Saturday, April 23, 2011

शरद की डायरी

12 फरवरी 2010

आज मेरे बारहवें बर्थडे पर पापा ने ये डायरी गिफ्ट की है। पापा ने कहा, सभी महान लोग डायरी लिखा करते थे। मुझे भी लिखनी चाहिए। सोचता हूं, इन महान लोगों को इतना लिख लेने का टाईम कब मिल जाता होगा कि महान बनते भी रहो, और अपनी महानता के बारे में डायरी भी लिखते रहो। फिर भी कोशिश करूंगा छोटा-मोटा महान बनने की

14 फरवरी 2010

आज वैलेंटाइन्स डे है। स्कूल में सारे दीदी-भैया लोग अपने बैग में कार्ड और फूल छुपाए घूम रहे थे। जिनका चेहरा जितना खिला हुआ होगा, उन्हें उतने ही खिले हुए फूल मिले होंगे, ऐसा मेरे दोस्त फैटी ने कहा। फैटी का नाम फ़िरोज़ है। बहुत मोटा है ना, इसलिए हम सब फैटी बुलाते हैं उसको। वैसे मैं भी तुम्हें कोई नाम क्यों नहीं दे देता? सोचकर बताऊंगा।

15 फरवरी 2010

सोच लिया तुम्हारा नाम। नीले रंग के कवर वाली डायरी का नाम होगा ब्लू लेबल। पंद्रह दिन में एक्ज़ाम्स शुरू होंगे। बहुत प्रेशर है ब्लू लेबल। कितने सारे सब्जेक्ट्स पढ़ने होते हैं हमको। मैथ्स, साइंस, इंग्लिश, हिंदी, संस्कृत, हिस्ट्री, जिओग्राफी, सिविक्स, जनरल नॉलेज, कम्प्यूटर... सांस फूलने लगी मेरी। उसके बाद कीबोर्ड प्रैक्टिस के लिए हफ्ते में दो दिन सर आते हैं, और शाम को मैं स्पोर्ट्स अकादमी में क्रिकेट सीखने जाता हूं। देखा? मैंने कहा था ना टाईम नहीं होता। ऊपर से शाम को पापा लेकर पढ़ाने बैठ जाएं तो शामत ही समझो। अब कल ही की बात है। पापा हिस्ट्री पढ़ाने बैठे। अब हड़प्पा का 'ग्रेट बाथ' कितना लंबा और कितना चौड़ा था, ये याद रखकर मैं क्या करूंगा? कहते हैं पांच नंबर का क्वेशचन है, श्योर शॉट। ऊपर से इंटरनेट खोलकर बैठ जाते हैं तस्वीरें दिखाने के लिए। ये स्कूल की किताबें ही कम हैं क्या कि मैं गूगल पर आनेवाले सेवेंटी फाइव हज़ार (सॉरी, 75 की हिन्दी नहीं पता) सर्च पेज को पढ़ूं और समझूं। ख़ैर, दोस्त अभी सोने का टाईम हो गया है। बाकी कल।

17 फरवरी 2010

शाम को खेलने के बाद आज मैं थोड़ी देर के लिए कबीर के घर क्या चला गया, घर में तो तूफ़ान ही मच गया। अब मम्मी को मखीजा आंटी से पर्सनल प्रॉब्लम हैं तो मैं क्या करूं। पहले तो मुझे इतना भाषण दिया कि कबीर रईस बाप का बेटा है, उसके साथ प्ले-स्टेशन और लैपटॉप पर गेम्स खेल-खेलकर मैं बिगड़ जाऊंगा। उससे भी मन नहीं भरा तो पापा से फोन पर ही मेरी शिकायत कर दी। लेकिन मैं जानता हूं प्रॉब्लम क्या है। कबीर की मम्मी जब पीटीएम के लिए आती हैं तो सारे पापा लोग उन्हीं की तरफ देख रहे होते हैं। वैसे तो मखीजा आंटी मम्मी से बहुत स्वीटली बात करती हैं, लेकिन मैं जानता हूं कि उन्हें देखते ही मम्मी का पारा चढ़ जाता है। कोई बात नहीं। होता है मेरे साथ भी। अपनी क्लास के मयंक को देखते ही मुझे इतना तेज़ गुस्सा आता है कि मन करता है उसे पटक दूं। लेकिन मैं ऐसा थोड़े करता हूं। या फैटी और ग्रंपी को उससे बात करने से थोड़े रोकता हूं।

19 फरवरी 2010

बॉस, तुम्हारे लिए बिल्कुल टाईम नहीं है। पहले स्कूल, फिर पढ़ाई और एक्स्ट्रा एक्टिविटिज़, फिर मम्मी का चालीस मिनट का भाषण और पापा का गुस्सा... अभी एक्ज़ाम्स दे लेने दो, फिर सारी राज़ की बातें बताऊंगा।

12 मार्च 2010

आई विल बी अ फ्री बर्ड सून। सारे इम्पॉर्टेन्ट पेपर्स खत्म। अब हिंदी, संस्कृत रह गया है, मम्मी का डिपार्टमेंट। हिंदी तक तो ठीक है, ये संस्कृत समझ के बाहर की चीज़ है। मम्मी किचन में खड़ी होकर भी मुझसे पठति, पठतः, पठन्ति करवाती हैं। पानी का संस्कृत? आसमान का पर्यायवाची? गैस जलाएंगी तो पूछेंगी, पेट की आग को क्या कहते हैं? और जंगल की आग को? पापा अपने बॉस को क्या कहते हैं? हां, टफ़ टास्कमास्टर। मम्मी भी वही है, टफ़ टास्कमास्टर - टीटीएम।

14 मार्च 2010

यार ब्लू लेबल, एक्ज़ाम्स के बाद भी चैन नहीं है। मेरी टीटीएम हैं ना, वोही टफ टास्कमास्टर - नया काम दिया है मुझे। एक्ज़ाम के सारे क्वेशचन पेपर सॉल्व करके दिखाओ कि एक्ज़ाम में आख़िर किया क्या है। फिर सिक्स्थ क्लास का पूरा रिविज़न हो जाएगा! पीछेवाली गली में सारे बच्चों के खेलने की आवाज़ें सुनाई दे रही है और एक मैं हूं कि मैथ्स का पेपर लेकर बैठा हूं। आई हेट टीटीएम।

15 मार्च 2010

एक्चुएली इतनी बुरी भी नहीं है मम्मी। हम आज मॉल गए थे। सेल लगी है ना, तो ढ़ेर-सारी शॉपिंग के लिए। मम्मी ने वो सारे कपड़े खरीदे जो मैं चाहता था। एक शर्ट को छोड़कर। कितनी कूल शर्ट थी। शर्ट के साथ टाई भी अटैच्ड थी, और पीछे बेनटेन की फोटो भी छपी थी। आज हमने मेरी पसंद का खाना भी खाया। एक कविता लिखी है मैंने, सुनोगे?

"छोटा हूं, कहते हो तुम।
फिर भी रखते उम्मीद बड़ी।
कभी दोस्त कहते हो मुझको,
कभी मिलती डांट, छड़ी।
बारह का ही तो हूं मम्मा,
कितना ले पाऊंगा बोझ।
क्या थकता नहीं भाषण से,
मेरी परेशानी भी सोच।
हंसकर कर लो बात ज़रा,
सारी बात बताऊंगा।
मुझपर जो होगा विश्वास,
दोस्त तुम्हारा बन जाऊंगा।"

16 मार्च 2010

आज का दिन बिल्कुल अच्छा नहीं था। पापा-मम्मी घर में होते हुए भी एक-दूसरे से दूर रहे। मम्मी कल रात मेरे कमरे में सोईं। तुम मेरे इकलौते दोस्त हो ब्लू लेबल। वरना तो यहां सब एक-दूसरे से रूठने में ही टाईम निकाल देते हैं। मेरी छुट्टियों के पांच दिन बचे हैं बस। पांच दिन में रिज़ल्ट। ओ गॉड, प्लीज़ हेल्प। मैं घर की टेंशन और नहीं बढ़ाना चाहता।

17 मार्च 2010

आज सुबह से ही पापा मेरे पीछे पड़े हैं। मम्मी से बात नहीं हो रही ना, इसलिए झल्लाहट मुझपर। कहा, पेपर क्यों नहीं पढ़ते रोज़? कितनी पूअर जीके है तुम्हारी? लेकिन पेपर में रोज़-रोज़ क्या पढ़ूं? वही स्कैम, वही इंडिया-पाकिस्तान के झगड़े, कभी यहां इलेक्शन, कभी वहां, कभी यहां बम ब्लास्ट कभी वहां ट्रेन एक्सीडेंट। ये सब याद करके क्या होगा? एक स्पोर्ट्स पेज ठीक लगता है तो वो फिर इंडियन टीम के हारने की न्यूज़ पढ़ने के लिए तो मैं पेपर खोलूंगा नहीं ना। फिर मुझसे पूछा कि दिनभर क्या करते हो, घंटे-घंटे का हिसाब दो। घंटे-घंटे का? बड़े लोग दे सकते हैं क्या ऐसा हिसाब? दिन तो निकल जाता है बस।

18 मार्च 2010

आज चार बजे का उठा हुआ हूं। चार बजे का! कैन यू बिलीव दिस? मम्मी-पापा को फिटनेस का भूत चढ़ता है कभी-कभी। बस आज मैं भी उस भूत का शिकार बन गया। सुबह पहले कई तरह के आसन करवाए गए, फिर प्राणायाम। फिर पार्क के पांच चक्कर। आईपीएस बनना है तो ये सब करना पड़ेगा, पापा ने कहा। आईपीएस? मैं? क्यों? मैं तो कार रेसर बनना चाहता हूं। माइकल शूमाकर की तरह। किसी से कहना मत दोस्त, ये मेरा-तुम्हारा सीक्रेट है।

20 मार्च 2010

सुबह से डांट सुन रहा हूं यार। कबीर से लेकर मम्मी के फोन पर वो इमरान खान वाला गाड़ियां गाना डाउनलोड कर लिया इसलिए। पापा कहते हैं, वो मेरे म्यूज़िक टेस्ट से डिस्गस्टेड हैं। अब मैं चौबीस घंटे भजन और देशभक्ति के गीत तो नहीं सुन सकता ना। वैसे मामाजी ने एक राज़ की बात मुझे कल शाम को ही बताई। मम्मी छोटी थीं तो उन्हें टपोरी टाईप गाने बहुत पसंद थे। मामाजी ने तो एक गाना गाकर भी सुनाया जो मम्मी सुनती थीं रेडियो पर - कभी तू छलिया लगता है टाईप का कुछ। पत्थर के फूल जैसा नाम था फिल्म का। पत्थर के फूल??!!

22 मार्च 2010

पापा को आज अचानक तुम्हारी याद आई दोस्त। पूछा कि मैं डायरी लिख रहा हूं या नहीं। खुश होकर तो मैंने तुम्हारा नाम भी बता दिया। तुम्हारा नाम सुनकर पापा हंसने लगे। कहा, सही जा रहे हो बेटा। बाद में मैंने गूगल किया तो पता चला ब्लू लेबल तो किसी स्कॉच व्हिस्की का नाम है! तो इसमें हंसने वाली कौन-सी बाद हो गई भला? जॉनी वॉकर की बॉटल पर डंडा लिए गांधीजी जैसा एक आदमी छपा हुआ नहीं होता क्या? दोस्त, वैसे आज की रात ही हंसने-हंसानेवाली है। कल मेरा रिज़ल्ट आएगा, और उसके बाद...

25 मार्च 2010

संस्कृत की किताब में सुभाषितानि में कोई एक श्लोक था जिसका मतलब मम्मी ने  समझाया था - संतोष में बहुत सुख मिलता है। मम्मी ने मुझे तो समझाया लेकिन खुद नहीं समझीं। अब मेरे मार्क्स पर ऐसा माहौल हुआ है घर का कि क्या बताऊं। मैं पास कर गया हूं यार। 75 परसेंट मार्क्स है। लेकिन फिर भी किसी को संतोष नहीं। पापा तो ऐसे सदमे में हैं जैसे वो ही फेल हो गए हों। तू चिंता मत करना दोस्त, दो दिन का तूफ़ान है, शांत हो जाएगा।

28 मार्च 2010

मम्मी का फेवरेट टाइमपास क्या है आजकल पता है? मेरी शिकायत। जिससे देखो, शरद पुराण लेकर बैठ जाती हैं। वो पढ़ता नहीं, बदतमीज़ हो गया है, बात नहीं मानता, टीवी देखता रहता है, सुबह टाईम पर नहीं उठता वगैरह वगैरह। कहती हैं, कार्टून नेटवर्क देखकर मैं बिगड़ गया हूं। जब मैंने कहा कि आप भी सास-बहू के सीरियल देखकर मीन हो गए हो, तो मुझसे गुस्सा हो गईं! ये कोई बात है? जब पापा एक्सएन पर एक्शन फिल्में देखकर आर्नल्ड श्वार्जनेगर नहीं बन सकते, मम्मा गंदीवाली बहू नहीं बन सकती तो मैं कैसे बेन-टेन देखकर वॉयलेंट हो जाऊंगा? सारी शिकायत मुझी से? क्या करूं यार! चल छोड़, बाद में बाकी बातें।

2 अप्रैल 2010

कल से नया क्लास। नए किताबों की खुशबू कितनी अच्छी होती है। लेकिन सिर्फ खुशबू, उनका वजन नहीं। पापा ने मैथ्स का आधा सिलेबस भी पूरा करा दिया है। वो बात अलग है कि मैं दो दिन में भूल जाऊंगा सब। मम्मी के भी बड़े-बड़े प्लान्स हैं। कीबोर्ड के साथ-साथ शायमक दावर की डांस क्लास भी ज्वाइन करवा रही हैं मुझे। मैं क्या-क्या करूं यार? पापा के बदले आईपीएस और मम्मी के बदले डांसर मुझे ही तो बनना है। गर्ररररररर....

नोट: ये शरद का आखिरी नोट था। 2 अप्रैल की दोपहर अलमारी साफ करते हुए मम्मी के हाथों में शरद की डायरी आ गई। फिर तो जो बवाल कटा कि पूछिए मत। मम्मी अबतक अपने दिए 'संस्कारों' को कोस रही हैं कि बेटा उनकी शिकायत एक अदद-सी डायरी से करता है! सबकुछ इतना जल्दी हुआ कि शरद को अपने दोस्त को अलविदा कहने का भी मौका ना मिला और बढ़े हुए थायरॉड और हॉरमोनल चेंजेस से परेशान मम्मी ने गुस्से में आकर डायरी के पन्ने-पन्ने अलग कर दिए। बहरहाल, हम एक उभरते लेखक के बेबाक लेखन से वंचित रह गए...

Between the Lines

"Will you pick me up from the airport (so that we get to spend some time together, alone)?"

"I am in South Delhi right now, and then I have to drive back, and then I have to do this and that and that (so I won't)", he says.

Thursday, April 21, 2011

वजूद

जो दिखता है यहां, मेरा एक टुकड़ा है/
जो बिखरा है टुकड़े-टुकड़ों में/
मेरा वजूद है।

Tuesday, April 19, 2011

श्रीनगर से लौटकर

बेमिसाल हुस्नवाले पहाड़ों ने
परदेसियों की नज़र से बचने की ख़ातिर
काली चादर ओढ़ ली है आज।
जो हवा छूकर गई है मुझको
रंग-रूप में खुशबू-सी लगती है।
चिनार के पत्तों से लटकी हैं
बूंदें मोती जैसीं
और गिरता है टप-टप
लटकते शहतूत से पानी।
मेरी खिड़की पर आई है
नीलपंखी चिड़िया
गीले पंखों का पानी झटककर
फिर तैयार है
बगल में बहते झेलम के पार जाने को।
पीछे अखरोट के पेड़ों पर
छाई है गुलाबी रूमानियत,
और नर्गिस ने दूर से
सिर हिलाकर बुलाया है।
टीन की छत पर
बजता है संतूर-सा पानी,
आज रात की नींद
हमने घाटी में आई बारिश से भिंगोई है।

अल-सुबह जो आई है सामने
सबा नाम है उसका।
दोस्त है मेरी
और दुल्हन बनी है आज।
सिर पर लटकता है झूमर
और जूड़े में सज गए हैं
अखरोट के फूल।


आई हूं मैं जन्नत में आज,
जन्नत इसको ही तो कहते होंगे,
और लाल गरारे में सिमटी दुल्हन
जैसी ही लगती होगी
कोई जन्नत की हूर।

(16-17 अप्रैल को सबा और ओमैर की शादी से लौटकर)

Thursday, April 14, 2011

Thank you Papa, for being you!



I have never been able to forget that one workshop that I had attended in college some 15 years ago. 25 of us were a part of 3-day long workshop on female sexuality organised by the Women Development Cell of our college. We wanted to discuss the subject which is restricted by the norms of the so-called society and does not find any place in any discussion within the families. We wanted to talk and ask questions, we wanted to challenge some myths.

And it started with a very basic question, "How many of you have been abused? Sexually, verbally, physically?" It took a moment to raise our hands. And then came the most difficult question, "How many of you have been abused by your near and dear ones?" It took one whole day to talk about that, to get over some of the inner fears, to let it get out of our systems. Talking in a group has never been easy for most of us anyway, and then, this was a topic we mostly avoided broaching.

All of us had experienced at least some degree of sexual abuse and 5 out of 25 of us had been abused by their own fathers. We cringed and cried together for the pain that most of us were living with. We pledged to move ahead and we promised each-other that we would let the pain go. We promised that we would still be happy and we would still believe in the goodness of others. That was the first lesson I had taken back with me from the workshop.

But there was another person who was the foundation of my belief of "the world is not is not such a bad place after all". Even when I choose to share my feelings here, at this platform, I can only talk about that belief we must have in ourselves, and in others. I credit my father for this innate belief, and I credit that workshop for making me realise that if there are moments and people who could dent our spirit, there are people who mend it and protect you from that damage.

My father is an introvert man, someone who would never show his emotions through any physical display - no stroking the hair, patting the cheeks kind of display. I don’t remember getting close to my dad ever in my life except twice. I have hugged him and cried only twice - one, when I hadn’t done well in my XIIth Board exams, and two when I was leaving home as a bride. Other than that, he wouldn’t allow us the luxury that came naturally to other children of our age with their fathers. My father always maintained distance. He always got upset when I would leave my long and curly hair open. He would tell me sternly that I wasn’t supposed to apply nail polish or make up. I was expected to look like a Plain Jane, I was to grow up with the glasses hanging loose on my nose, I was to grow up isolated from the world and I now understand why. Now I know why he would get extremely upset if I childishly tried to get close to any male member of the family. Now I know why he would be so protective, even when he didn’t know how to express it.

We came from a joint family set-up where each family unit got only one bedroom. So, our parents shared their bedroom with three of their kids. I remember one instance when I had just barged into the room thinking no one would be there. I had opened the cupboard to take out my nightsuit. Papa called out from behind the mosquito net. “I am right here. Switch on the light and go to the bathroom to change.” I left, embarrassed, but grateful. Papa had saved me from a bigger embarrassment. Papa would be watchful if we would sit in a group of family members to chat and gossip. He was extra vigilant if anyone's body language looked suspicious or uncomfortable. Very subtly he taught me why it was important to maintain distances. He never objected if I would hang out more with boys, even when we came from a very narrow-minded middle class family, as long as I knew how to take care of myself. He was the one who told me to raise alarm when anything uncomfortable happened around me.

Papa, you are the reason why I believe that the world is not such a bad place after all. You are the reason why I have learnt to be cautious, and not paranoid, when it comes to my children now. Papa, you are the reason why I can survive all the stories of abuse and violence. Papa, you are the reason why I still believe in men. 

Keep your children safe. What you should do, as a parent

1. Be vigilant, but not paranoid. Your paranoia will make your children uncomfortable.


2. Talk to them about "good touch" and "bad touch", more in a normal conversation than a sit-down chat.

3. At about four years of age, you can tell them about how they should be careful when Mum is not around. 


4. Talk to them. Talk to them as much as you can. They will come back to you to share everything eventually. 


5. Stay alert. Teach them to stay alert.


6. Minimise the chances of any such mishap. Be vigilant. And make sure, there is someone around them. Someone you trust.


Visit http://csaawarenessmonth.wordpress.com/ for more. 



Sunday, April 10, 2011

A fine balance, or something like it

I have been very restless for the past couple of days. My consultancy assignment gets over two days later. Will I get an extension? Will I be able to work as flexibly? Have I delivered well? I am restless, even though I know from within that these doubts are unfounded. I take a deep breath and let that be. I have no control over some decisions, even though they could change the world for me. 

I am a journalist by training, a filmmaker by choice, a writer by default, a translator by chance and a communications consultant for an NGO by intention. It’s the last part of my profile really that keeps me financially secure by the end of every month. And top of it, I am a mother of 4-year old twins. That should explain my career graph. 

Working has never been easy. I come from Bihar, and believe it or not, am the first working woman from the large and extended agrarian family. At 22, I was working as a production assistant in Mumbai for a feature film that was based on gigolos. I had to go back home when the film released. It took three months for everyone to get over the shock. Only a decent job with a prestigious organization could mend the damage. So at 24, I was working on the news desk of a leading news channel, trying to act informed and empowered all the time. It didn’t take me anywhere, the steady and beloved job I mean. But I continued to work harder, month after month, braving the monotony of producing the same kinds of bulletins over and over again. I continued to be the insignificant victim of the TRP race and the appraisal system.  

It wouldn’t have changed at all. The decently healthy salary arriving every month had put me in a comfort zone. Then at 27, the twins arrived - first as a very difficult pregnancy and then as tiny, vulnerable, underweight babies. My focus changed, everything else became immaterial. But the overindulgence was short-lived. Leaving five month old twins into the safe hands of my mother and mother-in-law, who were taking turns to help me out, I was back in the newsroom. First few weeks were superb and seamless. I had a support system and three domestic helps to run the chores. I would wake up with the twins, feed them, bathe them, play with them and would refer to Dr. Spock’s once in a while to be sure if I was matching up to the universally set parameters for motherhood. It was another comfortable cocoon where I didn’t need anyone else other than twins and their grandmothers. I didn’t even need my husband.

Everything was fine till I landed in the hospital with a prolapsed disc. A desperate attempt to recover through every single kind of therapy failed and relapses followed. Meanwhile another crisis emerged. The mothers couldn’t be held up forever in Delhi. They had their own husbands and establishments to take care of. Two months of bed rest and a number of changes of guard at home front later, I quit my job. Almost suddenly, although not unexpectedly. 

Three days after resigning, I was writing to friends asking for freelance assignments. A week later, I had a meeting with an NGO to produce a documentary for them. Fifteen days later, I had left for the shoot. Within a month of quitting my job, I was exploring an uncharted territory as a filmmaker! All of this happened suddenly. And the months that followed were very exciting – shooting, editing, writing, translating – everything I wanted to do but feared doing. I had time for the twins, and I had time for myself.

Then came a lull that stayed for almost two years. I had nothing to do. I had nowhere to go. Since I had nowhere to go, I stayed in Purnea with my family for almost six months. Sometimes in the moments of despair and hopelessness, I fought with myself. But I mostly fought with my husband. I almost believed that he didn’t help me deliberately because this arrangement suited everyone. I can’t even explain how I felt when I would see people leaving for work in the mornings while I would be coming back from the bus stop after seeing off my children. I wanted to run away, I wanted to cry, I wanted to hold onto something – all at the same time. I could write a separate chapter on what it feels like to be idle and directionless, but that’s not what I am here for. What I do want to remember and reiterate is that whatever happens, happens for good and whatever doesn’t happen, happens for better.

It was not easy to decide whether I wanted to be a working mom or not. It was tougher to shake off the inertia. It was even more difficult to tell people that I was competent, but I could work only at certain hours. And it was almost impossible to ask for help. Who would help me? I didn’t matter to anyone. 

But it did matter to someone after all. My kids needed a sane mother. My husband wanted a happy wife. My friends wanted me to get a life. And I had to pull up my socks. I faced a couple of interviews just for the heck of it. I taught mass communication for a while to reassure myself that I hadn’t lost control over myself totally. Fleximoms is a good concept, but it won’t work in my kind of profile – I had almost convinced myself.

Then this offer came through. The offer was for a fulltime position. I loved the profile and I loved every single thing about the organization. I wanted to join them really badly. But fulltime? I was too shy to even negotiate a flexi timing or a part time role. And then I was pushed into negotiations by the people who believed in me. It worked. I have done well with the flexibility, and have even managed to travel on work. I have learnt to juggle in these four months. I have learnt to spend more and more time with my children, even if that means waking up at 5 in the morning to finish work. I have somehow managed to muster the energy. I have learnt to ignore the messy toy room and unkempt cupboards. They don’t matter to me so much. My being happy and sane does. I have learnt to communicate with my husband and I don’t let ego come into my way when I need to reach out to him for help. He has rarely refused the few times I have tried. And most importantly, I have learnt to prioritise.

So it doesn’t matter whether I get an extension or not. I am convinced that life is defined by a few moments and the next life defining moment could be this one.