Saturday, December 31, 2011

गुज़रे हैं लाख बार इसी कहकशां से हम

ये बेरहम साल भी गुज़र गया आख़िर। मनीष पिछले दस दिनों से कहते रहे, हाथी निकल गया है, दुम भी निकल जाएगी। वाकई हाथी जैसा ही था ये साल - मंथर चाल, मदमस्त जिसपर किसी का वश ना हो। वश यूं भी लम्हों, दिनों, सालों पर किसका होता है? जाने ये चित्रगुप्त महाराज किस देश में बैठते हैं और मालूम नहीं कैसी कलम हाथों में है उनके कि नियति की लिखाई हर रोज़ हैरान कर देनेवाली होती है। मिलेंगे कभी तो पूछुंगी, थकते नहीं? ज़रूरी है शख्स-शख्स की सांस-सांस के लिए कुछ नया लिख दिया जाए?

2011 में चित्रगुप्त का काम थोड़ा आसान कर दिया, अपने करम की कुछ लिखाई अपने हाथों से भी हुई। अब जब जायज़ा लेने बैठी हूं तो कटे-फटे, उलझे हर्फों में हिज्जों की एक हज़ार अशुद्धियां दिखाई देने लगी हैं। कोई अक्षर सही नहीं लगता, कोई वाक्य सीधा नहीं पड़ता। लेकिन मैं एक ज़िद्दी, अड़ियल और घमंडी किस्म की लड़की हूं। महाराज चित्रगुप्त से माफ़ी मांगते हुए अपनी लिखाई और उसकी गलतियों से ली गई सीख यहां दुहरा रही हूं, प्वाइंट बाई प्वाइंट।

1. पूरी दुनिया को ख़ुश रखने की कोशिश मत करो। सब अपनी खुशी ढूंढ लेंगे, तुम ये देखो कि तुम्हारी खुशी कहां बसती है।

(वस्ल-ए-दुश्मन की ख़बर मुझसे अभी कुछ ना कहो/ठहरो ठहरो मुझे अपनी तो ख़बर होने दो)


2. हक़ीकत क्या है और भ्रम क्या, इसमें मत उलझो। ये सबकुछ तुम्हारे लिए रचा गया है, बेहतर होगा कि अपना पात्र अच्छी तरह निभाया जाए और दोज़ख़ में जाते-जाते सर्वश्रेष्ठ सह-अभिनेत्री का तमगा हासिल करने के लिए भी जान ना गंवाई जाए।

(रोते-धोते जी को जलाते मंज़िल-ए-शब तक आ पहुंचे/चेहरे पर है दर्द-ए-तमन्ना दिल पर गहरा दाग़ लिए)


3. ज़िन्दगी बार-बार मौके नहीं देती। ना दिया करे, ज़िन्दगी कोई रास्ता भी नहीं बंद करती।

(मुन्तज़िर है एक तूफ़ान-ए-बला मेरे लिए/अब भी जाने कितने दरवाज़े हैं वा मेरे लिए)


4. बिस्तर पर लेटकर गर्म, उमस भरी रातों में पंखे के चक्कर गिनने से बड़ी सज़ा कुछ नहीं हो सकती। लेकिन सज़ा कट ही जाती है, रात ढल भी जाती है।

(ता फिर ना इंतज़ार में नींद आए उम्र भर/आने का अहद कर गए आए जो ख़्वाब में)


5. सेहत सबसे बड़ी नेमत है। अपनी सेहत का ख़्याल इसलिए रखो कि जबतक सांसें हैं, तबतक तो 'Esc' बटन दबाने की गुंजाईश नहीं बचती।


(चारागरी बीमारी-ए-दिल की रस्म-ए-शहर-ए-हुस्न नहीं/वर्ना दिलबर-ए-नादां भी इस दर्द का चारा जाने है)


6. ढेर सारा पैसा सारी परेशानियों का हल नहीं होता, परेशानियां से जूझना आसान ज़रूर कर देता है। मां-बाप ने रिश्तों में निवेश करना सिखाया था, गोल्ड एसआईपी, म्युचुअल फंड्स और स्टॉक मार्केट में नहीं। लेकिन अपनी ज़िन्दगी जीने के क्रम में हम कुछ चीज़ें सीखते हैं तो कुछ चीज़ें अनलर्न भी करते हैं।

(ज़ौफ़ में ता नए अग़ियार का शिकवा क्या है/ बात कोई सर तो नहीं है कि उठा भी ना सकूं)

7. किसी को मसीहाई नहीं आती। किसी के पास किसी समस्या का कोई समाधान नहीं है। सब अपने में उलझे हुए हैं, इसलिए उम्मीद मत करो।

(दश्त-ए-तन्हाई ये हिजरा में खड़ा सोचता हूं/हाय क्या लोग मेरा साथ निभाने निकले)


8. चमत्कारों की मियाद बहुत छोटी होती है। उसके बाद वही हर रोज़ की जद्दोजेहद है, वही उतार-चढ़ाव है और वही टूटे-बिखरे दिन हैं। उन्हें संभालना सीखो, फिर हर रोज़ कमाल होगा।

(अभी बरसेंगे हर तरफ़ जलवे/तुम निगाहों का एहत्माम करो)


9. प्यार करो, ढेर सारा प्यार - जीवन साथी से, बच्चों से, मां-बाप से, भाई-बहन-दोस्तों से। प्यार संजीवनी बूटी नहीं होता, लेकिन मरहम होता है।

(अब और किस तलाश में बेचैन है नज़र/कुदरत तो मेहरबान है दरियादिली के साथ)

10. ख़्वाबों की बंजर ज़मीं को अपने आंखों के पानी से सींचते रहो। ना जाने कौन सा अंकुर कहां फूटे, ना जाने कहां की हरियाली तुम्हारा बियावां गुलज़ार कर दे।

(सुनते हैं कि मिल जाती है हर चीज़ दुआ से/एक रोज़ तुझे मांग के देखेंगे ख़ुदा से)


11. कुछ नामुमिकन नहीं होता। कुछ भी नहीं।

(जवाब जिनका नहीं वो सवाल होते हैं/जो देखने में नहीं कुछ, कमाल होते हैं)


12. चित्रगुप्त ने जो लिखा, ठीक ही लिखा। लड़ना-भिड़ना छोड़ो और जीने का सलीका सीखो।

(अब किसी से क्या कहें इक़बाल अपनी दास्तां/बस ख़ुदा का शुक्र है, जो भी हुआ अच्छा हुआ)

और साल का आख़िरी दिन महबूब जगजीत सिंह के नाम।

Friday, December 30, 2011

सिगरेट का आख़िरी कश

कमरे का कोना-कोना दुरुस्त कर दिया गया था। केन के लैंपशेड से ठीक उतनी ही रौशनी आ रही थी जितनी उसे पसंद थी - सिर्फ उसी कोने पर बिखरती हुई जहां कांच के एक फूलदान में नर्गिस के फूल बेतरतीबी से डाल दिए गए थे। फूलदान के नीचे मेज़पोश पर गिरती रौशनी में उसने जल्दी से उसपर बिखरे रंग गिन लिए - छह थे। एक रंग छूट गया था। खरीदते हुए उसने ध्यान क्यों नहीं दिया था? तैयार होते हुए लिली ऑफ द वैली
की शीशी देखी, जिसमें दम तोड़ती खुशबुओं की कुछ आखिरी बूंदें थी। कुछ स्थायी नहीं होता। एक दिन ये खुशबू भी अपनी-सी नहीं लगेगी। फ्रिज में पिछली पार्टी की बची हुए बियर की कुछ बोतलें थी जिनका नसीब तय किया जाना था। पार्टी में उसने अपने एक कॉलिग के सामने कहा था कि बियर और घोड़े की लीद की बदबू में कोई ख़ास अंतर नहीं होता। पार्टी में सब बीयर को छोड़कर ब्रीज़र पर भिड़ गए थे और किंगफिशर की ये बोतलें अभी भी वैसी ही पड़ी थीं, लावारिस। 

"बालों की कंडिशनिंग में इस्तेमाल कर लेंगे,"  उसकी रूममेट ने कहा तो उसे सोनमर्ग की घाटियों पर पसरे आर्मी कैंप के अस्तबलों से आती बदबू याद आ गई। 

''मिसमैच होगा, तुम्हारे बाल, ये बदबू... सोनमर्ग और कैंप्स की तरह'', और बोतलों में बची बीयर के इस्तेमाल की योजना फिर अनिश्चितकाल के लिए मुल्तवी हो गई।

जाने क्या सोचकर उसने बीयर के दो मग्स और बोतलें डाइनिंग टेबल पर रख दीं। बहुत ठंडी बीयर गले को नुकसान पहुंचाएगी और फिर कल प्राइमटाईम में उसी के शो के लिए कोई वॉयस ओवर करनेवाला नहीं मिलेगा।

रूममेट आज रात देर से आनेवाली थी, क्लायंट पार्टी में एप्पल जूस पर एक लंबी शाम काटने की सज़ा भुगतकर। लड़का कभी एक घंटे से ज्यादा वक्त के लिए नहीं आता था इन दिनों उसके पास। दूरी एक बहाना हो सकता था, लेकिन रोहिणी और जीके की दूरी से उसे ये ज़ेहन की दूरी ज्यादा लगती थी - मार्स और वीनस की दूरी जैसा कुछ। रोहिणी से आने में कम-से-कम डेढ़ घंटे लगते। यानि उसके पास बहुत सारा वक्त था। डिनर
के लिए राजमा-चावल बन सकता था, कपड़ों की अलमारी ठीक की जा सकती थी, रूममेट के किताबों के ख़ज़ाने में से कुछ मोती चुराए जा सकते थे, हर हफ्ते मंगाए जानेवाले न्यूज़वीक का एक आर्टिकल पढ़ कर अख़बारवाले पर अहसान किया जा सकता था... या ये तय किया जा सकता था कि अपने दिशाहीन रिलेशनशिप का क्या किया जाए। ये आख़िरी काम सबसे आसान था, क्योंकि तय करना बिल्कुल मुश्किल नहीं था। छोटे शहर से आई थी, लौटकर चली जाती। वहां सुकून था, कुशन था और पहचान बनाने की कोई जद्दोजेहद नहीं थी। फलां-फलां की बेटी अमुक साहब की बहू होती और पैरों के नीचे छह इंच मोटी गद्देदार लाल कालीन बिछाकर उसका स्वागत किया जाता। वहां कोई लड़ाई नहीं थी, एक आसान रास्ता था। बल्कि ज़िन्दगी भर की आसानी थी। 

फिर ये ज़िद किसलिए? क्या बचाए रखना था? हासिल क्या करना था आख़िर? 

सिगरेट, सिगरेट हासिल करना था फिलहाल। आदत ना सही, तलब सही। तलब ना सही, ज़रूरत सही। उसने लड़के को फोन करके उसे क्लासिक माइल्ड्स लाने की हिदायत दे दी। लड़के के आने में अब भी एक घंटे का वक्त था। 60 मिनट, 3600 सेकेंड। ज़रूरत इतना लंबा इंतज़ार क्यों करती? सो, उसने नीचे जाकर सिगरेट खरीदने का फ़ैसला किया। लाल रंग के चमकी चप्पलों में चमकते लाल रंग के नाखूनों पर नज़र गई तो रूममेट की एक और ज़िद का जीत जाना याद आया। वो इतनी जल्दी क्यों हार मान लेती है? अब घर जाकर नेलपॉलिश रिमूवर ढूंढने का अलग काम करना होगा। वैसे हर नाखून पर बीस सेकेंड के हिसाब से वक्त लगाया जाए तो 200 सेकेंड कम किए जा सकते हैं। रिमूवर ढूंढने में कम-से-कम 600 सेकेंड।

जीके में लड़कियों को सिगरेट खरीदते देखकर किसी की भौंहें नहीं चढ़ती और यहां सुपरमार्केट में आसानी से एल्कोहोल मिल जाया करता है। सिगरेट भी खरीद ली गई और ग्रीन एप्पल फ्लेवर वाले वोदका की बोतल भी। वो 600 सेकेंड का सौदा भी कर आई थी। वक्त का सौदा इतना भी मुश्किल नहीं होता।

इंटरनेट नहीं था, वरना कोई अच्छी सी कॉकटेल बनाई जा सकती थी। वोदका नीट पिया जा सकता है या नहीं, ये जानने के लिए उसके फिर लड़के को फोन किया। आखिरी ट्रैफिक सिग्नल पर हूं, जवाब में सवाल के जवाब जैसा कुछ नहीं था। नीट सही, ये सोचते हुए उसने एक ग्लास में वोदका डाल ली और क्लासिक माइल्ड्स के डिब्बे से सिगरेट निकाल ली, जलाने के लिए। "तुम्हें सिगरेट पीना कभी नहीं आएगा लड़की," रूममेट का
ताना याद आ गया। बाएं हाथ में सिगरेट थी और दाहिने में माचिस की जलती हुई तीली। ''मुंह में लेकर जलाओ और गहरा कश लो,'' दिमाग में रूममेट का निर्देश फॉलो करती रही और वॉयला! जलती हुए एक सिगरेट उसके हाथ में थी। 240 सेकेंड...

फोन की घंटी बजी। मां थी। 1200 सेकेंड, कम-से-कम। वक्त पर शादी और बच्चे हो जाने चाहिए, लोग बातें बनाते हैं... 200 सेकेंड... मोहल्ले में चिंकी-पिंकी-बिट्टू-गुड़िया की शादियां तय हो गई, लड़कों के खानदान का विवरण और दहेज की तैयारी... 600 सेकेंड... तुम्हारी नालायकी और सिरफिरेपन पर हमले... 600 सेकेंड... यहां तो बोनस था! दरवाज़े की घंटी बजी और फोन से सुबह तक के लिए निजात मिल गया।

"सिगरेट नहीं मिली। गाड़ी नहीं रोक सका कहीं।"

"मुझे मिल गई, पियोगे?"

"ओह! नो थैंक्स।"

''वोदका या बीयर?''

''कुछ ख़ास है?''

"नौकरी की सालगिरह है। अगले पच्चीस साल वहीं टिके रहने का वायदा कर आई हूं।"

''क्या चाहती हो?''

''पूछो क्या नहीं चाहती। जवाब देना आसान होगा।''

''तुम्हें उलझने की बीमारी है?''

''इतने सालों में आज पता चला है?''

''कुछ खाओगी? बाहर चलना है?''

''ग्रीन एप्पल के साथ काला नमक मस्त लगता है।''

''आई गिव अप।''

''बचपन से जानती हूं, तुम लूज़र हो।''

''व्हॉट्स रॉन्ग विथ यू? आई फील लाइक शेकिंग यू अप।''

''यू वोन्ट बिकॉज़ आई डोन्ट परमिट। तुम तो मुझे छूने के लिए इजाज़त मांगते हो।''

''आर यू ड्रंक?''

''देखकर क्या लगता है?''

''लगता है कि कोई फायदा नहीं। हम बेवजह कोशिश कर रहे हैं। मुझे वापस लौट जाना चाहिए।''

''दरवाज़ा तुम्हारे पीछे है। जाते-जाते मुझे सिगरेट की एक और डिब्बी देते जाना। रूममेट को चाहिए हो शायद। हम आधी रात को कहां खोजते फिरेंगे? हां, यू कैन वॉक डाउन टू द मार्केट। गाड़ी नीचे ही रहने दो।''

''यही होता है जब छोटे शहरों से लड़कियां आती हैं दिल्ली पढ़ने। बिगड़ जाती हैं। कुछ तो अपने वैल्युज़ याद रखा करो। यही करने के लिए आई थी यहां?''

''ये अगर तुम्हारा आख़िरी वार था तो खाली गया। अगली कोई कोशिश मत करना।''

''आई गिव अप।''

"ये वोदका लेते जाओ। यू मे नीड इट। सिगरेट भी एक्स्ट्रा खरीद लेना। तुम्हारे सारे गुनाह माफ़ हैं। वैल्युज़ मुझे ही गठरी में बांधकर दी गईं थीं दिल्ली आते हुए। लेते जाओ। मेरे घर वापस कर आना।"

लड़के ने उसकी तरफ बहुत उदास होकर देखा और कहा, 'मुझे क्यों लग रहा है कि तु्म्हें आखिरी बार देख रहा हूं?'

'फिर तो ठीक से देख लो। मैं इतनी खूबसूरत दुबारा नहीं लगूंगी।'

लड़का चला गया। थोड़ी देर बाद वॉचमैन क्लासिक माइल्ड्स के पांच डिब्बे पहुंचा गया था।

रूममेट के इंतज़ार में वो बालकनी में बैठकर एक डिब्बा फूंक चुकी थी। नया डिब्बा उसने रूममेट के आने पर ही खोला।

"मेरी कोशिश कामयाब रही। वो अब वापस नहीं लौटेगा।"

"तुमने ऐसा किया क्यों आखिर?"

''उसे अपने घर पर होना चाहिए, अपने मां-बाप के साथ। ही ओज़ देम हिज़ लाइफ। ही डिडन्ट ओ मी एनीथिंग।"

''तुम उसके साथ भी तो जा सकती थी। प्यार नहीं करती थी उससे?''

'करती थी। करती हूं। इसीलिए तो उसके साथ नहीं गई,' ये कहते हुए उसने सिगरेट का एक आखिरी गहरा कश लिया और उठकर बीयर से बालों की कंडिशनिंग करने के लिए बाथरूम में घुस गई।

Thursday, December 29, 2011

ओह! कलकत्ता

तब ट्रेनों में शायद एसी के डिब्बे नहीं होते थे। या होते भी होंगे, मुझे याद नहीं। एक फर्स्ट क्लास डिब्बा ज़रूर होता था रांची से हमें कलकत्ता लेकर आनेवाली हटिया-हावड़ा मेँ। कुछ टुकड़े-टुकड़ों में पहली बार कलकत्ता आने की जो याद बाकी रह गई है उसमें वही डिब्बा है और जाने क्यों लगता है कि उस डिब्बे की खिड़कियों में रॉड नहीं लगे थे। नज़रों और नज़ारों के बीच कोई रुकावट नहीं थी, ऐसा ही कुछ याद है। मेरी उम्र तब पांच साल की रही होगी शायद, और मैं बाबा-दादी के साथ कलकत्ता जा रही थी, पहली बार। यादों के मॉन्टाज में जो स्लो-मोशन में बचे रह गए कुछ शॉट्स हैं उनमें हावड़ा ब्रिज और नीचे बहती हुगली है, विक्टोरिया मेमोरियल है और विशालकाय खंभों वाला ग्रैंड होटल का अहाता है, एक सफेद एम्बैसेडर कार है और ढेर सारी भीड़ है। हां, तिरहट्टी बाज़ार का चॉलनुमा घर भी है जहां एक कमरे में हमारा पूरा परिवार समा जाया करता था, और पब्लिक टॉयलेट्स के बाहर लगनेवाली कतारें भी याद हैं। ये भी याद आ रहा है कि हम जहां रहा करते थे उसकी छत पर मिश्र बाबा का परिवार रहता था और रहते थे ढेर सारे कबूतर। मैंने पहली बार सिगरेटनुमा टॉफी भी वहीं देखी थी।

हम 1988 में कलकत्ता गए थे दूसरी बार। तब चॉल से फ्लैट में शिफ्ट कर चुके थे, लेकिन कलकत्ता वैसा ही था - उतना ही ठहरा हुआ, उतनी ही भीड़-भाड़ वाला, उतनी ही गंदगी और उतनी ही पीली टैक्सियां। तबतक केसी दास के रॉशोगुल्ले और अलीपुर चिड़ियाघर के साथ बिरला प्लैनिटोरियम की यादों को करीने से सजाकर रखा जा सके, इतनी अक्ल आने लगी थी। उस साल लूची-पायॉश-दम आलू-बेगुन भाजा था और फुचका खाते हुए दुर्गा पूजा के पंडालों की सैर थी। था ढेर सारा पैर दर्द और मलेरिया में तपता बेहोश होता माथा।

फिर मैं जितनी बार कलकत्ता गई, हर बार एक नए तरह का अनुभव लेकर आई। हर बार के दिलचस्प वाकये, हर बार शहर के एक नए रूप को पहचान लेना। और तब, जब आपको अकेले घर की दहलीज़ से बाहर निकलने की आज़ादी भी ना हो। तब, जब बिना दुपट्टे के आप कमरे से बाहर निकलें तो गज़ब हो जाए और तब, जब आप अपनी उम्र के बग़ावती मोड़ पर हों। तमाम पहरों और नफ़रतों, कॉलेज स्ट्रीट से आते सब्जी बाज़ार की तीखी गंध और एक बारिश में ही जमा होनेवाले घुटने भर गटर के पानी के बावजूद कलकत्ता से इश्क कायम रहा। पार्क स्ट्रीट पर अकेले घूमने और फ्लूरिज़ में बैठकर चॉकलेट ट्रूफल खाने की ख्वाहिश ने दम नहीं तोड़ा, मैं कभी फेलूदा और प्रोफेसर शॉन्कु, कभी ताराशंकर बंद्योपाध्याय तो कभी डॉमिनिक लैपियर की नज़रों से कलकत्ते को देखती रही, जीती रही, महसूस करती रही। कलकत्ता अब भी दूर था, अनजान, अबूझ, अपरिचित - मेरा 'सेकेन्ड होम' और 'चाइल्डहुड क्रश' होते हुए भी।

मैं फिर कलकत्ता आई, ज़िन्दगी का अहम फ़ैसला लेने। जिससे शादी करनी थी उसके लिए अपने भाईयों की सहमति जुटाने। कलकत्ता ने इस बार भी निराश नहीं किया। मनीष और मैं ठीक चार महीने बाद मियां-बीवी बनकर कलकत्ता लौटे।

जिस शहर से इतना गहरा कार्मिक कनेक्शन हो, वो आपको बार-बार बुलाया करता है। तय नहीं कर पाती कि मैं पिछले जन्म में क्या थी - कलकत्ते में पान और चाय खाते हुए, ऊंघती दोपहरों को किताब लिखने का ख्वाब बचाए रखनेवाली बंगाली या मायानगरी में एक दिन अपने पसंद की फिल्म बना डालने की उम्मीद के साथ आखिरी सांस ले लेनेवाली कोई असिस्टेंट डायरेक्टर, क्योंकि दोनों शहरों से इस जन्म में भी मुझे बेइंतहा नफ़रत और मोहब्बत है और ये दोनों ख्वाब अभी भी आधी रातों को डराने आ जाया करते हैं।

कलकत्ता से इश्क पर नया रंग चढ़े, उसकी एक और वजह मिल गई। आद्या-आदित 'Calcutta babies' हैं। कार्मिक कनेक्शन ही होगा क्योंकि वहां ना मेरा मायका है, ना ससुराल ना हम किसी काम के सिलसिले में कलकत्ते में रह रहे थे। फिर मुझे अपनी गायनोकॉलोजिस्ट से भी ऐसा प्यार हुआ कि किसी और पर भरोसा करने की बजाए मैंने बचपन की मोहब्बत कलकत्ता नगरिया पर यकीन करना ज्यादा सही समझा।

ये कार्मिक कनेक्शन फिर कलकत्ता ले गया कल। चेक-इन काउंटर पर ही आप कोलकाता जा रहे अपने सहयात्रियों को ठीक-ठीक पहचान सकते हैं। बंगाली अलग से पहचान में आ जाएंगे, कोलकाता के मारवाड़ियों की पहचान अलग होगी और मेरे जैसे नॉन-रेज़िडेन्ट्स को पहचानना तो बिल्कुल मुश्किल नहीं। दिल्ली की सर्दी में भी नारंगी रंग की जैकेट के नीचे से एक बाटिक प्रिंट का कुर्ता दिखता नहीं कि मेरा दिमाग शोर मचाने लगता है - You can take a Bengali out of Calcutta, but you can't take Calcutta out of a Bengali.

ऐसा पहली बार है कि मैंने कलकत्ता में अपने रिश्तेदारों में से किसी को नहीं बताया कि यहां लैंड कर रही हूं। ये ना माफ़ किया जानेवाला गुनाह हो सकता है जिसका ख़ामियाज़ा तानों के रूप में मुझे महीनों तक भुगतना पड़ेगा। वक्त 24 घंटे का ही है और कई सारे काम खत्म करने हैं। हम अपने करियर के नए मोड़ पर हैं, यहां से सफ़र कहीं भी ले जा सकता है - गंगा की तरह तफ्सील से मुहाना खोजते हुए सुन्दरवन में गुम हो सकता है या फिर पहाड़ी नदी की तरह अठखेलियां खाते, पत्थर-पहाड़ों से जूझते नए रास्ते बना सकता है। जो भी होगा, अच्छा ही होगा। मेरा काम अपनी ज़िम्मेदारियां निभाना है और उसमें कोताही ना हो।

इस बार कलकत्ते को कैमरे के पीछे से देखा है, फ्रेम और कॉम्पोज़िशन की भाषा में, 60 और 120 की स्पीड से, टाईम लैप्स ढूंढते हुए, मॉन्टाज प्लान करते हुए, बादलों से लुका-छुपी खेलते सूरज से मिन्नतें करते हुए, लाइट पकड़ते हुए... इस बार कलकत्ता हुगली की लहरों पर तैरती नाव है और मैं झुककर पानी पर नाचती किरणों को छू लेना चाहती हूं। इस बार कलकत्ता कई ख्वाबों की ताबीर है। इस बार कलकत्ता वो फोटो एक्जीबिशन है जिसमें मैं सालों से शरीक होने की ख्वाहिश ही रखती रही। इस बार कलकत्ता मेरी नज़रों से ली हुई तस्वीरों का स्लाइड शो है।

ओह कलकत्ता, इस बार मैं तुमसे कह ही देना चाहती हूं - ओ आमार शोनार कोलकाता, आमि तोमा के भीषोण भालो बाशी!

Tuesday, December 27, 2011

इस मुसाफ़िर को रहगुज़र से क्या

मेरे ख्वाब को भाई ने संजीदगी से लिया है। उसे मेरे जीने का बेढब तरीका अक्सर परेशान करता है क्योंकि वो खुद बहुत सुलझा हुआ और समझ से काम लेनेवाला शख्स है। मेरे सपने की डिकोडिंग करते हुए उसे लगता है कि मुझे उसके मैनेजमेंट ज्ञान की सख्त ज़रूरत है। मुमकिन है। मैनेजमेंट स्कूल और मल्टीनेशनल कंपनियों की खिदमत का नतीजा है कि उसका करियर एक तय ग्राफ फॉलो करता है, एक्सपोनेन्शियली बढ़ता हुआ, साल-दर-साल नए रास्ते बनाता हुआ। इस टू-डाइमेंशनल ग्राफ के मुक़ाबले मेरा करियर मल्टीडाइमेंशनल है, जो मेरी मैं नहीं जानती कि मुझे क्या चाहिएवाली सोच का नतीजा हो सकता है।

फिगर आउट द चैलेंजेस। उन्हें कागज़ पर लिखो, मेरे से चार साल छोटा भाई मुझे समझाता है।

आई लाइक। तुमने चैलेंज कहा, प्रॉब्लम नहीं।

डू यू नो वॉट यू वॉन्ट?”

आई नो वॉट आई डोन्ट वॉन्ट।

फेयर इनफ। वो भी लिखो, वो चीज़ें जो तुम्हें नहीं चाहिए।

मैं ये कसरत हज़ारों बार कर चुकी हूं, नतीजा सिफ़र ही होता है, मैं उससे कहना चाहती हूं लेकिन कहती नहीं। वो मेरी मदद करनी की कोशिश कर रहा है, मुझे ध्यान देना चाहिए।

एक महीने में लोग अमूमन कितना काम करते होंगे, पहला सवाल।

हम्म, थोड़ी देर दिमाग में जल्दी से हिसाब लगाने के बाद मैं कहती हूं, अस्सी घंटे?” चार घंटे से ज्यादा कोई क्या काम करता होगा?

180 घंटे, वो एकदम आराम से कहता है। आमतौर पर हम हिंदुस्तानी 180 घंटे काम करते हैं। तुम कितनी देर करती हो?”

इस सवाल का जवाब देना मुश्किल है। अव्वल तो मैं काम में बिताए गए वक्त को क्वालिटेटिवली देखना चाहूंगी, दूसरा – मैं फेसबुक, ब्लॉगिंग, गाने सुनना और कविताएं पढ़ना और लिखना भी काम का ही हिस्सा मानती हूं। ये सब मेरी क्रिएटिव लर्निंग का हिस्सा हैं, मैं उसको बताना तो यही चाहती हूं लेकिन कहती नहीं। खुद पूरी तरह सहमत नहीं हूं इसलिए।

काम को उसके आउटपुट से जज करो। देयर हैज़ टू बी समथिंग टैन्जिबल।

टैन्जिबल यानि ...। लेकिन जहां कोई इम्तिहान ना देना हो, वहां लर्निंग प्रोसेस को कैसे जज करें? दस घंटे का डीटीपी जॉब बनाम एक घंटे की रचनात्मकता, इसे कैसे जज किया जाए? 'काम' क्या है मेरे जैसे फ्रीलांसर्स के लिए?

टाईम मैनेजमेंट। तय करो कि तुम कितनी देर क्या करना चाहती हो। मुझे नहीं मालूम था कि मैनेजमेंट पढ़ने के इतने फायदे हो सकते हैं। प्रोबलम सॉल्विंग स्किल एक वो शय है जो मेरे पास कभी नहीं हो सकती। मुझे उलझने की क्रॉनिक बीमारी है। दिमाग में हिसाब बैठने लगता है – मैं इतनी देर ये काम करूंगी, उतनी देर वो... बच्चों के लिए मेरे पास इतने घंटे होंगे और घरेलू कामों के लिए इतने। सोने के लिए आठ घंटे तो चाहिए ही, और दिन में चौबीस घंटे ही होते हैं।

मेरा सवाल घूम-फिरकर वही है, इन सबके बीच 'मैं' कहां हूं? तमाम सारी ज़िम्मेदारियां हैं, रिश्ते बनाए और बचाए रखने की मशक्कत है, रोज़ी-रोटी का सवाल है, बच्चों के भविष्य की चिंताएं हैं, मनुष्य के सामाजिक प्राणी होने का दारोमदार है। मेरा होना किससे मुकम्मल है? क्या वजूद इन्हीं सब टुकड़ों से बनता है? 

नियर डेथ स्टडीज़ और क्युबलर रॉस मॉडल के लिए मशहूर स्विस मनोचिकित्सक एलिज़ाबेथ क्युबलर रॉस लिखती हैं, 'अपने भीतर की ख़ामोशी से संपर्क में आना सीखो और ये जान लो कि इस जीवन में हर एक चीज़ का एक उद्देश्य है।' लेकिन अपने भीतर की खामोशी बाहर के शोर में कहां सुनाई देती है? 180 घंटे की भाग-दौड़ और जीतोड़ मेहनत ज़रूर एक मुकाम पर ले जाती होगी, लेकिन मैंने रास्ते में रुककर अपने पैरों के छालों की ओर देखा क्या? मुझसे इतनी तेज़ नहीं भागा जाता मेरे भाई, ना सलीका आया है जीने का। इसी बेतरतीबी और बेचैनी में सुकून है। ये बेतरतीबी मेरी रिकवरी प्रोसेस का हिस्सा है। मैं तुम्हारी तरह होना चाहती हूं, ये भी सच है। जानती हूं कि अगर तुम्हारी कही और सिखाई हुई एक चौथाई बातें भी मान लीं तो ज़िन्दगी बन जाएगी। लेकिन मुझे रुक-रुककर, थम-थमकर चलने की आदत है। 

शायद इसलिए ख्वाब का आखिरी हिस्सा माकूल है। सफ़र कहां का है, नहीं जानती। कारवां कौन सा है, ये भी नहीं मालूम। मंज़िल किधर, कैसे बताऊं। चलते रहते हैं कि चलना है मुसाफ़िर का नसीब...

पोस्टस्क्रिप्ट: एलिज़ाबेथ रॉस के इंटरव्यू का एक हिस्सा कॉपी-पेस्ट कर रही हूं विकीपीडिया से। रॉस ने शायद ये मेरे जैसे आलसी, काम से बचनेवाले लोगों के लिए ही कहा होगा - "स्विट्ज़रलैंड में जिस ढर्रे पर मेरी शिक्षा-दीक्षा हुई उसका मूल आधार एक ही था - काम काम काम। तुम तभी किसी काम के इंसान हो अगर तुम काम करते हो। लेकिन ये पूरी तरह गलत है। आधा काम, आधा नाचना-कूदना - सही मिश्रण तो यही है।"

तो मैं अबतक क्या करती रही हूं? काम? उछल-कूद? उछलते-कूदते काम? काम करते हुए उछल-कूद? 

एक और कोट पढ़ा है आज ही - "The noun of self becomes a verb. This flashpoint of creation in the present moment is where work and play merge." 

~ Stephen Nachmanovitch (Musician, Artist and Author) 

काम और मनोरंजन या उछल-कूद, इन सबके बीच रचनात्मकता बची रहती है, ये जानकर संतोष हुआ है। मैं बची रह जाऊंगी और सफ़र कट जाएगा, इसका यकीन है अब। 180 घंटे नामुमकिन नहीं लगते। थैंक यू भाई!

Monday, December 26, 2011

सहर तक अंजाम है ख़ाक हो जाना

रांची में हमारे घर के दाईं तरफ एक आदिवासी बस्ती है। बमुश्किल चार-पांच घर होंगे उसमें, और उनकी चार पीढ़ियों को हमने वैसे ही देखा है जैसे उस बस्ती ने हमें बड़ा होते देखा होगा। घर से बाहर रातू रोड तक जाने के लिए उस बस्ती से होकर एक शॉर्टकट रास्ता जाता है। हमें हमेशा उस रास्ते से ना आने जाने की सख्त हिदायत दी जाती रही है, और हम उसी लगन से हर बार उस हिदायत को अनसुना करते रहे हैं। बस्ती के बाहर कोने पर पीपल का एक बड़ा-सा पेड़ है जो हमारी रातों की नींदों में भूत-प्रेत और डायनों के डरावने सपने भरने के लिए काफी हुआ करता था। पेड़ से परे कुछ तीस फीट की दूरी पर एक कोना था जहां मरने के बाद उस बस्ती के लोगों को दफनाया जाता था। शहर के तमाम कब्रिस्तानों की तरह उस कब्रिस्तान पर भी अब इंसानों की बस्तियां उग आई हैं अब तो। पीपल के पेड़, बस्ती और हमारे छोटे से मोहल्ले के ठीक बीचोंबीच एक खाली जगह है जो कूड़ा-करकट फेंकने के काम आता है। उस गड्ढेनुमा खाली जगह से उठकर मलेरिया और ब्रेन फीवर जैसी बीमारियां हवाओं में तैरा करती हैं।

एक रात सपने में देखा कि उस गड्ढे में ढेर सारा पानी जमा हो गया है - मटमैला और ठंडा। कभी गड्ढा तालाब जैसा लग रहा है, कभी दरिया जैसा। उसके किनारे बने कच्चे रास्ते पर मैं अपने भाई के साथ खड़ी हूं और मेरे साथ हमारे पड़ोस की एक दीदी (मेरी दोस्त गुड्डी की बड़ी बहनों में से एक) है जिनसे मैं कई सालों से नहीं मिली। मैं और भाई पानी में उतरने पर आमादा हैं, सुषमा दीदी हमें नसीहतें दे रही हैं। भाई ने छलांग लगा दी है और मुझे कपड़ों के मैले हो जाने की चिंता है। घर में वैनिश भी तो खत्म हो गया है! डरते-डरते मैं पानी की गहराई नापने के लिए एक पैर नीचे उतारती हूं, संतुलन बिगड़ा है या किसी ने मुझे खींचा है, ये याद नहीं लेकिन मैं ना चाहते हुए भी पानी के भीतर हूं। भाई दरिया के बीच में कहीं दिखाई दे रहा है, और मुझे डर है कि कहीं वो डूब ना जाए। उसके साथ कोई और डूब रहा है - मेरे पति हैं, मेरा सबसे छोटा भाई, मुझे ये सूझ नहीं रहा। किनारे की कच्ची पगडंडी पर फिसलते हुए मैं गीली, मिट्टी से तर-ब-तर बाहर निकल आई हूं। याद नहीं, बाकी डूब गए या साथ निकल आए हैं।

कल ख़ैरात की एक और रात को भरने की कोशिश में मैंने कई उल्टे-सीधे काम किए - चुन-चुनकर वो गाने सुनती रही जिससे नज़र-ए-आब को बरसने के बहाने मिले, हीटर की रौशनी में कविताएं पढ़ती रही और आधी-अधूरी कहानियां बुनीं। भाई के साथ काफ़िया मिलाया और थककर नींद के आने का रास्ता देखती रही। आधी-अधूरी नींद में ख्वाब ने फिर उसी पीपल के पेड़वाले रास्ते का रुख किया जहां एक रात डूबने-उतराने का डर गलती से छोड़ आई थी।

उस गड्ढे में पानी नहीं दिखता अब, लेकिन बर्फ है या दलदल समझ नहीं पा रही। कभी लगता है छांगू लेक के किनारे खड़ी हूं कभी लगता है नताशा के घर के पीछे वाले पार्क के कोने का तालाब है। साथ में मेरा छोटा भाई खड़ा है, सबसे छोटा वाला। हाथ पकड़कर कहता है, चलो दीदी, घर पहुंच जाएंगे। मैं डरती हूं, पैरों के नीचे बर्फ पिघली तो, या दलदल में ही जा गिरे तो क्या हो? वो अपनी डिंपलवाली हंसी हंसता है और दो कदम आगे चलता है। मुड़कर मेरी तरफ देखता है और आगे आने का इशारा करता है। उसके आगे बढ़ते ही पैरों के नीचे घास उग आई है। लेकिन वैसी ही पीली और ठंड से सिकुड़ी हुई जैसी कड़क सर्दियों में रांची के लॉन में दिखा करती थी। अरे, ये तो सख़्त ज़मीन है, मिट्टी, मैं कहती हूं। हां, अंकुर फूटेंगे यहां से, पेड़ भी निकलेंगे, वो कहता है। लेकिन घर तो चलो इस रास्ते से। डरती क्यों हो? मैं दाहिने पैर से अपने नीचे की ज़मीन का जायज़ा लेती हूं। सख्त है, लेकिन एक बित्ता दूर बर्फ है शायद, या फिर दलदल। मैं नहीं बचूंगी। पैर पीछे खींच लिए हैं। वो पीछे आकर मेरा हाथ पकड़ लेता है और फिर मेरा कंधा। हमने वो रास्ता पार कर लिया है।

घर के आगे बच्चे हैं, थोड़ी दूर एक पहाड़ है और पूरे पहाड़ पर बिखरे हुए पीले फूल हैं। घसियारिनें घास की गठरियां बांधे सड़क के किनारे चल रही हैं और हम भूपेन्द्र की आवाज़ सुनते हुए गाड़ी में चलते जा रहे हैं।

गाड़ी में मुझे कोई जानी-पहचानी शक्ल क्यों नहीं दिखती? मेरे दोनों भाई कहां गए? मनीष और बच्चे? उन्हें कहां छोड़ दिया मैंने? मैं किस कारवां की ख्वाहिश में निकलती हूं? कौन सा सफ़र है ये और मंज़िल कहां है मेरी?

सुबह उठते-उठते मैंने ये कव्वाली अपने प्लेलिस्ट में डाल दी है।


"मेरे नामुराद जुनून का है इलाज कोई तो मौत है
जो दवा के नाम पे ज़हर दे उसी चारागर की तलाश है"



काफ़िए की एक रात

आधी रात को भाई के साथ काफ़िया मिलाया तो नतीजा ये निकला..


कभी ख्याल बनकर ही छू लिया, कभी नींद उड़ाई एक ख़्वाब की
जो राज़ बना, हमराज़ बना, करूं कैसे शिकायत उस माहताब की

घनघोर घटा को जिसने बांधा है, ऐसी ताक़त है तेरे हिजाब की
जो तीर-ए-निगाह है पोशिदा, दो बूंद मिले उस नज़र-ए-आब की

कहो कैसे चैन आ जाएगा जब बात ना हो किसी इज़्तराब की
हम दीवाने हैं, अपनी हस्ती क्या, हमें उम्मीद कहां है इंतख़ाब की

हमने भी कहा चलो ऐसा भी हो, भूलें हर्फें माज़ी के किताब की
थोड़ी शक्लें वैसे हम पहचानते हैं तुझसे आनेवाले जवाब की

जब झोंके से ही काम बने, क्यों ख़्वाहिश करें फिर सैलाब की
पहले सुलझें अपनी ये उलझनें, तब बात करेंगे इंकलाब की

Saturday, December 24, 2011

Working from home. Really?

I have an early morning meeting. Parent's Teacher's Meeting, to be precise. I am good at keeping early morning appointments, yes, but please spare me today. I have a script to rework on, an article to be written, another article to be reviewed, an assignment to be completed... And then, a song walks into my mind in slow motion which I HAVE to play in a loop. Children have to be brushed, fed, bathed. Then, there is an early morning birthday party to go for. Gift? Wrapping paper? Electricity bill? When was the date of disconnection? Breakfast? What do we have for breakfast? Lunch? Khichudi? Bengali style? Petrol? There is no petrol in the car. I want to scream out the four lettered word. But I am the Mommy here. I have to be in control.

Take out the party dresses for the kids (Most important).
Checked.

Switch on the geyser.
Checked.

Write a mail to your client apologising for the delay.
Checked.

Pick up the car keys.
Checked.

Don't forget the wallet.
Checked.

Carry Adya's homework book.
Checked.

Look for the electricity bill.
Later.

Fetch milk and groceries.
Later.

Run for the PTM with hair and shoes gone all askew.
Ignore.

Start the engine. (I have forgotten something.) Reverse. (What is it that I have forgotten?). Leave. (Where the hell is my phone?). Drive back. Park. Ring the bell. Sort out a fight and go back with the phone which barely works. Phew!

"But I work from home," I am trying to explain to my daughter's class teacher. She has been worried about her sudden behavioral change. Adya apparently has been very cranky and whiny in the past few weeks. "Do you come back very late? May be she is not getting enough time?" Her teacher expresses her concern.

"May be", I admit, "But I am home 24/7." But am I always there, I want to ask myself. Guilt is another vice you seamlessly develop as a mother.

So, it's a Saturday full of action, and admittedly, my guilt plays an integral role here. I am out there taking them for a birthday party, inviting a friend's daughter for a play date, getting them sufficient dose of Vitamin D and physical activity in the park, curbing their TV watching time, reading, feeding, singing, dancing... And all of this with the anxiety of the backlog of work I am creating for myself. I am bad at switching off. Yes.

"I can't write like this", I tell my brother. "I want a quieter place, a corner of my own." He suggests I go to a coffee shop or to Sabah's. I am calculating the driving time in my mind. The kids are happily jumping around while I bask in the glory of being published in a national newspaper, and of finding a mention in another. Youtube plays the Qawwalli in a loop.

I do manage to get the work done. And I don't have a very unhappy daughter around me either. Only, right now all I want to think of is a hammock by the seaside. Will you pass me a drink please? Or may be two? Thank you.

Friday, December 23, 2011

Dear Santa, I want to be Adya

Choose between sky diving from Qutab Minar and getting ready for a party, and I will go for the former. Choose between walking in stilettos and walking on your knees and I go for the latter. Choose between wrestling a toothy alligator and wearing churis everyday matching with my dress, and I say, give me the wrestling bit, any day. 
That's Mommy for you.
Give her the make-up kit and she will make you up for any kind of party. Give her the heels and she will walk on the ramp without faltering even once. Give her the churis and she will match them with her dress. Not a shade here and there.
That's the daughter for you.
She cannot be branded as the boisterous type, but there is certain liveliness in her. She can blend into the background and yet stand apart. She is the perfectionist, I am not. She is the lady, I am not. She is organised, does her homework without being told and tries to retain a certain orderliness in everything she does. I'm usually pretty thick-skinned and incorrigible when it comes to getting organised. I am sensitive to criticism. She is adept at turning a deaf ear if you are saying things she doesn't want to hear. 
We have had a terrible fight this morning. 
She doesn't listen. I scream. 
She holds fort. I don't give up. 
It turns into a nasty, ugly session of screaming and shouting and non-stop tears. I almost push her out of the door, telling her to get lost. She turns back, looks at me teary-eyed and leaves. I feel a knot in my heart. Why does she bring out the worst in me? Who is responsible for this? And who is more stubborn?
It's time for her to get back from school. I am anxious. She can be so much like me sometimes - very unforgiving. She comes back, gregariously talking about the Christmas celebrations and the food that they ate and all the fun that they had. 
I take a deep breath. The worst is over between us. She has moved on. We can now kiss and tell. 
"The Santa cap that you had given me had a hole. Don't worry. My Ma'am fixed it. And you didn't even bother looking for my homework book. I had to sit in the class idle, when all my friends were showing their work to Ma'am. And the chips packet that you gave me, I didn't eat it at all. I gave it to my friends. I am not selfish and greedy, Mamma, remember that." 
(The whole issue in the morning was about the chips packets that she had to give to her class teacher. She was NOT to eat it. She was SUPPOSED to share it with the class. And she did just the opposite a day before, much to my dismay. I know I know. It is all so trivial and I was being mean. But she had to be reprimanded for that. Only, I was a little too harsh.)
Right. I know Adya. You are like me, I want to tell her. Or, may be I am like you. Or, may be, I should be like you.
I wouldn’t change my daughter’s personality for the world. I would want to change mine though. Santa, please grant me this one Christmas gift. 

Thursday, December 22, 2011

हद-ए-वफ़ा क्या है आख़िर?

नैना को पहली बार देखा था तो हैरान रह गई थी। कोई इतना भी ख़ूबसूरत हो सकता है? रौशन चेहरा, गोरा रंग, तीखे नक्श और चेहरे पर चमकती मुस्कान। हम पड़ोसी थे लेकिन सीढ़ियों पर आते-जाते एक-दूसरे का हाल पूछने के अलावा और कोई बातचीत ना थी। उसका बेटा मेरे बच्चों से एक साल बड़ा है, लेकिन तीनों में पटती नहीं। इसलिए, बच्चों के बहाने मिलने का मौका भी कम ही लगा। लेकिन हम अपने बच्चों की बर्थडे पार्टी में एक-दूसरे को बुलाना कभी नहीं भूलते थे। इतनी दोस्ती भी थी कि फोन नंबर एक-दूसरे के सिम में बचाए रखे गए हों। 

नैना और उसके पति को देखकर लगता था, हैंडसम कपल इसे ही कहते होंगे। सबकुछ परफेक्ट। घर भी, बच्चा भी, बच्चे के साथ लगे रहनेवाले दादा-दादी भी और नैना का दफ़्तर भी। सास-बहू को कई बार साथ बाज़ार जाते देखा, अक्सर वीकेंड की रातों को पूरा परिवार साथ लौटता और मैं रश्क करती। एक साथ रहने का कितना सुख है, इसकी मिसालें नैना के नाम पर फोन पर अपनी सासू मां को देना कभी नहीं भूलती थी। अब नैना का मुझपर ऐसा ही असर था कि उसकी सलाह पर अपने बच्चों को उसी स्कूल में दाख़िला दिलाया जहां उसका बेटा पढ़ा करता था। 

हमारी बातचीत कभी निजी नहीं होती थी। बच्चों की परवरिश और काम करते हुए बच्चों को वक्त देने की चुनौती, कर्सिव सिखाने में आनेवाली अड़चनें, फ्लेक्सिबल वर्क ऑप्शन्स और बबल सीरिज़ की किताबें... इससे ज़्यादा कुछ नहीं। लेकिन सुबह उसे दफ्तर जाते देख लेती तो मेरा दिन बन जाता। उसकी खुशमिज़ाजी और ताज़गी पूरे दिन मेरे साथ रहती। मैं अक्सर उसके पति की किस्मत की दाद दिया करती थी कि उसे नैना जैसी हसीन और समझदार बीवी मिली। नैना से भी कम ईर्ष्या नहीं होती थी। 

आज पता चला नैना ने घर छोड़ दिया है। घर भी। पति को भी। बच्चे को भी। बच्चे की कस्टडी को लेकर मामला अदालत में है और नैना कहीं और अकेली रह रही है। जब से ये मालूम चला है, मैं इस कदर सदमे में हूं जैसे किसी अपने की मौत की ख़बर मिल गई हो। मुझे अपने भरोसे और यकीन पर कुछ भारी-सा गिर जाने जैसा महसूस हो रहा है, ऐसे जैसे किसी ने मुझे बुरी तरह धोखा दिया हो। 

रिश्तों के डोर की बुनावट आख़िर कैसी होती है? कैसे साफ़ दिखाई देनेवाली गांठों के साथ डोर बची भी रहती है और कैसे बाहर से रेशम-सी दिखनेवाली डोर दरअसल मकड़ी के जाले के रेशे से ज़्यादा कुछ नहीं होती? रिश्तों को पकने में कितना समय लगता है और सीलने में कितना? खुशनुमा क्या है और टिकाऊ क्या? ये सामंजस्य किस बला का नाम है? मेरी करीबी दोस्त और पेशे से डॉक्टर वंदना का कहा मुझे अचानक याद आ रहा है, 'याद रखो कि 80 फ़ीसदी से ज़्यादा कपल्स मानसिक रूप से तलाकशुदा हैं। वे साथ तो हैं, लेकिन साथ रहने की कोई वजह सही नहीं।' सच है शायद। जब साथ रहने की वजहें गलत थीं और सही वजहों से अलग ही हो गए दोनों तो मैं मातमपुर्सी के लिए क्यों बैठी हूं? 

इस दौड़ती-भागती दुनिया में हमने यूं भी खुद को अंधे कुंओं में ढकेल रखा है और अपने चारों ओर अपने ही अहं की दीवार खड़ी कर ली है। रही सही कसर पैसा, डेडलाइन, काम, ख़्वाब और ज़िम्मेदारियां पूरी कर देते हैं। लेकिन अपना घर छोड़ देना एक बड़ा फ़ैसला होता होगा। कई रातों की नींद, कई दिनों के सुकून की आहुति मांगता होगा ऐसा कोई कदम। परिवारों की नाराज़गी, खुद का खुद से उलझना, ढेर सारी तन्हाई और टूट जाने के डर को दरकिनार कर ऐसा कोई फ़ैसला लेना आसान नहीं होता। फिर भी क्यों?

मुझे नैना की आंखों के नीचे के काले घेरे अचानक याद आने लगे हैं। अचानक मैंने खुद को किसी अदृश्य तराजू पर बैठा दिया है।  

सीज़न्स ग्रीटिंग्स और हैपी न्यू ईयर

साल के इन आख़िरी दिनों तक रंग-बिरंगे ग्रीटिंग कार्ड्स आ जाते थे, थोक में। बाबा के ऑफिस में उनकी कंपनी के लोगो के साथ छपनेवाले कार्ड्स ख़ास दिलचस्प नहीं होते थे। क्राई, यूनिसेफ जैसे किसी एनजीओ से गुडविल में कार्ड्स लेकर उन्हें कंपनी के कर्मचारियों को दे दिया जाता था। बाबा बॉस थे, घर में सबसे बड़े भी थे। इसलिए उन्हें प्रोफेशनल और पर्सनल दोनों मोर्चों पर सैंकड़ों की संख्या में ग्रीटिंग कार्ड्स की ज़रूरत पड़ती थी। साल का ये वक्त सबसे हसीन हुआ करता था - स्कूल की छुट्टियां, नर्म गुलाबी धूप, आंगन में तकरीबन सारे मौसमी फूलों की क्यारियां, पेड़ पर लटके हुए अमरूद, छज्जों से लटके हुए पेट्युनिया से लदे गमले और बाबा के पैरों से सिमटी-लिपटी बैठी पेपी। टेबल पर लाल डायरी निकल आया करती थी, लिफ़ाफ़ों पर पते लिखे जाने लगते थे और डाक टिकटें चिपकाने का काम भी हम तीनों भाई-बहन में किसी एक को मिल जाया करता था। अपने ख़ास दोस्तों के लिए आर्चीज़ या हॉलमार्क से आते थे कार्ड्स, जिनमें प्यारभरे संदेश होते थे। इन्हीं कार्ड्स की सेटिंग के हिसाब से क्लास में अगले साल के लिए जोड़ियां तय हो जाया करती थीं।

नए साल की स्वागत की तैयारी का पैटर्न तकरीबन तय था - 25 तक कार्ड डिस्पैच करना, 26-27 की रात कंपनी गेस्टहाउस में न्यूईयर की पार्टी और 31 की रात दूरदर्शन के साथ हैपी न्यू ईयर, जब पार्वती खान नींद में खुला ताला छोड़ आने की खुशी में नाचती थीं और येसुदास तिस्ता नदी सी चंचला आवाज़ वाली हेमलता को छेड़ते थे। 1 जनवरी को हम घूमने जाते थे - कभी डियर पार्क कभी कांके डैम, कभी रुक्का तो कभी ओरमांझी। ढेर सारी भीड़ और जगह-जगह पतीलों पर चढ़े मीट की खुशबू में हंडिया की गंध गड्ड-मड्ड हो जाया करती थी। न्यूईयर की यही अजीब-सी मादक गंध अभी भी ज़ेहन में है।

एक साल ऐसा भी हुआ कि हमने गुड्डी के किचन गार्डन में पिकनिक मनाना तय किया। आटा, नमक, हल्दी, आलू और रिफाइन्ड ले आए घर से। लेकिन आटा गूंधे कौन और आलू काटे कैसे! धूप में आटा और आलू को लेकर अपना दिमाग भिड़ाते रहे, फिर रॉ मैटिरियल की तैयारी के लिए वापस घर चले गए। जाने आटा किसकी मां ने गूंधकर दिया और आलू किसने काटे, लेकिन जली हुई पूड़ियां और अधपके आलू का सोंधा-सा ज़ायका एक तस्वीर में अभी भी कैद है (मेरी दो चुटिया, भाईयों की मैंचिंग शर्ट और निकर और गुड्डी की 'ओह-सो-ग्रेसफुल' स्माईल के साथ)।

और एक साल हम ज़रा महत्वाकांक्षी हो गए थे। दूरदर्शन का वही घिसा-पिटा कार्यक्रम क्यों देखा जाए? क्यों ना अपनी तैयारी, अपना जश्न, अपना माहौल हो? तो मैं थी, पार्टनर इन क्राइम मेरे दो भाई थे और मेरी दोस्त सुवर्णा और उसका भाई था। उसके घर में टेपरिकॉर्डर लग जाया करता और हम 'काली तेरी चोटी है' की प्रैक्टिस करते। दो-चार और गाने भी थे, मंदाकिनी की किसी फिल्म के, जो अब याद नहीं। ये याद है कि मोहल्ले के सबसे रईस लोगों में से एक बापी अंकल ने हमारे 'कॉन्सेप्ट' से प्रभावित होकर टेन्ट, कुर्सियां और माइक स्पॉन्सर कर दिया था और हमारे ग्रैंड फिनाले के लिए अच्छी खासी भी़ड़ जमा हो गई थी। कार्यक्रम के लिए जमा किए गए चंदे में से कुछ पैसे बचाकर हमने सुवर्णा की छत पर एक की दोपहर पिकनिक भी की और मेन्यू तक याद है - चिकन करी, मटर पनीर, पुलाव, चने की दाल, टमाटर की चटनी और रोशॉगुल्ला।

एक साल ये भी हुआ था कि अपनी छत पर पिकनिक करने की कोशिश में हमने चूल्हा ऐसे लगाया कि रेलिंग पर कालिख जमा हो गई। उसको साफ करने के जतन में हमने सीमेंट, चूना, मिट्टी - सब इस्तेमाल कर लिया और नतीजा सिर्फ यही कि कालिख राख के रंग की हो गई। बाबा का गुस्सा मुझे आज भी याद है, जो कालिख से ज्यादा लकड़ी के अलाव से हमारे हाथ-पैर जल जाने के ख़तरे से जुड़ा था।

सीज़न्स ग्रीटिंग्स अब फेसबुक पर एक स्टेटस मेसेज हो जाएगा, न्यूईयर का स्वागत उसी बॉनफायर, उसी तंदूर और उसी शैंपेन के साथ होगा जिनके बिना हमारी ख़ास तरह की लाइफस्टाईल मुकम्मल नहीं दिखती। लेकिन क्रैक्स, पॉपिन्स और बिल बिस्कुट के स्वाद के साथ-साथ मेरे ज़ेहन में जो बची रही गई है, हंडिया की खट्टी और तीखी गंध है।

Tuesday, December 20, 2011

I am a woman, and not phenomenal

So, there will be a 'fightback' support system for women in Delhi. I hear that the support system will actually be a mobile application which can be used to alert friends and family when the mobile-user is in distress. Now, there is a catch here. The application is only for the smartphone users, which means you will have to belong to a certain strata to be able to create another false safety net around you. What happens to the lesser mortals who can't afford a smartphone? Or worse, don't even have mobile phones? Safety is an overrated term for women, anyway. 

What makes me so bitter and cynical when it comes to women's safety? My own experiences, which come in abundance. I can go non-stop on how getting off at Akshardham at 9.30 PM, trying to cross the road, can make me feel extremely uneasy. I can tell you the various ways of eve-teasing you may have to face while on a rickshaw in Noida or North Delhi or Lajpat Nagar. You could be in your 20s, 30s or even 40s. But that doesn't stop an adolescent to pass a lewd remark or gesture.  

There is nothing extraordinary about me. I am wheatish, slightly overweight and significantly tall, and I have a perpetual frown on my forehead - as if I were born to disapprove everything around me. And to make matters worse, I am a mum of two. So, that leaves very little space for any kind of maneuvering. Plus, I am cranky and short-tempered. But I believe in what I do, even though I falter very often, and I strongly advocate peace-building and harmony, whether at home or in a queue at the supermarket. Barack Obama is probably looking for my kind of women when he wants them to play a bigger role in "resolving conflicts around the world".

But sorry, I am not phenomenal. Not phenomenal enough to shout the slogans, not phenomenal enough to worry about women in the war zones, and definitely not phenomenal enough to advocate equal political, social and economic rights for women. My concerns remain basic. While I am willing to love, care and sacrifice and live by the epitome of womanhood, at least give me my basic right of respect. Respect me as an individual beyond my curvaceous body and that is enough. An impossible thing I ask for, no?   

I don't care what feminism means. And I don't believe in "equal rights" because there are none. These are hypothetical terms created by intellectuals, mostly to divert the whole debate towards something unbelievably unachievable. Forget about the equal rights. Can I have my basic rights please? Right to live in a house without worrying about incest. Right to wear what I like to college. Right to walk on the street without a fear of being dragged into a car. Right to stand in the general queue with no fear of being manhandled. Right to express freely without being segmented as a 'feminist' or whatever. Right to just be. And most importantly, can I please have my basic right to live in this world? Thank you very much. You are now dreaming of owning the moon, and eating it too, I will be told. And moon, unfortunately, is not an ice cream.

While the White House works on a National Plan on Women, Peace and Security; UN agencies and civil society organizations generate some more funds for “women empowerment and emancipation” and the blue-bra woman in Cairo becomes another symbol of savagery, I will only worry about my daughter and my sister and my maid. I told you, there was nothing phenomenal about me. There is nothing phenomenal about being a woman.  




Sunday, December 18, 2011

ताकि ज़िन्दगी में बची रहे आस्था

रो़ज़ सोचती हूं कि आज कुछ उदात्त लिखूंगी - sublime - जिसका वास्ता दुनिया से हो, जो सर्वहारा के सरोकारों से जुड़ा हो, जिससे मेरे गिने-चुने इन्टेलेक्चुअल दोस्तों को मेरे कामभर इंटेलिजेंट होने पर पुख़्ता यकीन हो जाए । अन्ना और सरकार के बीच फुटबॉल बने लोकपाल पर, चिदंबरम और नेपोटि़ज़्म पर, उत्तर प्रदेश के ड्रामे पर या वीना मलिक के गुम हो जाने पर, कुछ तो ऐसा हो जिसपर बहस मुहाबिसे हों!

लेकिन घूम-फिरकर फ़साना वहीं का वहीं, किस्से वही घिसे-पिटे पुराने। फिर सोचती हूं, लिख किसके लिए रही हू्ं? अगर अपने बच्चों के लिए लिख रही हूं तो उन्हें पांच-आठ साल बाद क्या फर्क पड़ेगा कि उनकी मां हर रो़ज़ बासी हो जानेवाली ख़बरों के बारे में क्या सोचती थी? उन्हें इससे ज़रूर फर्क पड़ेगा कि उनकी मां जीती कैसे थी, अपनी आस्था कैसे बचाए रखती थी ज़िन्दगी में, जीवन को लेकर नज़रिया क्या था उसका, और उन्हें और खुद को बड़ा करने में टूटी कहां-कहां वो?

यही सोचकर आज फिर एक रोज़नामचा लिख डालने की ज़ुर्रत की है। पब्लिक स्पेस पर 'ranting' के ख़िलाफ़ रही हूं और आज वही करने जा रही हूं। हम यूं भी हर कदम पर ढोंगी और पाखंडी ही होते हैं - अव्वल दर्ज़े के हिपोक्रेट। कहते कुछ और हैं, करते कुछ और हैं। (बच्चों, सॉरी, लेकिन ज़रूरी नहीं कि मैं हमेशा तुमलोगों को नीति शास्त्र की शिक्षा देती रहूं। कुछ चीज़ें तुमलोग खुद तय करोगे।)

ये रैंटिंग वही है - दिन अच्छा नहीं रहा, आंसू नहीं रुके, बेपरवाही, बेरुखी परेशान करती रही, पलायन का ख़्याल आता रहा, सिगरेट और व्हिस्की की नाजायज़ तलब सताती रही, ये ज़िन्दगी कमबख्त कमीनी और बेमुरव्वत ही निकली और प्यार निकला बेवफ़ा। ये सब मान लेने भर से बोझ तो हल्का हुआ दिल का। हमारी आस्था बचाए रखने का एक तरीका ये भी है - हमारा लिख डालना, बेवजह बेसबब बेसलीका ही सही।

जापानी में एक शब्द है - कोसेन रुफु (kosen rufu)। ये एक शब्द मुझे बेहद पसंद है और मेरी ख्वाहिश है कि कोसेन रुफु एक दिन हक़ीकत बने। कोसेन रुफु का मतलब है, व्यक्तिगत प्रसन्नता और शांति हासिल करते हुए वर्ल्ड पीस कायम करना। कोसेन रुफु एक हाइपोथेटिकल टर्म हो सकता है, यूटोपियन दुनिया जैसा कुछ। लेकिन मैं सिर्फ इतना कहना चाहती हूं कि यहां भी केन्द्र में 'इन्डिविजुअल' ही है। यानि मैं और तुम। इसलिए रैंटिंग ही सही, मेरा लिखा, कहा और सोचा हुआ मेरे सुख-दुख का परिचायक है तो फिर कोसेन-रुफु हासिल करने की दिशा में कहीं ना कहीं मैं कुछ ना कुछ योगदान तो दे ही रही हूं। फिर अपनी खुशियां और अपने आंसू यूं खुलेआम प्रदर्शित करने से क्यों घबराया जाए? Express. Express freely. कालजयी रचना का मोह त्यागो। जुलिया कैमरॉन ने भी कहा है कि कला आत्म-संरक्षण (self care) की पहली सीढ़ी है। लिखना भी। चाहें वो फेमिनीन टॉश हो या फिर रैंटिंग। जो है, सो है।

कल एक बेहद ख़ूबसूरत पोएट से मिली - अरुंधती सुब्रमण्यम। जब अरुंधती को उनकी कविताएं पढ़ते सुना तो मैं भीतर से परेशान हो गई। ये तो मुझे लिखना था, ऐसा तो मुझे कहना था। फिर मुझमें वो हिम्मत क्यों नहीं थी जो इसमें है? मुझे सेल्फ केयर और फ्री एक्सप्रेशन के बारे में और ज्ञान हासिल करना होगा, तबतक के लिए अरुंधती की एक कविता 'Another way' के उस हिस्से का अनुवाद, जो मुझे बेहद पसंद है।


खड़े होना
विस्तीर्ण भीषण वर्षा से भेदे हुए
खुले काग़ज़ में
सवाल पूछते हुए
जो पहले भी पूछे जा चुके हैं
जानते हुए कि हज़ार ग्रंथालयों के झोंके
इसे अंधेरे में उड़ा देंगे कहीं।

कोई पदचिन्ह ना छोड़ना
उष्म जलोढ़क पर
कोई डॉल्बी की नहीं गूंज
जो प्रतिध्वनित हो आराधना-स्थलों में
ना स्मृति लेख
ना केसरिया झंडे

ये एक और तरीका था
अपनी आस्था बचाए रखने का

To stand 
in the vast howling rain-gouged
openness of a page
asking the question
that has been asked before,
knowing the gale of a thousand libraries
will whip it into the dark.
To leave no footprints
in the warm alluvium,
no Dolby echoes 
to reverberate through prayer halls,
no epitaphs,
no saffron flags.
This was also a way
of keeping the faith.