Sunday, February 28, 2010

शुभ हो होली

रंग-रंग छाए शाख-शाख पर,
रंग-रंग की है दिखती क्यारी।
रंग मेरी आंखों में उतरा
और हाथों में पिचकारी।

मौसम में आई है नरमी
गीतों में फाग लगे घुलने।
टेसू के जंगल छाएं हैं
लहकी है दुनिया सारी।

ये रंग मैं तेरे नाम करूं
जो मुझको-तुझको रंगता है।
इस रंग की नेमत ऐसी है
जिससे घर में है किलकारी!

आई होली शुभ हो अपनी,
रंगों की ही हो फुलवारी।
ये दिन हो रंगीन, साल भी,
घर आएं खुशियां सारी।

Thursday, February 25, 2010

हो बाबू

उसकी कहानी मुझे भूलती नहीं। बचपन में सुना था 'हो बाबू' के बारे में। तब लड़की या औरत होने की खूबी-खामियों का अहसास भी नहीं था, ना फेमिनिज़्म या स्त्रीवाद से कोई परिचय था। यूं कहूं कि हो बाबू को मैंने पहली फेमिनिस्ट के तौर पर जाना तो अतिशयोक्ति ना होगी। उस महिला की कहानी ऐसे ज़ेहन में बसी है कि लगता है उसे मैंने बहुत करीब से जाना है, देखा-परखा-समझा है।

ऐसी ही कोई दोपहर रही होगी जब रांची के घर में पीछे के आंगन में खाट पर हम सब धूप सेंक रहे थे। तब वक्त हमारी मर्ज़ी से चलता था, हम अपनी सांस-सांस जीते थे। मां, चाची, दादी की गोद में सिर रखे घंटों गुज़र जाते थे लेकिन दिन ढ़लने का कोई मलाल ना होता था। घंटों-घंटों घर की महिलाएं अपने नैहर की कहानियों से दोपहर गुलज़ार करती थीं। उन्हीं किस्सों-कहानियों के रंग बुने जा रहे स्वेटरों, कढ़े जा रहे चादरों में उतरते थे। ऐसे पक्के रंग थे कि बीसियों साल बाद भी फीके ना पड़ें।

अनजाने में ही मैं अपनी मां की गर्दन पकड़कर झूल गई। मां ने परे हटाते हुए कहा, "मत तंग करअ हो बाबू।'' मां का इतना कहना भर था कि चाची को हो बाबू की कहानी याद आ गई।

गोपालगंज के एक गांव की हैं मेरी चाची। शादी नब्बे में हुई, और पहली बार अपने शहर, इलाके से बाहर निकलीं तो सीधा ससुराल ही पहुंची, हमारे दादाजी के घर रांची। बताती हैं कि ट्रेन पर भी पहली बार वो रांची आने के लिए ही चढ़ीं। गांव उनका निहायत ही पिछड़ा। लड़कियों की पढ़ाई सातवीं के बाद बंद हो जाती थी। जो अच्छे घरों की थीं, बियाह-शादी के नाम पर मैट्रिक-इंटर पास कर लेती थीं, वो भी प्राइवेट से। गांव में सवर्ण कम, पिछड़ी जातियों के परिवार ज़्यादा थे। लेकिन ज़ाहिर है, बोलबाला सवर्णों का ही था। गांव की आधी से ज्यादा आबादी का गुज़ारा सवर्णों के खेत-खलिहानों और घरों में काम कर चलता था।

तो चाची के यहां भी बिसेसरा और बिसेसरा बो (बिसेसरा की पत्नी) काम करते थे। बिसेसर का नाम विश्वेशर रहा होगा, लेकिन उसका अपभ्रंश रूप ही सबकी ज़ुबान पर चढ़ा। बिसेसर खेत में मज़दूरी करता और उसकी पत्नी घर में अनाज फटकने, भंडारघर साफ करने, दूध औटाने, दही जमाने का काम करती थी। मांग में टह-टह पीला सिंदूर, सांवले माथे पर चांद-सा बिंदा (चाची ने उसके आकार के अनुरूप बिंदा कहा, बिंदिया नहीं), कलाइयों में दर्जन-दर्जन भर कांच की रंग-बिरंगी चूडियां, पैरों में चमकता आलता और सीधे पल्ले की सूती साड़ी, जो सिर से ना सरकती थी। बिसेसरा बो के रूप का बखान तो जैसे मेरे मन में उतर गया और मैं उसकी कायल होने लगी।

लेकिन यहीं कहानी में नया मोड़ आ खड़ा हुआ। बिसेसर में एक ही ऐब था (एक ही?), वो शराब बहुत पीता था। शराब पीता तो होश में ना रहता और बेचारी बिसेसरा बो को जूतियाते-लतियाते उसकी वो हालत करता कि अगले दिन उसकी शक्ल पहचान में ना आती। लेकिन मांग का सिंदर फीका ना पड़ता ना ही बिंदा बिंदिया बन जाता। बिसेसरा बो अगले दिन चौके में चूड़ियां खनकाते ऐसे काम में जुटी पाई जाती कि जैसे कुछ हुआ ही नहीं। तो भला बिसेसर को भी कोई क्यों टोकता-समझाता। दिन-महीने-साल ऐसे ही गुज़रते चले गए। बिसेसर बो कूटती रही, बिसेसर सुबह-दर-सुबह कभी घर के बाहर, कभी खेतों में लुढ़का हुआ मिलता रहा। लेकिन किसी ने बीचबचाव करने की ज़रूरत ना समझी।

एक सुबह बिसेसर बो बड़ी खिली-खिली-सी चाची की मां के पास जाकर बैठी। ''काकी, हमरो खातिर अइसन टोपी मोजे बनवा देबू ना?''

''हां रे बिसेसर बो, तू अच्छी खबर तो ला, हम तेरे लिए पूरा जामा सिल देंगे।''

''तो काकी, बबुनी के कह द। सिल दीहें। चार महीना के बाद हम बबुआ लेकर आएब तोहरा आंगन में। काकी, काम हम तबहुं पूरा कर लेब। पीठ पर बबुआ के बांधल-बांधल सब हो जाई। बस काकी, तू हमरा खातिर जामा बनवा द।''

''चार महीने में? क्यों रे बिसेसरा बो? तुझे पहले पता नहीं चला क्या? अभी बता रही है। पता नहीं पिछले दिनों कितना भारी-भारी काम करवाया तुझसे। तेरे बच्चे को कुछ हुआ तो पाप हमें लगेगा।''

बिसेसरा बो ने दांत से जीभ काटी। ''ना काकी, हम सब क लेब। कुछ ना होई। तू देखत जा बस।''

मालिकों के घर में तो सबको समझा दिया बिसेसरा बो ने, लेकिन अपने पति को ना समझा पाई। लात-जूते-घूंसे बरसने का क्रम फिर भी चालू रहा। पता नहीं किस मिट्टी की बनी थी बिसेसरा बो कि अपने साथ-साथ अपने बच्चे को भी संभाले रखा।

बेटी हुई थी बिसेसरा को। रंग मां जैसा ही सांवला, लेकिन आंखे गोल-गोल कजरारी। बाल साईं बाबा से थे, ऐसे घूंघराले कि खींचो तो स्प्रिंग जैसे वापस लौट जाएं। दिन भर आंगन में लेटी-लेटी बिंदिया (मां ने उसे यही नाम दिया था) किलकारियां मार-मार कर सबको बुलाती रहती। ऐसी प्यारी थी कि पत्थर भी पिघल जाए, अनजान लोगों का भी दिल जीत ले।

बिंदिया छह-साढ़े छह महीने की हुई होगी। बिसेसर पर एक रात फिर भूत सवार हुआ। नशा था कि उसपर हावी होते ही दरिंदा बना छोड़ता था। जो हाथ में मिला, उसने अपनी घरवाली को उसी से पिटना शुरू कर दिया। बिसेसरा बो पिटती रही, लुढ़ककर कभी इस कोने गिरे, कभी उस कोने। तभी बिसेसर को जाने क्या सूझी कि उसने बालों से अपनी नन्हीं-सी बेटी को पकड़ा और उसे मां के ऊपर फेंक दिया। बिसेसर बो के तो जैसे होश ही उड़ गए। या बल्कि तब होश में आई वो। उसने बेटी को संभाला, रो-रोकर नीली पड़ती बेटी को चुप कराने के लिए कमरे से बाहर निकल गई। बेटी चुप हुई तो वो वापस कमरे में लौट आई। खटिया पर बेटी को लिटाया और अचानक उसका रूप ही बदल गया। अब बिसेसरा बो पर चंडी सवार थी। अपने पति की लाठी से ही उसने जीभर को उसकी मरम्मत की। सात सालों के ब्याह में जो उसने ना किया, आज कर रही थी। पति चीखता-चिल्लाता, धमकियां देता। लेकिन बिसेसरा बो की लाठी ना रुकी। अपने अधमरे पति को उसने घर से निकाल बाहर खेत में डाल दिया।

अगली सुबह वो घर आई तो लोग उसे देखते रह गए। कसकर पीछे बंधे बालों पर नीली पगड़ी, पति का झूलता कुर्ता, लाल पाढ़ वाली मटमैली धोती और हाथ में लाठी - बिसेसरा बो को ये क्या हो गया था?

आजी ने चिढ़कर पूछा, ''का हो गइल बा तहरा हो बाबू? इ का रंग-रूप ह?''

उसका जवाब था, ''अब इहे रूप रही आजी। हम हो बाबू हो गइनी। अपन बेटी के माई भी हम, बाप भी हम। कहब त राउर दुआर छोड़ देब लेकिन इन रूप ना छोड़ब।''

कुछ दिनों तक तो सबने सोचा, पति से नाराज़गी है, उतर जाएगी। गांववाले किस्म-किस्म की बातें करते रहे, कई अफवाहें भी उड़ीं। लेकिन हो बाबू टस से मस ना हुई। दिन-दर-दिन बेटी को बगल में दबाए वो काम पर उसी वेशभूषा में लौटती रही। सोनहुला गांव की हो बाबू के चर्चे दूर-दूर तक पहुंचे। लेकिन किवंदती बनी हो बाबू के अंदर की मां को किसी ने नहीं सराहा। जो पत्नी पिटती रही, वो मां ज़ुल्म बर्दाश्त ना कर सकी। अपनी बेटी के जहां की कोई खुशी उसे गवारा ना थी।

सुनती हूं कि उस बेटी को हो बाबू ने गोपालगंज पढ़ने भेजा, और आज वो किसी हाई स्कूल में पढ़ाती है। हो बाबू का आंगन नवासों से गुलज़ार है, लेकिन उनका रूप नहीं बदला। पगड़ी के नीचे के बाल चांदी हो गए, लेकिन पगड़ी का रंग फीका ना पड़ा। आज भी हो बाबू कलफ वाला कुर्ता और लाल किनारे वाली धोती के साथ खादी का गमछा लटकाए घूमती हैं।

Wednesday, February 24, 2010

लक्ष्य

राजू तेज़ी से अपनी टोकरी संभालने में लग गया। हटिया-दिल्ली स्वर्ण जयंती एक्सप्रेस के पहुंचने का वक्त हो चला था। मुरी स्टेशन पर लगातार खियाई हुई आवाज़ में उदघोषक ट्रेन के प्लेटफॉर्म नंबर दो पर आने की सूचना दोहराए जा रहा था।

यहां से बोकारो तक झालमुढ़ी बेचकर राजू की अच्छी कमाई हो जाती है। फिर वो गया या पटना की ओर से आनेवाली कोई ट्रेन पकड़कर वापस मुरी पहुंच जाता है। भूख लगी तो प्लेटफॉर्म पर ही कहीं से चाय-पावरोटी खरीदी और खोमचे को माथे से लगाए, दाहिने हाथ से कसकर जकड़े हुए बाएं हाथ का तकिया बनाकर सो रहना - कई रातें तो ऐसे ही स्टेशनों पर कटती हैं। परिवार के नाम पर एक बूढ़ी दादी है जो मुरी स्टेशन के बाहर भीख मांगती है। होश संभाला तब से राजू को दादी को ऐसे ही देखा है, इतनी ही बूढ़ी, ऐसी ही मलिन, इतनी ही झुकी हुई। प्लेटफॉर्म राजू का घर है, और बाहर की जो दुनिया उसने देखी है, ट्रेन के डिब्बों में बैठे रंग-बिरंगे मुसाफिरों के रूप में देखी है। हां, एक नया जानकार बना है राजू का। खुद को असलम भैया बताता है। साफ-सुथरे कपड़े, हाथ में कपड़े का झोला, झोले से बाहर झांकती किताबें और पत्र-पत्रिकाएं - सूरत-सीरत से तो असलम भैया किसी इज़्जतदार घर के होनहार वारिस नज़र आते हैं। लेकिन प्लेटफॉर्म पर लावारिसों के बीच बैठना, बातें करना और एक छोटी-सी बही में लाल स्याही से कुछ लिखते रहना, राजू के हिसाब से असलम भैया को ये शोभा नहीं देता।

आज फिर असलम भैया ने पकड़ लिया था उसे। एक लंबी सूची लिए उससे सवाल पूछने बैठे। नाम, पता, उम्र, पढ़ाई... अब बताओ भला। प्लेटफॉर्म पर घर बनानेवालों के आगे-पीछे भी कोई होता है क्या। अब असलम भैया एक और सवाल बार-बार पूछे जा रहे थे। "लक्ष्य राजू लक्ष्य, मकसद क्या है जीने का। कुछ तो करना चाहते होगे ज़िन्दगी में। आखिर लक्ष्य क्या है तुम्हारा?" ये लक्ष्य कौन से नए परिंदे का नाम है। हमारा लक्ष्य क्या होगा। झालमुढ़ी बेचना, एजेंटों को खोमचे की कमाई से वक्त पर हिस्सा पहुंचाना, दादी का पेट भरना और चैन की नींद सो जाना। इसके परे तो राजू ने दुनिया जानी ही नहीं।

भला हो असलम भैया का। आज उनके चक्कर में स्वर्ण जयंती छूटते-छूटते रह गई। सबसे ज्यादा कमाई इसी ट्रेन से होती है राजू की। लोग खा-पीकर रांची स्टेशन से चढ़ते हैं। मुरी तक पहुंचते-पहुंचते चाय और नाश्ते की तलब सताने लगती है। फिर झालमुढी के साथ चाय पीने का मज़ा ही कुछ और है।

राजू ने एस७ से शुरुआत की। ट्रेन करीब-करीब खाली थी। ऑफ-सीज़न था। लोग छुट्टियों, त्योहारों या दाखिलों के दौरान ज्यादा सफ़र करते हैं। लेकिन अगस्त में तो सफर करने की ऐसी कोई वजह कम ही होती है लोगों के पास। पूरे डिब्बे में किसी ने झालमुढ़ी नहीं खरीदी। राजू अगले डिब्बे की ओर बढ़ा। "मुढ़ी, मुढी, झालमुढ़ी...", हर कूपे पर रूककर राजू बड़ी उम्मीद से आवाज़ लगाता, लेकिन आज जैसे पूरी ट्रेन किसी मातमपुरसी के लिए जा रही थी। ना किसी को चाय पीनी थी ना मूढ़ी खानी थी।

तभी पीछे से एक बच्चे के रोने की आवाज़ आई। "नहीं खाएंगे। चावल भी नहीं, अंडा भी नहीं, पराठा भी नहीं। कुछ नहीं खाएंगे।"

मां बिचारी फिर मनुहार में लगी रही। "बाबू, एक कौर। सोना, एक बार मुंह में डाल लो।"

"नहीं, नहीं, नहीं।" बच्चा अपनी जिद पर कायम था।

"आंटी, बाबू को झालमुढ़ी खिलाईए ना। मुंह का स्वाद बदलेगा। एकदम इस्पेसल बनाएंगे बाबू के लिए। बिना मिर्ची वाला। मुढ़ी से पेट भी भरेगा। एक दोना बनाएं क्या?"

"नहीं रे भाई। ई सब अंट-संट हम बाबू को नहीं खिलाते हैं। पेट खराब होगा इसका। देखते हो, मिनरल वाटर भी खौलाकर देते हैं बाबू को। झालमुढ़ी नहीं। आगे ले जाओ।"

राजू फिर भी बड़ी उम्मीद से बच्चे को देखता रहा। क्या पता बच्चे की ज़िद में ही सही, उसकी बोहनी हो जाए।

तभी उसे करीब-करीब धक्का देते हुए पीछे से एक और खोमचेवाला निकला। टोकरी में सजे हुए रंगीन पैकेट - कुरकुरे, लहर नमकीन, अंकल चिप्स, चॉकलेट, केक, बिस्कुट और ना जाने क्या क्या। उसे देखते ही बच्चे का चेहरा कुछ यूं खिला जैसे सूरज को देखकर सूरजमुखी का खिलता है। बच्चे से झट से कुरकुरे की फरमाईश कर डाली। उबला हुआ मिनरल वॉटर पिलानेवाली मां ने बच्चे की इच्छा पूरी करने में बिल्कुल देर नहीं की।

राजू को भी ज़िन्दगी का लक्ष्य मिल गया था। कल असलम भैया से मिलेगा तो कहेगा कि उसकी ज़िन्दगी को भी मकसद मिल गया है। वो झालमुढ़ी की जगह अब कुरकुरे और चिप्स बेचना चाहता है!

Thursday, February 18, 2010

मैं घुमन्तू

कहीं रुकता ठहरता नहीं ये मन,
दर-दर की ठोकर फितरत है।
कभी यहां रुके, कभी उधर चले,
मंज़िल की किसको हसरत है।

रस्ते में हमको लोग मिले,
कुछ संग चले, कुछ छूट गए।
इनसे ही सीखा जीना भी,
इन लोगों से ही बरकत हैं।

मन है कि ढूंढे दर्द नए
कभी किस्सों में, कभी नज्‍मों में
शब्दों की हेरा-फेरी है,
पर दर्द ही अपनी किस्मत है।

मन देश-देश की सैर करे,
कूचे-कस्बे में क्यों भटके।
कहते हैं, पैरों में पहिए हैं
और घुमन्तुओं की सोहबत है।