Sunday, October 31, 2010

Sanity sucks. Thank you very much.

"Hey girl, whassup on a Sunday?" That's my super sexy, super hot Gucci wearing globetrotter 'friend' calling.

"Hmmm... Well, multitasking. Cutting tori, looking for the spatula that Adit has pushed under the sofa, wiping Adya's bum, and thinking of when to have that much-needed haircut."

"Wow, multitasking indeed." Do I hear sarcasm?

I can almost imagine her walk into 1149. I can imagine her cringe while sitting on that milk-stained sofa. How is she to manoeuver her way to the loo with all these blocks, clothes, dupatta, picture books, crayons, bags, water bottles, toys spread all over the floor?

"How do you keep yourself sane Anu?"

Here comes the most dreaded question.

"I am in good company," I say. "Darn good company."

"For instance?"

"It was Coke Studio yesterday. Today is a date with AR Rehman. Sometimes it is Gulzar-RD together, otherwise Raahat, Abida, Kishore, they all come over. I have Kaifi's poetry that puts me to sleep, and then Prasoon Joshi writes just what I want to listen to. And then I have friends like you who help me discover that sense of humour I never had!"

Having said that, who wants to remain sane anyway. (And I type this at the cost of tori ki sabzi that burns on the stove...

Saturday, October 30, 2010

जिसने चैनलों की शक्ल (और अक्ल) बदल डाली

मुझे टीवी प्रो़डक्शन पढ़ाने के लिए बुलाया गया है। दस क्लासेज़ के दस मो़ड्युल्स में वो सबकुछ समेटना है (और सिखाना भी है) जो आप टीवी में दस सालों तक रहकर भी नहीं सीख पाते। मैं एक छोटे-से अभ्यास के साथ क्लास शुरू करती हूं। ब्रॉ़डकास्ट में अपना भविष्य तलाश कर रहे छात्रों को उनके पसंदीदा कार्यक्रम के बारे में लिखने को कहती हूं, 100 शब्दों में। 23 में से 8 एनडीटीवी इंडिया के 'रवीश की रिपोर्ट' पर अपनी टिप्पणी देते हैं, 3 आजतक पर आनेवाली 'सीधी बात' को अपना पसंदीदा कार्यक्रम बताते हैं, दो ने 'बिग बॉस' के बारे में लिखा है तो ज़्यादातर लड़कियां आईबीएन 7 पर ऋचा अनिरुद्ध के कार्यक्रम 'ज़िन्दगी लाइव' जैसे कार्यक्रम पसंद करती हैं और वैसा ही कुछ बनाना चाहती हैं। लेकिन एक और कार्यक्रम है जो क्लास में भी टीआरपी के लिहाज़ से इन सभी को मात दिए है - इंडिया टीवी पर आनेवाला 'आपकी अदालत'।

आख़िर ऐसी क्या बात है रजत शर्मा के इस कॉन्सेप्ट में, जो सोलह-सत्रह सालों बाद भी ये कार्यक्रम इतना लोकप्रिय है? नेता हों या अभिनेता, बाबा रामदेव हों या राखी सावंत, रजत शर्मा की अदालत में सब कठघरे में घिरते नज़र आते हैं। ऐसा क्या है इस शख्स में जिसने भारतीय टेलीविज़न की शक्ल बदल डाली? मुझे एक बड़ा दिलचस्प वाकया याद आ रहा है। 1997-98 की बात रही होगी, 'आपकी अदालत' ज़ी पर ख़ासा लोकप्रिय हो चला था। मैं तब लेडी श्रीराम कॉलेज में थी, ग्रैजुएशन का दूसरा साल था। कॉलेज में तब एक "Academic Forum" हुआ करता था जो हर गुरुवार को किसी भी क्षेत्र की जानी-पहचानी हस्ती को छात्राओं से रूबरू होने के लिए बुलाया करता था। फोरम के चार कन्वीनरों में से एक मैं भी थी। मुझे याद नहीं कि रजत शर्मा को बुलाने का आइडिया किसके दिमाग में आया। लेकिन मैं झूठ नहीं बोलूंगी। मुझे पूरा यकीन था कि एक निजी चैनल पर इस तरह का कार्यक्रम (वो भी हिंदी में! ) पेश करनेवाले किसी पत्रकार को सुनने के लिए लड़कियां तो नहीं ही जमा होंगी, कम-से-कम एलएसआर में तो बिल्कुल नहीं। बुलाना था तो स्टार न्यूज़ से किसी को बुलाते (एनडीटीवी तब स्टार न्यूज़ के लिए कॉन्टेन्ट बनाया करता था)। राजदीप सरदेसाई को बुलाया होता। वीर संघवी आ सकते थे। अंग्रेज़ी अख़बार के किसी और संपादक को बुलाते। रजत शर्मा को सुनने कौन आएगा?

बहरहाल, हमने पूरे कॉलेज में पोस्टर लगा दिए। जहां-जहां नोटिस डालना था, डाल दिया गया। किसी एक कन्वीनर को वक्ता का परिचय देने की और दूसरे कन्वीनर को धन्यवाद ज्ञापन की ज़िम्मेदारी दी जाती। मुझे दोनों में से कोई काम नहीं मिला था और मैं इत्मीनान से ऑडिटोरियम में बैठकर कार्यक्रम शुरू होने का इंतज़ार करती रही। रजत शर्मा आए, हमारे बीच से एक कन्वीनर ने चिकनी-चुपड़ी भाषा में उनका परिचय देना शुरू किया। श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स से पढ़ाई की, 'ऑनलुकर', 'द संडे ऑबज़र्वर' और 'द डेली' के साथ जुड़े रहे, देश के सबसे कम उम्र के संपादकों में से एक, और अब टीवी पत्रकार हैं। 'आपकी अदालत' का हल्का-फुल्का ज़िक्र ही आया। ये शायद तब का समय रहा होगा जब उन्होंने ज़ीटीवी छोड़कर अपना प्रोडक्शन हाउस शुरू ही किया था।

रजत शर्मा ने अंग्रेज़ी में बात करना शुरू किया, सधी हुई भाषा, लेकिन लहज़े में अंग्रेज़ियत नहीं। और अचानक उन्होंने खुद ही अपने बारे में बताना शुरू किया। मुझे याद है कि अंग्रेज़ी बोलते-बोलते उन्होंने हिंदी में बोलना शुरू कर दिया - शायद अपने बचपने की तंगहाली के बारे में कुछ बता रहे थे। दिल्ली में रहे, दिल्ली में पढ़े, लेकिन कई भाई-बहनों के बीच दिल्ली में हर दिन एक संघर्ष था, कुछ ऐसा कहा था उन्होंने। कुछ लाइनें तो मुझे वैसी की वैसी ही याद हैं - "ये जो मोटा चश्मा देख रहे हैं ना मेरी आंखों पर, दरअसल ये रेलवे स्टेशन की स्ट्रीट लाईट के नीचे पढ़-पढ़कर इम्तिहान देने का नतीजा है।" उनकी कहानी सुनते हुए कॉलेज ऑडिटोरियम में गहरा सन्नाटा था। "अंग्रेज़ी तो मुझे आती ही नहीं थी, वो तो कॉलेज के दोस्तों ने सिखाई। मैं आप लोगों की तरह किसी पब्लिक स्कूल, किसी कॉन्वेंट में नहीं पढ़ा।" और इतना कहते-कहते रजत शर्मा फिर अंग्रेज़ी में अपनी बात कहने लगे। कैसे कॉलेज में अरुण जेटली, विजय गोयल जैसे छात्र नेताओं से दोस्ती हुई, कैसे इमरजेंसी के दौरान उनमें भारतीय राजनीति की गहरी समझ और रुचि पैदा हुई, कैसे पत्रकारिता में रिसर्चर बनकर आए, कैसे रिपोर्टर बने और कैसे प्रीतिश नंदी जैसे पत्रकारों के साथ चंद्रास्वामी का सच उजागर किया। लेकिन ये कहना पड़ेगा कि पूरे चालीस मिनट रजत शर्मा ने दर्शकों को बांधे रखा और जीवन के कुछ अनमोल संदेश (Do what you believe in.) के साथ जब उन्होंने बोलना ख़त्म किया तो लड़कियां ज़ोर-ज़ोर से तालियां बजा रही थीं। बिना किसी तैयारी के मुझे धन्यवाद ज्ञापन के लिए भेज दिया गया - In Hindi and English, both, मुझसे किसी ने कहा और मैं जाने क्या बोलकर मंच से उतर आई। शायद विपरीत परिस्थितयों से जूझने और प्रेरणा-स्रोत होने जैसा कोई घिसा-पिटा जुमला इस्तेमाल किया था मैंने। रजत शर्मा से पत्रकारिता का गुर सीखने के लिए कई लड़कियां उनके पीछे-पीछे विज़िटर्स रूम तक गई थी। झूठ नहीं बोलूंगी, उनमें से एक मैं भी थी। मुझे हिंदी और अंग्रेज़ी पर उनकी ज़बर्दस्त पकड़ ने बेहद प्रभावित किया था और स्ट्रीट लैंप वाली बात तो ज़ेहन में कई दिनों तक रही थी।

इसी रजत शर्मा को हमने बाद में जीभर कर कोसा भी। इंडिया टीवी का कॉन्टेन्ट हमारी कई औपचारिक-अनौपचारिक चर्चाओं में मज़ाक का विषय बना। इंडिया टीवी टाइप के सुपर्स, हेडलाइन्स पर हम हंसते भी थे (ये 2004-2005 की बात है)। लेकिन इसी इंडिया टीवी ने न्यूज़ के मायने बदले, टीआरपी की नई परिभाषा तय की और टीवी के दिग्गजों को ठेंगा दिखाते हुए शीर्ष पर ऐसा कायम हुआ कि खिसकाना मुश्किल।

पढ़ाने के दौरान ही हमने एक और अभ्यास किया क्लास में - कॉन्सेप्ट नोट लिखने का। कुछ छात्रों के कॉन्सेप्ट कुछ ऐसे थे - 'एलियन्स, सच या फ़साना', 'योग भगाए रोग', 'फ़ैशन के पीछे का सच'। मैं मन-ही-मन इन्हें इंडिया टीवी लायक कॉन्टेन्ट करार देती रही, लेकिन सच तो ये ही कि अब तकरीबन सभी टीवी चैनल इसी ढर्रे पर चल पड़े हैं। जो शख़्स अगली पीढ़ी को भी इस क़दर प्रभावित कर रहा है उसमें कोई बात तो होगी ही!

Friday, October 29, 2010

बेज़ुबां ख़्वाब कुछ कहते हैं

सुबह-सुबह मिले ख़्वाब की
तासीर कैसी है,
कैसा है मिज़ाज तुम्हारा,
पूछती हूं ख़ुद से।
हंस देता है आईना,
उलझे-रूखे बालों,
सूखे होंठों पर
ठंड उतर आई है।

लेकिन नर्म हाथों की
गर्मी से आज मैंने
आंखों को सहलाया है ।
बांधा है फिर से
कुछ हर्फ़ों को
दुपट्टे के कोने में।
नुक़्तों को
माथे की बिंदिया बनाया है।
फिर बनी हूं
एक नज़्म आज मैं,
फिर कोई गीत
याद आया है।

I can hear my dreams talk

Dream, my dream!
How are we this morning,
I ask.
The mirror smiles at me
And the chapped lips,
Dry, coarse hair
Resemble new-found winter.

But I share the warmth
Of my palms
With my watery eyes.
I tie some phrases
At the far end of my dupatta,
And sprinkle some words
over my forehead.
I am a sonnet today,
I am looking out for a song.

Thursday, October 28, 2010

इन बेज़ुबां ख़्वाबों का क्या करूं

एक ख़्बाब मिलता है सुबह सिरहाने,
कैसी बेचैनी है जो तकिए पर लेटी दिखती है।
जहां जाती हूं, घर में पीछे-पीछे चलती है।
लफ़्ज़ हैं कि तितलियों जैसे फड़फड़ाते हैं,
थाम भी लूं तो काग़ज़ पर उतरने से डरते हैं।

आंखों के कोने पर लटका एक आंसू
आज क्यों बाढ़-सा बहने को बेताब है?
क्या उलझन है जो मन में
एक गांठ-सी बनी बैठी है
किसे झकझोरूं, किसको खोलूं।

खिड़की से बाहर आसमां का कोई कोना
अपना नहीं लगता।
नीले-नीले बादलों की नाव
मुझे मंझधार में क्यों छोड़ जाती है
क्यों सब डूबता उतराता-सा लगता है।

सुबह सिरहाने मिला वो ख़्वाब
कुछ कहता ही नहीं,
बस साथ-साथ चलता है।
वो बेचैनी जैसे आंखों में उतर आई है
धूप में भी सब नमनाक दिखता है।

Dreams, that don't speak


I find a dream kept on my bed

The restless one rests on my pillow.

It follows me in the house,

And wherever I go.

Words keep flying around,

Like butterflies.

And won't sit still on the paper,

Even when I hold them by their wings.

One teardrop hangs at one corner

Waiting to inundate my world.

What is that snarl in my heart,

Looks like a knot not willing to open.

What do I shake?

What do I open?

The sky hanging down on my window

Looks so far away.

Blue clouds are like boats,

Which refuse to move from here.

I can't take the plunge.

I can't sit still.

The dream that I found

Doesn't say anything.

Only walks around with me.

The dream has now walked into my eyes,

And the sun seems wet today.

Tuesday, October 26, 2010

बच्चों का आना - भाग 4 (पहाड़ों पर उनके बगैर)

नौकरी छोड़ते ही एक शानदार प्रस्ताव मिला है, जिसे ठुकरा नहीं सकती। "क्या आप हमारे लिए एक डॉक्युमेंट्री बनाएंगी?" एक एनजीओ के डायरेक्टर जब मुझसे पूछते हैं तो मुझे यकीन नहीं होता। फिल्म और मैं? एक टूटी पीठ और दो छोटे बच्चों के साथ? लेकिन पूरा परिवार मेरी हौसलाअफ्ज़ाई में जुट जाता है। बच्चों की दादी और नानी ने गज़ब के तारतम्य के साथ घर का मोर्चा संभाल लिया है। मैं घर से दूर, पूर्वा एक्सप्रेस में बैठ अपने ही राज्य झारखंड के एक ऐसे शहर, ऐसे इलाके के लिए निकल पड़ती हूं जिसका नाम ही सुना है बस।

कई महीनों में ये पहला मौका है जब मैं अकेले सफ़र पर निकली हूं। फिल्म की शूटिंग के पहले रेक्की करनी है, इसलिए साथ में कोई नहीं। ब्रीफ के नाम पर इतना मालूम है कि झारखंड और पश्चिम बंगाल की राजमहल पहाड़ियों में एक प्रीमिटिव ट्राइबल ग्रुप (आदिम जाति) रहती है जिन्हें पहाड़िया कहते हैं। इनकी जीवन-शैली, इनकी समस्याओं और मुख्यधारा से दूर इनके रोज़-रोज़ के संघर्ष पर ना सिर्फ फिल्म बनानी है, बल्कि इसे तस्वीरों और कहानियों के ज़रिए शहरों में बसनेवाले "सभ्य समाज" तक भी पहुंचाना है। इस तरह का ये मेरा पहला असाइनमेंट है, इसलिए चिंता लाज़िमी है।

मैं सफ़र में पढ़ने की कोशिश करती हूं। मन बार-बार बच्चों की ओर लौटता है। क्या कर रहे होंगे? उन्हें लगता होगा मां कहां चली गई? रात में रोएंगे तो नहीं? जहां-जहां नेटवर्क मिलता है, मैं उनकी खोज-खबर के लिए फोन करती रहती हूं। फिर मेरी मां ही कहती है, "हमपर भरोसा करो और अपने फ़ैसले पर भी। जिस काम के लिए गई हो, वो ठीक से करके आओ।" फिर मैं घंटे-घंटे फोन करना बंद कर देती हूं।

मुझे जेसीडीह उतरना है। यहां से अस्सी किलोमीटर दूर गोड्डा जाना है, जहां से फिर साठ किलोमीटर अंदर राजमहल की पहाड़ियों पर बसे गांवों में मेरे पात्र होंगे, मेरी कहानियां होंगी। स्टेशन पर मुझे एक टूटी-फूटी से मार्शल लेने आई है। वैजनाथ जी ड्राईवर हैं। जेसीडीह से निकलते ही पूछते हैं, "मैम, गाना लगा दूं क्या?" हामी भरते ही घरघराता हुआ टेपरिकॉर्डर बज उठता है। मोहम्मद रफी के गानों की बेहद खराब नकल। नकल करनेवाले गायक की आवाज़ नहीं पकड़ पाती। बाबुल सुप्रियो? नहीं, वो तो किशोर दा के गानों की नकल करते हैं, और फिर उनकी आवाज़ ठीक ही है। ये महाशय कौन हैं? ना चाहते हुए भी मैं कैसेट का कवर मांग बैठती हूं। ऐश्वर्या की आंखें मुझे ऐसे घूर रही हैं जैसे पूछ रही हों, क्या जानना चाहती हो? चुपचाप कैसेट बजने दो और ज्ञान बघारने की कोशिश तो बिल्कुल मत करना। सो, घरघराता हुआ टेपरिकॉर्डर अपनी घिसी हुई आवाज़ में कैफ़ी आज़मी के लिखे गीत गाता चला जाता है - "ये दुनिया ये महफिल मेरे काम की नहीं..." मैं घबराकर आंखें बंद कर लेती हूं।

शाम होते-होते हम गोड्डा पहुंच गए हैं। मैं एनजीओ के स्थानीय दफ्तर गई हूं। सब घर निकलने की तैयारी में हैं। सुबह दस बजे का वक्त देकर सब अंधेरा होते-होते निकलने लगते हैं। पांच बजे? दिन इतना छोटा? दस बजे सुबह तक मैं क्या करूंगी इस सोए हुए कस्बे में? मैं बेहद परेशान हो जाती हूं। कुछ प्रोजेक्ट रिपोर्ट देखने के बहाने से एक घंटा निकल जाता है, लेकिन अब और नहीं। मुझे होटल पहुंचा दिया गया है। एक अकेली लड़की को होटल वाले भी घूम-घूमकर देख रहे हैं। ये कहां फंस गई मैं? जी में आता है, ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाकर कहूं, दो बच्चों की मां हूं मैं। मेरे पहनावे को देखकर लड़की मत समझना मुझे। ख़ैर, खाना कमरे में ही भेजने को कह मैं धाड़ से दरवाज़ा बंद कर लेती हूं। अचानक मुझे घर और बच्चों की याद बुरी तरह सताने लगी है। कमरे में अजीब-सी गंध है। खिड़की खोल नहीं सकती, जाली पर मच्छरों को दिमाग में ही गिन लिया है मैंने। अपनी क्रीम की आधी बोतल मैं अपने हाथों पर उंडेल लेती हूं। कुछ तो राहत मिलेगी। बाथरूम की ओर तो झांकने का भी मन नहीं करता। फिल्ममेकर भी बनोगी अनु सिंह और ज़िन्दगी के मज़े भी लूटोगी? मुमकिन ही नहीं।

रात सफ़ेद पन्नों पर कई तरह की योजनाएं बनाते गुज़रती है। लाल-नीले कलम में पूरी ज़िन्दगी की योजना पन्नों पर बिखरी पड़ी है, मैं फिर भी उतनी ही उलझी हुई और परेशान हूं। अकेलापन क्या बना देता है आपको? आठ बजे से ही ड्राईवर का इंतज़ार है। पौने दस बजे पहुंचता है वो। तबतक मैं गोड्डा से ही भाग निकलने को तत्पर हूं। ख़ैर, आज का दिन तो शहर में ही बीतना है। मैं दिनभर क्षेत्र में काम करनेवाले सामाजिक कार्यकर्ताओं से पहाड़िया लोगों के बारे में ज़्यादा से ज़्यादा जानकारी इकट्ठी करना चाहती हूं। सुंदरपहाड़ी में रहनेवाले टीम लीडर कहते हैं, "आंकड़ें कुछ नहीं बताएंगे आपको। You will have to experience them to know them better." बिल्कुल। यही तो मैं कह रही हूं। सुंदरपहाड़ी ले चलिए ना मुझे। दफ्तर में रेक्की थोड़े करूंगी। मैं झल्ला उठती हूं।

अगली सुबह पांच बजे का वक्त मुकर्रर होता है निकलने के लिए। मुझे नींद तो आज भी नहीं आई है, लेकिन फिर भी खुश हूं कि कल फील्ड में तो रहूंगी। पीठ जवाब देने लगी है। डर से पेनकिलर नहीं खा रही। अगर सुबह नींद ना खुली तो? करवट बदलते रात निकलती है।

सुबह-सुबह मैं होटल के चौकीदार कम वेटर को आवाज़ देती हूं। "इतना भोरे-भोरे?" मैं बिना जवाब दिए सीढ़ियां उतर जाती हूं। थोड़ी ही देर में हम शहर के बाहर होते हैं। गाड़ी में अब भजन बज रहा है, फिल्मी गानों की तर्ज पर। "बहारों फूल बरसाओ" की पैरोडी भजन के रूप में! लेकिन आज मैं आंखें बंद नहीं करती। गोड्डा शहर से बाहर सड़क के किनारे के गांव अंगड़ाई लेते हुए बाहर निकल आए हैं। कहीं साथ-साथ मवेशी चलते हैं, कहीं नवंबर की हल्की ठंड में धूप का कोना पकड़े बड़े-बूढ़े सुस्ता रहे हैं। और बाकी भारत के गांवों के खेतों, सड़कों पर सुबह-सुबह जो नज़ारा दिखता है, उससे कहां बच सकते हैं आप! सुंदरपहाड़ी एक ब्लॉक है जहां मुझे टीमलीडर से मिलना है। यहां से गाड़ी में नहीं, मोटरसाइकिल पर जाना है। खु़दा रहम करे! मेरी पीठ का क्या होगा? जहां मोटरसाइकिल नहीं जाएगी वहां दो से तीन किलोमीटर पैदल चलना होगा। पहाड़ी रास्ते पर? नहले पर दहला! जब ओखली मे सिर दिया तो मूसलों से क्या डरूं। मैं बहादुर बच्चे की तरह हराधन साव की मोटरसाइकिल पर पीछे बैठ जाती हूं।

सुंदरपहाड़ी से निकलते ही दूसरी दुनिया में आ जाते हैं हम। दूर तक पसरी पहाड़ियां, पहाड़ पर झुका नीला आसमान, खेतों में कटने के लिए तैयार फसलें, और फिर हम अचानक जंगल में जा घुसे थे। अभी तक तो सड़कें मौजूद थीं। हराधन मुझे निचले इलाके के गांवों में ले जा रहा था।

टूटी-फूटी झोंपडियां, लेकिन सामने पसरे सरसों के पीले खेत। गांव के बाहर एक चापाकल और चापाकल पर झुक आया नीम। मैदान में फुटबॉल खेलते नंग-धडंग बच्चे। हराधन मुझे चापाकल के पास ही किसी पहाड़िया के घर ले आया है। "जामू पहाड़िया नाम है इनका", हराधन कहता है। मैं कुछ झिझकते हुए, कुछ अनिश्चितता के साथ हाथ जोड़कर लकड़ी काटते अधनंगे शख्स को 'नमस्ते' कहती हूं। इसी दुविधा में हूं कि क्या पूछूं, कहां से बातचीत शुरू करूं कि हराधन परेशानी और बढ़ा देता है। "दीदी, इन्हें हिंदी नहीं आती।" "तुम्हें इनकी भाषा तो आती है ना", मैं इतनी जल्दी हताश थोड़ी हो जाऊंगी। "थोड़ी-थोड़ी।" अब क्या करूं? मैं फिर भी जामू से उनका नाम पूछती हूं। जामू मुस्कुरा रहे हैं। मैं पूछती हूं कि परिवार में कितने सदस्य हैं? जामू अभी थोड़ा और मुस्कुरा रहे हैं। "हराधन, मैं कैसे बात करूंगी ऐसे?" मैं झल्ला उठती हूं। हराधन भागता हुआ गांव के भीतर से एक दुभाषिया पकड़ लाया है। जामेश्वर पहाड़िया स्वास्थ्य कर्मचारी हैं, इनकी पत्नी आंगनबाड़ी सेविका है। रांची तक हो आए हैं। गांव में सबसे पढ़ा-लिखा परिवार है इनका।

जामेश्वर की मदद से मैं गांव के लोगों के बारे में कुछ जानकारी चाहती हूं। इन पहाड़ों पर आजीविका के लिए शायद ही कोई ज़रिया यहां बसनेवालों के लिए उपलब्ध है। अमूमन हर पहाड़िया परिवार आज भी झूम खेती पर निर्भर है। पहाड़ों और पहाड़ों की ढ़लानों पर फिर किसी दूसरी जगह जंगल काटकर ये लोग लोबिया, मक्का, बाजरा और सरसों जैसी कुछ फसलें उगाते हैं। जिनके पास खेत नहीं, वे पत्ते चुनकर या लकड़ियां बेचकर अपना गुज़ारा करते हैं। आजीविका का कोई और साधन इन गांवों में मौजूद नहीं है।

ये तो फिर भी समृद्ध गांव है जिसके पास चापाकल है। यहां से और ऊपर जाते-जाते गांवों में पानी के साधन के नाम पर मीलों दूर मौजूद पहाड़ी झरने रह जाते हैं। एक मटका पानी के लिए कई किलोमीटर चलना पड़ता है। भूख-प्यास से जान बच गई तो मलेरिया नहीं छोड़ेगी, मलेरिया से भी बचे तो हैजा और डायरिया जैसी बीमारियां यहां जान लेती हैं। शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं इन गांवों में लक्ज़री है, विलास के साधन। जालेश्वर बड़ी उम्मीद से सबकुछ बता रहा है, जैसे मेरा यहां होना उनके लिए बदलाव का कोई रास्ता खोले शायद। मैं सफाई देती हूं, अपनी पहचान भी। लेकिन पूरा गांव जामू के दरवाज़े पर जुट गया है। बताते हैं, कुछ एनजीओ के लोगों को छोड़कर कोई सरकारी व्यक्ति दूर-दराज के पहाड़िया गांवों में कभी गया ही नहीं।

फिलहाल मेरे अंदर का फिल्ममेकर जाग चुका है। मैं सबकुछ कैमरे के पीछे से देख रही हूं। गांव, गांव के लोग, पानी के लिए पैदल चलती औरतें, हंडिया के लिए शाम को जमा हुए आदिवासी, उनके हाट-बाज़ार, उनका लोक-संगीत.... पिक्चर हिट है बॉस। अवार्ड विनिंग। क्या ज़बर्दस्त डॉक्युमेंट्री बनेगी।

जामू की सात-आठ साल की बेटी अचानक मेरे सामने खड़ी हो जाती है। हाथ में पत्ते के एक दोने में उबली हुई मकई के कुछ दाने हैं और दूसरे हाथ में पानी का एक लोटा। शरीर पर कपड़े के नाम पर एक चड्ढी है। गंदे बाल, बढ़े हुए नाखून। सोचती हूं, कितने दिनों से ये नहाई नहीं होगी। लेकिन उसकी आंखों में ऐसी आत्मीयता है कि मैं अपनेआप उसके हाथ से दोना और पानी, दोनों ले लेती हूं।

मुझे अब सबकुछ साफ-साफ दिखाई दे रहा है। जामू के चार बच्चे, जामू, उसकी पत्नी जिसके बढ़े हुए पेट को एक मैली-कुचली साड़ी किसी तरह ढंके हुए है बस, दरवाज़े की ओट से झांकते कुछ और बच्चे, जालेश्वर और उसके बगल में मोटरसाइकिल का सहारा लिए खड़ा हराधन। अचानक मुझे खुद को देखकर बड़ी शर्मिंदगी महसूस हो रही है। रिबॉक के जूते, लिवाइस की जीन्स, फैब इंडिया की कुर्ती, एडिडास की टोपी, एफसीयूके के सनग्लासेस... मेरा एक दिन के पहनावे का खर्च इनकी सालाना आमदनी से कहीं ज़्यादा है। मैं घबरा उठती हूं। यहां से जाना चाहती हूं। हराधन फिर आने की बात कह मोटरसाइकिल सड़क की ओर मोड़ लेता है।

मेरे पीछे बैठते-बैठते हराधन बस इतना कहता है, "दीदी, वो दाने शायद उनके अनाज के आखिरी दाने थे।" पीछे बैठते-बैठते मैं रो पड़ती हूं। रोती चली जाती हूं।

http://janatantra.com/2010/03/22/anu-singh-reportage-on-condition-of-tribals-of-jharkhand/



Monday, October 25, 2010

बच्चों का आना - भाग 3

रांची से मेरा बोरिया-बिस्तर बंध चुका है, चार महीनों के बच्चों के साथ। ननिहाल में वक्त गुज़ारने के बाद अब दादा-दादी की बारी है कि वो जुड़वां बच्चों के सुख उठाएं। मेरा मन भारी है। जानती हूं, अब ज़िन्दगी में कभी अपने ही घर में, अपने मायके में इतने लंबे वक्त के लिए नहीं आ सकूंगी। कैसी अजीब-सी स्थिति में होती हैं हम लड़कियां! कितनी जल्दी पहचान बदल जाती है, घर का पता बदल जाता है, प्राथमिकताएं बदल जाती हैं। और हमें बदलने की इस प्रक्रिया में भी संभला-संभला सा, बिना शिकायत के बहते चले जाने की सीख दी जाती है, बचपन से।

फिर कोलकाता होते हुए मैं पूर्णियां पहुंची हूं। इस बार छोटे चाचा-चाची और मेरा ग्यारह साल का चचेरा भाई मेरे हमसफ़र हैं, दादाजी के घर तक। फिर नए सिरे से बक्सों का खुलना, नए घर की दिनचर्या के साथ अपना, बच्चों का ढल जाना, फिर धूप के एक कोने को अपना साथी बनाना, शाम ढलते ही अपनी गोद में दोनों को लिए कमरों में दुबक जाना। बच्चों के अन्नप्राशन के बहाने बड़े स्तर पर उनका आने के समारोह की तैयारी की जा रही है। गांवों, शहरों, बच्चों के ननिहाल से आए मेहमान। बैंगलोर से आया मेरा भाई। असम से आए बच्चों के फुआ-फूफा। नाना-नानी, दादा-दादी, काका-चाचा, भैया। कई सारे लोगों के बीच साढ़े चार महीने के आद्या-आदित अपनी पहचान बना चुके हैं, गोद में लेने पर हंसकर अपनी पहचान जताते हैं, भीड़ से, लोगों से कतराते नहीं। आद्या फिर भी शर्मीली है, आदित तो सबसे रिश्ते जोड़ चुका है।

समारोहों के खत्म होने का वक्त है। यहां आए मुझे दो महीने हो चुके हैं। इनकी पहली होली भी शुभ-शुभ निकली है। मेरी मैटरनिटी लीव बस खत्म होने को है। दो बच्चों के साथ काम पर जाना कितनी मुमकिन होगा, इसको लेकर जद्दोज़ेहद शुरू हो गई है। हर रोज़ बहस छिड़ती है, हर रोज़ हम किसी नतीजे पर नहीं पहुंचते। मैं क्या चाहती हूं? कहना मुश्किल है। फिलहाल, मैं दिल्ली वापस जाना चाहती हूं। पिछले एक साल में बच्चों के आने के इंतज़ार के अलावा मैंने कुछ नहीं किया। अब मैं नए सिरे से, नई ज़िम्मेदारियों के साथ अपनी पहचान कायम करना चाहती हूं। सुनने में तो ये सब अच्छा लगता है, लेकिन क्या इतना आसान है?

हम बच्चों के दादा-दादी को लिए सिलीगुड़ी/बागडोरा होते हुए दिल्ली पहुंचते हैं। सोचती हूं, पांच महीने के बच्चों ने पांच शहर देख लिए। घूमन्तू मां की घूमन्तू संतानें!

एक साल से बंद पड़े घर में गृहस्थी फिर नई आवाज़ों के साथ शुरू होने लगी है। इस बार बच्चों की आवाज़ के इर्द-गिर्द पूरा घर घूमता है। मैं नौकरी पर वापस चली गई हूं। फिलहाल तय हुआ है कि बारी-बारी से नानी और दादी आकर बच्चों को संभालती रहेंगी। झूठ नहीं बोलूंगी। दफ्तर में वापस जाना ऐसा है जैसे मुझे मुद्दतों बाद खुली हवा का झोंका मिला हो। मैं दुगुने उत्साह के साथ काम में लग जाती हूं। न्यूज़ रूम की चिल्ल-पों कानों को संगीत समान लगती है, बुलेटिन ऑन-एयर होता है तो लगता है बाजबहादुर का किला फतह कर लिया।

लेकिन ये उत्साह बहुत दिनों तक नहीं चलता। बच्चों को छोड़कर आने के अपराध-बोध के बीच ये भी दुविधा परेशान करने लगी है कि मेरी वजह से बच्चों की दादी-नानी को अपना-अपना घर छोड़कर यहां, नोएडा प्रवास की सज़ा भुगतनी पड़ रही है।

काम का बोझ है या मेरे वज़न का, मेरी पीठ दोनों बर्दाश्त नहीं कर पाती और मैं बच्चों के नौ महीने का होते-होते स्लिप्ड डिस्क के साथ अस्पताल पहुंच जाती हूं। नए सिरे से परेशानी, नई चुनौतियां और आठ हफ्ते बिस्तर से ना उठने की हिदायत। बच्चों को संभालने में सब लग जाते हैं। अपनी-अपनी ज़िम्मेदारियों के साथ, अपनी-अपनी काबिलियत के मुताबिक।

तीन किलोमीटर दूर रहनेवाला मेरा भाई शाम को दफ्तर से पहले मेरे पास आता है। घंटा-दो घंटा बच्चों को देखता है। दो-चार दिन तो उनके दूध का डिब्बा, डायपर का बैग लिए एक बच्चे को रात-भर के लिए अपने घर भी ले जाता है। वो और उसका रूममेट बच्चे को रातभर सुलाते हैं, दूध पिलाते हैं, उसकी देखभाल करते हैं, और सुबह हमारे पास छोड़कर चले जाते हैं। लड़कों ने शादी से पहले ही बच्चे संभालने में महारत हासिल कर ली है, हम उन्हें चिढ़ाते हैं। लेकिन बच्चे अकेले तुम्हारे तो नहीं, भाई कहता है। मैं मामा हूं, मेरा हक़ बनता है। बच्चों पर सबके हक़ को मैं कभी चुनौती नहीं देती। इससे मेरी ज़िन्दगी आसान हो जाती है। कभी मन का एक कोना पोज़ेसिव होने की बात भी करे तो डांटकर चुप करा देती हूं। टूटी हुई पीठ वाली मां बच्चों की अकेले देखभाल तो बिल्कुल नहीं कर सकती। और सब मिलकर पालेंगे तो सबका हक़ होगा उनपर।

दो महीने बिस्तर पर पड़े रहने के बाद मैं फिर दफ़्तर जाती हूं। सबको मुझसे सहानुभूति है। यहां तक कि सफाई करनेवाली दीदी भी मुझसे मेरा और मेरे बच्चों का हाल पूछती है। मैं फिर दफ्तर और घर के बीच, बच्चों और अपने स्वास्थ्य के बीच का संतुलन कायम करने में जूझने लगती हूं। वक़्त गुज़र तो रहा है, तेज़ी से भी, लेकिन भारी पड़ता है।

एक दिन यूं ही बुलेटिन बनाते-बनाते मेरी पीठ में असह्य दर्द शुरू होता है। रनडाउन पर एंकर लिंक लिखने की बजाए अब मैं अपना इस्तीफ़ा लिख रही हूं। बिना किसी भूमिका, बिना किसी तैयारी, बिना किसी सलाह-मशविरे के मैं नौकरी से इस्तीफ़ा दे देती हूं। मैं वो नौकरी छोड़ देती हूं जिसने मुझे पहचान दी, मुझे आत्मविश्वास दिया, जिसने आर्थिक सुरक्षा दी। ये दफ्तर मेरे लिए घर के बाद सबसे पावन जगह लगती थी। यहां मैं करीब-करीब सबको जानती-पहचानती थी। यही नौकरी मिली थी तो मैंने पापा को कहा था कि बस यहीं से रिटायर होना है मुझे। और मैंने बिना सोचे-समझे इस नौकरी से इस्तीफा दे दिया।

मेल भेजकर मैं घर चली आई। पूरे रास्ते रोती रही। बीच में मैनेजिंग एडिटर का फोन आया। मैंने कहा, थोड़ी देर में संभल जाऊंगी तो फोन करूंगी। अगले दो दिन तक मुझे सब समझाते रहे, घर में, दफ्तर में, सब जगह। कहा गया कि मैं लंबी छुट्टी ले लूं पर नौकरी ना छोड़ूं। एचआर से फोन आए। लेकिन मैं ज़िद पर कायम थी। जानती थी कि अगले दो महीने में मुझे मुश्किल फैसला तो लेना ही होता। मां और मम्मी का ऐसे अपने घर छोड़-छोड़कर आने वाला इंतज़ाम ज़्यादा लंबा नहीं खिंचना था। मैं बच्चों को आया या क्रेश के भरोसे नहीं छोड़ना चाहती थी। नौकरी तो अब कहां मुमकिन हो पानी थी?

Wednesday, October 20, 2010

Excuse me, please!

He is not someone who is very fond of milk, unlike his twin sister. So, every morning is a tough morning for me, trying to make him gulp down that extra dose of calcium. But the lactophobic that he is, Adit will come up with one new excuse everyday.

As always, we are after him with that one glass of milk. Adit will start with his readymade excuses, which don't work anymore. "Only Mamma will hold the glass", "Too sweet", "Too hot", "Too cold", "Too much cream over it", "I can see a fly in my milk"... He has tried it all, albeit unsuccessfully.

So, today he holds the glass politely, completely surprising us. He takes one sip, and the other. Voila! We have won, after all. Just when I am getting completely euphoric over this new development, Adit looks angry and suddenly starts hitting his tummy.

"What Adit? What is it?" My husband looks worried.

"It's my tummy Papa."

"Hurting? You alright?"

"Tummy is acting rather funny you see. I want it to drink all the milk and it wants to throw up. Not me Papa, it's my tummy. So I am punishing him you see."

Adit, and his excuses.

Tuesday, October 19, 2010

Dreams Sweet Dreams

I am trying to put the twins to sleep. And I am trying really hard. But nothing works. No lullabies, no stories, not even counting till 100. They just wouldn't sleep.

So we decide to play a game. "We close our eyes. All three of us. Nobody cheats. Now we have to think of the most wonderful things we want to dream about. So, who begins now?"

"Mamma. Mamma begins."

"Sure kids. So, Mamma's eyes are shut and she is dreaming of blue sky and blue waters, mountains and valleys. She is dreaming of a valley full of flowers. Adya next."

"Adya's eyes are closed. I am dreaming of moon and stars and the fairy who comes from the stars. I am dreaming of wonderful gifts fairy has got for me."

"Great. Adit's turn now."

"Adit's eyes are shut too. I am thinking of Santa Claus. And cars. Red cars, white cars, black cars, small cars, big cars. And motorcycles. And tractors and trucks. I am also dreaming of helicopters. And that big white plane."

Dreams sweet dreams I say.

Family matters

Adya pretends to be deep in her thoughts. "What is a family," she asks.

"Mmmmm.... A family... Let me think. A family is a unit, a set of people who love you dearly", I try to be as simple as possible.

"So Adya, do you know now what a family is?"

"Yes Mamma. Family is you, Papa, Adit, Adya, Dadi Maa, Baba, Nani Maa, Nanaji, Bhaiya Mamu, Chota Mamu, Ruchi Mausi, Bua, Phuphaji, Sharad Bhaiya, Riti Mami, Saumya Mami, Lakhi Bhaiya, Gauri Didi, Anand Bhaiya, Hari Bhaiya, Balram, Amresh Mamu, Priyanka Mami, Ravi Mamu, Manisha Mami, Om, Sushant Mamu, Guddu mamu, Choti mausi, Sabah-Hafsa Mausi, Buia Mausi, Vivaan, Abhishek Mamu, Pratik Mamu. Family is Purnea, Ranchi, Siwan, Calcutta. Family is..."

"Hold on Adya. Mamma is getting breathless now." I literally have to shut her up!

And that's the joint family Adya comes from. वसुधैव कुटुम्बकम। The entire world is a family, you see.

Sunday, October 17, 2010

दुर्गा पूजा की यादें, बच्चों की ख़ातिर

आद्या और आदित,

आज विजयदशमी है। मम्मा आप लोगों के लिए अपने बचपन की कुछ यादें सहेजकर लिख ले रही है ताकि आप दोनों जब बड़े हो जाएं और मेरी भी यादें धुंधली पड़ने लगे तो मैं आपको फिर भी अपने बचपन के बारे में कुछ बता सकूं।

छुट्टी तो हमारी भी लंबी ही होती थी दुर्गा पूजा के लिए, लेकिन हम छुट्टियों का नहीं, पूजा के आने का इंतज़ार करते थे। क्या कहूं कि पूरा शहर कैसे अचानक एक नया रंग ले लेता था। मौसम बदलने लगता था, सुबह-शाम की हवा अच्छी लगती थी और हम भी समझ जाते थे कि मां दुर्गा ने अपने आने की आहट दे दी है। हमारे रांची वाले घर की गली तो देखी है ना आप दोनों ने? गली में घुसते ही बाईं तरफ जो बड़ी चहारदीवारी दिखती है ना, वहां दरअसल एक बड़ा-सा खाली मैदान था। पूरे साल हम उसी मैदान में धमाचौकड़ी करते, खो-खो, कबड्डी, पिट्ठू, क्रिकेट, गुल्ली डंडा खेलते। शाम तो हमारी वहीं निकला करती थी, उसी मैदान में। वहीं हमने साइकिल चलाना सीखा, वहीं भैया मामू से खूब उलझी भी, वहीं दोस्त बनाए और कुछ दुश्मन भी। पांच-छह कट्ठे का रहा होगा वो मैदान, लेकिन तब लगता था जैसे पूरी दुनिया उसी परिधि में सिमटती हो।

तो उसी मैदान में बारिश के बाद लंबी-लंबी घास निकल आया करती थी जिसपर पूरा-पूरा दिन हेलीकॉप्टर-सी तितलियां मंडरातीं और पूरा-पूरा दिन हम उन तितलियों के पीछे भागते। मैदान के किनारे-किनारे कास के फूल निकल आते थे। उजले, रूई से हल्के फूल। छुओ तो हाथ से फिसल जाएं। वो घास जब कपड़ों में चिपकती तो आपकी नानी मां हमपर गुस्सा करतीं। धोने में कितनी परेशानी होती होगी उनको!

जब घसियारिनें मैदान में घास काटने के लिए पहुंचतीं तो हम समझ जाते कि पू्जा की तैयारियां शुरू हो गई हैं। पूरे शनिवार-इतवार हम बहाने बना-बनाके मैदान में उनका घास काटना देखने के लिए पहुंच जाया करते। उस कटे हुए घास की खुशबू अबतक नहीं भूली हूं मैं, बारिश के बाद का गीलापन लिए हुए घास की वो खुशबू। तो घास कट जाती, मोहल्ले के चाचा-भैया लोग चंदे उठा लिया करते और उसी मैदान में बांस की बल्लियां गिरने लगतीं। सब उत्सुक होते कि इस साल मां दुर्गा सपरिवार किस रूप में उतरेंगी हमारे मोहल्ले में। हर साल नया रूप, हर साल पंडाल का नया रंग। नए कपड़े सिल जाते, चप्पलें बदल दी जातीं, चूड़ियों के नए डिब्बे निकल आते, माथे की बिंदियों पर पूर्णमासी का चांद उतर आता।

पूरे शहर में जगह-जगह पंडाल बन रहे होते। हम षष्ठी का इंतज़ार करते और मां की आंखें खुलते हीं पूरा शहर जैसे जश्न में डूब जाता। एक हरसिंगार का पेड़ था हमारे घर के पास ऑरोविन्दो आश्रम में। वहां फूल चुनने के लिए मार पड़ने लगती। सुबह चार बजे से ही लोग अपने-अपने हाथों में थैलियां लिए गली-गली फूल चुना करते। हरसिंगार के उन फूलों का पुष्पांजलि में बड़ा महत्व था। शायद अब भी होता होगा। खैर, हरसिंगार के अलावा चंपा, चमेली, जवा कुसुम के फूलों से पूजा की थालियां सज जाया करतीं। हमारे घर के आंगन में चांदनी का एक बड़ा-सा पेड़ था। हम भी फूल चुन-चुनकर चांदनी और जवाकुसुम की एक सुन्दर सी माला बनाया करते।

ढाक के बजते ही पूरा मोहल्ला जान जाता कि सुबह की आरती का वक्त हो गया है। गहरे, चटक रंगों की पाढ़ वाली साड़ियों में लिपटीं मोहल्ले की चाचियां, भाभियां लाल बिंदी लगाए, खुले घुंघराले बालों से पानी टपकाती हुई जब पूजा की थालियां लिए पंडाल में पहुंचतीं तो लगता साक्षात दुर्गा ऐसे ही कई रूपों में होती होगी शायद। धूप और अगरबत्ती की खुशबू हमारे घर के आंगन तक पहुंचती थी। मां के भोग के लिए जो खिचड़ी बनती उसका स्वाद छप्पन भोग से बेहतर होता। आज तक वैसी सोंधी खिचड़ी मैंने नहीं खाई। लकड़ियों के चूल्हे और मिट्टी की हांडी का स्वाद मिला होता था उसमें।

शाम ढलते ही फिर एक बार आरती होती। मेरी दोस्त सुवर्णा मुखर्जी के चाचा (नाम याद नहीं आ रहा अभी) धुनुची नाच करते। हाथ में आग लिए मुंह से भी धुंआ निकालते धूप का दिया पकड़े हुए उनके नाच को देखने के लिए अपना मोहल्ला क्या, आस-पास के इलाकों से भी लोग आया करते। ढाकवाला तो बर्दमान (पं. बंगाल) से आता था शायद।

अंधेरा होते ही पूरी सड़क लाइटों से जगमगा जाती। ऐसा लगता जैसे असंख्य तारे हमारी खुशी में शामिल होने की इच्छा से हमारे बीच ही उतर आए हैं। रात के खाने के बाद हम भी शहर के पंडालों के दर्शन के लिए निकलते। उन पंडालों की सज्जा पर तो एक पूरा थीसिस लिखा जा सकता है। किसी साल व्हाइट हाउस थीम होता, कहीं विक्टोरिया मेमोरियल, कहीं लोटस टेम्पल की थीम होती तो कहीं पूरा का पूरा पंडाल भूसे से बना दिया जाता। पूरी रात अपने दादाजी और घर के बाकी सदस्यों के साथ हम गली-कूचों के पंडाल देखते, दुर्गाबाड़ी में मां के दर्शन करते और रात के तीन बजे कहीं फुचके खाते, कहीं चाट पकौड़ियां। हमारे लिए मेलों से खिलौने भी खरीदे जाते, कभी किचन सेट, कभी डॉक्टर सेट, कभी नाचनेवाला बंदर, कभी घर्र-घर्र चलती गाड़ी।

नवमी के दिन हम रातू जाते, महल में रातू के राजा का मेला देखना। क्या कहूं कि उस बीस किलोमीटर के सफर का, शहर से दूर एक पुराने महल में जाने का हम पूरे साल कितनी बेसब्री से इंतज़ार करते। रातू की पूजा टुकड़ों-टुकड़ों में याद है। ये याद है कि वहां सौ से ज़्यादा बकरों की बलि चढ़ाई जाती, महल के बगीचे में एक बड़ा-सा मेला लगता और रातू के राजा की एक छवि पाने के लिए घंटों लोग इंतज़ार करते।

विजयदशमी की तो बात ही निराली थी। किसी साल हम मोराबादी मैदान में रावण दहन देखने जाते तो किसी साल धुर्वा चले जाते। एक एम्बैस्डर में पूरा मोहल्ला समा जाता और हम दो बजे से ही मैदान के किसी वान्टेज प्वाइंट पर अपनी गाड़ी लगा देते जहां से दहन का पूरा नज़ारा साफ दिखाई देता। दहन तो अंधेरा होने के बाद होता लेकिन वो तीन-चार घंटे आस-पास के लोगों से गप-शप में मूंगफली तोड़ते, चाट खाते, गुब्बारे फुलाते गुज़रता। हम बच्चों को गाड़ी के ऊपर बिठा दिया जाता। जो थोड़े छोटे होते, उनको बड़ों के कंधों पर जगह दे दी जाती। और हम खुश हो-होकर, तालियां बजा-बजाकर असत्य पर सत्य की, पाप पर पुण्य की विजय देखते। घर लौटकर आते तो हाथ में तीर-धनुष, डुगडुगी, गुब्बारे जैसी कई चीज़ें होतीं। विजयदशमी की कढ़ी-पकौड़ों का भी स्वाद नहीं भूली। वैसी कढ़ी तो कोई नहीं बना पाता अब।

विसर्जन के वक्त शहर में एक अलग-सा नज़ारा होता। मां की विदाई करते हुए सब क्यों भावुक हो जाते थे, क्यों रोते थे, अब समझ में आता है। उन चार-पांच दिनों में तो हम किसी और दुनिया में होते थे, कई रिश्ते बनाते थे, एक परिवार-सा रहते थे।

ये जश्न, ये उत्सव का माहौल तुम्हें सौंप नहीं पाई हूं, इसका मलाल हमेशा रहता है। लेकिन वायदा करती हूं, कोलकाता, रांची, जमशेदपुर, पूर्णियां - सब जगह की दुर्गा पूजा से तुम्हारी यादों को भी भर दूंगी। तबतक, मां दुर्गा तुम्हें खुश रखें, तुमपर अपनी कृपा-दृष्टि बनाए रखें।

तुम्हारी मां।

Saturday, October 16, 2010

ज़माने-ज़माने की बात

यही तो बच्चों का असली घर है
मां कहती हैं।
खुल जाते हैं चरमराते हुए दरवाज़े,
सीलन-भरे कमरों से
निकलते हैं गुज़रे ज़माने के पन्ने।
छत से लटकता कोई झाड़फानूस नहीं
लेकिन कोने में कांच के टूटे टुकड़े हैं।
सालों की धूल है कढ़ाई वाली चादर पर,
कुर्सी है कि खिसकाओ तो रो देती है।
दीवारों की नक्काशी पर जमी है काई,
एक पीपल कमरे में घुसपैठिया है।

इस आंगन में कभी बच्चे खिलखिलाते थे,
सूखे हुए आम की टहनी हमसे कहती है।
वो कोने में देखो, रसोई है जहां
सौ-सौ जनों के पेट की तपिश का थी इलाज।
मिट्टी के चूल्हे आग को तरसते हैं अब तो,
छत ढह गई है, फर्श भी तो धंस गई है।
खाली पड़ी हैं दूध की भी हांडियां,
कांसे-पीतल के बर्तनों की अब कौन सुने।

ठूंठ-से रह गए हैं पेड़ बगीचों के अब,
ना आम मीठे रह गए हैं और ना ही बोलियां।
ये पेड़ देखो, हरसिंगार-सा लगता है।
फूल खिलते थे, ये भी तो लहकता होगा।
यहां पीछे हुआ करती थी एक गौशाला,
दूध-दही से तो भंडार भरा रहता था।
शुद्ध घी में बना करते थे लड्डू बेटा,
पूरा गांव उस खुशबू से महकता होगा।

इन खेतों में लहलहाती थीं फ़सलें,
ज़मीन कहते हैं, हीरे उगाया करती थी।
इस पोखर से आती थीं सोने-सी मछलियां,
छठ में पूरा कुनबा यहां जमता था।
पोखर में नहीं है एक बूंद पानी,
आंखों के आंसू भी तो अब
बात-बात पर छलकते नहीं हैं।

इस दरवाज़े पर सजते थे घोड़े-हाथी,
हर रोज़ जैसे लगती थी एक बारात।
दुआर पर खड़ी बाबा की फीटन
टुकड़ों-टुकड़ों में खड़ी अब कबाड़ लगती है।
घर खंडहर लगता है, क्या कहूं तुमसे
ये पुश्तैनी जायदाद उजाड़ लगती है।

मैं अपने दिल की भी कैसे कहूं आपसे मां,
बच्चों को मैंने सौंपी है कैसी थाती।
एक दौड़ता-भागता शहर सौंपा है,
और बोझ डाला है अपेक्षाओं का कंधों पर।
आप माज़ी को लिए ढोती हैं, देखिए ना मां,
मैं भी तो कल को लिए फिरती हूं माथे पर।
ज़माने-ज़माने की बात है ये, क्या बोलूं,
हम दोनों की ही तो एक-सी दुखती रग है।

Friday, October 15, 2010

देवी तेरे रूप अनेक!

सुबह-सुबह बजी है दरवाज़े की घंटी,
बिटिया के लिए आमंत्रण है।
आद्या में विद्यमान हैं अन्नपूर्णा,
ऐसा उन्होंने मुझे याद दिलाया है।

सज जाती है कन्याएं, बिछ जाते हैं आसन,
धुलते हैं पैर, लगा दी जाती है थालियां।
कुमकुम, रोली, अक्षत, फूलों से
पूजीं जाती हैं नौ कन्याएं बार-बार,
साक्षात देवी का आशीर्वाद लिया है उन्होंने।

कल ही देखा था, चीख-चीखकर
कामवाली की बेटी को देते धमकियां,
पकड़ी थी चोटी, खिंचा था थप्पड़,
सूखे, सांवले गालों पर।
"पोते की साइकिल छूने का गुनाह क्यों किया?"

देवी, तू कितने रूपों में विराजमान है!

मेरी मां जैसा मुझमें कुछ

बच्चों ने खेलते-खेलते अपनी उंगलियां
मेरी हथेलियों में फंसाई हैं।
तभी मेरे ज़ेहन में
एक बात कौंध आई है।
कैसे गुज़रे ये साल,
क्यों हो इसका मलाल।
जब बिटिया मेरी आंखों में झांक
बड़े प्यार से मुस्कुराई है।

कभी बांहों को मैंने
झूला बनाया है।
कभी दोनों को कंधों पर बिठाया है।
कभी मीठी-सी थपकी से
तेरे लिए नींदिया बुलाई है।

कभी खाने को मनुहार किया,
और शिद्दत से प्यार किया।
कभी टॉफियों की लालच में
मैंने तुम्हें कड़वी दवा पिलाई है।

तुम बुढ़ापे की उम्मीद भी,
कुछ कर गुज़रने की ज़िद भी।
तुम्हारे लिए कई बार मैंने
अपनों से की लड़ाई है।

मां की तरह मंदिर में जुड़ते हाथ,
व्रतों, त्यौहारों में तुम्हारी बात।
मेरी नसीहतों, हरकतों में भी तो
मेरी मां ही उतर आई है।

जैसे मां के घोंसलों से उड़े हम,
और एक नई दुनिया से जुड़े हम,
वैसे ही खाली होंगे हमारे भी घोंसले,
ये सोचकर जाने क्यों मेरी आंखें भर आईं हैं।


Thursday, October 14, 2010

ये सपनों का घर है

बिखरी-बिखरी चीजों में
कुछ ख्वाब संजोए रहते हैं,
एक खिड़की बाहर खुलती है,
और पत्ते बातें करते हैं।

दीवारों पर रंग भी है
और बच्चों की रंगोली भी,
इस घर में अपनी चाहत के
ऐसे कई रंग भी रहते हैं।

ये घर लोगों से सजता है
और बातें यहां बिखरती हैं,
इस घर में हम सबसे ज्यादा
खामोशी से ही डरते हैं।

हमको चंदा की चाह नहीं,
ना आसमान की ख्वाहिश है,
हम फर्श पर लेटे-लेटे ही
तारों की बातें करते हैं।

रोज़-रोज़ की दौड़ नहीं,
हम वक्त के साथ ही बहते हैं,
ये अपने सपनों का घर है,
इसको 1149 कहते हैं!

Wednesday, October 13, 2010

पिंक पेन और कविता

रात से पावर प्वाइंट में उलझी हूं। सुबह-सुबह क्लायंट के साथ मीटिंग है और भारी-भरकम शब्दों की तैयारी करके नहीं गई तो प्रभाव कैसे छोड़ पाऊंगी? तो, सारा ध्यान कंप्यूटर पर है। बगल में एक मोटी डायरी रखी है जिसमें मेरी कविताओं के साथ फिल्मों के लिए कॉन्सेप्ट से गीतों की पंक्तियां और गृहस्थी के हिसाब-किताब, सब मिल जाएंगे आपको।

रात ग्यारह बजे आद्या आई है झूमती हुई। मेरी नींद के साथ उसकी नींद के साथी भी गायब हैं। एक गुलाबी रंग की कलम है उसके हाथ में।

"कवीता लिख रही हो मम्मा? ये लोग पिंक पेन। इससे अच्छी 'कवीता' निकलेगी।"

आद्या के इतना भर कहने से मुझे पावर प्वाइंट से कुछ घंटे और उलझने की हिम्मत मिल गई है।

बारहमासा

(जनवरी)

कुछ और वक़्त निकला,
एक और साल गुज़रा।
जनवरी की ठंड में भी
देखो, लम्हें कैसे पिघलते हैं।

(फरवरी)

घर आओ सूरज दादा,
पकडूं मैं धूप का एक कोना
जब उसका रंग गुलाबी हो,
सीधे मेरे घर आती हो।
छन-छनकर फरवरी बिखरे
बच्चों का ज्यों हंसना-रोना।

(मार्च)

ये मौसम है जलते जंगल का
जब पलाश आग लगाता है
सुर्ख लाल फूलों से
होली की मांग सजाता है।
मार्च, तुम्हारे गालों पर भी
आओ, टेसू के रंग मल दूं मैं।

(अप्रैल)

गुलमोहर की छांव-सा है अप्रैल,
थोड़ा नर्म भी, थोड़ा गर्म भी।
अमलतास-सी फितरत उसकी,
रंग सुनहरा,
पर छुओ तो
पत्तों के संग झड़ जाएगा।

(मई)

कहां से आई है ये गर्मी,
मई तुम किससे जलती हो?
लाई कहां से आग सीने की
क्यों अंगारों पर चलती हो?


(जून)

जून, तुम्हारी करूं शिकायत?
बरखा को वापस भेज दिया है
सूरज का पकड़ा है दामन,
दुनिया को बेहाल किया है।

(जुलाई)

कानों में घूंघरू बजते हैं
जब बरखा थिरककर आती है
जुलाई संग यहीं ठहरना,
बदरा बिदेसी।

(अगस्त)

झूम-झूमकर आई बरखा,
अगस्त की कलाई पर बांधी राखी,
एक वादा भी लिया बादलों से,
कि कहीं पर कोई सितम ना ढाएं।
वादे? वादे तो तोड़ने के लिए होते हैं।

(सितंबर)

आता है चुपचाप सितंबर,
नहीं किसी से कुछ है कहता।
कभी बना बादल का संगी,
धूप के साथ कभी है रहता।

(अक्टूबर)

खिड़की पर झूलते आम के पत्ते
कैसे सर-सर बतियाते हैं।
अक्टूबर,
मैंने ऐसे तो तुम्हें जादू करते पहले नहीं देखा।

(नवंबर)

आया है खुशनुमा नवंबर,
बक्सों से निकले हैं स्वेटर।
चौपालों पर भीड़ जमी है,
धूप की हमको लत लगनी है।

(दिसंबर)

कहां से आई है ये पछुआ
हाड़ कंपाती लाई सर्दी,
गुज़रा देखो वहां दिसंबर
यादों से झोली फिर भर दी।

हुआ खत्म ये बारहमासा,
साल नया फिर से आएगा।
रंग बदले फिर से धरती,
पहिया ये चलता जाएगा...

Tuesday, October 12, 2010

अक्टूबर का जादू

खिड़की पर झूलते आम के पत्ते
कैसे सर-सर बतियाते हैं,
अक्टूबर,
मैंने ऐसे तो तुम्हें जादू करते पहले नहीं देखा!

Monday, October 11, 2010

जिनकी कविताओं, नज़्मों, गीतों से यादें गुलज़ार हैं


किताबों की अलमारी संभालने-सहेजने के क्रम में एक किताब हाथ में आई है। खोलकर देखती हूं। मेरी ही लिखावट में मेरा नाम लिखा है। अपने जन्मदिन पर कई सालों से खुद को एक किताब तोहफे में देती हूं मैं। ये किताब मैंने 1996 में खरीदी थी, अपने अठारहवें जन्मदिन पर। "पुखराज" - गुलज़ार की नज़्मों का संग्रह मैंने खरीदा तो होगा, लेकिन सोचती हूं तब उन लफ्ज़ों की क्या समझ होगी मुझमें। लेकिन ये भी याद है कि कई-कई बार कई नज़्में पढ़ीं, फोन पर अपनी दोस्त मीनू को सुनाया भी, और अकेले बैठकर खूब रोई भी।

गुलज़ार के साथ हंसने-रोने का पुराना नाता है मेरा। ठीक-ठीक याद नहीं कि पहली बार कब और कहां उनकी कविताओं की पहचान या पसंद या समझ पैदा हुई। लेकिन कुछ ऐसे गीत हैं जिनके साथ कई यादों के टुकड़े अब भी ज़ेहन में लौट-लौटकर आते हैं। याद है कि अभी स्कूल में ही थी। जेठ की चिलचिलाती धूप में कहीं से लौटकर मैं मीनू के यहां आई थी दोपहर को। उसके म्यूज़िक सिस्टम पर "छोटी-सी कहानी से, बारिशों के पानी से (फिल्म - इजाज़त)" बज रहा था। उसके घर के ठंडे फर्श का अहसास, खिड़कियों पर गिरे हुए हरे पर्दे और कमरे में गूंजती आशा भोंसले की आवाज़ मेरे लिए बिन मौसम बरसात ले आई थी।

ये भी याद है कि सातवीं या आठवीं में ही थी जब अपनी सहेलियों के सामने बड़े गुरूर से पूछा था - "हमको मन की शक्ति देना गीत किसने लिखा है, मालूम है किसी को?" कोई नहीं जानता था, मुझे छोड़कर।

ये भी याद है कि चाचा की शादी 1990 में तय हुई तो उनके लिए गुलज़ार का ही गीत गाना चाहती थी - "एक बात सुनी है चाचाजी बतलानेवाली है"। डर के मारे सुनाया नहीं, ये बात अलग है।

कई बार अंत्याक्षरी में खुद से वायदा करती कि अगले पांच गाने सिर्फ गुलज़ार के गाऊंगी, एक तरह से खुद को चैलेंज भी करती - देखूं उनके कितने गीत याद हैं। "म" से मेरे लिए "मैंने तेरे लिए ही सात रंग के सपने चुने" पहला गाना होता। ये भी याद है कि तब पूरे-पूरे कैसेट खरीदने के पैसे नहीं होते थे। सो, हम विविध भारती, चित्रहार और रंगोली से सुनकर गीतों की लिस्ट बनाया करते और रांची के मखीजा टावर की एक दुकान से कैसेट रिकॉर्ड कराया करते। बीस रुपये में एक कैसेट! गुलज़ार के कई गीतों का कलेक्शन था हमारे पास, पंद्रह-सोलह साल की उम्र में ही। "हवाओं पे लिख दो हवाओं के नाम (दो दूना चार)", "दिन जा रहे हैं (दूसरी सीता)", "मुझे जां ना कहो मेरी जां (अनुभव)", "घर जाएगी तर जाएगी (खुशबू)", "धन्नो की आंखों में (किताब)", "सारे नियम तोड़ दो" (खूबसूरत) जैसे कई गीत हमने पहले सुने, फिल्म के बारे में बाद में जाना।

इंटरनेट तब नहीं था, ना हमारे घर-परिवार में कोई गुलज़ार का या ऑफबीट फिल्मों का फैन था। बल्कि हम तो वीसीआर पर "तोहफा", "ज़लज़ला", "कमांडो" जैसी मिथुन दा और जीतेन्द्र की फिल्में देखकर पले-बढ़े। लेकिन आज तक समझ नहीं पाई कि गुलज़ार के गाने हमतक कई बार फिल्म रिलीज़ होने के पहले कैसे पहुंच जाते थे। याद नहीं कि "मम्मो", "ग़ुलामी", "लेकिन", "दायरा", "जहां तुम ले चलो", "लिबास", "माया मेमसाब" जैसे फिल्मों के गीत कहां से और कब पहले वॉकमैन और फिर गाड़ी के टेप रिकॉर्डर पर बजे। हां, मेरा भाई ज़रूर मेरा partner-in-crime रहा। हम चुन-चुनकर नए-पुराने गाने लाते और सुनते-सुनाते।

मैं पहली बार रांची से छुट्टियां बिताकर दिल्ली कॉलेज हॉस्टल आ रही थी तो हमने "माचिस" का एक कैसेट लिया था और एक रिकॉर्ड करवाया था ताकि मैं एक कैसेट दिल्ली लेकर आ सकूं। "छोड़ आए हम वो गलियां" और "भेज कहार पिया जी बुला लो" सुनकर मुझपर पूरे रास्ते क्या असर रहा था, ये मैं आज भी शब्दों में बयां नहीं कर सकती।

ये भी याद है कि भाई को मैंने बड़ा हैरान होकर बताया था, "संजय दत्त वाली खूबसूरत का गाना गुलज़ार का है, मालूम है?" ये भी याद है कि कई दिनों तक छुप-छुपकर "आस्था" के गीत सुने थे। इस फिल्म की खूब चर्चा हो रही थी अख़बारों में और हम नहीं चाहते थे कि घर के बड़ों को पता चले कि इस फिल्म के बारे में भी ना सिर्फ हम जानते हैं, बल्कि गाने भी खूब सुनते हैं! "तुम्हीं से जन्मूं तो शायद मुझे पनाह मिले" का मतलब आज सालों बाद थोड़ा-थोड़ा समझ में आया है। ये भी याद है कि थर्ड इयर कॉलेज में हम "दिल से" के गाने खूब सुनते थे। सब "छय्या छय्या" पर नाचते और मैं "उंस" और "गुलबोश" जैसे शब्दों के मतलब तलाशती।

रूमानी हुई तो "सनसेट प्वाइंट" सुना, मस्ती में "गोली मार भेजे में" सुना, बारिश में "फिर से अइयो बदरा बिदेसी" सुना तो बच्चों के साथ "लकड़ी की काठी" सुना। लेकिन सिरहाने सपने तब भी जलाती थी, अब भी जलाती हूं। सीली हवा अब भी छूती है, सुरमई शाम अब भी आती है, वक्त अब भी जाता सुनाई देता है और खुशबू भी नज़र से छूती है। सोती हुई आंखों कैसे उड़ती हैं और आवाज़ की इक बूंद कैसे मिलती है, ये गुलज़ार के गीत सुन-सुनकर ही समझी हूं। दिल को पड़ोसी बनाना और चांद को गीतों में परोसना भी उन्हीं के नज़्मों से सीखा है। ये बात और है कि आज जब ब्रॉडबैंड भी है और ढेरों सीडी खरीदने के पैसे भी तो अब लफ्ज़ों की ये सारी हरकतें उस शिद्दत से महसूस नहीं करती।

लेकिन बच्चे जब "लकड़ी की काठी (मासूम)", "आकी चली बाकी चली (नमकीन)" और "पंगा ना ले (मकड़ी)" गाना सुनाने की फरमाइश करते हैं तो लगता है, हरकतें कहीं बाकी हैं। और जब मेरी ढाई साल की बेटी आधी नींद में मुझसे कहा - "चलो मम्मा चांद की मटकी तोड़ते हैं" तो लगा गुलज़ार के गीतों ने मुझे जो बनाया-बिगाड़ा, उसका मुकर्रर खिराज मैंने अदा कर दिया।

तुम दोनों के लिए


इन जागती-सोती आंखों में सपनों की आंखमिचौली है
तेरी आधी नींदिया में जब अपनी नींद टटोली है।

दुनिया जब लगती बेमानी और मन खाली-सा लगता हो,
सन्नाटों की कड़वाहट में तब तुमने मिश्री घोली है।

जब रिश्ते ढ़ीले पड़ते हों और घर में दूरी बढ़ती हो
तब यूं ही रूठे लोगों की तू
एक नई हमजोली है।

ना काफ़िर हूं ना पंडित हूं, ना सज्दे में ही झुकता हूं,
फिर भी आयत-सी क्यों लगती बच्चे तेरी बोली है।


ऐसा नहीं कि सब जानूं, ना ही कोई मैं ज्ञानी हूं
लेकिन तेरे संग प्यारे इल्म की दुनिया खोली है।

Sunday, October 10, 2010

बेटे के जन्मदिन पर अम्मा को ख़त


है कौन-सी ऐसी पगडंडी, जन्नत तक जाती हो अम्मा
जिसपर कम हो थोड़ी फिसलन
और सर पर हो तेरा आंचल
वो कौन-सी ऐसी राहें हैं जो तुझतक आती हो अम्मा।

क्यों कहती हो परवाज़ लो,
क्यों उड़ने को हूं मैं मजबूर
वो कौन-सी ऐसी दुनिया है जो मेरी थाती हो अम्मा।

देखो मेरे छोटे पैर,
कितना थकते और हैं कमज़ोर
फिर दूर देश ही जाने की क्यों बात बताती हो अम्मा।

कहती हो, बड़ा बनोगे तुम
और घर की शान भी होगे तुम।
फिर बड़े हमारे पापा को कितना सताती हो अम्मा।

देखा है छुप-छुपकर तुमको
तुमने जोड़ी हर पाई है।
इतनी छोटी-सी चादर में कैसे काम चलाती हो अम्मा।

उन पनियल आंखों की तो
बोली भी मैं जानता हूं।
लेकिन फिर भी तुम भोली हो, अब बात छुपाती हो अम्मा।