Wednesday, June 20, 2012

Building the connection, bit by bit

It is a proposition that doesn’t make any business sense. So, we don’t have a B-plan. We don’t have fancy presentations. We don’t even have pitch notes for funding. We are a start-up alright, but we barely understand how sweat equity works vis-a-vis financial equity. Venture capital financing and private equity are alien terms for us, and we know nothing about bootstrap funding. (We wouldn’t mind an ‘Angel Investor’ though!).

All we have is a dream, and quite a few reasons to believe in it. The dream has aptly been named as “Gaon Connection”; the rural newspaper envisaged as the voice of rural people which will soon reach far and wide (weekly 12-page broadsheet to be launched initially in three districts of UP and will also be available online).
As for the reasons, the first one is the bare need of creating a system that will hopefully bridge the information gap that exists between the rural India and the urban India; between the laboratories and the land; between the manufacturers and the consumers; and between the policy-makers and the common man. A far-fetched dream, yes, and we are also working towards creating a news wire service that will supply news stories from the villages to the mainstream newspapers across the country to address that need. That’s the true objective of journalism that we want to work for.

The other reason why we want to carry on are our village reporters like Archana and Rekha Gautam, who have endless stories to tell, and the drive to share it with the world. These two girls come all the way to our modest office in Lucknow from a village about 50 kms away. They are now getting hands-on training in rural reporting, and beam with pride when they receive compliments on the story they have just filed. This story was their own idea. “People in our villages have got smart cards made. But they don’t know what to do with it. CHCs are more or less defunct. There is no awareness on health schemes in the villages. We had to talk about this with our people,” they say, filling in details for each-other when either one is at loss of words. They actually traveled across seven villages, traversing several kilometers on their cycles in this sweltering heat; talking to men and women from over 70 families; questioning Asha workers and the ANMs and other community health workers reporting to the nearby CHCs. Rekha sits on the computer and diligently keys in her story word by word while Archana looks on, pointing out typos then and there.


We found a stronger reason in our other set of reporters, who are out and out city-bred kids. Most of them had never been to a village before, like most of the urban youth of this generation, and had no idea about the real picture of the villages. It will take time before they start understanding the policies that are of hardly any worth to the 65% population of the country. But we are hoping that once we get rolling, they will eventually start writing uninhibitedly about discrimination, mismanaged resources and apathy, and everything else they should be writing about; including stories of change, good Samaritans, innovations and development. Getting these stories to you through them is one solid reason why we want to succeed.


The way these reporters are working with very limited resources are another source of inspiration for us. Our photojournalists Shipra and Ishaan use their own DSLR cameras to get some outstanding photos of the ‘gaon’ for the newspaper. Their photographs from the villages are true reflections of their amused astonishment, something I hope they never get over. Bhaskar is trying to figure out how something like a ‘Total Sanitation Campaign’ can be a reason of a 2900 crore scam in Uttar Pradesh even though he has a solid proof in his hands – a fake list of beneficiaries who never got the money to build toilets! While the state government is forcing and withdrawing ‘mall and market’ early closure in order to address the prevailing power crisis, Prashant and Saroj are gathering proof of power theft that has become a common, yet conveniently ignored practice across villages and cities.


And they are putting their stories together in an office which is battling with power fluctuations; where work-stations mean a few donated computers assembled in a true ‘jugaad’ style; which is now proudly equipped with an electric kettle, fridge and furniture, all brought in from the Editor-in-chief’s house. The reporters and editors, by the way, also double up as office assistants, drivers, riders and helpers.


Some of the other reasons why we are doing this are - conviction, insanity and an obsessive compulsive disorder of story-telling. We also have a few vacancies for the post of ‘Angel Investors’! Some of the prerequisites for the same have been listed above.

Saturday, June 16, 2012

मुश्किलें पड़ीं इतनी कि आसां हो गईं

उनसे पहली बार मिलती हूं तो ज़ेहन में पहला ख़्याल यही आता है कि उम्र चेहरे पर अपना करतब दिखाए तो कुछ ऐसे ही, कि झुर्रियों से भी टपके सौम्यता। नए शहर में, नई जगह पर, अजनबी घर में खड़े होने की घबराहट उन्हें देखते ही काफ़ूर हो जाती है। यूं भी मैं अपने दोस्तों से पहले उनकी मांओं के साथ ज्‍यादा आसानी से जुड़ जाने में माहिर हूं, बचपन से। आंटी को देखते ही लगा है, यहां रहना मुश्किल नहीं होगा।

सफ़र की थकान है, एक बार फिर बच्चों को छोड़ कर आने का बोझ है और एक ऐसे जुनून में शामिल हो जाने की ज़िम्मेदारी है जिसकी पहली शर्त पागलपन होती है। सामान रखकर आंटी के साथ बैठी हूं और बिना किसी भूमिका के ही मैं पहला सवाल पूछती हूं, "जुड़वां बच्चों के साथ कैसे किया इतना सबकुछ?" आंटी मुस्कुराते हुए अपने ख़ास लखनवी अंदाज़ में कहती हैं, "अरे बड़ा मुश्किल था बेटा, तुम्हें क्या बताएं हम।" ये सुनते ही सोचती हूं, एक ट्विन मदर्स क्लब बनाया जाना चाहिए कि हम सब मांओं का ये पेटेंट जुमला है शायद।

आंटी के बारे में बता दूं। नाम निर्मला (शुक्ला) मिश्र, लखनऊ में पली-बढ़ीं, यहीं से ग्रैजुएशन, एमए और बीएड किया (और ये उस ज़माने की बात है जब देश में स्त्री-शिक्षा का अलख जगाया जाना चंद बड़े सामाजिक सुधारों की कोशिशों के परे कुछ भी नहीं था)। शादी हुई तो नॉर्थ अमेरिका में देश का नाम ऊंचा कर आए एक जिऑलोजिस्ट शिव बालक मिश्र से। लेकिन एक फितूरी को दूसरा फ़ितूरी मिल जाया करता है और ऊपरवाला भी ऐसी ही जोड़ियां बनाने में माहिर हो शायद। तो बस, अंकल कनाडा में करोड़ों साल पुराने फॉसिल पर शोध करते-करते  अचानक देश लौट आए और पहुंच गए अपने गांव, जहां वो एक स्कूल खोलना चाहते थे।

सपने देखना एक बात है, सपने को सच बनाने का जुनून रखना दूसरी बात और उसको पूरा करने की जद्दोज़ेहद में जुट जाना सर्वोपरि है। उससे भी अहम है अपने जीवन-साथी के सपने में कुछ इसी तरह यकीन करना जैसे ये दुनिया का पहला और आख़िरी सच हो। शहर में पली-बढ़ी आंटी शादी के बाद गांव जा पहुंची। मिट्टी के घर में घूंघट के पीछे से उसी सपने को खुली आंखों से देखा जो उनके पति देख रहे थे और एक दिन उनके साथ स्कूल को चलाने के लिए घर की ड्योढ़ी और गांव की पगडंडियां पार कर वहीं जा खड़ी हुईं जहां सपनों को मुकम्मल शक्ल दिया जाना था, अपनी शादी के ठीक डेढ़ महीने बाद - पहली जुलाई १९७२ को। मिट्टी की दीवारों और कच्ची-सी छत वाला एक कमरा था जिसे स्कूल बनाया जाना था। यहीं उनके साथ दहेज़ में आए सोफे और कुर्सियां डाल दी गईं थीं। स्कूल में कुछ सत्तर-अस्सी बच्चे थे, जिन्हें हाई स्कूल तक की शिक्षा दी जानी थी। साथ में चार टीचर्स थे, वो भी गांव के।

फिर शुरू हुआ शिक्षा के प्रचार-प्रसार का वो सिलसिला, जो अब तक जारी है। सुनने में आसान लगता है, दंतकथा हो गया ना इसलिए। लेकिन हर दिन एक चुनौती रही होगी, हर लम्हा एक संघर्ष। तब, जब आप मौसम की मार सहते हुए, कभी लू के थपेड़ों से उलझते हुए, कभी शीतलहरी बर्दाश्त करते हुए, कभी सांप-बिच्छुओं से ख़ुद को बचाते हुए हर रोज़ स्कूल पहुंचते हों - वो भी ऐसे बच्चों को पढ़ाने के लिए जिनमें से कुछ को स्कूल के बाद भैंस चरानी होती होगी, किसी को हल चलाना होता होगा और किसी को बर्तन मांजना होता होगा।

ये पागलपन क्यों था? आसानियां भी तो चुनीं जा सकती थीं। क्या ज़रूरत थी कि आठ महीने का जुड़वां गर्भ लिए हुए कभी बारिश, कभी फिसलन से खुद को बचाते हुए स्कूल पहुंचा जाए? खेत की पगडंडी पर उतना बड़ा पेट लिए औंधे मुंह गिरी होंगी तो उन्हें किसने बचाया होगा? उनके अच्छे कर्मों ने, शायद। क्या ज़रूरत थी कि बच्चों की पैदाईश के तुरंत बाद उन्हें कभी दादी तो कभी नानी के पास छोड़कर वापस धुनी जोगन की तरह स्कूल लौट जाया जाए? मीराबाई की साधना कई रूपों में दिखाई देती है, कई रूपों में बसे ईष्ट के लिए।

"हम एक को अपने मायके लखनऊ में छोड़ते थे, एक को अपने साथ गांव में रखते थे। सालभर के थे तब बच्चे। फिर पंद्र्ह दिन बाद बच्चा बदल कर लाते थे और यही सिलसिला उनके थोड़े बड़े हो जाने तक चला। क्या बताएं बेटा कि जिस बच्चे को छोड़कर आते थे उसके लिए क्या हालत होती थी।"

जानती हूं आंटी, मैं उनसे कहना चाहती हूं, लेकिन कह नहीं पाती। थोड़ी-सी नींद हासिल करने के लिए एक बच्चे को कभी दादी, कभी नानी के कमरे में छोड़ आना याद आता है। याद आती है अपनी वो जगलिंग कि जब एक को नानी के पास छोड़ने रांची गई थी, दूसरे को दादी के पास छोड़ आई थी। ये भी याद आया है कि पंद्रह-पंद्रह दिनों पर उनमें से किसी एक के पास लौटती थी तो दूसरे के लिए रूह रोती थी और एक को गोद में लिटाए हुए सोचती थी कि दूसरे को किसने लोरी सुनाई होगी? बाबा-दादी और नाना-नानी बच्चों को कितना प्यार करते हैं, मगर फिर भी... आंटी स्कूल के साथ-साथ बच्चों को पालने की कहानी बताए जाती हैं, मैं अपने आंसू ज़ब्त करने की कोशिश में उलझती जाती हूं।

फिर ऐसा हुआ कि अंकल की नौकरी नैनीताल में हो गई और लोअर केजी में पढ़ने वाले बच्चों को लेकर वो वहीं चले गए। आंटी स्कूल चलाने के लिए गांव में ही रह गईं। क्या ज़रूरत थी? उन्होंने क्यों नहीं चुन लीं आसानियां?

छुट्टियों में मिलने आती थीं बच्चों से। कहती हैं, "बस स्टैंड पर बीच में खड़े पापा के अगल-बगल खड़े दोनों बच्चों को छोड़कर आते थे तो लखनऊ पहुंचने तक रोते रहते थे। लगता था, अपना कोई हिस्सा वहीं छोड़ आए हैं। आज के ज़माने की तरह फोन थोड़ी थे बेटा? एक चिट्ठी आया करती थी कभी पंद्रह दिन पर, कभी महीने में एक बार अंकल की। हम सुबह-शाम कई-कई बार वो चिट्ठी पढ़ते थे, हर अक्षर में, हर लाईन को बार-बार, कि उनकी कही हुई कोई बात हमसे छूट ना जाए। एक बार हम बिना बताए नैनीताल पहुंच गए। घर के थोड़ी दूर स्कूल का बस्ता लटकाए बेटा मिला। वो बैठकर पत्थरों से यूं-यूं निशाना लगाकर दूसरे पत्थरों को मार रहा था। हमने पूछा, घर क्यों नहीं गए बेटा? उसने कहा, घर पर ताला बंद है। तब बहुत रोए हम।"

इतनी मुश्किलें? तो फिर हार क्यों नहीं मान ली आंटी ने? ये कैसी ज़िद थी? बच्चे बड़े हुए, और अपनी जीवट मां के लिए स्नेह और सम्मान बढ़ा ही होगा, कम नहीं हुआ। दो बच्चे पालतीं आंटी या फिर हज़ारों बच्चों को चालीस सालों में शिक्षित करके उनकी ज़िन्दगी संवारने का काम किया होता। सिर्फ दो बच्चों की मां बनी रहतीं, या पूरे गांव-जवार की प्रिंसिपल साहब बन जातीं... चुनाव कितना आसान तो था।

इतना आसान भी नहीं रहा होगा क्योंकि एक मां से बेहतर ये कोई नहीं जानता कि उसके बच्चों की बेहतरी किसमें है और उन्हें कब क्या चाहिए। अपने बच्चों को छोड़ आने के अपराध बोध और बोझ के साथ ईमानदारी से काम करते चले जाना आसान रहा होगा क्या? पुरुष या पिता का काम करना, काम के प्रति ईमानदार होना, अपने सपने को जीना उसे एक आदर्श नागरिक, एक आदर्श इंसान बनाता है। स्त्री कामकाजी हो और उसी जुनून के साथ अपने हुनर का इस्तेमाल करे तो उसे ख़ुदगर्ज़ और महात्वाकांक्षी, कई बार ज़ालिम तक, क़रार दिया जाता है। ऐसा भी क्या काम करना, मुझसे भी कहते हैं लोग।

ये भी स्वीकार करना होगा कि वीमेन एम्पावरमेंट बिना पुरुष के सहयोग के मुमकिन नहीं होता। अगर अंकल ने साथ नहीं दिया होता तो? दो छोटे बच्चों को नहलाने-धुलाने से लेकर खिलाने-पिलाने और साफ कपड़े पहनाने की ज़िम्मेदारी अकेले ना उठाई होती तो? एक के आंखों के सपनों का दूसरे की आंखों की किरकिरी बन जाने की मिसाल भी तो देखी है हमने। एक-दूसरे के सपने को पूरा करने के लिए अपना जीवन होम कर देने की ये मिसाल भी देखिए। और हम कहां-कहां तो सोर्स ऑफ इन्सिपेरेशन ढूंढते रहते हैं जबकि ईश्वर हमें जाने किस-किस रूप में ज़िन्दगी के पाठ पढ़ाने आया करता है। जाने किस-किस रूप में आकर बताता है कि चुन लो मुश्किलें क्योंकि जब ज़ुल्फ के सर होने का वक़्त आएगा और मुड़कर देखोगे तो तमाम मुश्किलें आसान लगने लगेंगी। ईश्वर मुझे अभी एक औरत, एक पत्नी, एक मां, एक टीचर के रूप में मिला है।  


लखनऊ ज़िले के कुनौरा गांव में अपने स्कूल भारतीय ग्रामीण विद्यालय  के प्रांगण में बच्चों और शिक्षकों के साथ
आंटी (श्रीमती निर्मला मिश्र) और अंकल (श्री एसबी मिश्र)

Thursday, June 14, 2012

गर्मी छुट्टी डायरीज़ 11:फिर भी मुश्किल है कहना, बाय बेटा


मेरी एक रिश्ते की ननद आई हैं हमसे मिलने। नोएडा में ही रहती हैं, मेरे घर से कुछ तीन किलोमीटर दूर। लेकिन हम वहां कम मिल पाते हैं, छुट्टियों में यहीं पूर्णियां में ही मिल लिया करते हैं। कुछ दफ्तर जाने की मजबूरी, कुछ बच्चों और परिवार के बाद छुट्टियों के दिन भी फुर्सत ना मिल पाने का रोना। सोनी मेरे पसंदीदा लोगों में एक हैं - बातचीत में साफगोई और ईमानदारी, कहीं कोई लाग-लपेट नहीं। महारानी गायत्री देवी गर्ल्स स्कूल की पढ़ी हुई, एमबीए और एक बड़ी कंपनी में सालों से काम कर रही हैं। हर रोज़ गुड़गांव से नोएडा तक का वो थका देनेवाला सफ़र बिना किसी शिकन के तय करती हैं, जिके बारे में सोचकर ही मेरे रोंगटे खड़े हो जाते हैं। सुबह चार बजे से लेकर आधी रात तक सुकून नहीं। दो बच्चों की मां हैं, लेकिन फिर भी काम करती रहीं लगातार। हंसकर कहती हैं, भाभी, सब कहते हैं कि नौकरी छोड़ क्यों नहीं देती? कैसे छोड़ दें? इतनी मेहनत लगी है यहां तक पहुंचने में।

सही बात है। मैं सोनी की हिम्मत से इतनी ही प्रभावित हूं कि उठकर गले लगा लेना चाहती हूं और पूछना चाहती हूं, कैसे करती हो ये सब? सोनी बच्चों को बोर्डिंग में भेजने की हिमायती हैं। उनके लिए एक्सपोज़र ज़रूरी है, वैसा माहौल जो मुझे मिला, कहती हैं, तो मैं अपनी परवरिश के बारे में सोचने लगती हूं - जो मिली, उसके बारे में भी, जो बच्चों को दे रही हूं, उसके बारे में भी।

घर की एक और बहू के बारे में चर्चा होती है, जिनसे मैं एक ही बार मिली हूं। भाभी इंग्लैंड में डॉक्टर हैं। मां बताती हैं कि उन्होंने दस दिन के बेटे को बाबा-दादी के पास छोड़ दिया क्योंकि उन्हें एमडी करना था। भाभी ने एमडी भी किया, अस्पताल में नौकरी भी की, बेटे को अपने साथ भी ले गईं और उसे अकेले पाला भी। जब दिन की ड्यूटी होती तो बेटे को केयरटेकर के साथ छोड़कर जाया करतीं और जब नाइट ड्यूटी होती तो उसे अपने साथ अस्पताल ले जाया करतीं। उनका बेटा अब इंग्लैंड के सबसे मशहूर रेसिडेंशियल स्कूल में दसवीं में पढ़ रहा है, और वर्ल्ड थिएटर मीट में इंग्लैंड को रेप्रेज़ेन्ट करनेवाले छह बच्चों में से एक है। बल्कि इकलौता हिंदुस्तानी बच्चा है जो बुडापेस्ट में शेक्सपियर के नाटक का मंचन कर रहा होगा। मां काम करती रही तो बच्चा उपेक्षित रहा या बिगड़ गया?

मैं ऐसी कई दोस्तों को जानती हूं जो बच्चों को पालते हुए दफ्तर और घर के बीच कमाल की जगलिंग करती हैं, ऐसी कि पेशेवर नटों को भी उनका टाइट रोपवॉक देखकर शर्मिंदगी हो जाए। मैं खुद बच्चों को क्लायंट मीटिंग्स में ले गई हूं, शूट पर गई हूं तो एक को नानी के पास छोड़ने के लिए रांची गई हूं, दूसरे को दादी के पास छोड़ने के लिए पूर्णिया। ऐसा भी हुआ है कि एक हफ्ते में सात शहरों और तीन राज्यों की यात्राएं की हैं, क्योंकि सपोर्ट सिस्टम उतने ही दिनों के लिए मौजूद था।

हम जैसों में इतनी बेचैनी क्यों है फिर? ये कौन-सा जुनून है जो हमें चैन से बैठने नहीं देता। काम करना मजबूरी है या वाकई कोई जुनून ही? आसान नहीं होता अगर चुन लिया होता घर में शांति से बैठ जाना? मैं जेंडर बैलेंस की बहस में नहीं पड़ना चाहती, लेकिन इस बात से पूरी तरह इत्तिफाक रखती हूं कि हुनर और क्षमता किसी एक जेंडर की जागीर नहीं होती। जिस तेज़ी से पुरुषों के दिल-ओ-दिमाग काम किया करते हैं, उतना ही शार्प औरतों की सोच और ज़हानत होती है। ऐसा नहीं कि मैं घर में बैठ जाने के ख़िलाफ़ हूं। बल्कि वैसी महिलाएं तो बड़ी वाहवाहियों की हकदार हैं। मेरी मां भी वैसी महिलाओं में शामिल हैं, और मैं मां की तरह नहीं होना चाहती थी, इसलिए बेचैन रहती हूं इन दिनों।

लेकिन आसान नहीं है दोनों जहान की ज़िम्मेदारियां उठाए चलना। कोफ्‍त होती है, थकान होती है और लगता है कि इतनी मुश्किलें क्यों पैदा कर रहे हैं अपने लिए? अब आज की ही बात ले लीजिए। मैं गर्मी छुट्टियां आराम से घर पर रहकर काट सकती थी। लेकिन लखनऊ जा रही हूं, इसलिए, क्योंकि एक सपने में यकीन है। यकीन है कि नामुमकिन-सा दिखने वाला ये काम दरअसल एक नई मिसाल कायम करेगा। यकीन है कि ऐसी ही छोटी-छोटी पहल से एक बड़ा बदलाव आता है। और इस बात का पुख़्ता यकीन है कि मुझे अपनी भूमिका अदा करनी चाहिए, अपना स्किल-सेट बांटना चाहिए, चाहे इसके लिए ख़ुद के साथ कितनी ही ज़्यादतियां क्यों ना करनी पडें?
मुश्किल बढ़ जाती है जब गर्दन से लिपटकर बेटी फूट-फूटकर रोती है। मत जाओ मम्मा। इतना काम क्यों करती हो? मैं कहती हूं, आप भी तो करते हो ना कितना काम आद्या। स्कूल जाती हो तो मम्मा कहां रोकती है आपको रोकर? तो क्यों नहीं रोकते मम्मा? मैं तो जाना भी नहीं चाहती स्कूल। मैं लाजवाब हो गई हूं और उसका रोना बंद नहीं हो रहा। मैं जेंडर बैलेंस का फंडा देती हूं फिर से, जस्ट ऐज़ आद्या-आदित दोनों स्कूल जाते हैं वैसे ही पापा को काम के लिए बाहर जाना होता है और मम्मा को भी। नहीं... आप तो मम्मा हो ना? आपको नहीं जाना चाहिए। ये मेरा दूसरा तीर निशाने से बहुत दूर जाकर गिरा है, लाचार और हारा हुआ।
अगले एक घंटे में मेरी ट्रेन है, वो भी कटिहार से, जो घर से तीस किलोमीटर दूर है। समझाने की सारी कोशिशें नाकाम हो जाती हैं, वो मुझसे लिपटी खड़ी रोती रहती है। जी में आता है, सब छोड़ दूं। कहीं नहीं जाऊं। सारे सपनों को आग लगा दूं। कोई मजबूरी नहीं। कोई ज़रूरत नहीं। लेकिन एक ज़िन्दगी है और ख्वाहिशें कमबख्त पापी होती हैं। मैं महत्वाकांक्षी हूं? नहीं जानती। फिर भी चचा ग़ालिब याद आए हैं - ईमान मुझे रोके है तो खींचे है मुझे कुफ्र... मैं काम करने की मजबूरी से मजबूर काफ़़िर मां हूं, और मुश्किल है घर से निकलते हुए तुम्हें बाय कहना, बेटा।
पोस्टस्क्रिप्ट – पोस्ट लिखते हुए बेटी का फोन आया। मम्मा, आपको मुंबई भी जाना है। मैं कहती हूं, हां बेटा, काम तो है लेकिन तभी जाऊंगी जब आप कहोगे। सोचकर थोड़ी देर में फोन करती हूं मम्मा, फिर हम डिसाईड कर लेंगे कि आपको जाना चाहिए या नहीं। आद्या ने इतना कहा है और मेरा जीना आसान हो गया है आज के लिए।  

Tuesday, June 12, 2012

गर्मी छुट्टी डायरीज़ 10: चूड़ियां मजबूरियां अब नहीं

टुकडों-टुकड़ों में टीवी पर देखा वो धारावाहिक याद है। कुछ इसी तरह याद है कि यादों के कोलाज से जो निकलकर आई, वो कहानी कुछ इस तरह थी - मध्यवर्गीय परिवार की एक लड़की है जो कॉलेज जाती है, शायद किसी बड़े शहर में पढ़ने आई है और अकेली रहती है। देखने में सुन्दर है और कभी कॉलेज में, कभी रास्ते में अक्सर उसको लड़के छेड़ा करते हैं। कोई शादी-शुदा दोस्त उसको मैरिड होने के फायदे बताती है। कहती है कि वो छेड़खानी से इसलिए बच जाती है क्योंकि वो 'अवेलेबल' नहीं है, और सुहाग के चिन्हों के साथ चलती लड़की को कोई लड़का छेड़ने का ख़तरा मोल नहीं लेगा। लड़की पर दोस्त की कही बात का इतना ही गहरा असर होता है कि वो ख़ुद को सुरक्षित रखने के लिए एक मंगलसूत्र डालकर कॉलेज जाने लगती है।

मुझे वो एक सीन तक याद है जिसमें मुख्य किरदार निभानेवाली दीपिका चिखलिया मोटरसाइकिल पर बैठे लफंगे लड़के के सामने दोनों बांहें सीने के आर-पार बांधकर खड़ी हुई है, गले में मंगलसूत्र है और चेहरे पर गज़ब का आत्मविश्वास। उस  'शादी-शुदा' लड़की की जान बख्श दी जाती है, लेकिन इस चक्कर में वो शरीफ लड़का भी उसे प्रोपोज़ नहीं करता जिससे नायिका की शादी हो सकती थी। आख़िर में मंगलसूत्र का सच सबको पता चल जाता है और सुहाग के चिन्हों और विवाहित बनाम कुंवारी लड़कियों के प्रति समाज को रवैये पर छोटे-से भाषण के बाद एपिसोड ख़त्म हो जाता है।

मैंने जब ये कहानी देखी थी तो इतनी ही छोटी थी कि याद है, सोफे पर टीवी देखते हुए लुढ़क जाने के बाद बाबा गोद में उठाकर बिस्तर पर सुलाने ले गए थे। ये दीपिका के सीता बन जाने से पहले की बात है, यानि करीब पच्चीस साल हो गए उस कहानी को टीवी पर देखे हुए। लेकिन मुझे वो कहानी कभी भूली ही नहीं।

कट टू रांची। मैं एक प्रोजेक्ट के लिए अपने शहर में हूं और देर शाम तक काम करने के बाद बजाए ऑफिस की गाड़ी इस्तेमाल करने के रिक्शा लेकर जाना बेहतर समझती हूं। मुश्किल से दो किलोमीटर का रास्ता है, फिर ये मेरा अपना इलाका है। मैं पली-बढ़ी हूं यहां। रिक्शे पर बैठकर रातू रोड से गुज़र रही हूं कि मोटरसाइकिल पर बैठा हुआ एक लड़का (जिसकी उम्र कम-से-कम मुझसे आधी होगी) बगल से गुज़रता है, घूमकर फिकरे कसते हुए, और पीठ पर धौल जमाते हुए।

पहला रिएक्शन शॉक है, जिससे उबरने में इतना ही वक्त लगा है कि मैंने उस लड़के की शक्ल भी ठीक से नहीं देखी। दूसरा रिएक्शन गुस्से का है। मेरा ख़ून इस क़दर खौला है कि मैं शहर में आग लगा देना चाहती हूं। रास्ते में उतरकर अपने दोस्त को बताया है तो वो उल्टा मुझपर ही नाराज़ होता है - किसने कहा था रिक्शे से आने को? गाड़ी क्यों नहीं मंगवाई? मैं उससे आगे और बहस नहीं करना चाहती।

घर आकर बताती हूं तो सत्रह साल की मेरी बहन कहती है, आप भी जो हैं ना दीदी। सिंदूर, चूड़ी, बिंदी कुछ लगाती नहीं हैं। किसी एंगल से मैरिड नहीं लगतीं। ये तो होना ही था।

और तुम? तुम्हें कौन बचाएगा ईवटीज़िंग से, लड़की? तुम भी नकली मंगलसूत्र पहनकर घूमो, कि बच जाओ फिकरों से। मेरी झल्लाहट बेचारी बहन पर निकली है।

मैं शादी-शुदा नहीं लगना चाहती। चूड़ी, बिंदी और मंगलसूत्र पहन लेती हूं, लेकिन शायद साल में तीन बार, वो भी सासू मां का दिल रखने के लिए। सिर पर पल्लू रखने को इज़्जत का प्रतीक नहीं मानती और इस मामले में क़रीब-क़रीब बग़ावती हूं। हालांकि, ये भी कभी-कभी कर लेती हूं, सासू मां का दिल रखने के लिए। 

शादी हुई थी तो लोग कहते थे, तुम तो मैरिड लगती ही नहीं। अरे कमबख़्तों, अब माथे पर 'टेकेन' की तख़्ती लिए चलना ज़रूरी है क्या? ऐसा ही कोई एक बोर्ड तुमलोग मर्दों के लिए भी क्यों नहीं तैयार कर देते? उनसे तो कोई नहीं कहता - यू शुड लुक मैरिड।

अब बस, ससुराल में इसी एक बात पर ठनते ठनते रह गई है। इस बार मैंने भी ठान लिया है, जैसी हूं वैसी स्वीकार करो कि अब मुझसे नहीं होगा सुहागन दिखने का स्वांग। पहले चूड़ियां उतरी हैं (खिड़की बंद करते हुए कांच की चूड़ी टूटी और हाथ कट गया, ब्लेसिंग इन डिसगाइज़!), फिर सिंदूर - सिर धो लिया और अब नहीं लगाऊंगी। ज़रूरी है नई-नवेली दिखूं साढ़े सात साल बाद भी? थोड़ा मुंह-फुलवल है, फिर मनौव्वल है। फिर लंबी बहस है, और हथियार का डाल दिया जाना है (सिन्होरा सेरेमोनियल पर्पज़ के लिए अलमारी में बंद कर दिया गया है)। रह गई बिंदी, तो मैचिंग ही सही, लगा लिया करो कभी-कभी। चलो, इतना मान लेते हैं। लेकिन नेल-पॉलिश, आलता, पायल, बिछुआ - सब दराज़ों में बंद। अपने पति के लिए मेरे प्यार का पैमाना चूड़ियों की संख्या को ना बनाया जाए, ना सिंदूर का रंग तय करेगा हमारे रिश्ते का रंग - मां से कहा है तो वो सिर्फ इतना कहती हैं - सही बात है।

कल देखा कि मां के हाथ में एक भी चूड़ी नहीं। सिंदूर भी नहीं। बिंदी भी नहीं। शॉक जैसा कुछ लगा है। लेकिन एक हल्की-सी नाइटी में सोफे पर बैठी मां किसी बात पर खिलखिला रही हैं। ना, ये नाराज़गी नहीं हो सकती। थोड़ी देर में देखती हूं कि ज़मीन पर बैठकर बड़ी तन्मयता से अपनी खाली कलाइयां आगे किए हुए पापा के पैरों के नाखून काट रही हैं। मुस्कुराकर उनकी ओर देखती हैं और कहती हैं, सीधे बैठिए ना। हिल रहे हैं, कहीं नाखून के बदले उंगली ना कट जाए।

मां की सूनी कलाइयों में चूड़ियां डाल दूं? ज़ेहन में सवाल आया है, लेकिन उसे दरकिनार कर आराम से बैठ गई हूं। हम सब उन्मुक्त हो जाने के अलग-अलग तरीके, अलग-अलग वक्त और बहाने ढूंढ लेते हैं। फिर सुहाग के चिन्हों के मायने अलग-अलग पीढ़ियों के लिए अलग-अलग क्यों हों? ज़रूरी थोड़े है कि समाज के समक्ष ख़ुद को सबला दिखाए जाने के लिए कुछ और ढोंग किए जाएं? फील फ्री टुडे, डियर मदर-इन-लॉ!


Saturday, June 9, 2012

गर्मी छुट्टी डायरीज़ 9: कर्स्यांग से पोस्टकार्ड

एक अजब-सा सुख है पहाड़ों पर सफ़र करने में। हालांकि दार्जिंलिंग और मसूरी जैसे पहाड़ों को तो मैं पहाड़ मानती भी नहीं। जब तक गोल-गोल घुमावदार सड़कों पर सफ़र करते हुए चक्कर खाकर दो-चार उल्टियां ना हुईं तो क्या गए पहाड़ पर? और कर्स्यांग तो ख़ैर छलावा है हिल स्टेशन के नाम पर। ठीक पैंतालीस मिनट में आप सिलिगुड़ी से कर्स्यांग पहुंच सकते हैं। इसलिए, समग्र चौधरी परिवार सिलिगुड़ी जाते-जाते कर्स्यांग पहुंच गया है।

सामने उतरे हुए बादल हैं, खिड़कियों से नज़र आता बारिश का झीना-सा परदा है जिसे हवा बार-बार छेड़ जाती है और पेंडुलम की तरह उदासी और बेइंतहा खुशी के बीच डोलता समझ-बूझ की सरहदों को तोड़ता एक बेकल मन है। खुश होना चाहिए मुझे ना? यहां कितना सुकून तो है। पूरे परिवार के साथ होने का सुख है। फिर तीखे-मीठे दर्द का ऐसा कौन-सा प्याला है जो कभी रीतता ही नहीं। कहीं तो चैन मिले। क्या ढूंढती रहती हैं आंखें? वो कौन-सा इंतज़ार है जो ख़त्म नहीं होता? मन को किसके हवाले कर आऊं कि कम हो जाएं बेचैनियां?

बच्चों को नहाने-तैयार करने और परिवार के साथ नाश्ते के बीच मैं यहां लौट आने के ख़्याल बुन रही हूं। दस दिनों के लिए अकेली आकर रह सकूंगी? कई-कई फोल्डरों में संभाल कर रखे गए ड्राफ्ट्स को मुकम्मल शक्ल देना मुमकिन हो पाएगा? आद्या और आदित खींचकर मुझे बाहर ले गए हैं। खरगोश हैं दो - ऊपर उड़ते बादलों जैसे हल्के और रूई के फाहों जैसे सफेद। देखा है। मैं यहां तीसरी बार आई हूं और तीन सौ बार आना चाहती हूं।

चाय कंट्री कहते हैं इसको। नीचे मकईबाड़ी के चाय के बगीचे और प्रोसेसिंग फैक्टरी दिखती है। जहां ठहरे हैं वहां चाय बार है एक। पान चाय से लेकर अहोमिया चाय तक, केसर मोगा से लेकर कहवा तक, ऑर्किड चाय से लेकर तंदूरी चाय तक - यहां आकर मेरे जैसे नॉन-ड्रिंकर का भी ईमान बिगड़ जाता है। चाय बार की कहानी अगली पोस्ट में लिखूंगी क्योंकि दो घंटे हुई बातचीत को हज़ार शब्दों में समेटना एक भरे-पूरे दशहरी आम के पेड़ पर चढ़कर ये तय करने जैसा है कि क्या खाऊं, क्या गिराऊं।

हम पहाड़ घूमने निकल पड़े हैं। मां ख़ुश हैं और आज उनकी तैंतालीसवीं सालगिरह है। पचासवीं के लिए आपको और पापा को गोआ ले जाएंगे मां, मैं कहती हूं तो मां बच्चों की तरह खुश हो जाती हैं, इतनी खुश की लता दीदी के साथ गाने लगती हैं  - कभी तेरा दामन ना छोड़ेंगे हम... आदित का नहीं, पापा का हाथ पकड़िए मां, हम उन्हें छेड़ने से बाज़ नहीं आते।

क्या मामी, आपके ज़माने में म्युज़िक डायरेक्टर्स बेस गिटार तक नहीं यूज़ करते थे, तबला और हारमोनियम से ही काम चला लेते थे? भांजा शरद पुराने गाने सुन-सुनकर पक चुका है। उसे क्या बताएं कि हमें घुट्टी में ही रेट्रो ऐसा पिलाया गया था कि टेस्ट बड्स भी कुछ तभी अप्रिशियट कर पाते हैं जब संगीत रेट्रो होने लगता है - चोर और चांद के साउंडट्रैक की तरह, या फिर यारा दिलदारा और पत्थर के फूल की तरह। शरद मेरे जवाब से दुखी होकर कानों में ईयरफोन्स घुसा लेता है - छूमंतर हों, आजा चल गुम हो जाएं... उसे भी मैं चैन से जीने नहीं देती। उसका एक प्लग मेरे कान में है। अब को फ्यूज़न है मस्त - लता-सुनिधि, शंकर-जयकिशन-सोहेल सेन, मजरूह सुल्तानपुरी-इरशाद कामिल... और हम मिरीक में हैं।

बारिश में बोटिंग नहीं हो सकती, हॉर्स राइडिंग तो हो सकती है। बच्चों को लेकर मैं किनारे चली आई हूं। बार्गेनिंग कर नहीं सकती और घरवालों को बता नहीं सकती कि झील के एक चक्कर के लिए हर घोड़े पर तीन सौ बीस देने का वायदा कर दिया। मां सुनेंगी तो सिर धुनेंगी कि परोरा की संपत्ति यही लड़की लुटाएगी आगे जाकर।

इतने में बच्चों ने घोड़ों से भी दोस्ती कर ली है, घोड़ेवालों से भी। मम्मा का नंबर याद है मुझे, फोन में सेव कर लो भैया। नोएडा आना तो हमसे ज़रूर मिलना। मम्मा, ये भैया गुड़गांव में रहते थे। अब घर वापस लौट आए हैं। घोड़ेवाले ने अपने घोड़े रुस्तम के साथ अपनी कहानी में इतनी देर में आदित को सुना दी है। मम्मा, रुस्तम तीन साल का था तो उसको गाड़ी ने मार दिया था। मालूम है, ये गाड़ी से बहुत डरता है, और छाते से भी और टीन की शीट से भी। रॉकी और बादल की कहानी शरद और आद्या ठीक-ठीक सुना नहीं पाए हमको। रुस्तम क्लियरली बेटर स्टोरीटेलर है, और आदित अच्छा श्रोता। झील के एक चक्कर में इतनी कहानियां बुनी जा सकती हैं? वैसे हुआ वही जो मैं चाहती नहीं थी। मां के सामने पैसे देने पड़े हैं घोड़ेवालों को और मां और दीदी, दोनों मुझे ऐसे देख रहे हैं जैसे जानबूझकर जंग हार आए सिपाही को उसका सेनापति देखता होगा। तेरे हाथ में कैसे देंगे कमान, ओ पगली कि तुझसे तो दो सौ रुपए भी नहीं बचते!

केले खरीदने के लिए खड़े होते ही मैं मां के कानों में कहती हूं, ये दुकानवाली हंड्रेड पर्सेंट बिहारन है। बिहारी ही नहीं, छपरा-सिवान की है। सच है कि मांग का पीला सिंदूर और हाथ में पड़ी दो दर्जन लाल चूड़ियां सब भेद खोल जाती हैं। रही-सही कसर भोजपुरी लहज़े में बोली गई बंगाली निकाल देती है। सिवान में कहां के बानी? बबुनिया मोड़। हमरो घर बा रामदेव नगर में। इतना कहना है कि तीस रुपए दर्जन केला चौबीस रुपए में मिल जाता है। छह रुपए की बचत! पचास पैसा प्रति केला!

मोमोज़ है, मैगी है, गर्म चाय है और कैमरे की मर चुकी बैट्री है। कुछ लम्हे आंखों में ही क़ैद हो तो अच्छे।

आंखों में क़ैद होते चाय के बगीचे हैं, ठहरी हुई तीस्ता है, उतरे हुए बादल हैं, देवदार है और पहाड़ी रास्तों से होकर गुज़रती लंबे-रेशमी बालों और हाई हील्स में बल खाती लड़कियां हैं। सिर पर टोकरियां लादे उनकी मांएं भी हैं कहीं-कहीं जो छतरी लगाकर पत्तियां चुनने में जुटी हैं। सड़कों के किनारे दो-चार भाई-बंधु-बाप-पितिया हैं जो नशे में ऐसे बेसुध हैं कि लाल चींटियों का होश नहीं, बारिश की ख़बर नहीं और सिर पर से होकर गुज़रती गाड़ियों से भी गिला नहीं।

और साथ चलती बहुत सारी ख्वाहिशें हैं। पहाड़ी ढलानों पर उग आए जंगली फूलों को चोटी में गूंथने की बेतुकी इच्छा है, एक बेसुध नींद का अरमान है, चुप्पियों से कहानियां चुनने की चाहत है, चुभते लम्हों के कांटों के बीच खिल आए फूलों का रंग गिनने की लालसा है। और एक आख़िरी ख़्वाहिश है - मर जाने की।  

Thursday, June 7, 2012

गर्मी छुट्टी डायरीज़ 8: हरि अनंत हरि कथा अनंता

हरि भैया का पूरा नाम हरि उरांव है। पूरे खानदान में तीन ही लोग उन्हें हरि भैया बुलाते हैं - एक मैं और दूसरे मेरे दो बच्चे। दो साल पहले हमने इस परिवार की ख़िदमत करते हुए हरि भैया की सिल्वर जुबली समोसा खाकर और पूर्णियां ड्राईव पर जाकर मनाई थी। मतलब, इस परिवार के साथ उन्हें सत्ताईस साल हो गए हैं। यूं तो हरि भैया ड्राईवर हैं, लेकिन उनके हिस्से आए कामों में बाथरूम के नल ठीक करना, बिजली के खराब तारों को बदलना, ट्यूबलाईट का चोक बदलना, करेले का भरवां और बूंदी के लड्डू बनाना, आनेवाले ख़ास मेहमानों के लिए हरि-स्टाईल मटन बनाना और बैंक, बाज़ार और बाहर के बाकी सारे काम हैं। माने हरि भैया ऑल इन वन हैं।

यूं तो मनीष से भी बड़े हैं, दीदी से भी। लेकिन हम सब उनके लिए क्रमशः भैया, दीदी औऱ भाभीजी हैं। मुझे याद नहीं कि उन्हें पुकारा गया हो और उन्होंने 'जी' के अलावा किसी और तरीके से जवाब दिया हो। हरि भैया पतिदेव के हनुमान भी हैं जिनपर असंभव कार्यों को कर दिखाने की ज़िम्मेदारी है। इन असंभव कामों में समुद्र लांघ आने के अलावा सत्तर साल पहले का खतियान निकलवाना, बेनामी ज़मीनों को रसीद कटवाना और नशे में  धुत्त अमीनों को पकड़कर घर ले आना का काम शामिल है।

हम छुट्टियों के लिए नहीं आते, हरि भैया की बैंड बजाने आते हैं। सिलिगुड़ी भी जाना है, दार्जिलिंग भी। गांव भी जाना है, भट्ठा बाज़ार भी। बच्चों को फुटबॉल भी खेलना है और खाना भी हरि भैया के हाथों का ना मिले तो क्या फ़ायदा? आप थकते नहीं हरि भैया, मैं पूछना चाहती हूं। लेकिन अपने सवाल पर शर्म आती है।

तो हुआ यूं कि ऐसी मूसलाधार बारिश हुई कि घर से निकलना नामुमकिन। चाय औऱ पकौड़ों के बीच में मां ने हरि भैया को सामने बिठा दिया। हरि की कहानी के आगे तुम्हारी सारी कहानियां फेल हैं। तो हरि, बताओ ना कि कैसे बचपन में तुमको खाने के लिए कुछ नहीं मिलता था और तुमलोग घोंघा पकड़कर खाते थे?

डिड आई हियर इट राईट? घोंघा?

बिना किसी उतार-चढ़ाव के, आवाज़ में बिना किसी नाटकीयता के हरि भैया ने जो कहानी सुनाई वो अक्षरशः लिखने की कोशिश कर रही हूं...

"पांच ठो भाई-बहन थे हमलोग। मेरा बहन और हम सबसे छोटे थे। मेरा बहन हमसे थोड़ा ही छोटी थी। बाकी बड़ा बहन लोग का सादी हो गया था। एक ठो बहन का तो उधर माटीगारा के पास सादी हुआ है। उसी का बेटा का मेहमानी में गए थे हम अभी थोड़ा दिन पहले।

हमारा बाप को कुछ काम-उम करता नहीं था। खाली हंड़िया पीकर ढ़िमालाता रहता था। हमारा मां काम करती थी। बहुत काम करती थी। उधर एक ठो बंगाली है, डे बाबू। उनका सब बच्चा सब बहुत बड़ा-बड़ा पोस्ट पर है अब। मां उनके यहां काम करती थी। सब काम - झाड़ू, बर्तन, रसोई, खाना-पीना, कपड़ा-लत्ता, बाड़ी-उड़ी का काम - सब काम करती थी। एईसा होता था कि मां कभी-कभी घर भी नहीं आती थी। अईसा होता था कि एकदम पईसा नहीं होता था घर में, एको ठो आना नहीं। फिर अनाज भी खतम होने लगता था। साग-सब्जी का बाते छोड़िए। हम लोग का उधर में जरा गो जमीन था, लेकिन हम लोग लईका-फईका आदमी कहां से साग-सब्जी लगाते? और बाबू को तो मतलबे नहीं था।

एक बार अईसा हो गया कि हम लोग का पूरा खाना खतम हो गया। फिर पानी पड़ने के बाद जो घोंघा-उंघा निकलता है ना, हमलोग उसको पकड़कर उसीन के नून मिलाकर खान लगे। ठीके लगता था खाने में। फिर ऊहो मिलना बंद हो गया। अब हमको आ मेरा बहिन का बड़ा जोर से भूख लगा। बाबू से खाना मांगे तो एतना पीटा हमलोग को, एतना पीटा कि देह पर निसान पड़ गया। मेरा बहिन तो बेहोस होने लगी।

फिर हमलोग सोचे कि भक्क साला, अईसे नहीं रहेंगे। चलो मां को खोजते हैं। मां को बोलेंगे कि हमलोग बेच दे चाहे तो कहीं किसी के यहां काम पर लगा दे। रास्ता-ऊस्ता मालूम नहीं था। हमलोग बहुते छोटे थे। हमरा उमर पांच-छौ साल होगा, हमरा बहिन एक-दो साल और छोटी होगी। तो हम अपना बहिन को लेकर घर से निकल गए। मालूम नहीं केतना देर चले। बीच में हमरा बहिन बेहोस होने लगी तो हम उसको रोड का किनारे बईठा के पानी खोजने चले गए। बड़ी देर के बाद पानी का एक ठो चापाकल मिला। लेकिन पानी लेके ओतना दूर जाएं कईसे? तो पत्ता को दो-चार ठो दोना बनाए और बहिन के लिए उसी में पानी लेकर गए।

बाकी औरो कुछो याद नहीं है। फिर मां पता नहीं कईसे मिल गई। छह साल के थे तो मां हमको धनबाद भेज दी। वहीं हम सब काम सीखे। आठ साल तक रहे उधर। खाना-पीना मिलता था, रहने का जगह था लेकिन जिस दस रुपया पर हमको रखने का बात हुआ था ऊ पईसा हमको कबो नहीं मिला। एको ठो रुपया नहीं। फिर हम उधर से छोड़कर वापस पुरनिया आ गए। इधर कपूर साब के यहां पर काम किए। ड्राईवरी वहीं सीखे। कपूर साब का परिवार का आठ-नौ गो बच्चा दार्जिलिंग में पढ़ता था। मेरा काम ऊ लोग को पहुंचाना, ले आना होता था। बस हम पहाड़ पर भी खूब बढ़िया से गाड़ी चलाने लगे। बच्चा सब खूब मानता था।

पईसा भी ठीके ठाक मिलता था। पईसा से जादा मान मिलता था। फिर कपूर साब का पूरा परिवार इधर से छोड़कर दिल्ली जाने लगा और हम यहां आ गए। हम अपना वाईफ को कबो काम करने को नहीं भेजे। हमको मालूम है ना घर का मेहरारू काम करने जाती है तो बच्चा सब का क्या दुरगति होता है। हम अपना बच्चा सब से भी काम नहीं करवाते हैं। कमे में गुजारा हो जाए, लेकिन हमको छोड़के कोई काम काहे के लिए करेगा?

हरि भैया, लेकिन मैं तो काम करती हूं। आपको मालूम है ना?

आपका बात दोसरा है भाभीजी। हमलोग का दोसरा टाईप का जिनगी है ना।

है तो हरि भैया, लेकिन जीवट तो आप ही कहे जाएंगे। ज़िन्दगी को सही तरीके से पछाड़ते तो आप ही हैं। हम तो ई जिनगी को जीने का ढोंग करते रहते हैं, बस....

अईसा थोड़े है भाभीजी? जरूरी थोड़े है कि घोंघा नहीं खाए तो जीवन देखबे नहीं किए? सबका अपना-अपना जीने का तरीका होता है, अलग-अलग तरह का पिरॉबलम होता है।

यही पिरॉबलम और जीने के अलग-अलग तरीके सीखने के लिए मैं हूं यहां। हरि भैया की अनंत कथाओं में से बाटती रहूंगी कुछ आपसे भी...

Wednesday, June 6, 2012

गर्मी छुट्टी डायरीज़ 7: आषाढ़ का पहला दिन

ये कमबख़्त दोपहर किसी तरह काटे नहीं कटती। बिहार में बिजली नीतीश कुमार के साथ दौरे पर होती है (जिस शहर में सीएम, उस शहर में बिजली) और सीएम ने अंगक्षेत्र क्या छोड़ा, बिजली ने भी साथ छोड़ दिया। उमस से हैरान-परेशान हम बड़ी-बड़ी खिड़िकियों से बाहर झांकते हुए गुम हो गई हवा का पता ढूंढते हैं। दूर दिखाई देती सड़क पर पसरा सन्नाटा देखकर मेरा दिल जाने क्यों और डूबा जाता है। बीच-बीच में खामोशी सड़क पर गुज़रता कोई ट्रैक्टर तोड़ जाता है। लैपटॉप नहीं है, फोन नहीं है, किसी का इंतज़ार नहीं है। सबकुछ ठहरा हुआ है जैसे। फिर भी सुकून भाग जाने की तरकीबें जुटाते हुए क्यों मिलता है? ऐसी भी क्या बेकली?

एक-दो-तीन...छह-सात-आठ... रसोई में बन रहे व्यंजनों की गिनती करने के बाद मैं घबराकर बाहर निकल आई हूं। जाने गर्मी वजह है या रसोई में खड़े होने के ख्याल का एक टुकड़ा कि मेरा दम घुटने लगा है। प्रोडक्टिव होने के नाम पर तोरी छिलने औऱ प्याज़ काटने के अलावा मेरा कोई योगदान नहीं। मेरा मन ही नहीं लगता यहां, और मैं शायद ही बिना मन के रसोई में काम कर सकती हूं। कम-से-कम कोई तो एक जगह हो जहां मैं हथियार डाल सकूं। ले जाओ ये करेले से आती अमचूर की खुशबू, ले जाओ पुदीने का स्वाद, ले जाओ कढ़ी की नरमी और बासमती के टुकड़ों का स्वाद। गर्मी में ये सब ख़राब सेल्स पिच जैसा कुछ लगता है।

बच्चे अपनी दुनिया में मस्त हैं। उन्हें लीची तोड़ने, रेत के घर बनाने और एक-दूसरे से रूठने-मनाने-संभालने से फुर्सत नहीं। बच्चों के बापू के पास तीन अलमारियां भरकर ज़मीन से जुड़े मुकदमों की फाइलें हैं और उन ज़मीनों की चिंता है जिन्हें बचाए रखना है। मां और पतिदेव का आधा दिन एक कमरे से दूसरे कमरे में ज़मीन के काग़ज़ खोजते हुए गुज़रता है। मेरे पास लिखने के लिए कुछ नहीं। कहने के लिए कुछ नहीं। सुनने के लिए कुछ नहीं। बोरियत की पराकाष्ठा है। कहीं कुछ तो शोर हो कि चुप्पी दोपहर की तरह ही भयावह हो गई है।

कैथरीन स्टॉकेट ने साथ छोड़ दिया। अमीष की दोनों किताबें पढ़ने में कुल तीन दिन लगे। अब क्या करूं? हर बार यहां आती हूं तो लगता है, दुनिया मुझे छोड़कर बहुत आगे निकल गई होगी। पूरे दिन दुनिया को जानेवाली इकलौती वर्चुअल खिड़की फेसबुक और जीमेल भी तो खोलकर नहीं देखा, कि तेज़चाल वक्त गुज़रता होगा कहीं, हम तो यहीं ठहरे जाते हैं।

कमरे में लेटने के इरादे से आई हूं तो कबूतरी मेरे ऊपर से फड़फड़ाती हुई गई है। डर से तीस सेकेंड के लिए मेरी सांसें रुक गई हैं। उसके औचक निकास ने मेरे प्रवेश को रोक ही दिया होता, अगर बच्चों ने कमरे से क्रेयॉन्स लाने की ज़िद ना की होती। भीतर आई हूं तो पूरे कमरे को कबूतर के बच्चों ने गंदा कर रखा है। इन्हें बाहर निकालना होगा अब।

भाभीजी, आप एक कबूतर से परेशान हैं? आपके कमरे के रौशनदान में दो चमगादड़ और उसके तीन बच्चे हैं। यकीन ना हो तो मेज़ पर चढ़कर देख लीजिए। अभी तक तो छिपलकी,टिड्डे, चूहा, बिल्ली, कबूतर, कॉकरोच, रंग-बिरंगी तितली, लेडीबर्ड, मधुमक्खियां और मच्छर ही थे। अब चमगादड़ भी? पीसफुल को-एक्ज़िस्टेंस की इससे बेहतर मिसाल और नहीं मिलेगी।

रेगिस्तान से आईं बड़ी ननद रंग-बिरंगे पैकेट्स निकाल रही हैं। राजस्थानी नमकीन, बीकानेरी भुजिया, शक्करपारे, नमकपारे, लोबिया का मिक्सचर और पता नहीं क्या-क्या। बाकी आर्मी कैंटीन का माल है। हमने भी अपनी तरफ से लीची, आम, चीकू और पुदीने का शर्बत पेश कर दिया है। खाने-पीने की प्रतिस्पर्धा नहीं हुई तो गर्मी की क्या छुट्टी?

आओ रे बादलों कि आज आषाढ़ का पहला दिन है, सासू मां ने प्यार से क्या पुकारा है, शाम तक बादलों ने छत पर ऐसा घेरा डाला है कि सूरज ढलने से पहले ही अंधेरा घिर आया है। हम ज़ंजीर-सी हवा से बंधे हुए छत के एक कोने से दूसरे कोने में ढ़िमलाए फिर रहे हैं। नीलकंठ है, कोयल है, कठफोड़वा है, बया है, मैना और गौरैया तो हैं हीं, फ़ाख्‍ता है (जिसे मां पंडुक कहती हैं) और एक सुनहरे रंग की चिड़िया है जिसका कोई नाम नहीं बता पाया है। शाम इनके गीतों से गुलज़ार होने लगी है। जीना इतना भी मुश्किल नहीं, कि इंतजार का भी कोई ना कोई रंग-रूप होता है।

रात होते ना होते ऐसी मूसलाधार बारिश हुई है कि हमें खिड़की-दरवाज़े बंद करने पड़े हैं। अपने कमरे की एक खिड़की खोल कर मैं दूर सड़क पर बत्तियां जलाकर आती गाड़ियों को देखती हूं। जाने क्यों, लेकिन बारिश में मैं हमेशा मुंबई में ही होना चाहती हूं, और कहीं भी नहीं। बारिश में चमकते हेडलाइ्ट्स और सड़क पर पड़ती रौशनी की परछाई जाने कितने रंग की यादों में गहरे डुबो जाया करती हैं...

बारिश थमने लगी है और देर शाम पतिदेव ने बाहर ले जाने का प्रस्ताव रखा है। हम अपनी हवाई चप्पलों में गाड़ी में लद गए हैं और पहली बारिश में गीले हुए शहर का मुआयना करने निकल पड़े हैं। बच्चों की खिलखिलाहट और दीदी की चुटकियों के बीच किशोर कुमार की आवाज़ बरसने लगती है - ये ना सोचो इसमें अपनी हार है कि जीत है/ उसे अपना लो जो भी जीवन की रीत है/ये ज़िद छोड़ो, यूं ना तोड़ो हर पल एक दर्पण है...


मेरा आत्मालाप बंद होने लगा है और मैं आइसक्रीम खाते हुए खिड़की से बाहर अमलतास के गीले पेड़ों से टपकती बूंदें गिनने लगी हूं।



Tuesday, June 5, 2012

Garmi Chutti Diaries 6: With love, from Mamma

Aapne Naani Maa ko kab bataaya ki aapko writer banna hai, Mamma? (How old were you when you told Naani Maa that you wanted to be a writer, Mamma?)”, you asked one night while I continued to stare at the screen, re-reading a pathetic story I had just finished writing.
“Hmmm… I didn’t even know I was going to be one, Aadu”, I say, gaze still fixed on the screen.
“But I know that I want to be a writer like you one day. Should I tell you now or later?” You say and I turn to look into your beautiful black eyes. Your smiling eyes are the best thing that I have been gifted with, Adya. They talk, and how!
It takes a few seconds for me to realize what you mean. I am not sure if it is the ‘want-to-be-a-writer’ part or ‘like-you’ part that I should worry about more, but I suddenly feel a tight knot form inside my heart.
I had started writing this letter in my head while trying to put you to sleep, and I may have lost some important points in the process. But I will still try to tell you what it means to have a desire like that, so you make an informed decision when you have to take one. This letter should help you understand what it really means to have an unusual ambition of ‘being a writer’.
I didn’t want to be a writer, to begin with. Or at least didn’t want to be called one. It sounded too pretentious, too difficult to believe. I would give credit to Natasha Maasi and Bhaiya Maamu for making me believe that it was alright to call oneself a writer. It was alright to write through most part of the day, and it was alright not to get paid for that. And it was perfectly alright to remain unemployable with your musings and idiosyncrasies. So, you see, writing isn’t such a fancy job after all. There is no money, and there is hardly any fame, at least for a long long time. And then, it is hardly considered respectable in our society. Writers are known to be self-destructive, mad, unsocial, promiscuous and broke. Does it sound terrifying? It is meant to be.
Do you know what I am getting in the bargain out of this whole writing business? More and more heart breaks, while what I write seems like a piece of junk, something you would conveniently want to tear and toss into the dustbin. More and more sleepless nights, as I can’t get a damn story out of my head. I have got this compulsive disorder of eavesdropping and observing intently, when all it gives me is a terrible headache and restlessness. Mamma seems to be lost in her own world lately, staring at faces, trying to guess their stories or weave one for them. Nowadays I have been overwhelmed by this strong urge of writing about things I have never talked about – even when I am well aware of the consequences.
And then it fills me with immense peace when I realize that this whole writing thing is taking me away from the kitchen more and more. I care less about appeasing others now. It is taking me away from the unnecessary hours spent in fixing your opinions about everyone else around you other than yourself. Mamma, however, still has to learn to handle the contempt in everyone else’s eyes when she walks into a room full of people after a long day spent on the laptop. “So, writing again, huh?” Well, yes. Sigh.  I still haven’t found an answer to “itna kya likhti rahti ho”?  So, a writer will have to be prepared to destroy comfort zones while creating her own fantasy world. She will have to handle contempt and disdain which will come in abundance. 
Do you want your characters to be what you could never be?  Do you really want to go through the pain which isn't even yours? Especially when you don't even know if you will succeed at narrating that pain? I would rather want you to be carefree and untouched by what was going around you. You have one life, and you should live it well. Although I have no control over your destiny, and I have no idea what’s in store for you, I somehow dread this thought of you writing relentlessly. 
You learn to write by trial and error. You learn to write by walking into the walls. You learn to write by bringing forth your pain and sufferings. You learn to write only if you are willing to go through this self-inflicted bitterness and loss. You learn to write only when you believe that what’s happening around you is not right, and you better talk about it in your own way!
So, my darling, writing can get extremely volatile for you, going against ideas of morality and righteousness that you were raised to believe in; conjuring unpleasant or simply unbelievable notions about life around you. If you really want to be a writer, be open-minded, for there is nothing that’s right or wrong. We are our best judges. And take a plunge only when you have the conviction of seeing through the layers that we are taught to ignore.
Do not pretend to believe when you do not. It is alright to question, debate and argue. Look for your own explanations. That’s again something you won’t be taught, especially with a mother like me around you, who so strongly believes in harmony that she will forego her convictions just to maintain peace in her surroundings. That, my girl, is not a good state to be in for a writer, or even for a woman. So, I would rather say you change the ‘like-Mamma’ bit to ‘unlike-Mamma’. Or at least make some amendments while you are trying to be like Mamma.  
So, Adya, decide to be a writer only when you are sure of being able to handle extreme emotions like love and hatred. Be a writer only when you can do well with your failures. Be a writer only when you have questions worth thinking about.
I know in my hearts of heart that the daughter I feel proud of everyday will make me feel proud one day. Here is what I wish for you… May you be the creative being Mamma could hardly be and may your life become your work of art, just the way you want it to be. 
For now, Mamma will write because she wants to live life twice over - one in the moment, and the other in retrospection. 
With love,
Mamma

Sunday, June 3, 2012

गर्मी छुट्टी डायरीज़ ५: ज़मीन, जायदाद, ज़मींदारी की अनचाही विरासत

कुछ दशक पहले तक पूर्णियां की नब्बे फ़ीसदी जमीन पर कुल चार या पांच रियासतें और ज़मींदार काबिज़ थे। चंपापुर, गढ़बनैली और राजा पीसी लाल का नाम तो मैं अक्सर सुना करती हूं। इन्हीं रियासतों की सूची में सबसे नीचे एक और रियासत हुआ करती थी, जिसके बारे में कहा जाता है कि ये रियासत विरासत की नहीं थी, बनाई गई थी। इस रियासत के बनने की प्रक्रिया में कौन-कौन सा रास्ता अख्तियार किया गया होगा, इसपर एक महाकाव्य लिखा जा सकता है। बहरहाल, इसी एक रियासत की बात करनी है मुझे, जिसमें मेरी शादी हुई।

तीस-पैंतीस साल पहले सीलिंग एक्ट के लागू होने के बावजूद, दादी सास के भूदान आंदोलन में ज़मीन खुलकर बांट आने के बावजूद, एकड़ों-एकड़ों ज़मीन पर अतिक्रमण के बावजूद भी मेरी शादी तक ज़मीन इतनी बाकी थी कि नाते-रिश्तेदार रश्क करते हुए कह सकें, बड़े ज़मींदार परिवार में जा रही है लड़की। उसके बाद से अब तक तय नहीं कर पाई हूं कि किस्मत को सराहूं या कोसूं, कि विरासत में मिलनेवाली ज़मीन के साथ-साथ एक अनचाहा भार भी मिला है जिसे संभालना नहीं आता।

तो ये रियासत एक ज़माने में बिहार के दस बड़ी ज़मींदारियों में गिनी जाती थी। दो बड़े बंटवारों के बाद हर परिवार के हिस्से में इतनी ज़मीन आई कि खेती करने के साथ-साथ ज़मीन को बेच-बेचकर बच्चों को दार्जीलिंग और दिल्ली के हॉस्टलों में पढ़ने के लिए भेजा जा सके और अगली दो-चार पुश्तों के भविष्य को सुरक्षित रखा जा सके। रियासत के मालिक ने इतनी समझदारी दिखाई कि बेटियों का ब्याह गरीब परिवारों के ऐसे लायक लड़कों से कम दहेज देकर किया गया जिनमें डॉक्टर, इंजीनियर, बैंकर बनने की प्रतिभा थी। बहुएं लाईं गईं बड़ी रियासतों से, जिनके साथ सोने-चांदी-हीरे-जवाहारातों के साथ ताक़तवर रिश्तेदारियां आतीं।

ये पिछली पीढ़ी के किस्से हैं। पिछली पीढ़ी का सच ये भी है कि जहां अति होती है, अति भी वहीं होती है। सो, ज़मींदारी बिखरती गई और ज़मीन-जायदाद नशे और ऐय्याशियों की भेंट चढ़ने लगे। बंटवारे के बाद भी एक धुर ज़मीन के लिए भाई-भाई एक-दूसरे के ख़ून के प्यासे रहे। पूरा परिवार बेईमानियों, डर, अवसाद और कर्ज़ के बोझ तले दबता चला गया। ज़मींदारी नहीं बची, और किसी तरह बची-खुची ज़मीन पर खेती करके परिवार गुज़ारा करते रहे। लेकिन ऐंठ ना जानी थी, नहीं गई।

चौदह भागों में बंटे परिवारों में एक वो परिवार भी था जिसमें मेरी शादी हुई। बड़े पापा डॉक्टर थे, सन बहत्तर में ही न्यू यॉर्क जाकर बस गए और वहीं के हो गए। बाकी रहीं दो बुआएं, जिनकी शादी नौकरीपेशा लड़कों से हुई। मनीष के कुल दस भाई-बहनों में छह विदेशों में हैं। कोई लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से पढ़ा, तो किसी की संतान हावर्ड मेडिकल स्कूल में है। एक बच्चा बर्कशायर के एटन कॉलेज में पढ़ रहा है तो दूसरा केम्ब्रिज जाने की तैयारी कर रहा है।

रह गए पापा, जिन्होंने एग्रीकल्चर की पढ़ाई ही इसलिए की ताकि खेती-खलिहानी और ज़मीन-जायदाद संभाल सकें। सुना है कि अस्सी के दशक में खेतों से इतना गन्ना निकला करता था कि लाखों-लाख के गन्ने बेचकर कम-से-कम तीस परिवारों का भरण-पोषण होता था। ये भी सुना है कि पापा की लगाई हुई फ़सल की चर्चा पूरे सूबे में होती थी और वर्ल्ड बैंक की टीम उनके खेतों को देखने आई थी एक बार। ये भी सुना है कि वो सुबह चार बजे से ही खेतों में लग जाया करते। मज़दूरों की बस्तियां बसाईं गईं, उनके लिए घर बनाए गए, सीलिंग से बचने के लिए उनके नाम ज़मीनें रखी गईं।  हालांकि इच्छा सतह को कुरेदकर वहां से भी कहानियां निकालने की होती हैं, लेकिन कुछ किस्से अनकहे ही अच्छे होते हैं।

फिर धीरे-धीरे खेती भी खत्म हो गई, सामंतवाद भी। किस्मत का उड़नखटोला एक जगह टिकाकर नहीं रखता कभी किसी को। संतुलन के लिए आवश्यक है कि पहिया घूमता रहे, किस्मतें बदलती रहें। ज़मीन हाथ से निकलने लगी है। बगीचों पर, खेतों पर उन्हीं गरीबों ने घर बना लिए हैं जिनके बाप-दादाओं को सरहद पार से लाकर यहां बसाया गया था। सरकार द्वारा अधिग्रहण ज़मीन के बदले सालों-साल से कॉम्पेनसेशन नहीं मिला। ज़मीन के झगड़ों को लेकर इतने सारे दीवानी और फौजदारी मामले ज़िला अदालतों में हैं कि मुझे लगता है, सरकार को सिर्फ परोरा एस्टेट के मामलों को निपटाने के लिए अलग से बेंच बना देना चाहिए। ज़मीन को बचाने के इस युद्ध में पैसा, रुतबा, वक्त - सब झोंका जा रहा है। सभी चौदह परिवारों की दिनचर्या एक-सी है। घर का कम-से-कम एक पुरुष सदस्य हर रोज़ अदालतों के चक्कर लगाने के लिए घर से निकलता है, वहीं छप्पर डालकर बनाए गए होटलों में मीट-चावल और रसगुल्लों का लंच करता है और बटाईदारी कानून को जी-जीभर कर गालियां देता है। बची-खुची गालियां नीतिश कुमार के हिस्से में भी जाती है, जो ना पिछड़ों के हो सके ना अगड़ों के। 

मैं मां से पूछती हूं कि इसका हासिल क्या है? गांव के जिस पुश्तैनी घर में कोई रहता नहीं उस घर को हम किसी स्कूल को दान में क्यों नहीं दे देते? जिन ज़मीनों पर कुछ उगाया नहीं जाता, उन्हें बांट क्यों नहीं दिया जाता? बांटने की दरियादिली नहीं तो बेच सकने से जुड़ा लालच तो है। लेकिन फिर हम ज़मींदार कैसे कहे जाएंगे? मैं लंबी सांस भरती हूं और मन मसोस कर रह जाती हूं जब बात होती है आदित की। उसके लिए हम क्या छोड़ेंगे? हुनर मां, मैं कहना चाहती हूं। मेरे बच्चों को भी उन्हीं फैंसी कॉलेजों में पढ़ने का हक़ है जहां विदेशों में रहने वाले उनके बाकी भाई-बहन पढ़ रहे हैं।

और आदित खेती करना चाहे तो? इसी ज़मीन पर सोना उगाना चाहे तो? यहीं रहकर समाज बदलना चाहे तो? बिहार का भविष्य बदलने में योगदान देना चाहिए तो?

मैं चुप रह जाती हूं। ये चुनाव भी तो मेरा ही था। ये कैसी दुविधा है? ज़मीन और आसमान के बीच त्रिशंकु-सा लटकने रहने की कैसी सज़ा है? ये कैसी विरासत सौंपेगें हम अपने बच्चों को?

Saturday, June 2, 2012

गर्मी छुट्टी डायरीज़ ४: दो सौ बार गिरना-संभलना, बनना-बिगड़ना

ये कोई ऐसा मील का पत्थर भी नहीं जिसका जश्न मनाया जाए। लेकिन अपने ड्राफ्ट्स में देखती हूं कि आज लिखी जाने वाली पोस्ट मेरी २००वीं पोस्ट है, तो मैं थमकर सोचने पर विवश हूं कि क्या हासिल रहा इस लिखाई का? मुझे लिखना नहीं आता, लेकिन कमाल की बात है कि यही लिखना अब मेरी आजीविका है। (पेशा नहीं कहना चाहती, अभी भी)। फिर ब्लॉग पर इस लिखे हुए को सेलीब्रेट करने का बहाना क्यों ढूंढा जाए?

२००९ में ब्लॉग करना शुरू किया था शायद। अजीब से दिन थे वो भी। दो-ढाई साल के बच्चों के साथ उलझी हुई थी। कोई सोशल लाईफ नहीं, कोई दोस्त नहीं। नौकरी छूटी, दोस्त-यार छूटे। कई-कई महीने दिल्ली से दूर इधर-उधर बिताती रही। कई-कई दिनों तक फोन की घंटी तक नहीं बजा करती थी। किसी से बात भी करती थी तो ज़ुबां पर कोई बात नहीं आती थी। बच्चों को बड़ा करना इतनी एकाकी प्रक्रिया होती है, मुझे इसका ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था। मैं पूर्णियां में थी बच्चों के साथ और मुझे याद है कि फोन पर भाई को कहा था, आई कान्ट थिंक स्ट्रेट। कई बार लगता है कि मैं अपनी भाषा भी भूलने लगी हूं।

मैं भूलने ही लगी थी सबकुछ। दोस्तों से कतराने लगी थी, खुद से डर लगने लगा था और आत्मविश्वास टुकड़े-टुकड़े होकर ऐसे बिखर गया था कि सूझता ही नहीं था, सहेजना शुरू कहां से करूं खुद को।

फिर एक दोस्त की ज़िद पर ब्लॉगिंग शुरू की। जहां होती हो, वहां से लिखा करो। लेकिन लिखूं क्या? कुछ भी। जस्ट थिंक अलाउड।

वैसे भी मुझे जानता कौन था? पहले टूटी-फूटी कविताएं आईं, फिर कच्ची बेहद खराब कहानियां। छह महीने तक मैंने ब्लॉग को यूं ही छोड़ दिया। फिर एक दिन जनसत्ता में छपी अपनी कहानी को ब्लॉग पर क्या डाला, लोगों को मेरे होने की ख़बर मिल गई। गिरिजेश राव, आप पढ़ रहे हैं इसे तो अपने हिस्से का आभार लेते जाइए। मुझ जैसी आलसी, अनसोशल, घुन्नी इंसान को ब्लॉगिंग की दुनिया में आपने ही ढकेला। इस बात की माफ़ी कि मैं बहुत खराब शागिर्द निकली।

उसके बाद ई-मेल्स आने लगे, दोस्त बनने लगे। बावजूद इसके कि मैं किसी ब्लॉग पर जाकर प्रतिक्रिया ज़ाहिर नहीं करती। लेकिन दावे के साथ कह सकती हूं कि बीस बड़े और रेग्युलर ब्लॉगर्स के लिखे हुए एक-एक बेनामी पोस्ट मुझे पढ़ने को दे दिए जाएं तो मैं बता सकती हूं कि कौन-सी पोस्ट किसकी लिखी हुई है।   

मुझसे कई बार पूछा गया कि मैं अपने बारे में ही क्यों लिखती हूं? पत्रकार हूं, कई और विषयों पर मेरी राय भी तो हो सकती है। ये ब्लॉग मेरे लिए मेरी बुद्धिजीविता या ज़हानत को साबित करने का ज़रिया नहीं है। ये ब्लॉग एक रोज़नामचा है जहां मैं बेहद ईमानदारी से वो दर्ज करती हूं जो अपने बच्चों के लिए छोड़ जाना चाहती हूं। पहले भी लिख चुकी हूं कि मेरे बच्चों को इससे फर्क नहीं पड़ेगा कि मेरी पोलिटिकल लीनिंग क्या थी या कश्मीर के मसले पर मैं क्या राय रखती थी। लेकिन उन्हें इससे फर्क पड़ेगा कि मेरी ज़िन्दगी में उनका होना क्या मायने रखता था या एक औरत, एक इंसान होने के नाते मैं कैसे गिरती-संभलती, हारती-जूझती रही। ज़िन्दगी के बड़े पाठ अख़बारों से नहीं आते, मोटी किताबों से भी नहीं आते। ज़िन्दगी के पाठ हमारी-आपकी कहानियों से आते हैं, हमारे-आपके रोज़मर्रा के अनुभवों से आते हैं और मुझे अपने बच्चों की ख़ातिर यही पाठ छोड़ जाना है। यहां यूं भी कमबख्त क्या कालजयी हुआ करता है? वैसे भी, हैं और भी दुनिया में सुखनवर बहुत अच्छे....

मेरी ब्लॉगिंग के तीन बड़े फायदे हुए - मैं धीरे-धीरे निर्भीक, ईमानदार और बिंदास हो गई। मैंने बहुत सारे दोस्त बनाए और तीसरा सबसे बड़ा फायदा ये हुआ कि मैंने अपने कई बेहद अंग्रेज़ीदां दोस्तों को हिंदी पढ़ना सीखा दिया। इस्मत, मंटो और नसीर वाली पोस्ट के बाद तीन दोस्तों ने फोन किया, कैन आई बॉरो सम बुक्स फ्रॉम योर कलेक्शन? हिंदी की किताबें! ये मेरी सबसे बड़ी उपलब्धि है।

मेरे कई स्कूल के दोस्तों ने मुझे मेरे ब्लॉग के सहारे ढूंढ निकाला। फेसबुक पर दोस्तों की संख्या १३५ से बढ़कर पांच सौ के पार हो गई। ये भी जानती हूं कि अमेरिका, यूके, फिनलैंड और ऐसी कई फैंसी जगहों पर मेरे कई पुराने दोस्त बैठे हैं जो मेरा कच्चा-पक्का लिखा हुआ पढ़ते हैं। इनमें से कई क्रश भी होंगे, और ये सोचकर मेरे चेहरे पर बड़ी-सी मुस्कुराहट उतर आई है। मैं ठीक हूं, दुरूस्त हूं और अपनी तमाम दीवानगियों और गलतियों के बावजूद बची हुई हूं - ये ब्लॉग तुम लोगों को वही बताने का ज़रिया है दोस्तों।

बाकी, बच्चे बड़े होकर मम्मा की डायरी पढ़ेंगे तो उन्हें कुछ वैसा ही रोमांच होगा जैसे मम्मी का लिखा हुआ पढ़ने पर हमें होता है। बस दुआ कीजिए कि डायरी लिखने का ये बेसाख्ता सिलसिला बंद ना हो। बाकी शोहरत, दौलत, चाहत, किस्मत - सब आनी-जानी है।

जाते-जाते एक और बात...

जो दिखता है यहां,
मेरा एक टुकड़ा है/
जो बिखरा है टुकड़े-टुकड़ों में/
मेरा वजूद है।

Friday, June 1, 2012

गर्मी छुट्टी डायरीज़ ३: मैं भी करती हूं... जेन्डर डिस्क्रिमिनेशन

मैं जानती थी कि आद्या तो आएगी ही। बेटी के बिना मैंने अपने मां बनने की कल्पना की ही नहीं थी। अल्ट्रासाउंड में पता चला कि जुड़वां बच्चे है, तो मैंने मां से कहा, एक तो आद्या है। दूसरा अदिति है या आदित, ये बताना मुश्किल है। हालांकि सातवें महीने से गट फीलिंग कहने लगी थी कि शांत, बिना उछल-कूद किए, बिना अपनी उंगलियां से गुदगुदी किए भीतर से चुपचाप मां को महसूस करती आद्या रही होगी और शरारती, हाइपरएक्टिव, डिमांडिंग बच्चा आदित रहा होगा।  इसलिए बच्चे बाहर आए तो मुझे कोई हैरत नहीं हुई - इन्हें आद्या और आदित ही होना था, मैं पिछले कई हफ्तों से जानती थी।

सी-सेक्शन के बाद होश आया तो मुझे आईसीयू में ले जाया गया जहां दोनों बच्चे थे। आदित को इन्फेक्शन था, इसलिए उसके मुंह पर ऑक्सीज़न मास्क था, जाने कितनी नसों से जाने क्या क्या एंटिबायोटिक्स दिए जा रहे थे। पैदा होने से पहले आदित डिस्ट्रेस में आ गया था जिसकी वजह से मैं लेबर में चली गई और बत्तीसवें हफ्ते में ही बच्चों को बाहर निकालना पड़ा। आदित को देखकर कलेजा मुंह को हो आया था। पैदा होते ही इतनी तकलीफ़? बच्चे को किस बात की सज़ा मिली है, या ख़ुदा?

आदित के पालने से दूर आद्या लेटी थी। मैंने उसका नाम भी नहीं देखा था, ना नर्स ने अभी बताया ही था कि इन तीस बच्चों में मेरा दूसरा बच्चा कौन-सा है? लेकिन उसकी गहरी, काली, गोल-गोल आंखें और गोल चेहरा देखते ही मैं दूर से ही जान गई थी कि वही है आद्या। पैदा होने के तीसरे दिन ही आद्या की आंखों को बोलते सुना था। उसे पहली बार गोद में लेना और उसका टुकुर-टुकुर ताकना, फिर धीरे से मुंह सीने में छुपा लेना याद आता है तो लगता है, मां बनने का पहला एहसास ऐसा ही होता होगा - निर्मल, अनिर्वचनीय, अद्भुत, अविश्वसनीय।

मेरी बेटी शुरू से फाईटर है। खुद की बेहतरी और सुरक्षा की समझ उसे पैदा होने से पहले से है। उसे बचपन से ही ये भी मालूम है कि कब कितनी ज़िद करनी होगी और कितनी ऊंची आवाज़ में क्या मांगना होगा, कब स्पेस देना होगा, कब रोना होगा और कब चुप हो जाना होगा। आदित कमज़ोर था, इसलिए ज़ाहिर है उसके लिए हम सब को बहुत सावधानी बरतनी होती थी। दो महीने की ही थी आद्या, जब उसे समझ में आ गया था कि मां के पास होने की उससे ज्यादा उसके भाई को ज़रूरत है। बिना किसी नखरे के आद्या ने बोतल से दूध लेना शुरू कर दिया और रात में नानी के पास सोने लगी। सोचकर रुलाई आती है कि मम्मी ने आद्या को पहली बार अपने कमरे में सुलाने के लिए ले जाते हुए कहा था, बेटी है ना, अभी से त्याग करना जानती है। भाई के लिए उसने मां को छोड़ दिया।

फिर तो वो अपने-आप मुझसे दूर होती चली गई। आदित मां को नहीं छोड़ता था और आद्या कभी नानी, कभी दादी, कभी बुआ, कभी मौसी के साथ सोती रही, उनकी कहानियां सुनती रही। मेरे पास दिन में जो थोड़ा-बहुत वक्त होता था, आद्या को देना चाहती थी। लेकिन उसे तब भी मुझसे दूर होना ही रास आता था। जिस बेटी के लिए बचपन से मन्नतें मांगीं, वही बेटी जुदा-जुदा रहने लगी थी।

फिर आद्या की फितरत, उसके तेवर हैं भी मुझसे बिल्कुल अलग। मुझमें कोई फेमिनिन खूबियां नहीं। मैं बिंदी भी बड़ी मुश्किल से लगाती हूं और पांच सालों में कितनी बार तैयार हुई होऊंगी, मेकअप किया होगा, छोटी उंगली पर गिन सकती हूं। ठीक इसके विपरीत मेरी बेटी को अच्छे कपड़ों, गहनों, अच्छी खुशबूओं का शौक था। मैं क्रीम, शैंपू, लिपस्टिक, काजल छुपाती रहती और आद्या उन्हें ढूंढ-ढूंढकर अपने बार्बी बैग में सजाती रहती थी। दोनों बच्चों के लिए एक-से खिलौने लाने, इंटेलिजेंट गेम्स खिलाने की मेरी तमाम कोशिशें बेकार रहीं। आद्या जितना बार्बी की दुनिया में रहती, मुझे उतनी ही कोफ्त होती। मैं उसको जितना टॉमबॉयिश बनाना चाहती, वो उतनी ही तेज़ी से लड़कियों वाले सारे शौक पालती चली जा रही थी। मैं कहीं से लौटती तो देखती कि बिटिया रानी ने दुल्हन जैसा श्रृंगार कर रखा है अपना, और मेरा पारा चढ़ जाया करता। ये घर में चीखने-चिल्लाने और  कॉन्फ्लिक्ट पैदा करने का सबब बनता जा रहा था। मैं और आद्या दूर होते चले जा रहे थे एक-दूसरे से। इतना कि वो मेरे पास होमवर्क करवाने के लिए भी नहीं बैठा करती थी। उसे मौसी चाहिए होती थी। स्कूल के लिए या तो कामवाली दीदी तैयार कराती या मौसी। मम्मा के लिए जगह नहीं थी। वक्त भी नहीं था। आदित ना चाहते हुए भी मुझे घेरे रहता था।

मैं क्यों अपनी बेटी को वक्त नहीं दे पा रही थी? हममें इतना तनाव क्यों था? पांच साल की आद्या में इतना विद्रोह, कि मां की हर बात को काटना उसका जन्मसिद्ध अधिकार हो जैसे? कहां तो मैं अपनी बेटी को उन तमाम बंदिशों से परे पालना चाहती थी जो बचपन में या अब भी जाने-अनजाने मुझपर डाली गई हों, और कहां हम एक-दूसरे से उलझते जा रहे थे। आद्या में विद्रोह के वो सारे लक्षण थे जिन्हें मैं अपने-आप में खूब मज़े में दबाती  रही हूं। समस्या कहां थी? क्या मैं भी जेन्डर डिस्क्रिमिनेशन कर रही थी? या ये एक स्वाभाविक प्रक्रिया है जिससे एक बेटी और एक बेटे को बड़ा करते हुए आप बच नहीं सकते?

फिर एक दिन मेरी बेटी मेरी बांहों में लौट आई। जाने वजह क्या थी, लेकिन दस दिनों तक बाबा-दादी के पास मां के बगैर रहते हुए आद्या ने मुझे जितनी शिद्दत से याद किया और जिस बेकली से मेरा इंतज़ार करती रही, उस बेचैनी की उम्मीद मुझे आद्या से नहीं, आदित से थी। लेकिन दस दिनों के बाद बच्चे पूर्णियां में मिले तो मैं उनमें आया बदलाव देखकर हैरान थी। आदित अपने पैतृक घर में ठीक उसी आत्मविश्वास और गुरूर के साथ घूम रहा है जो घर के बाकी पुरुषों में होना स्वाभाविक माना जाता है। मेरी बेटी मुझसे पूछती है कि आदित यहीं रह जाएगा और मैं कहां चली जाऊंगी मम्मा? ये सब आदित का है तो मेरा क्या है? उसके चेहरे पर परेशानी की लकीरें हैं और मैं उसका माथा चूम लेना चाहती हूं। अब समझ में आया है कि नताशा क्यों शुक्र मनाती है कि तीन बेटियां ही हुईं उसको। बेटे और बेटी को साथ बड़ा करते हुए उन्हें ये अहसास दिलाते रहना कितनी बड़ी चुनौती है कि कुछ भी नहीं ऐसा कि तुम दोनों को अलग-अलग कर सके। कोई अंतर नहीं तुम दोनों में, फिर भी एक कहलाएगा वारिस और एक को लेनी होगी इस घर से विदाई।

हम एक बिस्तर पर बैठे हैं - सासू मां, दोनों बच्चे और मैं। पतिदेव थोड़ी दूर कुर्सी पर हैं। चर्चा किसी ज़मीन की हो रही है, वैसी एकड़ों ज़मीन में से कोई एक टुकड़ा जो मैंने देखा तक नहीं। बच्चों की दादी आदित को अपनी ओर ओर खींचते हुए गले से लगाती हैं और कहती हैं, उत्तराधिकारी, ओ उत्तराधिकारी। आद्या खिसककर मेरी ओर चली आती है। मैं दादी की गोद में लेटे आदित को देखती हूं, फिर आद्या को अपनी ओर खींचकर गले से लगा लेती हूं और उसके कान में धीरे से फुसफुसाती हूं, यू विल इन्हेरिट माई मैडनेस, माई इनसैनिटी। तुम्हें मम्मा का पागलपन, मम्मा का जुनून मिलेगा विरासत में।

नहीं करना चाहती जेन्डर डिस्क्रिमिनेशन, फिर भी....