्री को भूल जाने के लिए डेढ़ दिन का वक्त काफ़ी होता है।

मुझे वाकई ऋतु की ज़रूरत पड़ी थी। मेरे पास नौकरी नहीं थी, घर नहीं था, मैं होश में नहीं थी। ऋतु ने अपना दरवाज़ा मेरे लिए खोल दिया था। अपनी बड़ी बहन के घर में उसने अपने कमरे में मेरे लिए जगह बना दी। फिर मेरे इंटरव्यू में जाने के लिए अपनी बहन के कपड़े पहनाकर भेजने भी लगी। उसके मम्मी-पापा और उसकी बहन को जाने कैसा लगता होगा तब, लेकिन ऋतु टस से मस नहीं हुई। मैं पीजी में रहने चली गई, फिर भी ऋतु से मिलने आती रही।

फिर जिस दिन एनडीटीवी में मुझे मिसेज़ रॉय और डॉ रॉय से मिलना था, उस दिन नोएडा से साथ गई थी वो। नीचे बैठकर इंतज़ार करती रही मेरा, और फिर लोदी रोड के साईं बाबा मंदिर ले गई थी। मन्नतों की भीड़ में उसने मेरे नाम की एक मन्नत खड़ी कर रखी थी।

फिर हम लगातार मिलते रहे। मैंने एक दोस्त के साथ घर ले लिया, और ऋतु उस घर में हक़ से आकर रहने लगी। जिस रात मैं मनीष से पहली बार मिलने गई थी, उस रात भी ऋतु मेरे घर पर थी। किसी लड़के पर उसकी मुहर लगे बिना मेरी शादी हो जाती, हो ही नहीं सकता था। मेरी पहली प्रेगनेंसी पर मुझे अस्पताल ले जाने वाली ऋतु ही थी, अपनी बहन की शादी की आपाधापी में भी समय निकाल लिया था उसने मेरे लिए। फिर धौलपुर हाउस से यूपीएससी की इंटरव्यू देकर लौटी और सबसे पहले मेरे जुड़वां बच्चों को देखने भी आई। मैं अपनी सासू मां को ठीक-ठीक समझा नहीं पाई कि मैं ऋतु को कैसे जानती हूं। ट्रेन की दोस्त है, बताती तो उनके पैरों के नीचे से ज़मीन खिसक जाती।

फिर ऋतु की शादी हो गई और वो बैंगलोर आ गई। हमें आदित को लेकर उसकी आंखों के चेकअप और सर्जरी के लिए कई बार बैंगलोर आना पड़ा। अपने सगे भाई के होने के बावजूद हमलोग ऋतु के घर रुके। मनीष को मैंने बताया नहीं कि हम ट्रेन के दोस्त हैं। ऋतु मनीष की साली होने के सारे सुख उठाती है, और एक वही है जिसके ताने और मज़ाक मनीष हंसते-हंसते झेलते हैं। हर्ष ऋतु के पति होने के साथ बच्चों के मौसा है, मनीष के करीबी दोस्त हैं और हम साल में एक बार भी बात करें तो हमें मालूम होता है कि बातचीत के सिरे कहां से पकड़ने हैं। ऋतु, शुभशंसा बख्शी, मेरी ट्रेन वाली दोस्त है।

उसके पास तीन बड़ी बहनें थीं, मेरे पास छोटे भाई-बहनों की जमात थी। लेकिन फिर भी हम अपनेआप एक-दूसरे के लिए बड़ी बहन और छोटी बहन की भूमिका में फिट हो गए थे। हमारे पास सैकड़ों दोस्तों की जमात थी, फिर भी हमने अपना ख़ास रिश्ता बचाए रखा था।

बैंगलोर निकलने से पहले ऋतु को वॉट्सऐप पर मेसेज भेजा। मौसम कैसा है वहां का? बच्चों के लिए जैकेट लाऊं या नहीं? जो ऋतु मेरे और बच्चों के बैंगलोर आने का एक महीने से इंतज़ार कर रही थी, उसने घंटों जवाब नहीं भेजा। फिर दोपहर में जवाब आया, हर्ष का। ऋतु और हर्ष पटना में थे, और ऋतु के पापा क्रिटिकल थे। फिर अगली सुबह अंकल का हाल पूछने के लिए मेसेज किया था शाम को हर्ष ने ही जवाब दिया, ऋतु के पापा नहीं रहे।

मैं बैंगलोर में हूं और ऋतु यहां नहीं है। मैं हमेशा की तरह फिर नहीं जानती कि कैसे बताऊं उसे, उसे कितना याद कर रही हूं। कैसे बताऊं कि आंटी के बारे में सोच रही हूं, और सांत्वना में क्या कहा जाता है, ये नहीं जानती। अपनी दुआओं में ऋतु के लिए, उसकी बड़ी बहनों के लिए, आंटी के लिए ढेर सारी हिम्मत भेज रही हूं।

ऋतु, तुम शुभशंसा बनी रहना - केप ऑफ गु़ड होप - जहां खड़े होकर आंटी ने सोचा था कि अगली बेटी होगी तो उसका नाम शुभशंसा ही रखेंगे। तुम उन लोगों में से हो जो ज़िन्दगी में मेरी आस्था बचाए रखते हैं। जब कोई भरोसा डगमगता है तो मैं उस भरोसे के बारे में सोचती हूं जो तुमने एक अनजान पर बिना सोचे-समझे दिखाया था। शरीर आता-जाता रहता है, लेकिन रूह के साथ जो अजर-अमर बना रहता है, कुछ ऐसे ही रिश्ते होते हैं जिनका कोई सिर-पैर नहीं होता। इन्हीं रिश्तों को देखकर यकीन हो जाता है कि हम किसी ना किसी वजह से मिलते हैं, हमारी नियतियां कहीं ना कहीं जाकर जुड़ती हैं और हर हादसे या खुशी के लम्हे का वक़्त पहले से तय होता है।

वरना इत्तिफ़ाक़ ऐसा क्यों कि मैं बैंगलोर में हूं और तुम यहां नहीं हो, अपने सबसे बड़े सदमे से जूझ रही हो इस वक्त। इत्तिफ़ाक़ ऐसा इसलिए कि तुम्हारी अहमियत मुझे आज सुबह समझ आई है। इत्तिफ़ाक़ इसलिए कि ये कह सकूं कि तुमसे बहुत प्यार करती हूं शुभशंसा बख़्शी, मेरी ट्रेन वाली दोस्त।   

 

Monday, October 22, 2012

बेंगलुरू डायरिज़ 1: छुक छुक छक छक

शुक्रवार के दिन किसी गुम हो गए बच्चे की तरह महसूस करती रही।

दर-दर भटकती, अपने घर का पता पूछती वो गुम हो गया बच्ची, जिसे मालूम तो है कि उसे पहुंचना कहां है, लेकिन जानती नहीं कि वहां जाने का रास्ता कहां से होकर जाता है। ये ट्रैवल एन्क्ज़ाईटी का नतीजा हो सकता है। घुमन्तू तो हूं, लेकिन शहर से बाहर जाने से पहले अभी भी हाथ-पांव ठंडे होने लगते हैं, हलक में कुछ ऐसा अटका हुआ-सा रहता है कि जैसे उंगली डालो और सब बाहर। कुछ छूट जाने का डर, वक्त पर स्टेशन ना पहुंचने का डर, तबीयत ख़राब हो जाने का डर... और डर कई गुना ज़्यादा बढ़ गया है क्योंकि इस बार दो बच्चों को लेकर छत्तीस घंटे के सफ़र पर जाना है।

दिन किसी बेख़्याली में गुज़रा है। किसी प्यारी चीज़ के खो जाने के ग़म में, जतन से संभालकर रखे गए याद के किसी टुकड़े के छिटककर दूर चले जाने के अफ़सोस में... सफ़र कई दुखों की दवा होता है, कई तकलीफ़ों का इलाज। एक जगह से दूसरे जगह पहुंचने के क्रम में रास्ते में जमा किए गए अनुभव उस लम्हे में जीने का सलीका सिखाते हैं, सिखाते हैं कि ना गुज़रा हुआ लम्हा मायने रखता है, ना आनेवाले लम्हों की चिंताएं किसी काम की होती हैं। जो है, इसी एक लम्हे में है। ट्रेन में बैठे हुए मुसाफ़िरों की लाचारी और बंधन बड़े कारगर होते हैं।

ऐन्क्ज़ाइटी में इतनी गड़बड़ ज़रूर हुई है कि मैंने आनेवाले सफ़र की टिकट देखकर बच्चों को सामान सहित गलत बोगी में चढ़ा दिया है। फिर अटे्न्डेंट की दुहाई है, सामान और बच्चों को उतारने की मशक्कत है और हांफते-दौड़ते ट्रेन खुलने के ठीक एक मिनट पहले अपनी सीट पर बैठ पाने की राहत है।

"हमें गलतफ़हमी हो गई थी, इसलिए हम यहां देर से पहुंचे", आदित सामने की सीट पर बैठी महिला से कहता है और वो हैरान होकर मेरी तरफ़ देखती है।

"वाऊ! डज़ ही ऑल्वेज़ टॉक लाइक दिस?" वो मुझसे कहती है।

"लाइक व्हॉट? हम घर में हिंदी में ही बात करते हैं," मैं उससे कहती हूं।

"दैट वॉज़ स्वीट।"

तबतक महिला का पति और चार साल का बेटा सीट पर आ जाते हैं।

हो गई छुट्टी। अब तीन बच्चे मिलकर पूरी बोगी में उत्पात मचाएंगे। टोटल हैपी हॉलीडेज़ की शुरूआत हो गई अभी ही।

"मॉम, हाउ लॉन्ग डज़ ईट टेक टू रीच नागपुर? आई होप इट्स नॉट अ वेरी टफ़ एंड आर्डुअस जर्नी!" चार साल का बच्चा कहता है।


"वाऊ! डज़ ही ऑल्वेज़ टॉक लाइक दिस?" अब हैरान होने की बारी मेरी है।

बात-बात में समझ आ गया है कि सजीव नाम का ये चार साल का जीव अंग्रेज़ी भी बोलता है और मलयालम भी। आद्या-आदित को उतनी अंग्रेज़ी आती नहीं, इसलिए उनसे टूटी-फूटी हिंदी में बात भी कर लेता है।

बीस मिनट के भीतर हम सब में दोस्ती हो गई है। तीनों बच्चों में, मेरी बच्चे की मां के साथ - इतना कि सजीव के बढ़े हुए नाखून के लिए मेरा नेलकटर निकल आता है और आदित की बहती नाक पोंछने के लिए उसकी मां के वाइप्स। खेलते-खेलते सो चुके आदित को सजीव के पापा गोद में उठाकर उसे बिस्तर पर डाल देते हैं। मेरी नॉन-स्टॉप छींक और खांसी के लिए एक्स ऑयल निकाल कर हाथ में थमा दिया गया है।

सोने से पहले सजीव की मां मुझसे पूछती है, "विक्स लगा दूं?" फिर धीरे से कहती है, "माई हस्बैंड हैज़ बैड साइनस। ही मे स्नोर इन हिज़ स्लीप। प्लीज़ बेयर विथ हिम।" मैं हंस देती हूं। खर्राटे मारनेवाले पतियों के लिए क्या शर्मिंदा होना?

सोने जाने से पहले सजीव के डैड भी हमें आगाह कर जाते हैं, "आई विल ट्राई नॉट टू स्नोर। बट इन केस आई डू, प्लीज़ डोन्ट माइंड।"

कंपार्टमेंट का सन्नाटा, पटरियों पर दौड़ती ट्रेन का शोर और सजीव के डैड के खर्राटे फिर दिमाग को लुकाछिपी के किसी खेल की ओर धकेल देता है।

एक सफ़र, बस एक सफ़र में रिश्ते बनते हैं क्या?

मैंने बनाए हैं एक सफ़र के, एक दिन के रिश्ते। सफ़र में मिलनेवालों से सालों का रिश्ता क़ायम किया है। ट्रेन में साथ सफ़र करनेवाले लोगों के नंबर बदलते हुए फ़ोनबुक और फोन के साथ मेरे पास बने हुए हैं अभी भी। मुझे याद आया है कि In life everything happens for a reason, People meet not by chance, but by fate. लोग अगर मिलते हैं तो कोई ना कोई वजह होती है, और हर रिश्ते की, हर मुलाक़ात की मियाद तय होती है। वक़्त से ज़्यादा किसी को उस रिश्ते का सुख नहीं मिलता, और अच्छा भी है क्योंकि कुछ तो ऐसे रिश्ते हों जो बिना गिरहों के हों, बिना अपेक्षाओं को, बिना किसी कारण, बिना किसी स्वार्थ के।

सुबह के शोर में ख़्यालों ने ख़ामोशी का जामा ओढ़ लिया है और नागपुर आने ही वाला है अब। सजीव और आदया-आदित की टेढ़ी-मेढ़ी ड्राईंग्स के साथ हमने एक रात की यादों को तह लगाकर अपने-अपने बैग्स में रख लिया है।

उतरते हुए सजीव की मां अपना नंबर दे जाती है, माई नेम इज़ अश्वथी - दैट्स अ मलयालम नेम पर अश्विनी, एंड आई लिव इन ग्रेटर नोएडा। वी मस्ट मीट सून!

वी मस्ट। आख़िर कोई ना कोई वजह है कि हम मिले अश्वथी। शायद इसलिए कि कल रात मुझे ऐक्स ऑयल और विक्स की सख़्त ज़रूरत थी और सजीव के नाखून काटे बिना तुम्हारा गुज़ारा नहीं हो सकता था। शायद इसलिए कि ग्रेटर नोएडा में मुझे कुछ और जान-पहचान वालों की ज़रूरत हो। शायद इसलिए कि सजीव को सिखनी थी थोड़ी सी हिंदी और मेरे बच्चों को इतनी-सी अंग्रेज़ी। लेकिन इतना सोचकर क्या होगा?

इसलिए, एक और वायदे के साथ फोन बुक में एक और नंबर जुड़ जाता है। इतने सारे रिश्तों की भीड़ में एक और रिश्ता बन जाता है।

वैसे बैंगलोर तक का हमारा सफ़र जारी है...